भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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५२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १


ऽध्यस्यति । एवमयमनादिरनन्तो नैसर्गिकोध्यासो मिथ्याप्रत्ययरूपः कर्तृत्वभोक्तृत्वप्रवर्तकः सर्वलोकप्रत्यक्षः । अस्यानर्थहेतोः प्रहाणाय, आत्मैकत्वविद्याप्रतिपत्तये

भामती

संसारी सर्वानर्थसम्भारभाजनं जीवात्मा इतरेतराध्यासोपादानस्तदुपादानश्चाध्यास इत्यनादित्वाद्वीजाङ्कुरवन्नेतरेतराश्रयत्वमित्युक्तं भवति । प्रमाणप्रमेयव्यवहारदृढीकृतमपि शिष्यहिताय स्वरूपाभिधानपूर्वकं सर्वलोकप्रत्यक्षतयाऽध्यासं सुदृढीकरोति । ॐ एवमयमनादिरनन्तः ॐ तत्त्वज्ञानमन्तरेणाशक्यसमुच्छेदः । अनाद्यनन्तत्वे हेतुरुक्तः ॐ नैसर्गिकः ॐ इति । ॐ मिथ्याप्रत्ययरूपः ॐ मिथ्याप्रत्ययानां रूपमनिर्वचनीयत्वं तद्यस्य स तथोक्तः, अनिर्वचनीय इत्यर्थः । प्रकृतमुपसंहरति ॐ अस्यानर्थहेतोः प्रहाणाय ॐ । विरोधिप्रत्ययं विना कुतोऽस्य प्रहाणमित्यत उक्तम् ॐ आत्मैकत्वविद्याप्रतिपत्तये ॐ । प्रतिपत्तिः प्राप्तिः तस्यै न तु जपमात्राय, नापि कर्मसु प्रवृत्तये, आत्मैकत्वं विगलितनिखिलप्रपञ्चत्वमानन्दरूपस्य सतस्तत्प्रतिपत्तिं निर्विचिकित्सां भावयन्तो वेदान्ताः समूलघातमध्यासमुपघ्नन्ति । एतदुक्तं भवति—अस्मत्प्रत्ययस्यात्मविषयस्य समीचीनत्वे सति ब्रह्मणो ज्ञातत्वान्निष्प्रयोजनत्वाच्च न जिज्ञासा स्यात् । तदभावे च न ब्रह्मज्ञानाय वेदान्ताः पठेरन् । अपि त्वविवक्षितार्था जपमात्रे उपयुज्येरन् । नहि तदौपनिषदामप्रत्ययः प्रमाणतामश्नुते । न चासावप्रमाणमभ्यस्तोऽपि वास्तवं कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यात्मनोऽपनेतुमर्हति । आरोपितं


भामती-व्याख्या

अहङ्कारास्पद, संसारी समस्त अनर्थ-प्रपञ्च का पात्र, जीवात्मा अन्योन्याध्यास पर आधृत और उत्तरोत्तर अध्यास का प्रयोजक होता है [ अर्थात् अध्यास-प्रयुक्त अहंविषयता और अहंविषयतापन्न चिदात्मा में प्रपञ्चाध्यास होता है ] । फलतः पूर्वोक्त अध्यासों की अन्योऽन्याश्रयता प्रत्याख्यात हो जाती है। यद्यपि प्रमाण-प्रमेयादि व्यवहारों के द्वारा अध्यास की दृढता का चित्रण किया जा चुका है, तथापि अबोध शिष्यों को भली प्रकार समझाने के लिए अध्यास का स्वरूप दिखा कर उसे दृढ़ता प्रदान की जा रही है— "एवमनादिरनन्तो नैसर्गिकोध्यासो" । यहाँ अनन्त का अर्थ है कि तत्त्व-ज्ञान के बिना उस (अध्यास) का अन्त (उच्छेद) नहीं किया जा सकता। अध्यास की अनादिता और अनन्तता का कारण बताया जाता है—'नैसर्गिकः"। "मिथ्याप्रत्ययरूपः"––का तात्पर्य है कि मिथ्या ज्ञानों के रूप (अनिर्वचनीयत्व) से युक्त अध्यास अनिर्वचनीय है। प्रकृत प्रसङ्ग का उपसंहार किया जाता है—"अस्यानर्थहेतोः प्रहाणाय"।

विरोधी ज्ञान के बिना इस (मिथ्या प्रत्यय) का प्रहाण नहीं हो सकता, अतः विरोधी ज्ञान और उसके साधनों का प्रदर्शन किया जाता है—"आत्मैकत्वविद्याप्रतिपत्तये सर्वे वेदान्ता आरभ्यन्ते"। प्रतिपत्ति का अर्थ प्राप्ति है, उसके लिए ही वेदान्त शास्त्र प्रवृत्त हुआ है, केवल जप या कर्म-प्रपञ्च में प्रवृत्ति के लिए नहीं, "आत्मैकत्व' से आत्मगत निखिल-प्रपञ्चाभावरूपता विवक्षित है, आत्मा स्वतः आनन्दरूप है, किन्तु पूर्वोक्त अध्यास के कारण उसकी आनन्दरूपता जो अप्राप्त-जैसी हो गई है, उसकी प्राप्ति (असन्दिग्ध निश्चय) कराते हुए वेदान्त-वाक्य अध्यास का समूल घात कर डालते हैं। सारांश यह है कि यदि आत्मविषयक अहं प्रत्यय समीचीन (प्रमारूप) होता, तब अहङ्कारास्पदत्वेन ब्रह्म ज्ञात ही है, अतः निष्प्रयोजन होने के कारण ब्रह्म की जिज्ञासा नहीं हो सकती थी, जिज्ञासा के अभाव में ब्रह्म का ज्ञान कराने के लिए वेदान्त वाक्यों की प्रवृत्ति ही नहीं होती या वे अविवक्षितार्थक होकर जपमात्र के उपयोगी रह जाते, क्योंकि पहले ही ब्रह्म का निश्चय रहने पर औपनिषद ब्रह्म का ज्ञान ज्ञातार्थ-ज्ञापक होने के कारण अप्रमाण ही हो जाता। अप्रमाणभूत ज्ञान का कितना भी अभ्यास किया जाय, वह आत्मा के वास्तविक कर्तृत्व-भोक्तृत्वादि धर्मों का अपनयन नहीं कर