भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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६४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

तानामपि कर्मणां संयोगपृथक्त्वेन ब्रह्मभावनां प्रत्यङ्गभावमाचक्षते, क्रत्वर्थस्येव खादिरत्वस्य वीर्य्यार्थताम्, एकस्य तूभयार्थत्वे संयोगपृथक्त्वमिति न्यायात् । अत एव पारमर्षं सूत्रम्- 'सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्' इति । यज्ञतपोदानादि सर्वं तदपेक्षा ब्रह्मभावनेत्यर्थः । तस्माद्यदि श्रुत्यादयः प्रमाणं यदि वा पारमर्षं सूत्रं सर्वथा यज्ञादिकर्मसमुच्चिता ब्रह्मोपासना विशेषणत्रयवत्यनाद्यविद्यातद्वासनासमुच्छेदक्रमेण ब्रह्मसाक्षात्काराया मोक्षापरनाम्ने कल्पत इति तदर्थं कर्माण्यनुष्ठेयानि । न चैतानि दृष्टादृष्टसामवायिकारादुपकारहेतुभूतोपदेशिकातिदेशिकक्रमपर्य्यन्ताङ्गग्रामसहितपरस्परविभिन्नकर्मस्वरूपतदधिकारिभे-

भामती-व्याख्या

दूसरे आचार्यगण "तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन" ( बृह० उ० ४।४।२२ ) इस श्रुति के बल पर संयोगपृथक्त्वन्याय के अनुसार यज्ञादि कर्मों का विधान ब्रह्मजिज्ञासा में वैसे ही मानते हैं, जैसे कर्म के अङ्गभूत खादिरत्व का "खादिरं वीर्यकामस्य यूपं कुर्वीत"-इस श्रुति के द्वारा वीर्य-कामना में विनियोग माना जाता है। [ श्रीमण्डन मिश्र भी कहते हैं- "अन्ये तु संयोगपृथक्त्वेन सर्वकर्मणामेवात्मज्ञानाधिकारानुप्रवेशमाहुः "विविदिषन्ति यज्ञेन" इति श्रुतेः" (ब्र० सि० पृ० २७ ) ] । संयोग-पृथक्त्व का स्वरूप बताते हुए महर्षि जैमिनि कहते हैं- "एकस्य तूभयत्वे संयोग-पृथक्त्वम्' (जै० सू० ४।२।५) [ भाष्यकार ने उसका स्पष्टीकरण उदाहरणों के द्वारा किया है कि "अग्निहोत्रे श्रूयते- "दध्ना जुहोति" (आप० श्रौ० सू० ६।२५ ) इति । पुनश्च "दध्नेन्द्रियकामस्य जुहुयात्" (तै० ब्रा० २।३।५।६) इति । तथाऽग्नीषोमीये पशावाम्नायते- "खादिरे बध्नाति" इति । पुनश्च खादरिं वीर्यकामस्य यूपं कुर्यात्" इति । तत्र एकस्योभयत्वे नित्यत्वे नैमित्तिकत्वे च संयोगपृथक्त्वं कारणम्-एकः संयोगो दध्ना जुहोतीति, एको दध्नेन्द्रियकामस्येति" (शाबर० पृ० १२५०) । यहाँ संयोग का अर्थ 'वाक्य' है। एक ही क्रिया का दो प्रधान फलों के साथ भी अन्वय (साध्य-साधनभाव) माना जा सकता है, यदि उनके बोधक वाक्य पृथक्-पृथक् हैं]। प्रकृत में भी "यजेत स्वर्गकामः"-ऐसे वाक्यों के द्वारा यागादि में स्वर्गादि की साधनता और "विविदिषन्ति यज्ञेन" इस वाक्य के द्वारा यागादि कर्मों में आत्मज्ञान की साधनता अवबोधित होती है। अत एव हमारे ब्रह्मसूत्रकार ने भी कहा है- "सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्" (ब्र० सू० ३।४।२६) । यहाँ यज्ञ, तप और दानादि क्रियाओं का 'सर्व' पद से ग्रहण किया गया है, उनकी अपेक्षा है जिस ब्रह्मभावना में, वह ब्रह्मभावना सर्वापेक्षा है। इस प्रकार चाहे 'यज्ञेन'-यहाँ तृतीया विभक्त्यादि श्रुतियों को विनियोजक प्रमाण माना जाय, चाहे परम ऋषि के "सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेः"-इस सूत्र को अङ्गाङ्गिभाव के प्रतिपादन में प्रमाण माना जाय, सर्वथा यह सिद्ध होकर रह जाता है कि यज्ञादि कर्मों से समुच्चित, (आदर नैरन्तर्य और दीर्घकाल-इन) तीन विशेषणों से युक्त ब्रह्मभावना अनादि अविद्या तथा तज्जन्य संस्कारों का समुच्छेद करती हुई मोक्षसंज्ञक ब्रह्मसाक्षात्कार को प्राप्त कराने में पूर्णतया सक्षम होती है, अतः उस (ब्रह्मज्ञान) के लिए कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए। कर्मों का अनुष्ठान तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक कि दृष्ट (धान की भूसी उतारना आदि), अदृष्ट (प्रोक्षण और प्रयाजादि कर्मों से जनित पुण्यादि), सामवायिक (अवघातादि सन्निपत्योपकारक अङ्गभूत कर्म), आरादुपकार के हेतुभूत (द्रव्यादि से दूरस्थ परमापूर्व के उपकारक प्रयाजादि अङ्ग कर्म), औपदेशिक (विकृतिभूत कर्मों में प्रत्यक्षतः पठित शरमय बर्हिरादि), आतिदेशिक ('प्रकृतिवद्विकृतिः कर्त्तव्या'-इस अतिदेश वाक्य के द्वारा अवगमित अङ्ग), क्रमपर्यन्त (क्रम-प्राप्त) अङ्गों से युक्त परस्पर