भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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कार्यत्वात् । मङ्गलस्य च वाक्यार्थे समन्वयाभावात् । अर्थान्तरप्रयुक्त एव ह्यथशब्दः
भामती
वचनत्वात् । ज्ञानेच्छावाचकत्वाज्जिज्ञासापदस्य, प्रवर्त्तिका हि मीमांसायां जिज्ञासा स्यात् । न च प्रवर्त्य-प्रवर्त्तकयोरेक्यम् , एकत्वे तद्भावानुपपत्तेः । न च स्वार्थपरत्वस्योपपत्तौ सत्यामन्यार्थपरत्वकल्पना युक्ताऽ-तिप्रसङ्गात् । तस्मात् सुष्टूक्तं जिज्ञासाया अनधिकार्थत्वादिति ।
अथ मङ्गलार्थोऽथशब्दः कस्मान्न भवति ? तथा च मङ्गलहेतुत्वात् प्रत्यहं ब्रह्मजिज्ञासा कर्त्तव्येति सूत्रार्थः सम्पद्यत इत्याह ॐ मङ्गलस्य च वाक्यार्थे समन्वयाभावात् ॐ । पदार्थ एव हि वाक्यार्थे समन्वी-यते, स च वाच्यो वा लक्ष्यो वा । न चेह मङ्गलमथशब्दस्य वाच्यं वा लक्ष्यं वा, किन्तु मृदङ्गशङ्खध्वनि-वदथशब्दश्रवणमात्रकार्यम् । न च कार्यज्ञाप्ययोर्वाक्यार्थे समन्वयः शब्दव्यवहारे दृष्ट इत्यर्थः ॥ तत्किमिदानीं मङ्गलार्थोऽथशब्दस्तेषु तेषु न प्रयोक्तव्यः । तथा च—
“ओंकारश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा।
कण्ठं भित्त्वा विनिर्य्यातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ॥”
इति स्मृतिव्याकोप इत्यत आह ॐ अर्थान्तरप्रयुक्त एव ह्यथशब्दः श्रुत्या मङ्गलप्रयोजनो भवति ॐ । अर्थान्तरेषु आनन्तर्यादिषु प्रयुक्तोऽथशब्दः श्रुत्या श्रवणमात्रेण वेणुवीणाध्वनिवद् मङ्गलं कुर्वन् मङ्गलप्रयो-
भामती-व्याख्या
‘मीमांसा’ शब्द बनाया गया है, जिसका रूढ़ अर्थ ‘पूजित विचार’ है। ‘मान्बध’—इस सूत्र के द्वारा ‘सन्’ प्रत्यय इच्छा में नहीं किया गया, क्योंकि इस सूत्र के उत्तरवर्ती "धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा” (पा. सू. ३।१।७) इस सूत्र के द्वारा इच्छा में ‘सन्’ का विधान करना यह सिद्ध करता है कि इस सूत्र के पूर्ववर्ती ‘मान्बध’—इस सूत्र से विहित सन् इच्छार्थक नहीं और ‘जिज्ञासा’ में सन् इच्छार्थक है—‘ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा’। इस प्रकार जिज्ञासा प्रवर्तक और मीमांसा (विचार) प्रवर्त्य है। प्रवर्तक और प्रवर्त्य—दोनों अभिन्न नहीं हो सकते, अन्यथा उनमें प्रवर्त्य-प्रवर्तकभाव ही नहीं बन सकेगा। ‘मीमांसा’ शब्द में जब स्वार्थपरक ‘सन्’ प्रत्यय की उपपत्ति हो सकती है, तब अन्य अर्थ में ‘सन्’ का तात्पर्य मानना युक्ति-युक्त नहीं, अन्यथा स्वार्थपरक प्रत्यय का विधान ही व्यर्थ हो जायगा। अतः भाष्यकार ने जो कहा है—‘जिज्ञासाया अनधिकार्यत्वात्’ वह बहुत सोच-समझ कर कहा है।
सूत्रोपात्त ‘अथ’ शब्द का मंगल अर्थ क्यों न मान लिया जाय ? ‘मंगल की साधिका होने के कारण ब्रह्म-जिज्ञासा प्रतिदिन करनी चाहिए’—ऐसा सूत्र का अर्थ किया जा सकता है। इस शङ्का का समाधान करते हुए कहा गया है—“मङ्गलस्य च वाक्यार्थे समन्वयाभा-वात्।” वाक्य-घटक पद के अर्थ का ही वाक्यार्थ में अन्वय हुआ करता है, वह अर्थ ‘पद’ का वाच्य होता है या लक्ष्य। मंगळरूप अर्थ न तो ‘अथ’ पद का वाच्य है और न लक्ष्य, किन्तु जैसे मृदङ्ग और शङ्खादि की ध्वनि श्रवणमात्र से मंगलार्थक मानी जाती है, वैसे ही ‘अथ’ शब्द के श्रवणमात्र का कार्य मंगल होता है। पद के वाच्य या लक्ष्यभूत अर्थ का ही वाक्यार्थ में अन्वय होता है, पद के कार्य या ज्ञाप्य अर्थ का नहीं यह शाब्दिक मर्यादा है। यदि कहा जाय कि इस प्रकार तो कहीं भी मङ्गल के लिए ‘अथ’ शब्द का प्रयोग ही न हो सकेगा, किन्तु स्मृतिकारों ने ‘अथ’ शब्द का मङ्गलार्थक प्रयोग माना है—
“ओंकारश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा।
कण्ठं भित्त्वा विनिर्य्यातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ॥
इस स्मृति वाक्य के विरोध का परिहार किया जाता है—“अर्थान्तरप्रयुक्त एव ह्यथशब्दः श्रुत्या मङ्गलप्रयोजनो भवति” अर्थात् आनन्तर्यादि अर्थों का बोध कराने के लिए भी प्रयुक्त