भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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५६ | सूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ ]


तत्र अथशब्द आनन्तर्यार्थः परिगृह्यते, नाधिकारार्थः, ब्रह्मजिज्ञासाया अनधि-

भामती

परमपुरुषार्थहेतुभूतसूक्ष्मतमार्थनिर्णयफलता विचारस्य पूजितता। तस्या मीमांसायाः शास्त्रम्, सा ज्ञानेन शिष्यते शिष्येभ्यः यथावत्प्रतिपाद्यत इति। सूत्रं च बह्वर्थसूचनाद् भवति। यथाहुः—

“लघूनि सूचितार्थानि स्वल्पाक्षरपदानि च।
सर्वतः सारभूतानि सूत्राण्याहुर्मनीषिणः।।” इति।

तदेवं सूत्रतात्पर्यं व्याख्याय तस्य प्रथमपदमयेति व्याचष्टे ॐ तत्राथशब्द आनन्तर्यार्थः परिगृह्यते ॐ। तेषु सूत्रपदेषु मध्ये योऽयमथशब्दः स आनन्तर्यार्थ इति योजना। नन्वधिकारार्थोऽप्यथ-शब्दो दृश्यते, यथा—‘अथैष ज्योतिः’ इति वेदे, यथा वा लोके ‘अथ शब्दानुशासनम्, ‘अथ योगानुशासनम्’ इति, तत्किमत्राधिकारार्थो न गृह्यत इत्यत आह ॐ नाधिकारार्थः ॐ। कुतः? ॐ ब्रह्मजिज्ञासाया अनधिकार्यत्वात् ॐ। जिज्ञासा तावदिह सूत्रे ब्रह्मणश्च तत्ज्ञानाच्च शब्दतः प्रधानं प्रतीयते। न च यथा दण्डी प्रैषानन्वाहेत्यत्राप्रधानमपि दण्डशब्दार्थो विवक्ष्यते, एवमिहापि ब्रह्मतज्ज्ञाने इति युक्तम्,

भामती-व्याख्या

भाष्यकार शास्त्र का आदिम (प्रथम) सूत्र कहते हैं—"वेदान्तमीमांसाशास्त्रस्य व्याचिख्यासितस्य इदमादिमं सूत्रम्"।

यहाँ 'मीमांसा' शब्द पूजित विचार का वाचक है। प्रकृत विचार में जो मोक्षरूप परम पुरुषार्थ के हेतुभूत सूक्ष्मतम अर्थ की निर्णायकता है, वही विचारगत पूजितता है। उस मीमांसात्मक तर्क की इस (वेदान्त दर्शन) शास्त्र के द्वारा अधिकारी शिष्यों को शिक्षा दी जाती है। सूत्रवाक्य अपने विषय की पुष्कलरूप में संक्षिप्त सूचनामात्र देते हैं, इसी में उनका गौरव माना जाता है, क्योंकि सूत्र का लक्षण किया गया है—

लघूनि सूचितार्थानि स्वल्पाक्षरपदानि च।
सर्वतः सारभूतानि सूत्राण्याहुर्मनीषिणः॥ (पराशरोप. अ. १८)

[स्वल्पकाय उस पदावलि को मनीषीगणों ने सूत्र कहा हैं, जिसमें सारभूत प्रतिपाद्य वस्तु के सम्यक् प्रतिपादन की पूर्ण क्षमता हो]।

इस प्रकार प्रथम सूत्र का तात्पर्य बताकर सूत्र-घटक प्रथम 'अथ' पद की व्याख्या करते हैं—"तत्राथशब्द आनन्तर्यार्थः परिगृह्यते"। तत्र (इस सूत्र के सभी पदों के मध्य में) जो यह 'अथ' शब्द प्रयुक्त हुआ है, वह आनन्तर्यार्थक है। शङ्का होती है कि 'अथ' शब्द अधिकार (आरम्भ) अर्थ में भी प्रयुक्त होता है, जैसे वेद में “अथैष ज्योतिः” (ता. ब्रा. १६।८।१) अथवा लोक में जैसे—'अथ शब्दानुशासनम्” (म. भाष्य पृ. ५) “अथ योगानुशासनम्” (यो. सू. १।१)। अतः यहाँ भी उस (आरम्भ) अर्थ में 'अथ' शब्द का प्रयोग क्यों न मान लिया जाय? इस शङ्का का निराकरण करते हैं—"नाधिकारार्थः”, क्योंकि 'ब्रह्म-जिज्ञासा'—यहाँ शब्दतः इच्छा 'ब्रह्म और उसके ज्ञान' इन दोनों से प्रधान है, उसका विषय ज्ञान है और ज्ञान का विषय है—ब्रह्म। ['इच्छा का आरम्भ करना चाहिए'-ऐसी आज्ञा कर देने मात्र से इच्छा की उत्पत्ति नहीं होती, अपितु विषयगत इष्टसाधनता या सौन्दर्य का ज्ञान ही इच्छा का जनक माना जाता है, उसके बिना] इच्छा अधिकार्य या समुत्पाद्य नहीं होती। यदि कहा जाय कि इच्छा यदि आरम्भणीय नहीं, तब उसके विषयीभूत ज्ञान और ब्रह्म को 'ब्रह्मजिज्ञासा' पद का अर्थ वैसे ही माना जा सकता है, जैसे “दण्डी प्रैषान् अन्वाह” [दण्ड के सहारे खड़ा होकर आज्ञा वचनों का उच्चारण करे] यहाँ पर अप्रधानभूत 'दण्ड' शब्दार्थ की विवक्षा होती है, अतः प्रकृत में ब्रह्म या ब्रह्म-ज्ञानरूप अमुख्यार्थ में अधिकारार्थ