भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७३

भामती

चित्तसत्त्वं मलिनयति, अतः पापनिवृत्तौ प्रत्यक्षोपपत्तिद्वारापावरणे सति प्रत्यक्षोपपत्तिभ्यां संसारस्या- नित्याशुचिदुःखरूपतामप्रत्यवहमवबुध्यते, ततोऽस्यास्मिन्ननभिरतिसंज्ञं वैराग्यमुपजायते, ततस्तज्जिहासोपा- वर्त्तते, ततो हानोपायं पर्य्येषते, पर्य्येषमाणश्चात्मतत्त्वज्ञानमस्योपाय इत्युपश्रुत्य तज्जिज्ञासते, ततः श्रवणा- दिक्रमेण तज्जानातीत्यारादुपकारकत्वं तत्त्वज्ञानोत्पादं प्रति चित्तसत्त्वशुद्ध्या कर्मणां युक्तम्। इममेवार्थम- नुवदति भगवद्गीता— "आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥" एवं चाननुष्ठितकर्मापि प्राग्भवीयकर्मवशाद्यो विशुद्धसत्त्वः संसारासारतावर्शनेन निष्पन्नवैराग्यः कृतं तस्य कर्मानुष्ठानेन वैराग्योत्पादोपयोगिना, प्राग्भवीयकर्मानुष्ठानादेव तत्सिद्धेः। इममेव च पुरुष- धौरेयमेवमधिकृत्य प्रवृत्ते श्रुतिः—'यदि वेतरथा ब्रह्मचर्य्यादेव प्रव्रजेत्' इति। तदिदमुक्तम् ⁕ कर्माव- बोधात् प्रागप्यधीतवेदान्तस्य ब्रह्मजिज्ञासोपपत्तेः इति ⁕ । अत एव न ब्रह्मचारिण ऋर्णानि सन्ति येन

भामती-व्याख्या

जिससे चित्तगत सत्त्व मलिन होकर अनित्य, अशुचि और दुःखरूप प्रपञ्च में नित्य, शुचि और सुखरूपता का भान करा देता है। कथित पाप की निवृत्ति हो जाने पर प्रत्यक्ष और उपपत्ति का द्वार उद्घाटित हो जाता है। और दृश्यमान प्रपञ्च में अनित्यत्वादि का ज्ञान प्रत्यक्षप्रमाण के द्वारा एवं अदृष्ट जगत् में अनित्यत्वादि का बोध (उपपत्ति या युक्ति के द्वारा उपपन्न) हो जाता है। उसके पश्चात् संसार से अनभिरतिसंज्ञक वैराग्य हो जाता है। उस वैराग्य के आधार पर संसार की जिहासा (त्याग करने की इच्छा) समुद्भूत हो जाती है और संसार के सर्वथा परिहार का मार्ग पुरुष खोजने लगता है। आत्मतत्त्वसाक्षात्कार ही कर्तृत्वादि प्रपञ्च के परिहाण का उपाय है—ऐसा सुनकर उसकी जिज्ञासा उत्पन्न हो जाती है और आत्मा के श्रवण-मननादि में प्रवृत्त होकर आत्मज्ञान का लाभ कर लेता है। इस प्रकार चित्तशुद्धि के द्वारा कर्मों का परम्परया उपयोग भगवान् भी बताते हैं—

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ (गी० ६।३)

[अन्तःकरणशुद्धिरूप वैराग्य के पद पर आरुरुक्षु (आरूढ़ होने के अभिलाषी) पुरुष के लिए कर्मानुष्ठान की उपयोगिता होती है अन्तःकरण-शुद्धिरूप योग पर आरूढ़ पुरुष का कर्त्तव्य केवल शम (संन्यास) रह जाता है]। जिस व्यक्ति ने इस जन्म में कर्मानुष्ठान नहीं किया, पूर्वजन्मोपार्जित धर्म के द्वारा ही जिस का बुद्धि-सत्त्व शुद्ध हो गया है, संसार की असारता का भान एवं वैराग्य उत्पन्न हो गया है, उस व्यक्ति के लिए कर्मानुष्ठान की आवश्यकता नहीं, क्योंकि जिस वैराग्य की उत्पत्ति में कर्मानुष्ठान का उपयोग होता है, उसका लाभ तो उसे पहले ही हो चुका है। ऐसे ही विरक्त-शिरोमणि को उद्देश्य करके श्रुति कहती है—"यदि वेतरथा ब्रह्मचर्य्यादेव प्रव्रजेत् [नारदपरिव्राजकोपनिषत् (तृतीयोपदेश) में कहा है—"ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद्, गृहाद् वनीभूत्वा प्रव्रजेद्, यदि वेतरथा ब्रह्मचर्या- देव प्रव्रजेद् गृहाद्वा वनाद्वा, यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्।" सारांश यह है कि वैराग्य पर ही संन्यास निर्भर है, जब भी वैराग्य उत्पन्न हो जाय तब ही परिव्रज्या ग्रहण की जा सकती है]। इसी भाव की अभिव्यक्ति भाष्यकार ने की है—"कर्मावबोधात् प्रागप्यधीतवेदा- न्तस्य ब्रह्मजिज्ञासोपपत्तेः"। इससे यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मचारी पर कथित जन्म-सिद्ध तीन ऋण नहीं होते, अतः उन ऋणों का उद्धार करने के लिए कर्मानुष्ठान अपेक्षित नहीं। यदि ब्रह्मचारी तीन ऋणों का ऋणी नहीं, तब “जायमानो वै ब्राह्मणः त्रिभिऋ णवाजायते”

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