भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 78, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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सति चानन्तर्यार्थत्वे यथा धर्मजिज्ञासा पूर्ववृत्तं वेदाध्ययनं नियमेनापेक्षते, एवं ब्रह्मजिज्ञासापि यत्पूर्ववृत्तं नियमेनापेक्षते, तद्वक्तव्यम् । स्वाध्यायानन्तर्यं तु समानम् ।
भामती
फलत इति । परमार्थतस्तु कल्पान्तरोपन्यासे पूर्वप्रकृतापेक्षा, न चेह कल्पान्तरोपन्यास इति पारिशेष्यादानन्तर्यार्थ एवेति युक्तम् । भवत्वानन्तर्यार्थः किमेवं सतीत्यत आह ॐ सति चानन्तर्यार्थत्वे इति ॐ । न तावद्यस्य कस्यचिदानन्तर्यमिति वक्तव्यं, तस्याभिधानमन्तरेणापि प्राप्तत्वाद्, अवश्यं हि पुरुषः किञ्चित् कृत्वा किञ्चित् करोति । न चानन्तर्यमात्रस्य दृष्टमदृष्टं वा प्रयोजनं पश्यामः । तस्मात्तस्यात्रानन्तर्यं वक्तव्यं यद्विना ब्रह्मजिज्ञासा न भवति, यस्मिन् सति तु भवन्ती भवत्येव । तदिदमुक्तम् ॐ यत्पूर्ववृत्तं नियमेनापेक्षते इति ॐ ।
स्यादेतद्—धर्मजिज्ञासाया इव ब्रह्मजिज्ञासाया अपि योग्यत्वात् स्वाध्यायानन्तर्यं, धर्मवद् ब्रह्मणोऽप्याम्नायैकप्रमाणगम्यत्वात् । तस्य चागृहीतस्य स्वविषये जिज्ञासाजननत्वात्, ग्रहणस्य च स्वाध्यायोऽध्येतव्य इत्यध्ययनेनैव नियतत्त्वात् । तस्माद् वेदाध्ययनानन्तर्यमेव ब्रह्मजिज्ञासाया अप्यथशब्दार्थ इत्यत आह ॐ स्वाध्यायानन्तर्यं तु समानं धर्मब्रह्मजिज्ञासयोः ॐ । अत्र च स्वाध्यायेन विषयेण तद्विषय-
भामती-व्याख्या
भी सिद्ध हो जाता है, अतः आनन्तर्यार्थकत्व का आग्रह हमारा नहीं, क्योंकि फलतः इन दोनों पक्षों में कोई अन्तर नहीं, विशेषता यहाँ इतनी अवश्य है कि पूर्वप्रकृतापेक्षी 'अथ' शब्द का प्रयोग पक्षान्तर ( कोट्यन्तर ) के उपन्यास में होता है, यहाँ पर तो कोई कोट्यन्तर का उपस्थापन नहीं किया जा रहा, अतः पारिशेष्यात् आनन्तर्यार्थ में 'अथ' शब्द का प्रयोग मानना चाहिए। 'अथ' शब्द का आनन्तर्य में प्रयोग मानने पर क्या लाभ ? इस प्रश्न का उत्तर है—"सति चानन्तर्यार्थत्वे"। आशय यह है कि जैसे "अथातो धर्मजिज्ञासा"—यहाँ 'अथ' शब्द पूर्वप्रकृतापेक्षा-सहगत आनन्तर्यार्थक माना गया है, जैसा कि भाष्यकार शबरस्वामी कहते हैं—"तत्र लोकेऽयमथशब्दो वृत्तादनन्तरस्य प्रक्रियार्थे दृष्टः, तत्तु वेदाध्ययनम्, तस्मिन् हि सति साऽवकल्पते" ( जै. सू. १।१।१ ) । अर्थात् 'धर्म-जिज्ञासा' सूत्र का घटकीभूत 'अथ' शब्द आनन्तर्यार्थक होने पर भी जिस-किसी क्रिया के आनन्तर्य को स्वीकार नहीं करता, अपितु पूर्व-प्रकृत वेदाध्ययन के आनन्तर्य का अभिधान करता है, वैसे ही "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा"—यहाँ पर भी 'अथ' शब्द के द्वारा उसी पदार्थ के आनन्तर्य की विवक्षा होती है, जिस पदार्थ के बिना ब्रह्म-जिज्ञासा सम्भव न होकर उस पदार्थ के अनुष्ठानान्तर ही उक्त जिज्ञासा पनप सके—इस आशय का स्पष्टीकरण किया जाता है—"यत् पूर्ववृत्तं नियमेनापेक्षते"।
शङ्का होती है कि स्वाध्याय ( वेद-शाखा ) का अध्ययन कर लेने पर अध्येता पुरुष में जैसे यह योग्यता आ जाती है कि वह धर्म-जिज्ञासा ( धर्म-विचार ) कर सके, वैसे ही ब्रह्म-जिज्ञासा ( ब्रह्म-विचार ) की क्षमता भी उसमें आ जाती है, क्योंकि धर्म और ब्रह्म के प्रतिपादक वे ही वैदिक वाक्य होते हैं, जिनका वह अध्ययन ( ग्रहण ) "स्वाध्यायोऽध्येतव्यः"—इस विधि के बल पर ही कर चुका है, अतः "अथातो धर्मजिज्ञासा" ( जै. सू. १।१।१ ) इस सूत्र में 'अथ' शब्द का स्वाध्यायानन्तर्य अर्थ होता है, वैसे ही "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" ( ब्र. सू. १।१।१ ) इस सूत्र में भी 'अथ' शब्द का स्वाध्यायानन्तर्य ही अर्थ क्यों न मान लिया जाय ? इस शङ्का का समाधान किया गया है—"स्वाध्यायानन्तर्यं समानम्"। इस भाष्य में 'स्वाध्याय' पद स्वाध्यायविषयक अध्ययन का लक्षक है, क्योंकि स्वाध्याय ( वेद ) विषय और अध्ययन विषयी है, विषय-वाचक पद की विषयी में लक्षणा