भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

अथशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६३


भामती

इति। ब्रह्मचर्यतपःश्रद्धायज्ञादयश्च सत्कारः। अत एव श्रुतिः “तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः” इति। विज्ञाय तर्कोपकरणेन शब्देन प्रज्ञां भावनां कुर्वीतेत्यर्थः। अत्र च यज्ञादीनां श्रेयः-परिपन्थिकल्मषनिबर्हणद्वारेणोपयोग इति केचित्। पुरुषसंस्कारद्वारेणान्ये। यज्ञादिसंस्कृतो हि पुरुष आदरनैरन्तर्यदीर्घकालैरासेवमानो ब्रह्मभावनामनाद्यविद्यावासनां समूलकाषं कषति। ततोऽस्य प्रत्यगात्मा सुप्रसन्नः केवलो विशदीभवति। अत एव स्मृतिः—‘महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः’। ‘यस्यैतेऽष्टाचत्वारिंशत्संस्काराः’ इति च॥

अपरे तु ऋणत्रयापाकरणेन ब्रह्मज्ञानोपयोगं कर्मणामाहुः। अस्ति हि स्मृतिः ‘ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्’ इति।

अन्ये तु ‘तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन’ इत्यादिश्रुतिभ्यस्तत्तत्फलाय चोदि-


भामती-व्याख्या

दीर्घकालीन अभ्यास अपेक्षित है, जैसा कि महर्षि पतञ्जलि कहते हैं—“स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः” (यो० सू० १।१४)। ब्रह्मचर्य, तप, श्रद्धा और यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान करना ही अभेद-भावना का सत्कार है। इस बोधक्रम की व्यवस्था स्वयं श्रुति कर रही है—“तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः” (बृह० उ० ४।४।२१)। अर्थात् युक्ति-सहकृत श्रुतिरूप शब्द के द्वारा विज्ञाय [उक्त अभेद का (परोक्ष) ज्ञान प्राप्त कर] भावनारूप प्रज्ञा में संलग्न हो जाय। इस भावना में यज्ञादि का उपयोग कुछ लोग कल्याण के विरोधी कल्मष (अन्तःकरणगत कालुष्य) के निबर्हण (नाश) में मानते हैं [श्री मण्डनमिश्र ने भी कहा है—“अन्ये तु मन्यन्ते अनवाप्तकामः कामोपहृतमना न परमाद्वैतदर्शनयोग्यः। कर्मभिस्तु कृतकर्मनिबर्हणः सहस्रसंवत्सरपर्यन्तः प्राजापत्यात् पदात् परमाद्वैतमात्मानं प्रतिपद्यते” (ब्र० सि० पृ० २७)]।

कुछ लोग यज्ञादि कर्मों का उपयोग अधिकारी पुरुष को संस्कृत करने में मानते हैं, क्योंकि यज्ञादि कर्मों के अनुष्ठान से संस्कृत होकर अधिकारी व्यक्ति ब्रह्मभावना का श्रद्धापूर्वक निरन्तर दीर्घ समय तक अभ्यास करके अनादि अविद्या के भेदविषयक सुदृढ़ संस्कारों को समूल नष्ट कर डालता है, उसके अनन्तर ही उसका प्रत्यगात्मा सुप्रसन्न केवलीभूत ज्योति के रूप में जगमगा उठता है [श्री मण्डनमिश्र ने (ब्र० सि० पृ० २८ में) कहा है—“अन्ये तु पुरुषसंस्कारतयात्मज्ञानाधिकारसंसर्शी कर्मणां वर्णयन्ति—‘महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः’ (मनु० २।२८), ‘यस्यैते चत्वारिंशत् संस्कारा अष्टावात्मगुणाः’ (गौ० ध० सू० ८।२२)]।

अन्य आचार्य (देव-ऋण, पितृऋण और ऋषि-ऋण—इन) तीन ऋणों के उद्धार में कर्मानुष्ठान का उपयोग मानते हैं, जैसा कि स्मृतिकारों ने कहा है—

ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्।
अनपाकृत्य मोक्षं तु सेवमानो व्रजत्यधः॥ (मनु० ६।३५)

[“जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिऋणवा जायते ब्रह्मचर्येणर्षिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः” (तै० सं० ६।३।१०।५) यह श्रुति कहती है कि ब्राह्मण जन्म ही से तीन ऋणों का भाजन होता है, उनमें यज्ञादि ब्रह्मचर्य से ऋषि-ऋण, यज्ञादि कर्मों के अनुष्ठान से देव-ऋण तथा सन्तानोत्पत्ति से पितृऋण का उद्धार होता है। अतः उक्त तीन ऋणों को चुका कर ही ब्राह्मण को मोक्ष-मार्ग पर आरूढ होना चाहिए। [श्री मण्डनमिश्र कहते हैं कि “अन्येषां दर्शनम्—पृथक्कार्या एव सन्तः कर्मविधय आत्मज्ञानाधिकारमवतारयन्ति पुरुषम्, अनपाकृतर्णत्रयस्य तत्रानधिकाराद्—“ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेदिति”]।

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