भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 92
७४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

तदपाकरणार्थं कर्मानुतिष्ठेत् । एतदनुरोधाच्च 'जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिर्ऋणवान् जायते' इति गृहस्थः सम्पद्यमान इति व्याख्येयम् । अन्यथा 'यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव' इति श्रुतिर्विरुध्येत । गृहस्थस्यापि च ऋणापाकरणं सत्त्वशुद्ध्यर्थमेव । जरामर्यवादो भस्मान्ततावादोऽन्त्येष्ट्यश्च कर्मजडानविदुषः प्रति, न स्वात्मतत्त्वपण्डितान् । तस्मात्तस्यानन्तर्यमथशब्दार्थो यद्विना ब्रह्मजिज्ञासा न भवति यस्मिंस्तु सति भवन्ती भवत्येव । न चेत्थं कर्मावबोधः । तस्मान्न कर्मावबोधानन्तर्यमथशब्दार्थ इति सर्वमवदातम् ।

स्यादेतत्—मा भूदग्निहोत्रयवागूपाकवदार्थः क्रमः, श्रौतस्तु भविष्यति, 'गृही भूत्वा वनी भवेत्'

भामती-व्याख्या

(तै० सं० ३।१०) इस श्रुति की क्या व्यवस्था होगी ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि उक्त श्रुति का 'गृहस्थः सम्पद्यमानः'—ऐसा वाक्यशेष लगाकर यह अर्थ करना होगा कि 'जो ब्राह्मण गृहस्थाश्रम में प्रवेश करनेवाला है, उस पर ही वे तीन ऋण होते हैं, सब पर नहीं'। अन्यथा (ब्राह्मणमात्र को ऋणी मानने पर) "यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्"—इस श्रुति का विरोध उपस्थित होता है । गृहस्थ पुरुष के लिए भी जो कथित ऋणों की निवृत्ति के लिए कर्मानुष्ठान विहित है, उसका भी फल चित्तगत सत्त्व गुण की शुद्धि ही है । जरामर्यवाद [ जरामर्यं वा एतत्सत्रं यदग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ च । जरया ह वा एष एताभ्यां निर्मुच्यते मृत्युना च" (तं० आ० १०।६४।१)। यहाँ पर श्री सायणाचार्य ने "जरामर्यम्' का अर्थ 'जरामरणावधिम्' किया है, अर्थात् अग्निहोत्र और दर्शपूर्णमास नाम के दोनों कर्म आहिताग्नि पुरुष को जीवनपर्यन्त करना है, अतः यह वह सत्र कर्म है, जो कि जरा-मरण-पर्यन्त किया जाता है ], भस्मान्ततावाद [ जिस व्यक्ति ने अग्न्याधान नहीं किया, वह यावज्जीवन सन्ध्या-वन्दनादि नित्य कर्मों का सम्पादन करता है और प्राणान्त हो जाने पर उसके शरीर का दाहसंस्कार (भस्मान्त) सम्पन्न किया जाता है ] और अन्त्येष्टि संस्कार [ किसी अग्निहोत्री पुरुष के मर जाने पर उसकी अन्तिम इष्टि इस प्रकार सम्पन्न की जाती है कि चिता में उसके शव को सीधा लिटाकर उसके मुख में घृत-पूर्ण स्रुक् (जुहू आदि ), नासिका में स्रुवा, अधर अरणी को पैरों पर उत्तराणि को छाती पर, शूर्प (सूप) को वाम पार्श्व में चमस को दक्षिण पार्श्व में, मूसल और उलूखल को दोनों जाँघों के बीच में रखकर उसकी अग्नि से दाहसंस्कार किया जाता है—

तत्रोत्तानं निपात्यैनं दक्षिणशिरस्कं मुखे ।
आज्यपूर्णां स्रुचं दद्याद् दक्षिणाग्रां नासि स्रुवम् ॥
पादयोरधरां प्राचीमरणीमुरसीतराम् ।
पार्श्वयोः शूर्पंचमसे सव्यदक्षिणयोः क्रमात् ॥
मुसलेन सह न्युब्जमन्तरूरुवोरुलूखलम् ।
चात्रे विलीकमत्रैवमनश्रुनयनो विभोः ॥ (कात्या० स्मृ० ९)]

इत्यादि कर्मों का विधान कर्मकाण्ड के अन्धश्रद्धालु अज्ञानी व्यक्तियों के लिए ही है, आत्मतत्त्व के पण्डित पुरुषों के लिए नहीं, इस प्रकार कर्मावबोधानन्तर्य 'अथ' शब्द का अर्थ नहीं हो सकता, अतः ब्रह्म-जिज्ञासा में उस पदार्थ का आनन्तर्य प्रतिपादित करना होगा कि जिसके बिना ब्रह्म-जिज्ञासा सम्भव न होकर जिसके सम्पन्न होने पर ही हो सके । कर्माबोध ऐसा नहीं कि जिसके बिना ब्रह्म-जिज्ञासा न हो सके, अतः कर्मावबोध का आनन्तर्य कभी भी 'अथ' शब्द का अर्थ नहीं हो सकता ।

शङ्का