भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६७

भामती

सन्ततिः ? यदि शाब्दज्ञानमात्रसन्ततिः, किमियमभ्यस्यमानाप्यविद्यां समुच्छेत्तुमर्हति ? तत्त्वविनिश्चय- स्तदभ्यासो वा सवासनं विपर्ययसमुन्मूलयेत्, न संशयाभ्यासः, सामान्यमात्रदर्शनाभ्यासो वा। नहि स्थाणुर्वा पुरुषो वेति वाऽऽरोहपरिणाहवद्द्रव्यमिति वा शतशोऽपि ज्ञानमभ्यस्यमानं पुरुष एवेति निश्च- याय पर्याप्नुमृते विशेषदर्शनात् । ननूक्तं श्रुतमयेन ज्ञानेन जीवात्मनः परमात्मभावं गृहीत्वा युक्तिमयेन च व्यवस्थाप्यत इति । तस्मान्निर्विकित्सशाब्दज्ञानसन्ततिरुपासना कर्मसहकारिण्यविद्याद्वयोच्छेद- हेतुः । न चासावनुत्पादितब्रह्मानुभवा तदुच्छेदाय पर्याप्ता । साक्षात्काररूपो हि विपर्यासः साक्षात्- काररूपेणैव तत्त्वज्ञानेनोच्छिद्यते, न तु परोक्षावभासेन । दिङ्मोहालातचक्रचलवृक्षमरुमरीचिसलिलादि- विभ्रमेष्वपरोक्षावभासिषु अपरोक्षावभासिभिरेव दिगादितत्त्वप्रत्ययैर्निवृत्तिदर्शनात् । नो खल्वाप्तवचन- लिङ्गादिनिश्चितदिगादितत्त्वानां दिङ्मोहादयो निवर्तन्ते । तस्मात् त्वम्पदार्थस्य तत्पदार्थत्वेन साक्षात्कार एषितव्यः । एतावता हि त्वंपदार्थस्य दुःखिशोकित्वादिसाक्षात्कारनिवृत्तिर्नान्यथा ।

न चैष साक्षात्कारो मीमांसासहितस्यापि शब्दस्य प्रमाणस्य फलम् अपि तु प्रत्यक्षस्य, तस्यैव तत्फलत्वनियमात् । अन्यथा कुटजबीजादपि वटाङ्कुरोत्पत्तिप्रसङ्गात् । तस्मान्निर्विकित्सवाक्यार्थभाव- नापरिपाकहितमन्तःकरणं त्वंपदार्थस्यापरोक्षस्य तत्तदुपाध्याकारनिषेधेन तत्पदार्थतामनुभावयतीति युक्तम् । न चायमनुभवो ब्रह्मस्वभावो येन न जन्येत, अपि त्वन्तःकरणस्यैव वृत्तिभेदो ब्रह्मविषयः । न


भामती-व्याख्या

है, तब यह बार-बार अभ्यस्यमान होकर भी अविद्या की समुच्छेदिका क्योंकर होगी ? तत्त्वज्ञान का निश्चय अथवा उसका अभ्यास ही संस्कार-सहित विपर्यय ( अविद्या ) का उच्छेद कर सकता है। संशयात्मक ज्ञान का अभ्यास या वस्तुगत सामान्यांशमात्र के दर्शन का अभ्यास अध्यास का विनाश नहीं कर सकता, क्योंकि 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा ?' इस प्रकार का संशय अथवा 'कोई लम्बी-चौड़ी यह वस्तु है'— इस प्रकार का सामान्य-ज्ञान शतशः अभ्यस्यमान होकर भी 'पुरुष एव'—इस प्रकार के निश्चय का जनक नहीं होता, हाँ पुरुषत्व- व्याप्य कर-चरणादिरूप विशेष का दर्शन ही 'पुरुषोऽयम्'—ऐसा निश्चय करा सकता है ।

शङ्का— यह कहा जा चुका है कि "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्यों से जनित शब्द के द्वारा जीव में ब्रह्मरूपता का ग्रहण होता है और मननरूप यौक्तिक ज्ञान के द्वारा कथित ब्रह्मभाव का दृढीकरण, उसके पश्चात् निदिध्यासनात्मक संशय-रहित शब्द ज्ञान की सन्तति ही कर्मानुष्ठान से सहकृत होकर द्विविध अविद्या के उच्छेद का कारण मानी जाती है। कथित सन्ततिरूप ब्रह्म-भावना तब तक अविद्या का उच्छेद नहीं कर सकती, जब तक ब्रह्म- साक्षात्कार को उत्पन्न न करे, क्योंकि साक्षात्काररूप विपर्यय साक्षात्काररूप तत्त्व-निश्चय के द्वारा ही उच्छेदनीय होता है, परोक्ष ज्ञान के द्वारा नहीं । दिम्भ्रम, आलात-चक्र, वृक्षों की गतिशीलता, मरुमरीचिगत जलरूपतादि अपरोक्ष भ्रमों की अपरोक्षात्मक दिगादि तत्त्व- निश्चय के द्वारा ही निवृत्ति देखी जाती है, आप्त-वचन और लिङ्गादि से उत्पादित दिगादि के तत्त्व-ज्ञान के द्वारा नहीं ।

यहाँ त्वम्पदार्थ ( जीव ) का ब्रह्मरूपेण साक्षात्कार विवक्षित है। उस साक्षात्कार के द्वारा ही त्वम्पदार्थरूप जीवगत दुःखशोकादिमत्त्व का साक्षात्कार निवृत्त होगा, अन्यथा नहीं । यह जीव की ब्रह्मरूपता का साक्षात्कार मीमांसा-सहित शब्द प्रमाण का फल नहीं, अपितु प्रत्यक्ष प्रमाण का ही साक्षात्कार फल होता है, अन्यथा कुटज के बीज से भी वटाङ्कुर की उत्पत्ति 'ने लग जायगी । फलतः संशय-रहित शब्द-भावना से युक्त अन्तःकरणरूप प्रत्यक्ष प्रमाण अपरोक्षात्मक जीव में अब्रह्मरूपता का निषेध करके