भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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६८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

चैतावता ब्रह्मणो नापराधीनप्रकाशता । नहि शब्दज्ञानप्रकाश्यं ब्रह्म स्वयंप्रकाशं न भवति । सर्वोपाधिरहितं हि स्वयंज्योतिरिति गीयते, न तूपहितमपि । यथाहु स्म भगवान् भाष्यकारः ॐ नायमेकान्तेनाविषयः इति ॐ । न चान्तःकरणवृत्तावध्यस्य साक्षात्कारे सर्वोपाधिविनिर्मोकः । तस्यैव तदुपाधेर्विनश्यदवस्थस्य स्वपरोपाधिविरोधिनो विद्यमानत्वात् । अन्यथा चैतन्यच्छायापत्तिं विनाऽन्तःकरणवृत्तेः स्वयमचेतनायाः स्वप्रकाशत्वानुपपत्तौ साक्षात्कारत्वायोगात् । न चानुमितभावितवह्निशाक्षात्कारवत्प्रतिभासत्वेनास्याप्रामाण्यं, तत्र वह्नित्वलक्षणस्य परोक्षत्वात् , इह तु ब्रह्मरूपस्योपाधिकलुषीतस्य जीवस्य प्रागप्यपरोक्षत्वात् । नहि शुद्धबुद्धत्वादयो वस्तुतस्ततोऽतिरिच्यन्ते । जीव एव तु तत्तदुपाधिरहितः शुद्धबुद्धविस्वभावो ब्रह्मेति गीयते । न च तत्तदुपाधिविरहोऽपि ततोऽतिरिच्यते । तस्माद्यथा गान्धर्वशास्त्रार्थज्ञानाभ्यासाहितसंस्कारसचिवश्रोत्रेन्दियेण षड्जादिस्वरग्राममूर्च्छनाभेदमध्यक्षमनुभवति, एवं वेदान्तार्थज्ञानाभ्यासाहितसंस्कारो जीवस्य ब्रह्मभावमन्तःकरणेनेति ।

अन्तःकरणवृत्तौ ब्रह्मसाक्षात्कारे जनयितव्येऽस्ति तदुपासनायाः कर्मापेक्षेति चेत्, न, तस्याः कर्मानुष्ठानेन सहभावाभावेन तत्सहकारित्वानुपपत्तेः । न खलु तत्त्वमसीत्यादिवाक्यान्निर्विकित्सं शुद्ध-


भामती-व्याख्या

ब्रह्मरूपता का आविर्भाव करा सकता है। यह जीव में ब्रह्मरूपता का अनुभव ब्रह्म-स्वभाव नहीं कि उत्पन्न न किया जा सके। उक्त अनुभव अन्तःकरण की एक विशेष ब्रह्म-विषयिणी वृत्ति है। इतने मात्र से ब्रह्म में अस्वप्रकाशता प्रसक्त नहीं होती, क्योंकि शब्द ज्ञान से प्रकाशित ब्रह्म स्वयंप्रकाश नहीं रहता—ऐसी बात नहीं। समस्त उपाधियों से रहित ब्रह्म ही स्वयंप्रकाश माना जाता है, उपाधि-युक्त नहीं, जैसा भगवान् भाष्यकार ने कहा है—"नायमेकान्तेनाविषयः"। अर्थात् यह ब्रह्माभिन्न जीव सर्वथा अविषय ही होता है—ऐसा नहीं, अपितु अहमाकार वृत्ति का विषय माना जाता है। अन्तःकरण की अखण्डाकार वृत्ति में ब्रह्म का साक्षात्कार होने पर ब्रह्म समस्त उपाधियों से निर्मुक्त नहीं होता, क्योंकि अन्ततोगत्वा वह अखण्डाकार वृत्ति ही एक उपाधि होती है, भले ही वह वृत्ति नाशोन्मुख एवं स्वात्मक और परात्मक उपाधियों की विरोधिनी होती है। यदि उक्त वृत्ति को चिदात्मा की उपाधि न माना जाय, तब चैतन्य-तादात्म्यापत्ति के बिना अन्तःकरण की जडरूप वृत्ति में प्रकाशकत्व ही न बनेगा। यह जो कहा गया कि अनुमित और भावित अग्नि के साक्षात्कार के समान ही उक्त ब्रह्म-साक्षात्कार भी एक अप्रमाणात्मक प्रतिभास ज्ञानमात्र है, वह उचित नहीं, क्योंकि अनुमान-स्थल पर अग्नि का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं, अपितु परोक्ष ही होता है, किन्तु जीव कर्तृत्ववादि उपाधियों से कलुषित होने पर भी वस्तुतः ब्रह्मरूपेण अपरोक्ष होता है। शुद्धत्व, बुद्धत्वादि धर्म चैतन्य तत्त्व से वस्तुतः भिन्न नहीं होते, जीव ही सभी उपाधियों से रहित होकर शुद्ध-बुद्धादिरूप ब्रह्म होता है। उपाधियों का अभाव भी चैतन्य से भिन्न नहीं होता, अतः जैस गन्धर्व-शास्त्र से जनित ज्ञान के अभ्यास द्वारा आहित संस्कारों से युक्त श्रोत्र इन्द्रिय (१) निषाद, (२) ऋषभ, (३) गान्धार, (४) षड्ज, (५) मध्यम, (६) धैवत और (७) पञ्चम—इन सात स्वरों के भेद-प्रभेद-समूह और उसकी मूर्च्छना (उतार-चढ़ाव) का प्रत्यक्ष अनुभव कर लेता है। वैसे ही वेदान्त-वाक्यार्थ ज्ञान के अभ्यास से जनित संस्कार वाला अन्तःकरण जीव में ब्रह्मभाव का साक्षात्कार कर लेता है। उक्त अन्तःकरण की वृत्तिरूप साक्षात्कार के उत्पादन में कर्मानुष्ठान की अपेक्षा होती है।

समाधान—उक्त ब्रह्म भावना में कर्मानुष्ठान का सहभाव सम्भव न होने के कारण कर्म-सहकारित्व उपपन्न नहीं हो सकता, क्योंकि "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्यों को