भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १
भामती
एतावानत्रार्थसंक्षेपः—यद्यपि च स्वाध्यायाध्ययनविधिना स्वाध्यायपदवाच्यस्य वेदराशेः फलवदर्थावबोधपरतामापादयता कर्मविधिनिषेधानाभिव वेदान्तानामपि स्वाध्यायशब्दवाच्यानां फलवदर्थावबोधपरत्वमापादितम् । यद्यपि चाविशिष्टस्तु वाक्यार्थ इति न्यायान्मन्त्राणामिव वेदान्तानामर्थपरत्वमौत्सर्गिकं, यद्यपि च वेदान्तेभ्यश्चैतन्यान्नन्दघनः कर्तृत्वभोक्तृत्वरहितो निष्प्रपञ्च एकः प्रत्यगात्माऽवगम्यते, तथापि कर्तृत्वभोक्तृत्वदुःखशोकमोहमयमात्मानमवगाहमानेनाहम्प्रत्ययेन सन्देहबाधविरहिणा विरुध्यमाना वेदान्ताः स्वार्थात्प्रच्युता उपचरितार्था वा जपमात्रोपयोगिनो वेत्यविवक्षितस्वार्थाः । तथा च तदर्थविचारात्मिका चतुर्लक्षणी शारीरकमीमांसा नारब्धव्या । न च सर्वजनीनाहमनुभवसिद्ध आत्मा सन्दिग्धो वा सप्रयोजनो वा येन जिज्ञास्यः सन् विचारं प्रयुञ्जीतेति पूर्वः पक्षः ।
सिद्धान्तस्तु भवेदेतदेवं यद्यहम्प्रत्ययः प्रमाणं, तस्य तूक्तेन क्रमेण श्रुत्यादिबाधकत्वानुपपत्तेः । श्रुत्यादिभिश्च समस्ततीर्थंकरैश्च प्रमाणानभ्युपगमादध्यासत्वम् । एवं वेदान्ता नाविवक्षितार्थाः, नाप्युप-
भामती-व्याख्या
वेदान्त वाक्यों को शारीरक और इस वेदान्त-दर्शन को शारीरक-मीमांसा या वेदान्त-विचार कहा है। इन्हीं सब समस्याओं को ध्यान में रखकर श्री वाचस्पति मिश्र इस अधिकरण-ग्रन्थ में प्रथम अधिकरण की रचना करते हुए सभी प्रकार के सन्देहों का परिमार्जन करते हैं। प्रत्येक अधिकरण के पाँच अवयव होते हैं—
विषयो विशयश्चैव पूर्वपक्षस्तथोत्तरः ।
प्रयोजनं संगतिश्च शास्त्रेऽधिकरणं विदुः ॥ १ ॥
इसके अनुसार यहाँ अङ्ग हैं—
( १ ) विषय—अज्ञात ब्रह्म
( २ ) संशय—वेदान्तमीमांसा शास्त्र आरम्भणीय है ? अथवा नहीं ?
( ३ ) पूर्वपक्ष—यद्यपि 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' (शत. ब्रा. १५।५।७।२) इस स्वाध्याय-अध्ययन-विधि के द्वारा 'स्वाध्याय' (स्वकीय शाखारूप वेद) का सप्रयोजन अर्थ के प्रतिपादन में तात्पर्य स्थिर किया गया है, अतः शाखागत कर्मविषयक विधि-निषेध वाक्यों के समान वेदान्त वाक्यों में भी फलवदर्थ-बोधकता निश्चित है । एवं “अविशिष्टस्तु वाक्यार्थः” (जै. सू. १।२।३२) इस सूत्र के भाष्य में कहा है—“अविशिष्टस्तु लोके प्रयुज्यमानानां वेदे च पदानामर्थः । स यथैव लोके विवक्षितः तथैव वेदे भवितुमर्हति ।” अतः संहिता भाग के समान ही वेदान्त-वाक्यों में विवक्षितार्थत्व स्वाभाविक है । वेदान्त-वाक्यों के द्वारा सच्चिदानन्दरूप-कर्तृत्व-भोक्तृत्व से रहित, निष्प्रपञ्च, एक प्रत्यगात्मतत्व अवगत होता है ।
तथापि कर्तृत्व, भोक्तृत्व, दुःख, शोकादि से युक्त आत्मा को विषय करने वाले संदेह और बाध से रहित अहमनुभव के द्वारा विरुद्ध पड़ जाने के कारण वेदान्त-वाक्य अपने वाच्यार्थ से हट कर गौणार्थक या जपमात्र में उपयोगी माने जाते हैं । फलतः वेदान्तार्थ-विचारात्मक चार अध्यायों वाला यह शारीरक-मीमांसा शास्त्र आरम्भणीय नहीं है । सर्वजन-प्रसिद्ध अनुभव के द्वारा प्रमाणित कर्त्ता भोक्ता आत्मा न सन्दिग्ध है और न उसके ज्ञान का कोई विशेष प्रयोजन, अतः वह न तो जिज्ञास्य है और न किसी प्रकार के विचार का प्रवर्तक ।
( ४ ) उत्तर पक्ष—यह सब कुछ कहना तभी सत्य हो सकता था, जबकि अहमनुभव प्रमाणभूत होता । जब कि पूर्वोक्त रीति से उक्त अनुभव में श्रुत्यादि की बाधकता सम्भव नहीं । अहमनुभव की प्रामाणिकता न तो श्रुत्यादि वाक्यों से संवादित है और न किसी तार्किक (दार्शनिक) के द्वारा अनुमोदित, पारिशेष्यात् उसे अध्यासत्मक ही मानना पड़ता