भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७१


भामती

निषिद्धमनुतिष्ठन् न प्रत्यवेयात् तिर्यगादिवदिति भिन्नकर्मतापातः । मैवम्, न खल्वयं सर्वथा मनुष्या- भिमानरहितः, किं त्वविद्यासंस्कारानुवृत्त्याऽस्य मात्रया तदभिमानोऽनुवर्त्तते । अनुवर्त्तमानं च मिथ्येति मन्यमानो न श्रद्धत्त इत्युक्तम् । किमतो यद्येवम् ? एतदतो भवति—विधिषु श्राद्धोऽधिकारी नाश्राद्धः । ततश्च मनुष्याद्यभिमाने नाशद्दधानो न विधिशास्त्रेणाधिक्रियते । तथा च स्मृतिरश्रद्धया हुतं दत्तमित्या- दिका । निषेधशास्त्रं तु न श्रद्धामपेक्षते, अपि तु निषिध्यमानक्रियोन्मुखो नर इत्येव प्रवर्त्तते । तथा च सांसारिक इव श्रद्धावगतब्रह्मतत्त्वोऽपि निषेधमतिक्रम्य प्रवर्त्तमानः प्रत्यवैतीति न भिन्नकर्मदर्शनाभ्युप- गमः । तस्मान्नोपासनायाः कार्ये कर्मापेक्षा । अत एव नोपासनोत्पत्तावपि निर्विचिकित्सशाब्दज्ञानोत्पत्त्यु- त्तरकालमनधिकारः कर्मणीत्युक्तम् । तथा च श्रुतिः—"न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्व- मानशुः” ।

तत्किमिदानीमनुपयोग एव सर्वथैव कर्मणाम् ? तथा च "विविदिषन्ति यज्ञेन” इत्याद्याः श्रुतयो विरुद्धयेरन् । न, आरादुपकारकत्वात् कर्मणां यज्ञादीनाम् । तथाहि—'तमेतमात्मानं वेदानुवचनेन' नित्य- स्वाध्यायेन 'ब्राह्मणा विविदिषन्ति' वेदितुमिच्छन्ति, न तु विदन्ति, वस्तुतः प्रधानस्यापि वेदनस्य प्रकृत्य-


भामती-व्याख्या

कर्मों का अनुष्ठान करने पर वैसे ही प्रत्यवाय ( पापादि ) नहीं होना चाहिए, जैसे पशु-पक्षी आदि तिर्यक् ( मेरुदण्ड को धरातल के समानान्तर रखनेवाले ) प्राणियों को । इस प्रकार एक ही कर्म किसी के लिए फलप्रद होता है और किसी के लिए नहीं । एवं किसी के लिए न्यून और किसी के लिए अधिक फल का वैसे ही समर्पक माना जायेगा जैसे ही एक ही स्वर्ग के लिए विहित अग्निहोत्र एवं ज्योतिष्टोम हैं तथापि इन दोनों कर्मों की गुरुता और लघुता को देखकर फल में भी वैसे ही मान-दण्ड की कल्पना की जाती है । इस प्रकार भिन्नकर्मता का प्रसङ्ग उपस्थित होता है ।

समाधान—तत्त्ववेत्ता पुरुष सर्वथा मनुष्यत्वाभिमान से निर्लिप्त नहीं माना जाता, अपिनु लेशाविद्या या अविद्या के अनुवर्तमान संस्कारों के आधार पर वैसा ही व्यावहारिक अभिमान भी रखता है भले ही उसे यह मिथ्या समझता हो ( उस पर इसकी श्रद्धा न हो ) । श्रद्धारहित होने के कारण विहितकर्मों में इसका अधिकार नहीं माना जाता । बिना श्रद्धा के किया हुआ कर्म फलप्रद नहीं होता जैसा कि कहा गया है—

“अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥” ( गी० १७।२८ )

किन्तु निषेध-शास्त्रों की गति उसके विपरीत है । श्रद्धा या अश्रद्धा की वहाँ अपेक्षा नहीं होती, अपिनु निषिद्धाचरणोन्मुख व्यक्ति ही उनका अधिकारी होता है । अतः तत्त्ववेत्ता पुरुष यदि निषिद्धाचरण करता है, तब उसे अवश्य प्रत्यवाय वैसे ही होगा जैसे कि एक सांसारिक व्यक्ति को । अतः विधिनिषेधशास्त्रों में किसी प्रकार का पक्षपात या भिन्नकर्मता प्रसक्त नहीं होती । फलतः उपासना के कार्य में कर्म की अपेक्षा किसी प्रकार नहीं । उपासना की उत्पत्ति में भी कर्म का उपयोग नहीं क्योंकि असंशयात्मक तत्त्वविषयक शाब्दज्ञानमात्र हो जाने के अनन्तर कर्मानुष्ठान का अधिकार समाप्त हो जाता है । श्रुति कहती है—"न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः” ( महाना० उ० ८।१४) । तब क्या वेद-विहित कर्म सर्वथा अनुपयुक्त हैं ? यदि हाँ, “तब विविदिषन्ति यज्ञेन” इत्यादि श्रुतियों का विरोध उपस्थित होता है । इस प्रश्न का समाधान आचार्यों ने ऐसा किया है कि कर्मानुष्ठान का साक्षात् तत्त्वज्ञान में उपयोग नहीं किन्तु परम्परया उपयोग का प्रतिपादन किया गया है । “विविदिषन्ति