भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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विषयादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५५

( १ जिज्ञासाधिकरणम् । सू० १ )

वेदान्तमीमांसाशास्त्रस्य व्याचिख्यासितस्येदमादिमं सूत्रम्—

अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १ ॥

भामती

चरितार्थाः, किन्तूक्तलक्षणाः । प्रत्यगात्मैव तेषां मुख्योऽर्थः । तस्य च वक्ष्यमाणेन क्रमेण सन्दिग्धत्वात्प्रयो- जनवत्त्वाच्च युक्ता जिज्ञासा, इत्याशयवान् सूत्रकारः तज्जिज्ञासामसूत्रयत् -- ❖ अथातो ब्रह्मजिज्ञासा इति ❖ । जिज्ञासया सन्देहप्रयोजने सूचयति । तत्र साक्षादिच्छा- व्याप्यत्वाद् ब्रह्मज्ञानं कण्ठोक्तं प्रयोजनम् । न च कर्मज्ञानात् पराचीनमनुष्ठानमिव ब्रह्मज्ञानात् पराचीनं किञ्चिदस्ति येनैतदवान्तरप्रयोजनं भवेत् । किन्तु ब्रह्ममीमांसाख्यतर्केतिकर्तव्यतानुज्ञातविषयैर्वेदान्तैराहितं निर्विकित्सं ब्रह्मज्ञानमेव समस्तदुःखोपशमरूपमानन्दैकरसं परमं प्रयोजनम् । तमर्थमधिकृत्य हि प्रेक्षावन्तः प्रवर्तन्तेतराम् । तच्च प्राप्तमप्यनाद्यविद्यावशादप्राप्तमिवेति प्रेप्सितं भवति । यथा स्वग्रीवागत- मपि ग्रैवेयकं कुतश्चिद् भ्रमान्नास्तीति मन्यमानः परेण प्रतिपादितमप्राप्तमिव प्राप्नोति । जिज्ञासा तु संशयस्य कार्यमिति स्वकारणं संशयं सूचयति । संशयश्च मीमांसारम्भं प्रयोजयति । तथा च शास्त्रे प्रेक्षावत्प्रवृत्तिहेतुसंशयप्रयोजनसूचनाद् युक्तमस्य सूत्रस्य शास्त्रादित्वमित्याह भगवान् भाष्यकारः ❖ वेदान्त- मीमांसाशास्त्रस्य व्याचिख्यासितस्य अस्माभिः इदमादिमं सूत्रम् ❖ । पूजितविचारवचनो मीमांसाशब्दः ।

भामती-व्याख्या

है । वेदान्त-वाक्यों का जब कोई विरोधी नहीं, तब वे न तो अविवक्षितार्थक हो सकते हैं और न गौणाद्यर्थक, किन्तु शुद्ध, बुद्ध मुक्तरूप आत्मतत्त्व के प्रतिपादक हैं । प्रत्यगात्मा ही उनका मुख्य अर्थ है, वह वक्ष्यमाण क्रम से सन्दिग्ध भी है और सप्रयोजन भी, अतः उसकी जिज्ञासा समुचित है—इस आशय से सूत्रकार ने उक्त जिज्ञासा को सूत्रित किया है— "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" । जिज्ञासा के माध्यम से अधिकरण के सन्देह और प्रयोजनरूप दो अवयव सूचित किए गए हैं।

( ५ ) प्रयोजन—ब्रह्म-जिज्ञासा का अर्थ ब्रह्म-ज्ञान की इच्छा है, इच्छा का साक्षात् विषय होने के कारण ब्रह्म-ज्ञान मुख्य प्रयोजन है । कर्मपरक वाक्यों से कर्म का ज्ञान और ज्ञान से कर्म का अनुष्ठान किया जाता है, तब स्वर्गादिरूप मुख्य प्रयोजन सिद्ध होता है, अतः वहाँ कर्म-ज्ञान जैसे अवान्तर प्रयोजन माना जाता है, वैसे यहाँ ब्रह्म-ज्ञान को मुख्य प्रयोजन न मानकर अवान्तर प्रयोजन नहीं माना जा सकता, क्योंकि कर्म-ज्ञान के पश्चात् जैसे कर्म का अनुष्ठान अपेक्षित होता है, वैसे यहाँ ब्रह्म-ज्ञान के पश्चात् कुछ कर्त्तव्य शेष नहीं रहता, क्योंकि ब्रह्म-विचारात्मक तर्करूप इतिकर्त्तव्यता ( सहायक व्यापार ) के द्वारा जिनके अर्थों का परिपोषण किया गया, ऐसे वेदान्त-वाक्यों से समुत्पादित असन्दिग्ध ब्रह्म-ज्ञान ही समस्त दुःखों का उपशामक और परमानन्दैकरसात्मक परम प्रयोजन माना जाता है । उसकी लालसा से ही विवेकिगण वेदान्त-विचार में प्रवृत्त होते हैं। यद्यपि वह तत्त्व-ज्ञान ब्रह्मरूप होने के कारण सदैव प्राप्त है, तथापि अनादि अविद्या के कारण वह अप्राप्त-जैसा होकर वैसे ही प्रेप्सित ( प्राप्त करने की इच्छा का विषय ) हो जाता है, जैसे कि अपने गले में विद्यमान हार किसी भ्रम के कारण विस्मृत एवं खो गया-सा हो जाता है और किसी व्यक्ति के द्वारा स्मरण दिलाने पर प्राप्त-सा हो जाता है । जिज्ञासा संशय से जनित होती है, अतः वह अपने कारणीभूत संशय को सूचित करती है और संशय मीमांसा के आरम्भ का प्रयोजक हो जाता है । इस प्रकार विचारशील व्यक्ति की शास्त्र में प्रवृत्ति के हेतुभूत संशय और प्रयोजन को सूचित करके के कारण "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा'—इस वाक्य को भगवान्

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