भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अथशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५७

भामती

ब्रह्ममीमांसाशास्त्रप्रवृत्त्यङ्गसंशयप्रयोजनसूचनार्थत्वेन जिज्ञासाया एव विवक्षितत्वात् । तदविवक्षायां तु तदसूचनेन काकदन्तपरीक्षायामिव ब्रह्ममीमांसायां न प्रेक्षावन्तः प्रवर्तेरन् । न हि तदानीं ब्रह्म वा तज्ज्ञानं वाऽभिधेयप्रयोजने भवितुमर्हतः । अनध्यस्ताहंप्रत्ययविरोधेन वेदान्तानामेवंविधेऽर्थे प्रामाण्यानुपपत्तेः । कर्मप्रवृत्त्युपयोगितयोपचरितार्थानां वा जपोपयोगिनां वा हुमित्येवमादीनामविवक्षितार्थानामपि स्वाध्यायाध्ययनविध्यधीनग्रहणत्वस्य सम्भवात् । तस्मात्सन्देहप्रयोजनसूचनी जिज्ञासा इह पदतो वाक्यतश्च प्रधानं विवक्षितव्या । न च तस्या अधिकार्यत्वम्, अप्रस्तूयमानत्वात्, येन तत्समभिव्याहृतोऽथशब्दोऽधिकारार्थः स्यात् । जिज्ञासाविशेषणं तु ब्रह्मज्ञानमधिकार्यं भवेत् । न च तदप्यथशब्देन सम्बध्यते, प्राधान्याभावात् । न च जिज्ञासा मीमांसा येन योगानुशासनवदधिक्रियेत । नान्तत्त्वं निपात्य माङ् मान इत्यस्माद्वा मान पूजायामित्यस्माद्वा धातोर्मान्बधेत्यादिनाऽनिच्छार्थे सनि व्युत्पादितस्य मीमांसाशब्दस्य पूजितविचार-

भामती-व्याख्या

का अन्वय क्यों न कर दिया जाय ? तो ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ब्रह्मविचारात्मक शास्त्र में प्रवृत्ति के अङ्गभूत संशय और प्रयोजन के सूचनार्थ जिज्ञासा ही विवक्षित है, उसकी विवक्षा न करने पर संशय और प्रयोजन का लाभ न होगा और उसके न होने के कारण जैसे निरर्थक और निष्प्रयोजन काक-दन्त-परीक्षा शास्त्र में कोई विचारशील प्रवृत्त नहीं होता, वैसे ही इस ब्रह्म-मीमांसा में भी कोई प्रवृत्त न होगा, क्योंकि जिज्ञासा के बिना ब्रह्म में सन्दिग्धत्व और ब्रह्म-ज्ञान में सप्रयोजनरूपता का लाभ नहीं होता । ब्रह्म और ज्ञान स्वरूप सत् प्रवर्तक नहीं होते, अपितु सन्दिग्ध और सप्रयोजन के रूप में ही प्रवर्तक होते हैं । संशय का विषयीभूत सद्वितीय ब्रह्म ही है, उसमें वेदान्त-वाक्यों का तात्पर्य माना नहीं जा सकता, क्योंकि 'अहमद्वितीयः', 'अहं ब्रह्मास्मि'—इत्यादि अनध्यस्त अहमाकार ( अखण्डाकार ) वृत्ति उसकी विरोधिनी है । वेदान्त-वाक्य यदि अविवक्षितार्थक या जपमात्र के उपयोगी मान लिए जाते हैं, तब “स्वाध्यायोऽध्येतव्यः”—इस स्वाध्याय विधि के द्वारा उनके सविधि अध्ययन का विधान क्योंकर होगा ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि कर्म की प्रवृत्ति में अनुपयोगी अविवक्षितार्थक, या जपमात्र में उपयोगी 'हुम्'—इत्यादि शब्दों का भी स्वाध्यायाध्ययन-विधि के द्वारा ग्रहण माना जाता है । फलतः प्रकृत में संशय और प्रयोजन की सूचिका जिज्ञासा ही पद और वाक्य की मर्यादा के अनुसार विवक्षित है । [ 'शमदमादिसाधनसम्पत्त्यनन्तरं ब्रह्मजिज्ञासा भवति'—इस प्रकार के विवक्षित वाक्य में जैसे 'जिज्ञासा' प्रधान है, वैसे ही 'ब्रह्म-जिज्ञासा'—इस पद में भी ब्रह्म की अपेक्षा जिज्ञासा प्रधान है ] । यह जिज्ञासा अधिकार्य ( आरम्भणीय ) नहीं, क्योंकि इस वेदान्त-दर्शन के द्वितीयादि सूत्रों में कहीं भी इसका प्रतिपादन नहीं किया गया है । यदि किसी भी सूत्र में जिज्ञासा का आरम्भ या प्रतिपादन किया गया होता, तब 'जिज्ञासा' पद के समीप में पठित 'अथ' शब्द को आरम्भार्थक माना जा सकता था । जिज्ञासा का विशेषणीभूत ब्रह्म-ज्ञान अवश्य आरम्भणीय है, किन्तु 'अथ' शब्द के साथ उसका अन्वय नहीं हो सकता, क्योंकि पद के प्रधानभूत अर्थों का ही परस्पर अन्वय होता है, 'ब्रह्म-ज्ञान' प्रधान नहीं, अपितु जिज्ञासा का विशेषण है । जिज्ञासा का यहाँ मीमांसा अर्थ भी नहीं कर सकते कि “अथ योगानुशासनं” के समान उसका आरम्भ सम्भव हो जाता, क्योंकि 'जिज्ञासा' पद में 'सन्' प्रत्यय इच्छार्थक है, किन्तु 'मीमांसा' पद में 'सन्' प्रत्यय इच्छार्थक नहीं, अपितु स्वार्थमात्र का समर्पक है—'माङ् माने' अथवा 'मान पूजायां'—इस धातु से “मान्बधदान्शान्भ्यो दीर्घश्चाभ्यासस्य” ( पा. सू. ३।१।६ ) इस सूत्र के द्वारा 'माङ्' धातु में 'ङ्' के स्थान पर 'न्' का निपातनतः आदेश और अभ्यास के विकारभूत इकार को दीर्घ करके