भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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७०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

मानी विद्वान्न श्रद्धत्ते पित्तोपहतेन्द्रिय इव गुडं थूत्कृत्य त्यजन्नपि तस्य तिक्तताम्। तथा चायं क्रिया-कर्तृकरणेतिकर्त्तव्यताफलप्रपञ्चमतात्त्विकं विनिश्चिन्वन् कथमधिकृतो नाम ? विदुषो ह्यधिकारोऽन्यथा पशु-शूद्रादीनामप्यधिकारो दुर्वारः स्यात्। क्रियाकर्त्रादिस्वरूपविभागं च विद्वस्यमान इह विद्वानभिमतः कर्म-काण्डे। अत एव भगवानविद्वद्विषयत्वं शास्त्रस्य वर्णयाम्बभूव भाष्यकारः। तस्माद्यथा राजजातीयाभि-मानकर्त्तृके राजसूये न विप्रवैश्यजातीयाभिमानिनोरधिकारः, एवं द्विजातिकर्त्तृक्रियाकरणादिविभा-गाभिमानिकर्त्तृके कर्मणि न तदनभिमानिनोऽधिकारः। न चानधिकृतेन समर्थेनापि कृतं वैदिकं कर्म फलाय कल्पते वैश्यस्तोम इव ब्राह्मणराजन्याभ्याम्। तेन दृष्टार्थेषु कर्मसु शक्तः प्रवर्त्तमानः प्राप्नोतु फलं दृष्टत्वात्। अदृष्टार्थेषु तु शास्त्रैकसमधिगम्यं फलमनधिकारिणि न युज्यत इति नोपासनायाः कार्ये कर्मापेक्षा।

स्यादेतत्—मनुष्याभिमानवदधिकारिके कर्मणि विहिते यथा तदभिमानरहितस्यानधिकारः। एवं निषेधविधयोऽपि मनुष्याधिकारा इति तदभिमानरहितस्तेष्वपि नाधिक्रियेत पश्वादिवत्। तथा चायं


भामती-व्याख्या

से संस्कारिक प्रतीतियों और व्यवहारों की अनुवृत्ति देखी जाती है। तथापि उन प्रतीतियों और व्यवहारों को अपने आचरण में लाता हुआ भी विद्वान् पुरुष उन्हें मिथ्या मानता है, उन पर वैसे ही श्रद्धा नहीं रखता, जैसे कि पित्तरोग से आक्रान्त व्यक्ति गुड़ का स्वाद लेकर थूकता हुआ भी उसकी तिक्तता पर विश्वास नहीं करता। अतः क्रिया, कर्त्ता, करण, इति-कर्तव्यता और फलादि प्रपञ्च अतात्त्विक है—ऐसा निश्चय कर लेनेवाला व्यक्ति कर्म-काण्ड का अधिकारी क्योंकर माना जा सकेगा ? क्योंकि क्रिया, कर्त्ता आदि प्रपञ्च सत्य है—इस प्रकार का निश्चय रखनेवाले (विद्वान्) पुरुष का ही कर्म में अधिकार माना जाता है। अन्यथा (वैसे ज्ञान की अपेक्षा न होने पर) पशु और शूद्रादि अज्ञानी प्राणियों का भी कर्म में अधिकार प्राप्त हो जायगा। यह एक वास्तविकता है कि क्रिया और कर्त्ता आदि विभाग का जानकार व्यक्ति ही कर्मकाण्ड का अधिकारी होता है। अत एव भगवान् भाष्यकार ने क्रिया, कर्त्ता आदि को वास्तविक समझनेवाले अविद्वान् (वस्तुतत्त्वानभिज्ञ) व्यक्ति को ही शास्त्र का अधिकारी कहा है। अतः जैसे क्षत्रियत्व-जाति का अभिमान रखनेवाले व्यक्ति के द्वारा सम्पादनीय 'राजसूय' कर्म में ब्राह्मणत्व या वैश्यत्व जाति के अभिमानवाले पुरुष का अधिकार नहीं माना जाता, वैसे ही द्विजाति क्रिया, कर्त्ता आदि विभाग के अभिमानी द्विजाति (केवल ब्रह्म, क्षत्रिय और वैश्य) के द्वारा सम्पादनीय वैदिक कर्मों में पशु और शूद्रादि का अधिकार नहीं माना जा सकता। अनधिकारी व्यक्ति के द्वारा किए जानेवाले वैदिक कर्म वैसे ही निष्फल माने जाते हैं, जैसे केवल वैश्य-द्वारा कर्त्तव्य वैश्यस्तोम कर्म यदि ब्राह्मण और क्षत्रिय के द्वारा किया जाता है, तब वह निष्फल ही होता है। दृष्टफलक कृषि आदि कर्मों में कोई भी समर्थ व्यक्ति प्रवृत्त होकर फल प्राप्त कर सकता है, किन्तु शास्त्रैकसमधि-गम्य स्वर्गादि अदृष्ट फल के जनकीभूत कर्मों का फल किसी अनधिकारी व्यक्ति को कभी नहीं प्राप्त हो सकता। फलतः उपासना-साध्य साक्षात्काररूप फल के सम्पादन में कर्मानुष्ठान की अपेक्षा नहीं।

शङ्का—जैसे मनुष्याधिकारिक विहित कर्मों में मनुष्यत्वाभिमान-रहित प्राणियों का अधिकार नहीं, वैसे ही "न हिंस्यात्"—इत्यादि निषेध वाक्यों में भी मनुष्य ही अधिकारी माना जाता है, अतः मनुष्यत्वाभिमान-रहित व्यक्ति का वैसे ही अधिकार नहीं होना चाहिए, जैसे पशु-पक्षी आदि का। तब तो मनुष्यत्वाभिमान-रहित तत्त्ववेत्ता पुरुष को हिंसादि निषिद्ध