भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
|---|
भामती तथैवानियमप्रदर्शनात्— "यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद्वा वनाद् वा" इति। एतावता हि वैराग्यमुपलक्षयति। अत एव "यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत्" इति श्रुतिः। निन्दावचनं चाविशुद्धसत्त्वपुरुषाभिप्रायम्। अविशुद्धसत्त्वो हि मोक्षमिच्छन्नालस्यात्तदुपायेष्वप्रवर्त्तमानो गृहस्थधर्ममपि नित्यनैमित्तिकमनाचरन् प्रतिक्षणमुपचीयमानपाप्माऽधोगतिं गच्छतीत्यर्थः। स्यादेतत्— मा भूच्छ्रौत आर्थो वा क्रमः, पाठस्थानमुख्यप्रवृत्तिप्रमाणकस्तु कस्मान्न भवतीत्यत
भामती-व्याख्या भाव विवक्षित नहीं, अन्यथा "यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद्वा" (जाबालो. ४) इस श्रुति के द्वारा प्रतिपादित अनियम का सामञ्जस्य नहीं रहता। इस अनियम के द्वारा एकमात्र वैराग्य को परिव्रज्या में कारण ध्वनित किया गया है, श्रुति स्पष्ट कहती है— "यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्" (जाबालो. ४)। "अनधीत्य द्विजो वेदान्" इत्यादि निन्दा-वचन उस व्यक्ति के लिए लागू होते हैं, जिसका अन्तःसत्त्व अविशुद्ध है, क्योंकि अविशुद्धसत्त्ववाला व्यक्ति यदि मोक्ष की इच्छा करता है, तब वह आलस्य के कारण नित्यादि कर्मों का भी परित्याग कर बैठता है और शमादि का पालन भी नहीं करता, अतः प्रतिक्षण उपचीयमान पाप-राशि से दब कर अधोगति को प्राप्त होता है।
शङ्का— क्रम या पौर्वापर्यभाव के नियामक (१) श्रुति, (२) अर्थ, (३) पाठ, (४) स्थान, (५) मुख्य और (६) प्रवृत्ति नाम के छः प्रमाण मीमांसा दर्शन के पञ्चम अध्याय में वर्णित हैं [(१) क्रम या पूर्वापर काल के वाचक शब्द को यहाँ श्रुति पद से अभिहित किया गया है, जैसे "वेदं कृत्वा वेदीं करोति" इत्यादि स्थलों पर 'क्त्वा' प्रत्यय पूर्वकाल का वाचक होने के कारण 'श्रुति' कहलाता है, अतः एक मुट्ठी कुशा को बीच से मोड़-तोड़ कर एक गाँठ लगा दी जाती है, उसे वेद कहते हैं, वेद का निर्माण कर लेने के पश्चात् ही वेदी का निर्माण किया जाता है।
(२) 'अर्थ' शब्द प्रयोजन का वाचक है, प्रयोजन या साध्य-साधनभाव के आधार पर ओदनादि का पाक पहले और अग्निहोत्रादि कर्म का अनुष्ठान पश्चात् किया जाता है।
(३) "समिधो यजति वसन्तमेवर्तूनामवरुन्धे, तनूनपातं यजति ग्रीष्ममेवावरुन्धे, इडो यजति वर्षा एवावरुन्धे, बर्हिर्यजति शरदमेवावरुन्धे, स्वाहाकारं यजति हेमन्तमेवावरुन्धे" (त. सं. २।६।१।१) यहाँ पर समिधादिसंज्ञक पाँच प्रयाज कर्मों के विधायक पाँचों वाक्यों का पाठ जिस क्रम से है, उसी क्रम से उन कर्मों का अनुष्ठान किया जाता है, इस क्रम को पाठ-क्रम कहते हैं।
(४) ज्योतिष्टोम नाम के प्रकृतिभूत कर्म का अनुष्ठान पाँच दिनों में सम्पन्न होता है, अत एव उसके अङ्गभूत 'अग्नीषोमीय, सवनीय और आनुबन्ध्य'—इन तीन पशु-यागों का अनुष्ठान भिन्न-भिन्न दिनों में होता है—सर्वप्रथम अग्नीषोमीय पशु-याग का अनुष्ठान चतुर्थ दिन में, सवनीय पशु-याग का अनुष्ठान पञ्चम दिन प्रातःसवन के पश्चात् और आनुबन्ध्य-याग का अनुष्ठान पञ्चम दिन में ही अवभृथ कर्म के अनन्तर किया जाता है।
प्रकृति याग के सभी अङ्ग विकृति याग में लिए जाते हैं, किन्तु साद्यस्कसंज्ञक विकृति याग एक ही दिन में सम्पन्न किया जाता है। दीक्षादि सभी कृत्यों का सद्यः अनुष्ठान होने के कारण इस विकृति कर्म का नाम साद्यस्क है—"दीक्षादि सद्यः सर्वं क्रियते" (कात्या. श्रौ. सू. २२।३।२७)। कथित तीनों पशु-यागों का अनुष्ठान यहाँ एक ही सवन-काल में किया जाता है—"सह पशूनालभते" (कात्या. श्रौ. सू. २२।३।२८)। प्रकृति कर्म में सवन-काल सवनीय