भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 80, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ ] |
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भामती
तदर्थानुष्ठानपरिवर्जनं ततश्च तद्बोध इति । न च वेदान्तवाक्यानामेव स्वार्थप्रत्यायने कर्मापेक्षा, न वाक्यान्तराणामिति साम्प्रतम्, विशेषहेतोरभावात् । ननु तत्त्वमसीतिवाक्यात् त्वंपदार्थस्य कर्तृभोक्तृरूपस्य जीवात्मनो नित्यशुद्धबुद्धोदासीनस्वभावेन तत्पदार्थेन परमात्मनैक्यमशक्यं द्रागित्येव प्रतिपत्तुम्, आपाततोऽशुद्धसत्त्वैर्योग्यताविरहनिश्चयात् । यज्ञतपोदानतनूकृतान्तर्मलास्तु विशुद्धसत्त्वाः श्रद्धाना योग्यतावगमपुरःसरं तादात्म्यमवगमिष्यन्तीति चेत्, तत्किमिदानीं प्रमाणकारणं योग्यतावधारणमप्रमाणात्कर्मणो वक्तुमध्यवसितोऽसि ? प्रत्यक्षाद्यतिरिक्तं वा कर्मापि प्रमाणम् ? वेदान्ताविरुद्धतन्मूलन्यायबलेन तु योग्यतावधारणे कृतं कर्मभिः ? तस्मात् तत्त्वमसीत्यादेः श्रुतमयेन ज्ञानेन जीवात्मनः परमात्मभावं गृहीत्वा तन्मूलया चोपपत्त्या व्यवस्थाप्य तदुपासनायां भावनापराभिधानायां दीर्घकालनैरन्तर्यवत्यां ब्रह्मसाक्षात्कारफलायां यज्ञादीनामुपयोगः । यथाहुः—'‘स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः’’
भामती-व्याख्या
रूप में अन्योऽन्याश्रयता दोष प्रसक्त होता है। 'केवल वेदान्त-वाक्यों को ही कर्मानुष्ठान की अपेक्षा है, अन्य ( कर्मादिपरक ) वाक्यों को नहीं'—ऐसा कहना भी उचित नहीं, क्योंकि जब सभी वैदिक वाक्यों में स्वार्थ-समर्पण की प्रणाली में कोई अन्तर नहीं, तब कतिपय वाक्यों को ही कर्मानुष्ठान की अपेक्षा क्यों ?
इसका उत्तर यह है कि "तत्त्वमसि" (छां. ६।८।७) इत्यादि वाक्यों के द्वारा त्वं-पदार्थ-रूप कर्तृत्वभोक्तृत्वादि धर्मों से युक्त जीवात्मा का नित्य, शुद्ध, बुद्ध, उदासीनस्वरूप तत्पदार्थ-भूत परमात्मा के साथ अभेद-बोध सहसा किसी भी श्रोता पुरुष को नहीं होता, क्योंकि 'जीव में परमात्मरूपता की योग्यता ही नहीं'—इस प्रकार के योग्यताभाव का निश्चय सहजतः सभी पुरुषों को होता है। किन्तु यज्ञ, तप और दानादि शुभ कर्मों के अनुष्ठान से जिनके अन्तःकरण का मल-विक्षेपादि दोष क्षीण हो जाता है, ऐसे विशुद्ध अन्तःकरणवाले श्रद्धालु पुरुषों को जीव में ब्रह्मभाव की योग्यता का निश्चय एवं उसके अनन्तर अभेद-बोध हो जाता है, इस प्रकार वेदान्त-वाक्यों को अपने अर्थ का बोध कराने में यज्ञादि कर्मों की अपेक्षा स्पष्ट हो जाती है। [ श्री मण्डन मिश्र भी कहते हैं—‘‘एवं च रागादिनिबन्धननैसर्गिकप्रवृत्तिभेदविलयद्वारेण दृष्टेनैव कर्मविधय आत्मज्ञानाधिकारोपयोगिनः। तथा हि शान्तस्य दान्तस्य समाहितस्य चात्मनि दर्शनमुद्दिश्यते शक्यं च’’, ( ब्र. सि. पृ. २७ ) ] ।
सिद्धान्त— जीव और ब्रह्म के अभेद में योग्यतावधारण की कारणता जो यज्ञादि में बताई गई, वहाँ जिज्ञासा होती है कि कर्मों को अप्रमाणभूत मानकर कारण माना गया है ? अथवा प्रमाणरूप मानकर ? प्रथम कल्प संगत नहीं, क्योंकि उक्त योग्यता का अवधारण (निश्चय या प्रमा ज्ञान) किसी प्रमा के करणीभूत प्रमाण का काम है, अप्रमाणभूत कर्मों का नहीं। "प्रमाणकारणं योग्यतावधारणम्" का अर्थ है—प्रमाणकारणं (प्रमाणं कारणं यस्य, तत्) योग्यतावधारणम्। द्वितीय कल्प भी उचित नहीं, क्योंकि प्रत्यक्षादि परिगणित प्रमाणों में यज्ञादि कर्म की गणना किसी ने नहीं की, अतः कर्म को एक पृथक् प्रमाण मानना होगा। यदि वेदान्त के अविरुद्ध (उपक्रमादि) युक्तियों के बल पर उक्त योग्यता का अवधारण किया जाता है, तब कर्मों की क्या आवश्यकता ? अतः 'तत्त्वमसि' इत्यादि शब्दों को सुनकर प्राप्त श्रुतमय ( शाब्दबोधात्मक परोक्ष ) ज्ञान के द्वारा जीव में ब्रह्मभाव की परोक्ष प्रतीति होती है। वेदान्तानुकूल उपक्रमादि युक्तियों के द्वारा उक्त अभेद व्यवस्थापित होता है। इस प्रकार श्रवण और मनन के पश्चात् अभेदविषयिणी निदिध्यासनरूप भावना की लोकोत्तर लता में ब्रह्म साक्षात्कारात्मक फल की निष्पत्ति करने के लिए यज्ञादि कर्मानुष्ठान के माध्यम से