भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअथशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५९
श्रुत्या मङ्गलप्रयोजनो भवति। पूर्वप्रकृतापेक्षायाश्च फलत आनन्तर्याव्यतिरेकात्।
भामती जनो भवति, अन्यार्थमानीयमानोदकुम्भदर्शनवत्। तेन न स्मृतिव्याकोपः। न चेहानन्तर्यार्थस्य सतो न श्रवणमात्रेण मङ्गलार्थतेत्यर्थः। स्यादेतत्—पूर्वप्रकृतापेक्षोऽथशब्दो भविष्यति विनैवानन्तर्यार्थत्वम्। तद्यथेममेवाथशब्दं प्रकृत्य विमृश्यते, किमयमथशब्द आनन्तर्येऽथाधिकारे इति? अत्र विमर्शवाक्येऽथशब्दः पूर्वप्रकृतमथशब्दमपेक्ष्य प्रथमपक्षोपन्यासपूर्वकं पक्षान्तरोपन्यासे। न चास्यानन्तर्यमर्थः, पूर्वप्रकृतस्य प्रथमपक्षोपन्यासेन व्यवधानात्। न च पूर्वप्रकृतानपेक्षा, तदनपेक्षस्य तद्विषयत्वाभावेनासमानविषयतया विकल्पानुपपत्तेः, न हि जातु भवति किं नित्य आत्मा, अथानित्या बुद्धिरिति? तस्मादानन्तर्यं विना पूर्वप्रकृतापेक्ष इहाथशब्दः कस्मान्न भवतीत्यत आह पूर्वप्रकृतापेक्षायाश्च फलत आनन्तर्याव्यतिरेकात्। अस्यायमर्थः—न वयमानन्तर्यार्थतां व्यसनितया रोचयामहे, किन्तु ब्रह्मजिज्ञासाहेतुभूतपूर्वप्रकृतसिद्धये। सा च पूर्वप्रकृतार्थापेक्षत्वेऽप्यथशब्दस्य सिध्यतीति व्यर्थं आनन्तर्यार्थत्वावधारणाग्रहोऽस्माकमिति। तदिदमुक्तं,
भामती-व्याख्या 'अथ' शब्द श्रवणमात्र से वीणादि की ध्वनि के समान ही मङ्गल्यरूप प्रयोजन का वैसे ही साधक हो जाता है, जैसे कि कोई कन्या अपने माता-पिता की प्यास बुझाने के लिए जल से भरा घट ला रही है, यद्यपि वह घट मङ्गल्यरूप प्रयोजन की सिद्धि के लिए नहीं लाया गया, तथापि उसके दर्शन मात्र से द्रष्टा पुरुष का मंगल सिद्ध हो जाता है, अतः 'अथ' शब्द का आनन्तर्य अर्थ मानने पर भी किसी प्रकार का उक्त स्मृति-वाक्य से विरोध नहीं होता, क्योंकि आनन्तर्य अर्थ में प्रयुक्त 'अथ' शब्द के श्रवणमात्र से मङ्गल नहीं होता—ऐसा नहीं, अपितु मङ्गल होता ही है।
शङ्का होती है कि आनन्तर्य और मङ्गल—इन दो अर्थों को छोड़ कर पूर्व प्रकृत पदार्थ के परामर्श (उपस्थापकत्व) में भी 'अथ' शब्द का प्रयोग देखा जाता है, जैसे कि इसी 'अथ' शब्द को लेकर यह सन्देह होता है कि 'किमयमथशब्द आनन्तर्ये, अथ अधिकारे?' इस सन्देह-वाक्य में 'अथ' शब्द के लिए एक कोटि का उपन्यास करने के पश्चात् कोटयन्तर की उपस्थिति कराने के लिए पूर्व प्रकृत 'अथ' शब्द का उपस्थापन 'अथ' पद के प्रयोग से किया गया है। यह 'अथ' पद आनन्तर्यार्थक नहीं, क्योंकि पूर्व प्रकृत 'अथ' शब्द और इस 'अथ' पद का आनन्तर्य (अव्यवहितोच्चारण) नहीं, अपितु 'आनन्तर्ये'—इस प्रकार प्रथम कोटि का उपन्यास कर देने से पूर्व प्रकृत 'अथ' शब्द अनन्तर (अव्यवहित) न रह कर व्यवहित हो जाता है। फलतः पूर्वप्रकृतापेक्षी 'अथ' शब्द को आनन्तर्यार्थक नहीं माना जा सकता। यह 'अथ' पद पूर्वप्रकृतापेक्षी भी नहीं—ऐसा कहना सम्भव नहीं, अन्यथा उक्त वाक्य से संशय का लाभ न हो सकेगा, क्योंकि एक ही धर्मी में विरुद्ध दो कोटियों के आरोपण का नाम संशय होता है। यदि उक्त 'अथ' पद पूर्वप्रकृत का उपस्थापक न होकर अर्थान्तर का बोधक है, तब उक्त वाक्य का 'किमथशब्द आनन्तर्ये, अथवा अन्यशब्दः अधिकारे'? यह वाक्य संशय का वैसे ही बोधक नहीं माना जाता, जैसे कि 'कि नित्य आत्मा, अथ अनित्या बुद्धिः'। फलतः सूत्र में भी 'अथ' शब्द का प्रयोग आनन्तर्यार्थ में न मान कर पूर्व प्रकृत-परामर्शी क्यों न मान लिया जाय? इस शङ्का का समाधान है—"पूर्वप्रकृतापेक्षायाश्च फलतः आनन्तर्याव्यतिरेकात्।" इस भाष्य का तात्पर्य यह है कि हम यहाँ 'अथ' शब्द का प्रयोग जिस-किसी भी पदार्थ के आनन्तर्य अर्थ में नहीं करते, अपितु पूर्वप्रकृत की अपेक्षा से ही ब्रह्म-जिज्ञासा के लिए नियमतः पूर्व अपेक्षित कारण पदार्थ की सिद्धि करने के लिए 'अथ' शब्द का प्रयोग मानते हैं। यह प्रयोजन तो 'अथ' पद के पूर्वप्रकृतापेक्षी मानने पर