भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्यासविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५१
तथा देहधर्मान्-स्थूलोऽहं, कृशोऽहं, गौरोऽहं तिष्ठामि, गच्छामि, लङ्घयामि चेति। तथेन्द्रियधर्मान्-मूकः, काणः, क्लीबः, बधिरः, अन्धोऽहमिति। तथाऽन्तःकरणधर्मान्-कामसंकल्पविचिकित्साध्यवसायादीन् । एवमहंप्रत्ययिनमशेषस्वप्रचारसाक्षिणि प्रत्यगात्मन्यध्यस्य, तं च प्रत्यगात्मानं सर्वसाक्षिणं तद्विपर्ययेणान्तःकरणादि-
भामती
स्यतीत्यर्थः। यदा च परोपाध्यपेक्षे देहधर्मे स्वाम्ये इयं गतिस्तदा कैव कथाऽनौपाधिकेषु देहधर्मेषु कृशत्वादिवित्यभिप्रायवानाह ꣤ तथा देहधर्मान् इति ꣥। देहादप्यन्तरङ्गाणामिन्द्रियाणामध्यस्तात्मभावानां धर्मान्मूकत्वादींस्ततोऽप्यन्तरङ्गस्यान्तःकरणस्याध्यस्तात्मभावस्य धर्मान् कामसङ्कल्पादीन् आत्मन्यध्यस्यतीति योजना।
तदनेन प्रपञ्चेन धर्माध्यासमुक्त्वा तस्य मूलं धर्म्यध्यासमाह ꣤ एवमहम्प्रत्ययिनम् ꣥। अहम्प्रत्ययो वृत्तिर्यस्मिन्नन्तःकरणादौ सोऽयमहम्प्रत्ययी तं ꣤ स्वप्रचारसाक्षिणि ꣥ अन्तःकरणप्रचारसाक्षिणि, चैतन्योदासीनताभ्यां, ꣤ प्रत्यगात्मन्यध्यस्य ꣥ तदनेन कर्तृत्वभोक्तृत्वे उपपादिते। चैतन्यमुपपादयति ꣤ तं च प्रत्यगात्मानं सर्वसाक्षिणं तद्विपर्ययेण ꣥ अन्तःकरणादिविपर्ययेण, अन्तःकरणाद्यचेतनं तस्य विपर्ययः चैतन्यं तेन, इत्थंभूतलक्षणे तृतीया। ꣤ अन्तःकरणादिष्वध्यस्यति ꣥। तदनेनान्तःकरणाद्यवच्छिन्नः प्रत्यगात्मा इदमनिदंरूपश्चेतनः कर्त्ता भोक्ता कार्य्यकारणाविद्याद्वयाधारोऽहङ्कारास्पदं
भामती-व्याख्या
द्वारा सञ्चारित औपाधिक धर्म हैं, उनकी जब ऐसी गति है, तब देहगत अनौपाधिक कृशत्वादि का आरोप आत्मा में क्यों न होगा? इसी भाव की अभिव्यक्ति करने के लिए कहा है— "तथा देहधर्मान्"। देह की अपेक्षा इन्द्रियाँ अन्तरङ्ग हैं, जिन वागादि इन्द्रियों में आत्मरूपता अध्यस्त है, उनके मूकत्वादि धर्मों एवं उनसे भी अन्तरङ्ग अन्तःकरण के सङ्कल्पादि धर्मों का आत्मा में अध्यास हो जाता है—इस प्रकार भाष्यार्थ की योजना कर लेनी चाहिए।
विस्तारपूर्वक धर्माध्यास की चर्चा करने के पश्चात् धर्माध्यास के मूल कारण धर्म्यध्यास का भाष्यकार वर्णन कर रहे हैं— "एवमहंप्रत्ययिनमशेषस्वप्रचारसाक्षिणि प्रत्यगात्मानमध्यस्य"। 'अहम्', 'अहम्'--इस प्रकार का प्रत्यय (वृत्ति) जिसमें होता है, उस अन्तःकरण को 'अहंप्रत्ययी' कहते हैं। उस (अन्तःकरण) का तादात्म्याध्यास उस प्रत्यगात्मा में किया जाता है, जो अन्तःकरण की वृत्तियों का स्वगत चैतन्य (ज्ञान) और तटस्थता के कारण साक्षी है [लोक में भी साक्षी वही पुरुष कहा जाता है, जो किसी वाद का ज्ञान तो रखता है, किन्तु उस वाद में सक्रिय भाग नहीं लेता, तटस्थ रहता है]। इस प्रकार 'अन्तःकरण से तादात्म्यापन्न होकर प्रत्यगात्मा अपने को कर्त्ता-भोक्ता मानने लगता है'--यह दिखाया गया। अन्तःकरण में चैतन्यारोप दिखाया जाता है— "तं च प्रत्यगात्मानं सर्वसाक्षिणम्"। "तद्विपर्ययेण" का अर्थ है—अन्तःकरणगत अचैतन्य (जाड्य) के विपरीत जो चैतन्य है, उस चैतन्य से उपलक्षित आत्मा का अन्तःकरण में अध्यास होता है। 'तद्विपर्ययेण'—यहाँ तृतीया विभक्ति "इत्थंभूतलक्षणे" (पा. सू. २।३।२१) इस सूत्र के द्वारा विहित हुई है [जो कि ज्ञापकार्थक होती है, जैसे किसी व्यक्ति के शिर पर जटाएँ देख कर समझ लिया जाता है कि यह तपस्वी है। वहाँ 'जटाभिः तापसः' ऐसा प्रयोग होता है, वैसे ही 'तद्विपर्ययेण प्रत्यगात्मा अध्यस्तो भवति'-यहाँ पर 'जाड्यविपरीतेन चैतन्यरूपेण'-ऐसा अर्थ फलित होता है]। "अन्तःकरणादिषु अध्यस्यति" ऐसा कह कर भाष्यकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अन्तःकरणादि से अवच्छिन्न प्रत्यगात्मा 'इदम्' और 'अनिदम्'-इस प्रकार विरुद्धरूपापन्न (चिदचिद्रूप) होकर चेतन, कर्त्ता-भोक्ता, 'कार्याविद्या और कारणाविद्या'--इन दो प्रकार की 'अविद्याओं का आधारभूत,