भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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भामती
तत्साक्षात्कारस्य तत्स्वभाव्येन नित्यतयोत्पाद्यत्वानुपपत्तेः । ततो भिन्नस्य वा भावनाधेयस्य साक्षात्कारस्य प्रतिभासप्रत्ययवत्संशयाक्रान्ततया प्रामाण्यायोगात् । तद्विषयस्य तत्सामग्रीकस्यैव बहुलं व्यभिचारोपलब्धेः । न खल्वनुमानविबुद्धं वह्निं भावयतः शीतातुरस्य शिशिरभरमन्थरतरकायकाण्डस्य स्फुरज्ज्यालाजटिलानलसाक्षात्कारः प्रमाणान्तरेण संवाद्यते, विसंवादस्य बहुलमुपलम्भात् । तस्मात् प्रामाणिकसाक्षात्कारलक्षणकार्याभावान्नोपासनाया उत्पाद्ये कर्मापेक्षा । न च कूटस्थनित्यस्य सर्वव्यापिनो ब्रह्मण उपासनातो विकारसंस्कारप्राप्तयः सम्भवन्ति । स्यादेतत्—मा भूद् ब्रह्मसाक्षात्कार उत्पाद्यादिरूप उपासनायाः, संस्कार्यस्त्वनिर्वचनीयानाद्यविद्याद्वयापिधानापनयनेन भविष्यति, प्रतिसीरापिहिता नर्त्तकीव प्रतिसीरापनयद्वारा रङ्गव्यापृतेन । तत्र च कर्मणामुपयोगः । एतावांस्तु विशेषः—प्रतिसीरापनये पारिषदानां नर्तकीविषयसाक्षात्कारो भवति । इह तु अविद्यापिधानापनयमात्रमेव नापरमुत्पाद्यमस्ति । ब्रह्मसाक्षात्कारस्य ब्रह्मस्वभावस्य नित्यत्वेनानुत्पाद्यत्वात् ।
अत्रोच्यते—का पुनरियं ब्रह्मोपासना ? किं शाब्दज्ञानमात्रसन्ततिराहो निर्विचिकित्सशाब्दज्ञान-
भामती-व्याख्या
होने से नित्य है। नित्य पदार्थ की कभी भी उत्पत्ति नहीं होती, अतः उसे उत्पाद्य क्योंकर कहा जा सकेगा ? ब्रह्मात्मक साक्षात्कार से भिन्न भावना-साध्य साक्षात्कार तो वैसा ही संशयाक्रान्त होता है, जैसा कि प्रतिभास ( अनवधारणात्मक ) ज्ञान, अतः उसे प्रमाण ही नहीं माना जा सकता, क्योंकि भावनाविषयविषयक और भावनारूप सामग्री से जनित ज्ञान प्रायः अपने विषय से व्यभिचरित ही पाए जाते हैं, जैसे कि हिमाच्छादित पर्वत-कन्दरा में भयङ्कर शीत से कांपता हुआ कोई व्यक्ति कभी अपनी अनुमित अग्नि की भावना ( निरन्तर चिन्तना ) करता-करता मूर्छित-सी अवस्था में जो अग्नि की विकराल ज्वाला का साक्षात्कार कर लेता है, वह प्रमाणभूत कदापि नहीं हो सकता, क्योंकि वह अन्य किसी भी प्रमाण से संवादित नहीं, प्रत्युत उसका प्रायः विसंवादन ( बाध ) ही उपलब्ध होता है । फलतः भावना के द्वारा कोई प्रमाणरूप साक्षात्कारात्मक कार्य उत्पन्न नहीं किया जा सकता कि भावना को अपने कार्य में कर्मानुष्ठान की अपेक्षा मानी जा सके ।
इसी प्रकार कूटस्थ, नित्य, सर्वत्र सर्वदा प्राप्त ब्रह्मतत्त्व का भावना ( उपासना ) के द्वारा कोई विकार, संस्कार या अप्राप्त-प्रापण भी नहीं किया जा सकता कि ब्रह्मरूप साक्षात्कार को विकार्य, संस्कार्य या प्राप्य कहा जा सकता ।
शङ्का—ब्रह्मात्मक साक्षात्कार भले ही उत्पाद्य या विकार्य न हो, किन्तु संस्कार्य हो सकता है। जैसे रङ्ग-मञ्च पर किसी परदे के पीछे बैठी नर्तकी रङ्ग-व्यापृत नट के द्वारा परदा हटाए जाने पर दर्शकों को दिखने लग जाती है, वैसे ही अनादि अनिर्वचनीय द्विविध अविद्या का आवरण हटते ही चिति शक्ति जाज्वल्यमान हो जाती है, फलतः आवरण-निवर्तन-रूप संस्कार से संस्कृत ब्रह्मतत्त्व को संस्कार्य मानना सर्वथा न्याय-संगत है। आवरण की निवृत्ति में कर्मानुष्ठान की अपेक्षा होती है। दृष्टान्त से दाष्टर्न्तिक में इतना अन्तर है कि रङ्गस्थल पर पहले प्रतिसीर ( परदे ) के उठने पर रङ्गस्थ पुरुषों के द्वारा नर्तकी का साक्षात्कार होता है, किन्तु प्रकृत में ब्रह्म के अविद्यारूप आवरण की निवृत्ति मात्र होती है, अतः आवरण का नाश ही उत्पाद्य होता है, ब्रह्म-साक्षात्कार नित्य ब्रह्मरूप होने से उत्पाद्य नहीं होता ।
समाधान—यह ब्रह्मोपासना क्या वस्तु है ? क्या सामान्य शाब्द ज्ञान की अविरल धारा है ? अथवा असंशयात्मक शाब्द-बोध की धारा ? यदि सामान्य शाब्द ज्ञान की सन्तति