भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविषयादिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५३
सर्वे वेदान्ता आरभ्यन्ते । यथा चायमर्थः सर्वेषां वेदान्तानां तथा वयमस्यां शारीरकमीमांसायां प्रदर्शयिष्यामः ।
भामती
हि रूपं तत्त्वज्ञानेनापोद्यते, न तु वास्तवमतत्त्वज्ञानेन । नहि रज्ज्वा रज्जुत्वं सहस्रमपि सर्पधाराप्रत्यया अपवदितुं समुत्सहन्ते । मिथ्याज्ञानप्रसञ्जितं च स्वरूपं शक्यं तत्त्वज्ञानेनापवदितुम् । मिथ्याज्ञानसंस्कारश्च सुदृढोऽपि तत्त्वज्ञानसंस्कारेणादरनैरन्तर्यदीर्घकालतत्त्वज्ञानाभ्यासजन्मनेति ।
स्यादेतत्—प्राणाद्युपासना अपि वेदान्तेषु बहुलमुपलभ्यन्ते, तत्कथं सर्वेषां वेदान्तानामात्मैकत्वप्रतिपादनमर्थ इत्यत आह ॐ यथा चायमर्थः सर्वेषां वेदान्तानां तथा वयमस्यां शारीरकमीमांसायां प्रदर्शयिष्यामः ॐ । शरीरमेव शरीरकं तत्र निवासी शारीरको जीवात्मा तस्य त्वंपदाभिधेयस्य तत्पदाभिधेयपरमात्मरूपतामीमांसा या सा तथोक्ता ।
भामती-व्याख्या
सकता। यह नैसर्गिक नियम है कि अध्यस्त पदार्थ का ही तत्त्व-ज्ञान से बाध होता है, वास्तविक पदार्थ की मिथ्या ज्ञान के द्वारा कभी भी निवृत्ति नहीं होती, जैसे कि रज्जुगत वास्तविक रज्जुत्व धर्म को 'अयं सर्पः', 'इयं जलधारा'—इत्यादि सहस्रों प्रकार के मिथ्या ज्ञान कभी भी निवृत्त नहीं कर सकते। मिथ्या ज्ञान के द्वारा आरोपित रूप का ही बाध तत्त्व-ज्ञान कर सकता है। मिथ्या ज्ञान से जनित सुदृढ़ संस्कार भी उस तत्त्व-ज्ञान के द्वारा जनित संस्कारों से विनष्ट हो जाते हैं, जिस तत्त्व का दीर्घकाल तक निरन्तर श्रद्धापूर्वक अभ्यास किया गया है। [ विजातीय वृत्तियों या संस्कारों के झंझावात को शान्त करने का एकमात्र उपाय है—सुदृढ़ निरोधाभ्यास, अभ्यास सुदृढ़ कैसे होता है? इसका मार्ग योग-सूत्र ने दिखाया है—"स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमि" (यो. सू. १।१४)। श्रद्धापूर्वक निरन्तर दीर्घ समय तक आसेवित अभ्यास सुदृढ़ होकर पूर्णतया अर्थक्रियाकारी माना जाता है ]। भाष्यकार ने जो कहा है—"आत्मैकत्वविद्याप्रतिपत्तये सर्वे वेदान्ता आरभ्यन्ते"। वहाँ यह शङ्का होती है कि वेदान्त या उपनिषद् ग्रन्थों में "यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च" (छां० उ० ५।१।१) इत्यादि प्रसङ्गों में प्राणादि उपासनाओं का भी प्रतिपादन किया गया है, तब सभी वेदान्त-वाक्यों में केवल आत्मैकत्वप्रतिपादकत्व क्योंकर घटेगा? इस शङ्का के समाधानार्थ कहा है—"यथा चायमर्थः सर्वेषां वेदान्तानां तथा वयमस्यां शारीरकमीमांसायां प्रदर्शयिष्यामः"। 'शारीरक' शब्द की शरीरमेव शरीरकम्, तत्र भवः शारीरकम्—ऐसी व्युत्पत्ति के आधार 'शारीरक' शब्द का अर्थ है—शरीराभिमानी चेतन जीव। यह जीव "तत्त्वमसि" (छां. ६।८।७) इस महावाक्य के घटकीभूत 'त्वम्' पद का वाच्यार्थ है। उसमें तत्पदाभिधेय परमात्मरूपता की मीमांसा (विचारशास्त्र) [ यहाँ यह विचारणीय हो जाता है कि इस वेदान्त-दर्शन को जीव-मीमांसा कहा जाय? या ब्रह्म-मीमांसा? जीव-मीमांसारूप मानने पर "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" (ब्र. सू. १।१।१) इस सूत्र में 'ब्रह्म' शब्द का जीवभावापन्न ब्रह्म अर्थ करना होगा और जिज्ञासा का आकार रखना होगा—कोऽयं जीवः? उसके अनुसार द्वितीय सूत्र में जिज्ञास्यभूत जीव का लक्षण करना चाहिए था, ब्रह्म का नहीं। कर्त्ता-भोक्ता जीव में संशयादि न होने के कारण जिज्ञास्यता भी नहीं बनती, अतः इस शास्त्र को ब्रह्ममीमांसा ही कहना चाहिए, हाँ, वस्तुस्थिति को ध्यान में रखकर 'जीव-मीमांसा' शब्द के द्वारा इस शास्त्र का अभिधान किया जा सकता है, अतः 'शारीरक' शब्द का अर्थ कुछ विद्वानों ने शरीरे भवः शारीरो जीवः, तं शारीरं कायति ब्रह्मरूपं गायति'—इस व्युत्पत्ति के माध्यम से 'अहं ब्रह्मास्मि'—इत्यादि