भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंआनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७५
जिज्ञासोपपत्तेः । यथा च हृदयाद्यवदानानामानन्तर्यनियमः, क्रमस्य विवक्षितत्वात्
भामती
'वनी भूत्वा प्रव्रजेद्' इति जाबालश्रुतिर्गाहस्थ्येन हि यज्ञाद्यनुष्ठानं सूचयति । स्मरन्ति च—
“अधीत्य विधिवद् वेदान् पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः ।
इष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत् ॥”
निन्दन्ति च—
"अनधीत्य द्विजो वेदाननुत्पाद्य तथात्मजान् ।
अनिष्ट्वा चैव यज्ञैश्च मोक्षमिच्छन् व्रजत्यधः ॥” इति ।
इत्यत आह ॐ यथा च हृदयाद्यवदानानामानन्तर्यनियमः ॐ । कुतः 'हृदयस्याग्रेऽवद्यति अथ जिह्वाया अथ वक्षसः' इत्यथाग्रशब्दाभ्यां क्रमस्य विवक्षितत्वात्, न तथेह क्रमो विवक्षितः, श्रुत्या
भामती-व्याख्या
कहा है—“अग्निहोत्रं जुहोतीति पूर्वमाम्नातम्, ओदनं पचतीति पश्चात् । अर्थात् विपरीत: कार्य:।” पकी हुई यवागू (दलिया) अथवा पके चावल अग्निहोत्र कर्म की हवि होते हैं, अतः ] कर्मानुष्ठान से पश्चात्पठित यवागू-पाक प्रयोजन (साध्य-साधनभाव) क्रम को लेकर पहले किया जाता है और उसके अनन्तर अग्निहोत्र कर्म का अनुष्ठान किया जाता है। ऐसे ही वैदिक वाक्यों से अर्थावबोध न होने पर ब्रह्मजिज्ञासा सम्भव नहीं, अतः कर्मविबोध या वेदार्थविबोध के अनन्तर ब्रह्म-जिज्ञासा का जो अर्थक्रम रखा जाता है, वह यदि अर्थ (प्रयोजन या साध्य-साधनभाव) के आधार पर नहीं माना जा सकता, तब श्रुति (आनन्तर्यार्थक 'क्त्वा' आदि शब्दों) के आधार पर वह क्रम वैसे ही मानना होगा, जैसा कि “वेदं कृत्वा वेदीं करोति” इत्यादि स्थलों पर माना जाता है, क्योंकि यहाँ भी “गृही भूत्वा वनी-भवेद्, वनीभूत्वा प्रव्रजेत्” (जाबालो० ४) इस प्रकार जाबालोपनिषत् में 'गृहीभूत्वा'—इस 'क्त्वा' प्रत्ययरूप श्रुति के द्वारा गृहस्थ आश्रम का पालन करने के पश्चात् परिव्रज्या का क्रम प्रतिपादित है। 'गृही' पद के द्वारा कर्मानुष्ठान और 'परिव्रजति' पद से ब्रह्म-जिज्ञासा की सूचना की गई है। मनु जी भी कहते हैं—
अधीत्य विधिवद्वेदान् पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः ।
इष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत् ॥ ( मनु० ६।३६)
[ विधिवत् वेदाध्ययन, पुत्रोत्पत्ति और वनस्थ यज्ञादि-अनुष्ठान के द्वारा क्रमशः ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रम सूचित किये गये हैं ] केवल इतना ही नहीं, वेदाध्ययनादि के बिना मुमुक्षा सरणि का अनुसरण अधःपतन का कारण माना गया है—
अनधीत्य द्विजो वेदाननुत्पाद्य तथा सुतान् ।
अनिष्ट्वा चैव यज्ञैश्च मोक्षमिच्छन् व्रजत्यधः ॥ ( मनु० ६।३७)
समाधान—उक्त शङ्का का समाधान करते हुए भाष्यकार ने कहा है—“यथा च हृदयाद्यवदानानामानन्तर्यनियमः, क्रमस्य विवक्षितत्वात्, न तथेह क्रमो विवक्षितः”। पशु-याग के लिए हवि के निष्पादन का क्रम बताते हुए कहा गया है—“हृदयस्याग्रेऽवद्यति, अथ जिह्वाया, अथ वक्षसो यथाकामीतरेषाम्” (आप. श्रौ. सू. २४।२) । [ स्वधिति नाम की छुरी के द्वारा छाग के हृदय का भाग सबसे अग्रे (पहले) उसके पश्चात् जिह्वा और जिह्वावदान के अनन्तर वक्षःस्थल का अवदान (टुकड़ा काटना) करना चाहिए ] ।
यहाँ पर 'अग्रे' और 'अथ' शब्दों के बल पर जैसे अवदान-क्रम की विवक्षा की जाती है, वैसे प्रकृत (गृहीभूत्वा प्रव्रजेत्—इस वाक्य) में कर्मविबोध और ब्रह्म-जिज्ञासा का पौर्वापर्य-