भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 68, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
|---|
माश्रित्य प्रवर्तन्ते । अध्यास्रो नाम अतस्मिंस्तद्बुद्धिरित्यवोचाम । तद्यथा-पुत्रभार्या-दिषु विकलेषु सकलेषु वा अहमेव विकलः सकलो वेति बाह्यधर्मानात्मन्यध्यस्यति;
भामती
हार्यम् ।
तदेवमात्मानात्मनोः परस्पराध्यासमाक्षेपसमाधानाभ्यामुपपाद्य प्रमाणप्रमेयव्यवहारप्रवर्त्तनेन च दृढीकृत्य तस्यानर्थहेतुतामुदाहरणप्रपञ्चेन प्रतिपादयितुं तत्स्वरूपमुक्तं स्मारयति ॐ अध्यास्रो नामातस्मिं-स्तद्बुद्धिरित्यवोचाम ॐ । 'स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः' इत्यस्य संक्षेपाभिधानमेतत् । तत्राहमिति धर्मितादात्म्याध्यासमात्रं ममेत्यनुत्पादितधर्माध्यासं नानर्थहेतुरिति धर्माध्यासमेव ममकारं साक्षादशेषा-नर्थसंसारकारणमुदाहरणप्रपञ्चेनाह ॐ तद्यथा, पुत्रभार्यादिषु इति ॐ । देहतादात्म्यमात्मन्यध्यस्य देहधर्मं पुत्रकलत्रादिस्वाम्यं च कृशत्वादिवदारोप्याहाहमेव विकलः सकल इति । स्वस्य खलु साकल्येन स्वाम्य-साकल्यात् स्वामीश्वरः सकलः सम्पूर्णो भवति । तथा स्वस्य वैकल्येन स्वाम्यवैकल्यात् स्वामीश्वरो विकलोऽसम्पूर्णो भवतीति । बाह्यधर्मा ये वैकल्यादयः स्वाम्यप्रणालिकया सञ्चारिताः शरीरे तानात्मन्यध्य-
भामती-व्याख्या
धान्यकुप्यपशुस्तेयं मद्यपस्त्रीनिषेवणम् ।
स्त्रीशूद्रविट्क्षत्रवधो नास्तिक्यं चोपपातकम् ॥ ( मनु. ११।५९-६६ )
गर्दभ-वधादि को सङ्कलीकरण कहा गया है—
खराश्वोष्ट्रमृगेभानामजाविकवधस्तथा ।
संकीरीकरणं ज्ञेयं मीनाहिमहिषस्य च ॥ ( मनु. ११।६८ )
अपात्र से दानादि-ग्रहण अपात्रीकरण कहा गया है—
निन्दितेभ्यो धनादानं वाणिज्यं शूद्रसेवनम् ।
अपात्रीकरणं ज्ञेयमसत्यस्य च भाषणम् ॥ ( मनु० ११।६९ )
मनुस्मृति में मलिनीकरण पातक भी गिनाए हैं—
कृमिकीटवयोहत्या मद्यानुगतभोजनम् ।
फलैधःकुसुमस्तेयमधैर्यं च मलावहम् ॥ ( मनु० ११।७० ) ] ।
इस प्रकार आत्मानात्मपदार्थों के अन्योऽन्याध्यास का आक्षेपसमाधानपूर्वक उपपादन किया गया, प्रमाण-प्रमेय-व्यवहार की उसमें प्रवर्तकता दिखाकर अध्यास का दृढीकरण दिखाया गया, अब विविध उदाहरणों के माध्यम से अध्यास की कथित अनर्थ-हेतुता का चित्रण करने के लिए अध्यास के पूर्वोक्त स्वरूप का स्मरण दिलाया जाता है—“अध्यासो नाम अतस्मिंस्तद्बुद्धिरित्यवोचाम”। यह “स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः”—इस विशद लक्षण का संक्षिप्ताभिधान मात्र है। अध्यास के दो अंश दिखाए गए—( १ ) अहङ्काराध्यास और ( २ ) ममकाराध्यास। इन्हीं को क्रमशः धर्म्यध्यास और धर्माध्यास भी कहा जाता है। इनमें धर्माध्यास साक्षात् अनर्थ का हेतु है—यह अनेक उदाहरणों के द्वारा सिद्ध किया जाता है—“पुत्रभार्यादिषु”। आत्मा में देह का तादात्म्याध्यास करके देह के धर्मभूत पुत्रभार्यादि के स्वामित्व एवं कृशत्वादि का आरोप करके मनुष्य कहता है—“अहमेव विकलः सकलः”—इत्यादि। अर्थात् पुत्रादिरूप स्वकीय जनों की सकलता ( सम्पन्नता ) से उसका स्वामित्व सकल हो जाने के कारण स्वामी अपने को सकल ( सम्पन्न ) मानता है। उसी प्रकार पुत्रादि स्वकीय परिजनों की विकलता ( विपन्नता ) से अपने को विकल मानता है—इस प्रकार पुत्रादि बाह्य पदार्थों के धर्म स्वामित्व-परम्परा से आत्मा में सञ्चारित और अध्यस्त होते दिखाए गए। ये वैकल्य और साकल्यादि धर्म देह के अपने नहीं, अपितु पुत्रादि उपाधियों के