भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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७२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

र्थतया शब्दतो गुणत्वादिच्छायाश्च प्रत्ययार्थतया प्राधान्यात्। प्रधानेन च कार्यसम्प्रत्ययात्। नहि राजपुरुषमानयेत्युक्ते वस्तुतः प्रधानमपि राजा पुरुषविशेषणतया शब्दत उपसर्जनमानीयतेऽपि तु पुरुष एव। शब्दतस्तस्य प्राधान्यात्। एवं वेदानुवचनस्येव यज्ञस्यापीच्छासाधनतया विधानम्। एवं तपसोऽ-नाशकस्य, कामानशनमेव तपः, हितमितमेध्याशिनो हि ब्रह्मणि विविदिषा भवति, न तु सर्वथाऽनश्नतो, मरणात्। नापि चान्द्रायणादितपःशीलस्य, धातुवैषम्यापत्तेः। एतानि च नित्यान्युपात्तदुरितनिबर्हणेन पुरुषं संस्कुर्वन्ति। तथा च श्रुतिः—"स ह वा आत्मयाजी यो वेद इदं मेऽनेनाङ्गं संस्क्रियत इदं मेऽने-नाङ्गमपचीयते” इति। अनेनेति प्रकृतं यज्ञादि परामृशति। स्मृतिश्च "यस्यैतेऽष्टाचत्वारिंशत्संस्काराः" इति। नित्यनैमित्तिकानुष्ठानप्रक्षीणकल्मषस्य च विशुद्धसत्त्वस्याविदुष एव उत्पन्नविविदिषस्य ज्ञानोत्पत्तिं दर्शयत्याथर्वणी श्रुतिः— "विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यति निष्कलं ध्यायमानः" इति। स्मृतिश्च—"ज्ञान-मुत्पद्यते पुंसां क्षयात् पापस्य कर्मणः" इत्यादिका।

क्लृप्तेनैव च नित्यानां कर्मणां नित्ये हि तेनोपात्तदुरितनिबर्हणेन पुरुषसंस्कारेण ज्ञानोत्पत्तावङ्ग-भावोपपत्तौ न संयोगपृथक्त्वेन साक्षादङ्गभावो युक्तः, कल्पनागौरवापत्तेः। तथाहि—नित्यकर्मानुष्ठाना-द्धर्मोत्पादः, ततः पाप्मा निवर्त्तते, स ह्यनित्याशुचिदुःखरूपे संसारे नित्यशुचिसुखख्यातिलक्षणेन विपर्य्यासेन


भामती-व्याख्या

यज्ञेन"—इस श्रुति में भी नित्यस्वाध्यायात्मक वेदानुवचन के द्वारा अवगत आत्मा के विशेष स्वरूप की विविदिषा कर्मानुष्ठान का फल माना जाता है, वेदन या तत्त्वज्ञान नहीं। यद्यपि वेदन तात्त्विकदृष्टि से प्रधान है तथापि 'सन्' प्रत्यय की प्रकृति का अर्थ होने के कारण अप्रधान माना जाता है और प्रधान का ही अन्वय अन्य पदार्थों के साथ होता है जैसे कि 'राजपुरुषमानय'—यहाँ पर पुरुष की अपेक्षा राजा प्रधान है तथापि आनयन आदि के साथ उसका अन्वय वाँछनीय नहीं, क्योंकि शब्दतः राजा की पुरुषविशेषणत्वेन उपस्थिति है स्वतन्त्रतया नहीं। पुरुषपदार्थ प्रधान होने के कारण आनयनादि के साथ अन्वित होता है। अतः वेदानुवचन के समान यज्ञादि कर्मों का भी वेदनविषयक इच्छा की साधनता के रूप में विधान माना जाता है। इसी प्रकार तप का भी इच्छा में विनियोग होता है। यथाकाम अनशन ( यथेच्छ भोजनादि का ग्रहण न कर हित, मित और मेध्य पदार्थों का स्वल्पमात्रा में ग्रहण ) तप कहलाता है। उसके द्वारा ही विविदिषा उत्पन्न होती है, सर्वथा अनशन से नहीं क्योंकि सर्वथा आहार-त्याग से प्राणियों का मरण हो जाता है। चान्द्रायण आदि क्लिष्ट तपों का भी विविदिषा में उपयोग नहीं, क्योंकि उनसे शरीरगत धातुवैषम्य हो जाने से मानसचिन्तन भी अस्त-व्यस्त हो जाता है। नित्यकर्म प्रस्तुत-दुरित की निवृत्ति के द्वारा पुरुष को संस्कृत करते हैं, जैसा कि श्रुति कहती है—"स ह वा आत्मयाजी यो वेद इदं मेऽनेनाऽङ्गं संस्क्रियत इदं मेऽनेनाऽङ्गमपचीयते” (शत०ब्रा० ११।२।६।१३)। इस श्रुति में 'अनेन' पद के द्वारा प्रकृत यज्ञादि कर्मों का ग्रहण किया गया है। स्मृतिकार भी कहते हैं—'यस्यैतेऽ-ष्टाचत्वारिंशत्संस्काराः' ( गौतमस्मृ० ८) । नित्य-नैमित्तिक-कर्मानुष्ठान के द्वारा जिसका पाप निवृत्त हो गया है किन्तु तत्त्वसाक्षात्कार नहीं हुआ ऐसे अधिकारी पुरुष को विविदिषा और उसके पश्चात् ज्ञान का लाभ श्रुति कहती है—"विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यति निष्कलं ध्यायमानः” ( मुण्डक० ३।१।८)। नित्यकर्मों का पुरुषगत-दुरित-निवृत्तिरूप संस्कार के द्वारा ज्ञान की उत्पत्ति में जब उपयोग बन जाता है, तब संयोगपृथक्त्व-न्याय के द्वारा साक्षात् ज्ञान में नित्यकर्म का उपयोग मानना उचित नहीं। अतः यही क्रम सर्वथा उचित प्रतीत होता है कि नित्यकर्मानुष्ठान से धर्म की उत्पत्ति और उससे उस पाप की निवृत्ति होती है