भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६९


भामती

बुद्धोदासीनस्वभावमकत्त्र्‌त्वाद्युपेतमपेतब्राह्मणत्त्वादिजातिं देहाद्यतिरिक्तमेकमात्मानं प्रतिपद्यमानः कर्मस्वधिकारमवबोद्धुमर्हति । अनहंज्ञः कथं कर्त्ता वाऽधिकृतो वा ? यद्युच्येत निश्चितेऽपि तत्त्वे विपर्यासनिबन्धनो व्यवहारोऽनुवर्त्तमानो दृश्यते, यथा गुडस्य माधुर्य्यविनिश्चयेऽपि पित्तोपहतेन्द्रियाणां तिक्तावभासानुवृत्तिः, आस्वाद्य थूत्कृत्य त्यागात् । तस्मादविद्यासंस्कारानुवृत्त्या कर्मानुष्ठानं, तेन च विद्यासहकारिणा तत्समुच्छेद उपपत्स्यते । न च कर्माविद्यात्मकं कथमविद्यामुच्छिनत्ति, कर्मणो वा तदुच्छेदकस्य कुत उच्छेद इति वाच्यम्, सजातीयस्वपरविरोधिनां भावानां बहुलमुपलब्धेः । यथा पयः पयोऽन्तरं जरयति, स्वयं च जीर्य्यति । यथा विषं विषान्तरं शमयति, स्वयं च शाम्यति । यथा वा कतकरजो रजोऽन्तराविले पयसि प्रक्षिप्तं रजोऽन्तराणि भिन्दत् स्वयमाप भिद्यमानमनाविलं पाथः करोति । एवं कर्माविद्यात्मकमपि अविद्यन्तराणि अपगमयत् स्वयमप्यपगच्छतीति ॥

अत्रोच्यते—सत्यं सदेव सोम्येवमित्युपक्रमात्तत्त्वमसीत्यन्तात् शब्दाद् ब्रह्ममीमांसोपकरणादसकृदभ्यस्ताद् निर्विचिकित्सेनाद्यविद्योपादानदेहाद्यतिरिक्तप्रत्यगात्मतत्त्वावबोधे जातेऽपि अविद्यासंस्कारानुवृत्तावनुवर्त्तन्ते सांसारिकाः प्रत्ययास्तद्व्यवहाराश्च, तथापि तान्पश्यं व्यवहारप्रत्ययान् मिथ्येति मन्य-


भामती-व्याख्या

सुन कर जो पुरुष अपने को असन्दिग्ध रूप से शुद्ध, बुद्ध और उदासीन, कर्तृत्व, भोक्तृत्वादि धर्मों से रहित, देहादि से भिन्न जान लेता है, वह पुरुष कर्मानुष्ठान का अधिकारी अपने को कभी नहीं मान सकता। जिसका कर्म में अधिकार नहीं, वह कभी कर्मों का कर्त्ता-भोक्ता नहीं हो सकता ।

शङ्का—यदि कहा जाय कि जीव में ब्रह्मरूपता का निश्चय हो जाने पर भी अध्यास-प्रयुक्त व्यवहार की अनुवृत्ति वैसे ही देखी जाती है, जैसे गुड़ में माधुर्य का निश्चय हो जाने पर भी पित्तरोग से दूषित इन्द्रिय वाले व्यक्ति को गुड़गत तिक्तता की अनुवृत्ति होती है, क्योंकि वह गुड़ का स्वाद लेता हुआ उसका थूक देता है। अतः अविद्या-संस्कारों की अनुवृत्ति से कर्मानुष्ठान सम्भव हो जाता है, इस प्रकार कर्म-सहकृत विद्या के द्वारा अविद्या का उच्छेद हो जाता है। कर्म स्वयं अविद्यात्मक है, वह अविद्या का उच्छेद क्योंकर कर सकेगा ? अविद्या का जो कर्म उच्छेदक है, उस कर्म का उच्छेद किससे होगा ? तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसे बहुत-से पदार्थ देखे जाते हैं, जो स्व और पर—दोनों के निवर्तक होते हैं, जैसे दुग्धपान प्रथमतः पीत दूध को पचाता हुआ स्वयं पच जाता है। या एक विष को उतारने के लिए दिया गया अन्य विष पहले के विष को शान्त करता हुआ स्वयं भी शान्त हो जाता है। अथवा कतक नामक फल का चूर्ण पानी में डालने पर अन्य धूलि-कणों को नीचे बिठाता हुआ स्वयं भी बैठ जाता है। इसी प्रकार कर्म स्वयं अविद्यारूप होने पर भी अविद्या का नाश करता हुआ स्वयं अपना भी नाश कर डालता है [आचार्य मण्डन मिश्र भी कहते हैं—"यथा रजःसम्पर्ककलुषितमुदकं द्रव्यविशेषचूर्णरजः प्रक्षिप्तं रजोऽन्तराणि संहरत् स्वयमपि संश्लिष्यमाणं स्वच्छं स्वरूपावस्थामुपनेयति, एवमेव श्रवणादिभिर्भेददर्शने प्रविलीयमाने विशेषाभावात् तद्गते च भेद, स्वच्छे परिशुद्धे स्वरूपे जीवोऽवतिष्ठते । यथा पयः पयो जरयति स्वयं च जीर्य्यति । यथा च विषं विषान्तरं शमयति स्वयं च शाम्यति" (ब्र. सि. पृ. १२–१३)] ।

समाधान—यह सत्य है कि "सदेव सोम्येदम" (छां. उ. ६।२।१) यहाँ से लेकर "तत्त्वमसि" (छां. उ. ६।२।१) यहाँ तक का वेदान्त-प्रकरण जब ब्रह्ममीमांसारूप तर्क से उपोट्ठलित होकर असंशयात्मक, अनादि अविद्यारूप उपादान के उपादेयभूत देहादि से भिन्न प्रत्यगात्मा का तत्त्वावबोध उत्पन्न कर देता है। तब भी अविद्या-जनित संस्कारों की अनुवृत्ति