भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अथशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६१

नन्विह कर्मावबोधानन्तर्यं विशेषः । न, धर्मजिज्ञासायाः प्रागप्यधीतवेदान्तस्य ब्रह्म-


भामती

मध्ययनं लक्षयति । तथा चाथातो धर्मजिज्ञासेत्यनेनैव गतमिति नेदं सूत्रमारब्धव्यम् । धर्मशब्दस्य वेदार्थमात्रोपलक्षणतया धर्मवद् ब्रह्मणोऽपि वेदार्थत्वाविशेषेण वेदाध्ययनानन्तर्योपदेशसाम्यादित्यर्थः ।

चोदयति ॐ नन्विह कर्मावबोधानन्तर्यं विशेषो धर्मजिज्ञासातो ब्रह्मजिज्ञासायाः ॐ । अस्यार्थः—‘विविदिषन्ति यज्ञेन’ इति तृतीयाश्रुत्या यज्ञादीनामङ्गत्वेन ब्रह्मज्ञाने विनियोगात् , ज्ञानस्यैव कर्मतयेच्छां प्रति प्राधान्यात्, प्रधानसम्बन्धाच्चाप्रधानानां पदार्थानाम् । तत्रापि च न वाक्यार्थज्ञानोत्पत्तावङ्गभावो यज्ञादीनां, वाक्यार्थज्ञानस्य वाक्यादेवोत्पत्तेः । न च वाक्यं सहकारितया कर्माण्यपेक्षत इति युक्तम् , अकृतकर्मणामपि विदितपदपदार्थसङ्गतोनां समधिगतशाब्दन्यायतत्त्वानां गुणप्रधानभूतपूर्वापरपदार्थार्काङ्क्षासन्निधियोग्यतानुसन्धानवतामप्रत्यूहं वाक्यार्थप्रत्ययोत्पत्तेः । अनुत्पत्तौ वा विधिनिषेधवाक्यार्थप्रत्ययाभावेन तदर्थानुष्ठानपरिवर्जनाभावप्रसङ्गः । तद्द्बोधतस्तु तदर्थानुष्ठानपरिवर्जने परस्पराश्रयः—तस्मिन् सति


भामती-व्याख्या

प्रायः हुआ ही करती है, जैसे ‘धूमेन वह्निरनुमीयते’ का अर्थ होता है—‘धूमविषयकज्ञानेन वह्निरनुमीयते’। फलतः ब्रह्म-जिज्ञासा में स्वाध्यायाध्ययन का आनन्तर्य तो “अथातो धर्मजिज्ञासा” (जै. सू. १।१।१) इस सूत्र से ही अवगत हो जाता है, उसके लिए “अथातो ब्रह्मजिज्ञासा” (ब्र. सू. १।१।१) इस सूत्र की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । “अथातो धर्म-जिज्ञासा”—इस सूत्र में ‘धर्म’ शब्द समस्त वेदार्थ का बोधक है, जैसा कि शालिकनाथमिश्र कहते हैं—“धर्मशब्दश्च वेदार्थमात्रपरः” (बृहतीपञ्चिका पृ. २०)। ‘धर्म’ और ‘ब्रह्म’—दोनों समानरूप से वेदार्थ हैं, अतः इन दोनों में वेदाध्ययनानन्तर्य ‘अथातो धर्मजिज्ञासा’—इसी से प्राप्त है ।

पूर्वपक्ष—यद्यपि वेदाध्ययन का आनन्तर्य धर्म और ब्रह्म—इन दोनों में समान है, तथापि धर्मजिज्ञासा की अपेक्षा ब्रह्म-जिज्ञासा में अपेक्षित कर्म-ज्ञान का आनन्तर्य अधिक है । आशय यह है कि “विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन” (बृह. उ. ४।४।२२) इस वेद-वाक्य के ‘यज्ञेन’ इत्यादि पदों में प्रयुक्त तृतीया विभक्तिरूप श्रुति ब्रह्मज्ञान में ही यज्ञादि कर्मों का अङ्गत्वेन विनियोग करती है, इच्छा में नहीं, क्योंकि यद्यपि विविदिषा पद वेदन (ज्ञान) और ज्ञानकर्मक इच्छा—इन दोनों का बोधक है, तथापि साध्यार्थ (कर्मार्थ) अभीप्सित होने के कारण इच्छा की अपेक्षा भी प्रधान ही माना जाता है, प्रधान पदार्थ के साथ ही करणादि रूप अङ्गपदार्थों का अन्वय होता है। ज्ञान भी परोक्ष और अपरोक्ष—दो प्रकार का होता है, यज्ञादि अङ्गों का विनियोग वाक्यार्थविषयक परोक्ष ज्ञान में नहीं होता, क्योंकि वह ज्ञान तो यज्ञादि कर्मों की अपेक्षा नहीं करता, केवल वाक्य के श्रवणमात्र से उत्पन्न हो जाता है । ‘वाक्य अपनी सहायता के लिए कर्म की अपेक्षा करता है’—ऐसा कहना भी युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि जिन व्यक्तियों ने किसी प्रकार के यज्ञादि कर्म का अनुष्ठान नहीं किया, जिन्हें केवल पदों और पदार्थों की संगति का ज्ञान है, शाब्दबोधोपयोगी युक्तियों का तात्त्विक ज्ञान है, गुणप्रधानभूत पूर्वापर-प्रयुक्त पदों में आकांक्षा, योग्यता और सन्निधिरूप शाब्द सामग्री का भली-भाँति स्मरण है, ऐसे व्यक्तियों को वाक्यार्थ का बोध उत्पन्न हो जाता है। कर्मानुष्ठान के बिना यदि वाक्य-श्रवण से वाक्यार्थ-बोध नहीं होता, तब विहित कर्मों के प्रवर्तक और निषिद्ध कर्मों के निवर्तक वाक्यों से बोध न होने के कारण विहित कर्मों का अनुष्ठान और निषिद्ध कर्मों का परित्याग कैसे होगा ? यदि कर्मानुष्ठान से वाक्यार्थ-बोध और वाक्यार्थ-बोध से कर्मानुष्ठान माना जाता है, तब विस्पष्ट