भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ७८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
•बद्धानां युगपदनुष्ठानाशक्तेः सामर्थ्यात् क्रमप्राप्तौ तद्विशेषापेक्षायां पाठादयस्तद्भेदनिर्णमाय प्रभवन्ति, यत्र तु न शेषशेषिभावो नाप्येकाधिकारावच्छेदो यथा सौर्य्यार्य्यमणप्राजापत्यादीनां तत्र क्रमभेदापेक्षा-भावान्न पाठादिः क्रमविशेषनियमे प्रमाणम्, अवर्जनीयतया तस्य तत्रागतत्वात् । न चेह धर्मब्रह्मजिज्ञासयोः शेषशेषिभावे श्रुत्यादीनामन्यतमं प्रमाणमस्तीति ॥
ननु शेषशेषिभावाभावेऽपि क्रमनियमो दृष्टः, यथा गोदोहनस्य पुरुषार्थस्य दर्शपूर्णमासिकैरङ्गैः सह, यथा वा दर्शपूर्णमासाभ्यामिष्ट्वा सोमेन यजेतेति दर्शपूर्णमाससोमयोरशेषशेषिणोरित्यत आह
भामती-व्याख्या
और एक ही अमावास्या और पौर्णमासी तिथि में किए जाते हैं। अतः उक्त द्विविध कर्मों का सहानुष्ठान करना है, किन्तु युगपत् सभी कर्मों का अनुष्ठान सम्भव नहीं, फलतः किसी क्रम का अवलम्बन कर साङ्ग प्रधान कर्म का सम्पादन करना होगा, क्रम विशेष का निर्णय करने के लिए पाठ, स्थानादि प्रमाणों की अपेक्षा होती है। जिन कर्मों में न तो शेष-शेषिभाव होता है और न एक ही अधिकारी व्यक्ति के द्वारा सम्पादनीयत्व, जैसे—सौर्य, आर्यमण और प्राजापत्यादि [ सौर्यं चरुं निर्वपेद् ब्रह्मवर्चसकामः” ( तै० सं० २।३।२।३ ), आर्यम्णे चरुं निर्वपेत् सुवर्गकामः” ( तै० सं० २।३।४।१ ) “प्राजापत्यं चरुं निर्वपेच्छतकृष्णलमायुष्कामः” ( तै० सं० २।३।२।१ ) ] कर्मों में क्रम की अपेक्षा ही नहीं, अतः क्रम-विशेष-बोधक पाठादि प्रमाणों का उपयोग नहीं होता। फिर भी उन कर्मों का युगपत् ( एक काल में ) अनुष्ठान न होकर किसी-न किसी क्रम से होता है। वह क्रम वहाँ अवर्जनीय होने के कारण स्वभाव-सिद्ध है, किसी प्रमाण से प्रयुक्त नहीं। प्रकृत ( कर्मावबोध और ब्रह्म-जिज्ञासा ) में शेषशेषिभाव ( अङ्गाङ्गि-भाव ) किसी प्रमाण से सिद्ध नहीं, अतः ब्रह्म-जिज्ञासा में कर्मावबोधानन्तर्य आवश्यक नहीं।
शङ्का—शेषशेषिभाव न होने पर भी क्रम का नियम देखा जाता है, जैसे गोदोहन पात्र में जल-प्रणयन और दर्शपूर्णमास कर्म के अङ्गों में क्रम माना जाता है [दर्शपूर्णमास कर्म के अङ्ग कलाप का आरम्भ जल-प्रणयन से होता है। आचमन के लिए किसी पात्र में जल भर कर रखना जल-प्रणयन कहलाता है। सामान्यतया “चमसेनापः प्रणयेत्” ( आप० श्रौ० सू० ११।१।३ ) इस विधि के द्वारा चमस नाम के काष्ठमय पात्र में जल-प्रणयन किया जाता है, पशुरूप अवान्तर फल के उद्देश्य से उस मृण्मय पात्र में जल-प्रणयन विहित हैं, जिसमें गो दुही जाती है—“गोदोहनेन पशुकामस्य” ( आप० श्रौ० सू० १।१६।२ )। यद्यपि दर्शपूर्णमास का अङ्गभूत जल-प्रणयन गोदोहन में किया जाता है, अतः गोदोहन पात्र में कर्माङ्गत्व और उसका पशु-कामना रूप स्वतन्त्र फल कीर्तित है, अतः गोदोहन में पुरुषार्थत्व ( पुरुषाङ्गत्व ) भी प्रतीत होता है, तथापि गोदोहन में पुरुषार्थत्व माना गया है—“यस्मिन् प्रीतिः पुरुषस्य लिप्सार्थ-लक्षणाऽविभक्तत्वात्” ( जै० सू० ४।१।२ ) ! यद्यपि गोदोहन दर्शपूर्णमासरूप क्रतु (यज्ञ) का उपकारक है, तथापि इतने मात्र से गोदोहन मात्र में क्रत्वङ्गत्व नहीं माना जा सकता, क्योंकि पुरुषार्थभूत गोदोहन से भी क्रतु का उपकार सिद्ध हो जाता है। फलतः गोदोहन और दर्शपूर्णमास का अङ्गाङ्गिभाव न होने पर भी यह क्रम माना जाता है कि गोदोहन पात्र में जल-प्रणयन कर लेने के पश्चात् ही दर्शपूर्णमास के पूर्वाङ्गों का अनुष्ठान किया जाता है ] वैसे ही प्रकृत में कर्मावबोध और ब्रह्म-जिज्ञासा का क्रम ( पूर्वापरभाव ) क्यों नहीं माना जा सकता ?
अथवा “दर्शपूर्णमासाभ्यामिष्ट्वा सोमेन यजेत” इस वाक्य में ‘क्त्वा’ प्रत्यय के द्वारा दर्शपूर्णमास और सोमयाग का क्रम माना जाता है, वैसे ही धर्म-जिज्ञासा और ब्रह्म-जिज्ञासा