भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६५

भामती

वपरिज्ञानं विना शक्यान्वनुष्ठातुम्। न च धर्ममीमांसापरिशीलनं विना तत्परिज्ञानम्। तस्मात् साधूक्तं 'कर्मावबोधानन्तर्यं विशेषः' इति। कर्मावबोधेन हि कर्मानुष्ठानसाहित्यं भवति ब्रह्मोपासनाया इत्यर्थः।

तदेतन्निराकरोति ॐ न ॐ। कुतः ? ॐ कर्मावबोधात् प्रागप्यधीतवेदान्तस्य ब्रह्मजिज्ञासोपपत्तेः ॐ। इदमत्राकूतम्—ब्रह्मोपासनया भावनापराभिधानया कर्माप्यपेक्ष्यन्त इत्युक्तं, तत्र ब्रूमः—क्व पुनरस्याः कर्मापेक्षा ? किं कार्ये, यथाऽऽग्नेयादीनां परमापूर्वं चरमभाविफलानुकूले जनयितव्ये समिदाद्यपेक्षा ? स्वरूपे वा, यथा तेषामेव द्विरवत्तपुरोडाशाद्विद्व्यग्निदेवताद्यपेक्षा ? न तावत् कार्ये, तस्य विकल्पासहत्वात्। तथा हि—ब्रह्मोपासनाया ब्रह्मस्वरूपसाक्षात्कारः कार्यमभ्युपेयः, स चोत्पाद्यो वा स्यात्, यथा संयवनस्य पिण्डः। विकार्यो वा, यथाऽवघातस्य व्रीहयः। संस्कार्यो वा, यथा प्रोक्षणस्योलूखलादयः। प्राप्यो वा, यथा दोहनस्य पयः। न तावदुत्पाद्यः, न खलु घटादिसाक्षात्कार इव जडस्वभावेभ्यो घटादिभ्यो भिन्न इन्द्रियाद्याधेयो ब्रह्मसाक्षात्कारो भावनाधेयः सम्भवति ब्रह्मणोऽपराधीनप्रकाशतया

भामती-व्याख्या

भिन्नस्वरूपवाले कर्म एवं उनके अधिकारी (फल-भोक्ता) पुरुषों के भेद का यथावत् ज्ञान नहीं होता, और धर्म-मीमांसा शास्त्र का परिशीलन किए बिना कथित कर्म-भेद का ज्ञान नहीं हो सकता। फलतः जो यह कहा गया कि "कर्मावबोधानन्तर्यं विशेषः", वह अत्यन्त उचित है अर्थात् कर्म-ज्ञान का आनन्तर्य ब्रह्म-जिज्ञासा में अत्यावश्यक है। पहले जो कहा गया कि कर्मानुष्ठान-साहित्य ब्रह्मभावना में विवक्षित है, वह कर्म-ज्ञान के द्वारा ही सम्पन्न हो सकता है।

उत्तर-पक्ष—कथित पूर्व-पक्ष का निराकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"न, कर्मावबोधात् प्रागप्यधीतवेदान्तस्य ब्रह्मजिज्ञासोपपत्तेः।" सिद्धान्ती का अभिप्राय यह है कि जो यह कहा गया है कि ब्रह्म की उपासना (भावना) कर्मानुष्ठान की अपेक्षा करती है, वहाँ जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मोपासना को कर्मानुष्ठान की अपेक्षा किस अंश में है ? (१) क्या ब्रह्मोपासना को अपने कार्यभूत ब्रह्मज्ञान की सिद्धि करने के लिए कर्मानुष्ठान की वैसे ही अपेक्षा है, जैसे कि दर्शपूर्णमास-घटक आग्नेयादि छः प्रधान कर्मों को अपने कार्यभूत परमापूर्व से अन्तिम (स्वर्गादिरूप) फल की निष्पत्ति करने के लिए 'समिधु, तनूनपात, इडा, बर्हिः और स्वाहाकार'—इन नामों से प्रख्यात पाँच प्रयाज कर्मों की अपेक्षा होती है ? (२) अथवा जैसे आग्नेयादि कर्मों को ही अपने स्वरूप का लाभ करने के लिए द्विरवत्त (दो बार काटे गये) पुरोडाश के दो टुकड़ों और अग्न्यादिरूप देवता की अपेक्षा होती है, वैसे ही ब्रह्मभावना को अपने स्वरूप की सम्पत्ति करने के लिए कर्मानुष्ठान की अपेक्षा होती है ?

प्रथम कल्प के अनुसार ब्रह्मोपासना को अपने कार्य का लाभ करने के लिए कर्मानुष्ठान की अपेक्षा नहीं मानी जा सकती, क्योंकि तब तो ब्रह्म-साक्षात्कार को ब्रह्म-भावना का कार्य मानना होगा। सभी कार्य चार प्रकार के होते हैं—(१) उत्पाद्य, (२) विकार्य, (३) संस्कार्य और (४) प्राप्य। आटा सानने से जो पिण्ड (बाटी) बनता है, वह उत्पाद्य कार्य है। धानों के छिलके उतार देने से जो चावल बनाए जाते हैं, वे विकार्यभूत कार्य हैं। "व्रीहीन् प्रोक्षति"—इत्यादि विधि के द्वारा विहित प्रोक्षण कर्म से संस्कृत व्रीह्यादि को संस्कार्य तथा गौ को दुहने से प्राप्त दूध को प्राप्य कार्य कहा जाता है। इनमें ब्रह्म-साक्षात्कार को उत्पाद्यरूप कार्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि जैसे जडस्वरूप घटादि पदार्थों का साक्षात्कार घटादि से भिन्न इन्द्रिय-साध्य माना जाता है, वैसे ब्रह्म-साक्षात्कार को भावना-साध्य नहीं माना जा सकता, अपितु स्वयंप्रकाशात्मक ब्रह्म का साक्षात्कार ब्रह्मरूप