भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७७
तथेह क्रमो विवक्षितः, शेषशेषित्वेऽधिकृताधिकारे वा प्रमाणाभावात् , धर्मग्रह-
भामती आह ॐ शेषशेषित्वे प्रमाणाभावात् ॐ । शेषाणां समिदादीनां शेषिणाम्नाग्नेयादीनामेकफलवदुपकारोप- निबद्धानामेकफलावच्छिन्नानामेकप्रयोगवचनोपगृहीतानामेकाधिकारिकर्तृकाणामेकपौर्णमास्यमावास्याकाल-
भामती-व्याख्या पशु-याग का स्थान माना जाता है, अतः 'स्थान' प्रमाण के आधार पर सवनीय पशु, उसके पश्चात् अग्नीषोमीय और अन्त में आनुबन्ध्य पशु का अनुष्ठान किया जाता है—"सौत्येऽहनि अग्नीषोमीयसवनीयानुबन्ध्यान् पशून् क्रमेण सहैव ( तन्त्रेण ) सवनीयकाले आलभेत । तत्र स्थानित्वात् सवनीयः स्वस्थान न जहाति, अग्नीषोमीयस्तु स्वस्थानात् प्रच्यावितः सवनीया-त्पश्चाद् भवति" ( कात्या. श्रौ. सू. व्या. २२।३।२८ ) ।
( ५ ) 'मुख्य' का अर्थ प्रधान है, प्रधान कर्म के क्रम से अङ्ग कर्मों का अनुष्ठान करना मुख्य-क्रम कहलाता है । जैसे कि दर्शयाग में तीन प्रधान कर्मों के तीन हवि द्रव्य होते हैं—( १ ) आग्नेय पुरोडाश, ऐन्द्र दधि और ऐन्द्रं पयः । “प्रयाजशेषेण हवींषि अभिघारयति"—इस वाक्य के द्वारा प्रयाज-शेष ( प्रयाज कर्मों के अनुष्ठान से बचे हुए घृत ) से उक्त तीनों हवियों का अभिधारण विहित है । पहले किस हवि का अभिधारण होगा और पश्चात् किसका ? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि प्रधान कर्मों का अनुष्ठान जिस क्रम से होता है, उसी क्रम से उनके हवियों का अभिधारण भी करना चाहिए । आग्नेय याग का अनुष्ठान पहले होता है, उसके पश्चात् ऐन्द्र याग का, अतः आग्नेय हवि ( पुरोडाश ) का अभिधारण पहले और उसके पश्चात् क्रमशः ऐन्द्र दधि और ऐन्द्र पयः का अभिधारण किया जाता है—इसी का नाम मुख्य-क्रम है ।
( ६ ) “सप्तदश प्राजापत्यान् पशूनालभते" ( तै. ब्रा. ३।४।३ ) इस वाक्य के द्वारा प्रजापति देवता के उद्देश्य से सत्तरह पशुओं ( छागों ) का अनुष्ठान विहित है । पशुओं के उपाकरण ( मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्पर्श और सम्प्रदानभूत देवता का निर्देश ), नियोजन ( यूप में पशु को बाँधना ) और पर्यग्निकरण आदि जो संस्कार विहित हैं, उनका किस क्रम से अनुष्ठान किया जाय ? इस प्रश्न का उत्तर है—प्रवृत्तिक्रम से [ उपाकरण जिस पशु से आरम्भ कर जिस पशु में समाप्त किया, उसी क्रम से नियोजनादि अङ्गों का अनुष्ठान प्रवृत्ति-क्रम कहलाता है ] । उनमें से कर्मावबोध और ब्रह्म-जिज्ञासा का क्रम ( पौर्वापर्यभाव ) यदि श्रुति और अर्थ ( प्रयोजन ) के आधार पर नहीं हो सकता, तब पाठ, स्थान, मुख्य और प्रवृत्ति के द्वारा सम्भव हो जायगा ।
समाधान - उक्त शंका का परिहार करते हुए भाष्यकार ने कहा है—शेषशेषित्वे प्रमाणाभावात्" । “शेषः परार्थत्वात्" ( जै. सू. ३।१।१ ) इस सूत्र में 'शेष' शब्द का अर्थ अङ्ग और उसका लक्षण किया गया है - परार्थ्य । जो पदार्थ किसी पर ( प्रधान ) को अपने सहयोग से सम्पन्नता या पूर्णता प्रदान करता है, उसे शेष कहते हैं । शेष का लक्षण कर देने से शेषी ( अङ्गी ) का लक्षण अपने-आप सिद्ध हो जाता है —
शेषलक्षणमात्रोक्तावर्थात्स्याच्छेषिलक्षणम् ।
अतः शेषः परार्थत्वादित्युक्तं शेषलक्षणम् ।। ( तं० वा० पृ० ६५३ )
समिध् , तनूनपातादि प्रयाज कर्म शेष हैं उनके शेषी ( अङ्गी ) हैं—आग्नेयादि याग । शेष और शेषी—दोनों एक स्वर्गरूप फल के उद्देश्य से विहित हैं । दोनों एक ही प्रयोग-विधि के द्वारा गृहीत हैं, दोनों एक ही अधिकारी ( स्वर्गकामनावान् ) व्यक्ति के द्वारा सम्पादनीय हैं