भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
| ६२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ ] |
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भामती
तदर्थानुष्ठानपरिवर्जनं ततश्च तद्बोध इति । न च वेदान्तवाक्यानामेव स्वार्थप्रत्यायने कर्मापेक्षा, न वाक्यान्तराणामिति साम्प्रतम्, विशेषहेतोरभावात् । ननु तत्त्वमसीतिवाक्यात् त्वंपदार्थस्य कर्तृभोक्तृरूपस्य जीवात्मनो नित्यशुद्धबुद्धोदासीनस्वभावेन तत्पदार्थेन परमात्मनैक्यमशक्यं द्रागित्येव प्रतिपत्तुम्, आपाततोऽशुद्धसत्त्वैर्योग्यताविरहनिश्चयात् । यज्ञतपोदानतनूकृतान्तर्मलास्तु विशुद्धसत्त्वाः श्रद्धाना योग्यतावगमपुरःसरं तादात्म्यमवगमिष्यन्तीति चेत्, तत्किमिदानीं प्रमाणकारणं योग्यतावधारणमप्रमाणात्कर्मणो वक्तुमध्यवसितोऽसि ? प्रत्यक्षाद्यतिरिक्तं वा कर्मापि प्रमाणम् ? वेदान्ताविरुद्धतन्मूलन्यायबलेन तु योग्यतावधारणे कृतं कर्मभिः ? तस्मात् तत्त्वमसीत्यादेः श्रुतमयेन ज्ञानेन जीवात्मनः परमात्मभावं गृहीत्वा तन्मूलया चोपपत्त्या व्यवस्थाप्य तदुपासनायां भावनापराभिधानायां दीर्घकालनैरन्तर्यवत्यां ब्रह्मसाक्षात्कारफलायां यज्ञादीनामुपयोगः । यथाहुः—'‘स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो दृढभूमिः’’
भामती-व्याख्या
रूप में अन्योऽन्याश्रयता दोष प्रसक्त होता है। 'केवल वेदान्त-वाक्यों को ही कर्मानुष्ठान की अपेक्षा है, अन्य ( कर्मादिपरक ) वाक्यों को नहीं'—ऐसा कहना भी उचित नहीं, क्योंकि जब सभी वैदिक वाक्यों में स्वार्थ-समर्पण की प्रणाली में कोई अन्तर नहीं, तब कतिपय वाक्यों को ही कर्मानुष्ठान की अपेक्षा क्यों ?
इसका उत्तर यह है कि "तत्त्वमसि" (छां. ६।८।७) इत्यादि वाक्यों के द्वारा त्वं-पदार्थ-रूप कर्तृत्वभोक्तृत्वादि धर्मों से युक्त जीवात्मा का नित्य, शुद्ध, बुद्ध, उदासीनस्वरूप तत्पदार्थ-भूत परमात्मा के साथ अभेद-बोध सहसा किसी भी श्रोता पुरुष को नहीं होता, क्योंकि 'जीव में परमात्मरूपता की योग्यता ही नहीं'—इस प्रकार के योग्यताभाव का निश्चय सहजतः सभी पुरुषों को होता है। किन्तु यज्ञ, तप और दानादि शुभ कर्मों के अनुष्ठान से जिनके अन्तःकरण का मल-विक्षेपादि दोष क्षीण हो जाता है, ऐसे विशुद्ध अन्तःकरणवाले श्रद्धालु पुरुषों को जीव में ब्रह्मभाव की योग्यता का निश्चय एवं उसके अनन्तर अभेद-बोध हो जाता है, इस प्रकार वेदान्त-वाक्यों को अपने अर्थ का बोध कराने में यज्ञादि कर्मों की अपेक्षा स्पष्ट हो जाती है। [ श्री मण्डन मिश्र भी कहते हैं—‘‘एवं च रागादिनिबन्धननैसर्गिकप्रवृत्तिभेदविलयद्वारेण दृष्टेनैव कर्मविधय आत्मज्ञानाधिकारोपयोगिनः। तथा हि शान्तस्य दान्तस्य समाहितस्य चात्मनि दर्शनमुद्दिश्यते शक्यं च’’, ( ब्र. सि. पृ. २७ ) ] ।
सिद्धान्त— जीव और ब्रह्म के अभेद में योग्यतावधारण की कारणता जो यज्ञादि में बताई गई, वहाँ जिज्ञासा होती है कि कर्मों को अप्रमाणभूत मानकर कारण माना गया है ? अथवा प्रमाणरूप मानकर ? प्रथम कल्प संगत नहीं, क्योंकि उक्त योग्यता का अवधारण (निश्चय या प्रमा ज्ञान) किसी प्रमा के करणीभूत प्रमाण का काम है, अप्रमाणभूत कर्मों का नहीं। "प्रमाणकारणं योग्यतावधारणम्" का अर्थ है—प्रमाणकारणं (प्रमाणं कारणं यस्य, तत्) योग्यतावधारणम्। द्वितीय कल्प भी उचित नहीं, क्योंकि प्रत्यक्षादि परिगणित प्रमाणों में यज्ञादि कर्म की गणना किसी ने नहीं की, अतः कर्म को एक पृथक् प्रमाण मानना होगा। यदि वेदान्त के अविरुद्ध (उपक्रमादि) युक्तियों के बल पर उक्त योग्यता का अवधारण किया जाता है, तब कर्मों की क्या आवश्यकता ? अतः 'तत्त्वमसि' इत्यादि शब्दों को सुनकर प्राप्त श्रुतमय ( शाब्दबोधात्मक परोक्ष ) ज्ञान के द्वारा जीव में ब्रह्मभाव की परोक्ष प्रतीति होती है। वेदान्तानुकूल उपक्रमादि युक्तियों के द्वारा उक्त अभेद व्यवस्थापित होता है। इस प्रकार श्रवण और मनन के पश्चात् अभेदविषयिणी निदिध्यासनरूप भावना की लोकोत्तर लता में ब्रह्म साक्षात्कारात्मक फल की निष्पत्ति करने के लिए यज्ञादि कर्मानुष्ठान के माध्यम से
अथशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६३
भामती
इति। ब्रह्मचर्यतपःश्रद्धायज्ञादयश्च सत्कारः। अत एव श्रुतिः “तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः” इति। विज्ञाय तर्कोपकरणेन शब्देन प्रज्ञां भावनां कुर्वीतेत्यर्थः। अत्र च यज्ञादीनां श्रेयः-परिपन्थिकल्मषनिबर्हणद्वारेणोपयोग इति केचित्। पुरुषसंस्कारद्वारेणान्ये। यज्ञादिसंस्कृतो हि पुरुष आदरनैरन्तर्यदीर्घकालैरासेवमानो ब्रह्मभावनामनाद्यविद्यावासनां समूलकाषं कषति। ततोऽस्य प्रत्यगात्मा सुप्रसन्नः केवलो विशदीभवति। अत एव स्मृतिः—‘महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः’। ‘यस्यैतेऽष्टाचत्वारिंशत्संस्काराः’ इति च॥
अपरे तु ऋणत्रयापाकरणेन ब्रह्मज्ञानोपयोगं कर्मणामाहुः। अस्ति हि स्मृतिः ‘ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्’ इति।
अन्ये तु ‘तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन’ इत्यादिश्रुतिभ्यस्तत्तत्फलाय चोदि-
भामती-व्याख्या
दीर्घकालीन अभ्यास अपेक्षित है, जैसा कि महर्षि पतञ्जलि कहते हैं—“स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः” (यो० सू० १।१४)। ब्रह्मचर्य, तप, श्रद्धा और यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठान करना ही अभेद-भावना का सत्कार है। इस बोधक्रम की व्यवस्था स्वयं श्रुति कर रही है—“तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः” (बृह० उ० ४।४।२१)। अर्थात् युक्ति-सहकृत श्रुतिरूप शब्द के द्वारा विज्ञाय [उक्त अभेद का (परोक्ष) ज्ञान प्राप्त कर] भावनारूप प्रज्ञा में संलग्न हो जाय। इस भावना में यज्ञादि का उपयोग कुछ लोग कल्याण के विरोधी कल्मष (अन्तःकरणगत कालुष्य) के निबर्हण (नाश) में मानते हैं [श्री मण्डनमिश्र ने भी कहा है—“अन्ये तु मन्यन्ते अनवाप्तकामः कामोपहृतमना न परमाद्वैतदर्शनयोग्यः। कर्मभिस्तु कृतकर्मनिबर्हणः सहस्रसंवत्सरपर्यन्तः प्राजापत्यात् पदात् परमाद्वैतमात्मानं प्रतिपद्यते” (ब्र० सि० पृ० २७)]।
कुछ लोग यज्ञादि कर्मों का उपयोग अधिकारी पुरुष को संस्कृत करने में मानते हैं, क्योंकि यज्ञादि कर्मों के अनुष्ठान से संस्कृत होकर अधिकारी व्यक्ति ब्रह्मभावना का श्रद्धापूर्वक निरन्तर दीर्घ समय तक अभ्यास करके अनादि अविद्या के भेदविषयक सुदृढ़ संस्कारों को समूल नष्ट कर डालता है, उसके अनन्तर ही उसका प्रत्यगात्मा सुप्रसन्न केवलीभूत ज्योति के रूप में जगमगा उठता है [श्री मण्डनमिश्र ने (ब्र० सि० पृ० २८ में) कहा है—“अन्ये तु पुरुषसंस्कारतयात्मज्ञानाधिकारसंसर्शी कर्मणां वर्णयन्ति—‘महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः’ (मनु० २।२८), ‘यस्यैते चत्वारिंशत् संस्कारा अष्टावात्मगुणाः’ (गौ० ध० सू० ८।२२)]।
अन्य आचार्य (देव-ऋण, पितृऋण और ऋषि-ऋण—इन) तीन ऋणों के उद्धार में कर्मानुष्ठान का उपयोग मानते हैं, जैसा कि स्मृतिकारों ने कहा है—
ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत्।
अनपाकृत्य मोक्षं तु सेवमानो व्रजत्यधः॥ (मनु० ६।३५)
[“जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिऋणवा जायते ब्रह्मचर्येणर्षिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया पितृभ्यः” (तै० सं० ६।३।१०।५) यह श्रुति कहती है कि ब्राह्मण जन्म ही से तीन ऋणों का भाजन होता है, उनमें यज्ञादि ब्रह्मचर्य से ऋषि-ऋण, यज्ञादि कर्मों के अनुष्ठान से देव-ऋण तथा सन्तानोत्पत्ति से पितृऋण का उद्धार होता है। अतः उक्त तीन ऋणों को चुका कर ही ब्राह्मण को मोक्ष-मार्ग पर आरूढ होना चाहिए। [श्री मण्डनमिश्र कहते हैं कि “अन्येषां दर्शनम्—पृथक्कार्या एव सन्तः कर्मविधय आत्मज्ञानाधिकारमवतारयन्ति पुरुषम्, अनपाकृतर्णत्रयस्य तत्रानधिकाराद्—“ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेदिति”]।
| ६४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
तानामपि कर्मणां संयोगपृथक्त्वेन ब्रह्मभावनां प्रत्यङ्गभावमाचक्षते, क्रत्वर्थस्येव खादिरत्वस्य वीर्य्यार्थताम्, एकस्य तूभयार्थत्वे संयोगपृथक्त्वमिति न्यायात् । अत एव पारमर्षं सूत्रम्- 'सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्' इति । यज्ञतपोदानादि सर्वं तदपेक्षा ब्रह्मभावनेत्यर्थः । तस्माद्यदि श्रुत्यादयः प्रमाणं यदि वा पारमर्षं सूत्रं सर्वथा यज्ञादिकर्मसमुच्चिता ब्रह्मोपासना विशेषणत्रयवत्यनाद्यविद्यातद्वासनासमुच्छेदक्रमेण ब्रह्मसाक्षात्काराया मोक्षापरनाम्ने कल्पत इति तदर्थं कर्माण्यनुष्ठेयानि । न चैतानि दृष्टादृष्टसामवायिकारादुपकारहेतुभूतोपदेशिकातिदेशिकक्रमपर्य्यन्ताङ्गग्रामसहितपरस्परविभिन्नकर्मस्वरूपतदधिकारिभे-
भामती-व्याख्या
दूसरे आचार्यगण "तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन" ( बृह० उ० ४।४।२२ ) इस श्रुति के बल पर संयोगपृथक्त्वन्याय के अनुसार यज्ञादि कर्मों का विधान ब्रह्मजिज्ञासा में वैसे ही मानते हैं, जैसे कर्म के अङ्गभूत खादिरत्व का "खादिरं वीर्यकामस्य यूपं कुर्वीत"-इस श्रुति के द्वारा वीर्य-कामना में विनियोग माना जाता है। [ श्रीमण्डन मिश्र भी कहते हैं- "अन्ये तु संयोगपृथक्त्वेन सर्वकर्मणामेवात्मज्ञानाधिकारानुप्रवेशमाहुः "विविदिषन्ति यज्ञेन" इति श्रुतेः" (ब्र० सि० पृ० २७ ) ] । संयोग-पृथक्त्व का स्वरूप बताते हुए महर्षि जैमिनि कहते हैं- "एकस्य तूभयत्वे संयोग-पृथक्त्वम्' (जै० सू० ४।२।५) [ भाष्यकार ने उसका स्पष्टीकरण उदाहरणों के द्वारा किया है कि "अग्निहोत्रे श्रूयते- "दध्ना जुहोति" (आप० श्रौ० सू० ६।२५ ) इति । पुनश्च "दध्नेन्द्रियकामस्य जुहुयात्" (तै० ब्रा० २।३।५।६) इति । तथाऽग्नीषोमीये पशावाम्नायते- "खादिरे बध्नाति" इति । पुनश्च खादरिं वीर्यकामस्य यूपं कुर्यात्" इति । तत्र एकस्योभयत्वे नित्यत्वे नैमित्तिकत्वे च संयोगपृथक्त्वं कारणम्-एकः संयोगो दध्ना जुहोतीति, एको दध्नेन्द्रियकामस्येति" (शाबर० पृ० १२५०) । यहाँ संयोग का अर्थ 'वाक्य' है। एक ही क्रिया का दो प्रधान फलों के साथ भी अन्वय (साध्य-साधनभाव) माना जा सकता है, यदि उनके बोधक वाक्य पृथक्-पृथक् हैं]। प्रकृत में भी "यजेत स्वर्गकामः"-ऐसे वाक्यों के द्वारा यागादि में स्वर्गादि की साधनता और "विविदिषन्ति यज्ञेन" इस वाक्य के द्वारा यागादि कर्मों में आत्मज्ञान की साधनता अवबोधित होती है। अत एव हमारे ब्रह्मसूत्रकार ने भी कहा है- "सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत्" (ब्र० सू० ३।४।२६) । यहाँ यज्ञ, तप और दानादि क्रियाओं का 'सर्व' पद से ग्रहण किया गया है, उनकी अपेक्षा है जिस ब्रह्मभावना में, वह ब्रह्मभावना सर्वापेक्षा है। इस प्रकार चाहे 'यज्ञेन'-यहाँ तृतीया विभक्त्यादि श्रुतियों को विनियोजक प्रमाण माना जाय, चाहे परम ऋषि के "सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेः"-इस सूत्र को अङ्गाङ्गिभाव के प्रतिपादन में प्रमाण माना जाय, सर्वथा यह सिद्ध होकर रह जाता है कि यज्ञादि कर्मों से समुच्चित, (आदर नैरन्तर्य और दीर्घकाल-इन) तीन विशेषणों से युक्त ब्रह्मभावना अनादि अविद्या तथा तज्जन्य संस्कारों का समुच्छेद करती हुई मोक्षसंज्ञक ब्रह्मसाक्षात्कार को प्राप्त कराने में पूर्णतया सक्षम होती है, अतः उस (ब्रह्मज्ञान) के लिए कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए। कर्मों का अनुष्ठान तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक कि दृष्ट (धान की भूसी उतारना आदि), अदृष्ट (प्रोक्षण और प्रयाजादि कर्मों से जनित पुण्यादि), सामवायिक (अवघातादि सन्निपत्योपकारक अङ्गभूत कर्म), आरादुपकार के हेतुभूत (द्रव्यादि से दूरस्थ परमापूर्व के उपकारक प्रयाजादि अङ्ग कर्म), औपदेशिक (विकृतिभूत कर्मों में प्रत्यक्षतः पठित शरमय बर्हिरादि), आतिदेशिक ('प्रकृतिवद्विकृतिः कर्त्तव्या'-इस अतिदेश वाक्य के द्वारा अवगमित अङ्ग), क्रमपर्यन्त (क्रम-प्राप्त) अङ्गों से युक्त परस्पर
आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६५
भामती
वपरिज्ञानं विना शक्यान्वनुष्ठातुम्। न च धर्ममीमांसापरिशीलनं विना तत्परिज्ञानम्। तस्मात् साधूक्तं 'कर्मावबोधानन्तर्यं विशेषः' इति। कर्मावबोधेन हि कर्मानुष्ठानसाहित्यं भवति ब्रह्मोपासनाया इत्यर्थः।
तदेतन्निराकरोति ॐ न ॐ। कुतः ? ॐ कर्मावबोधात् प्रागप्यधीतवेदान्तस्य ब्रह्मजिज्ञासोपपत्तेः ॐ। इदमत्राकूतम्—ब्रह्मोपासनया भावनापराभिधानया कर्माप्यपेक्ष्यन्त इत्युक्तं, तत्र ब्रूमः—क्व पुनरस्याः कर्मापेक्षा ? किं कार्ये, यथाऽऽग्नेयादीनां परमापूर्वं चरमभाविफलानुकूले जनयितव्ये समिदाद्यपेक्षा ? स्वरूपे वा, यथा तेषामेव द्विरवत्तपुरोडाशाद्विद्व्यग्निदेवताद्यपेक्षा ? न तावत् कार्ये, तस्य विकल्पासहत्वात्। तथा हि—ब्रह्मोपासनाया ब्रह्मस्वरूपसाक्षात्कारः कार्यमभ्युपेयः, स चोत्पाद्यो वा स्यात्, यथा संयवनस्य पिण्डः। विकार्यो वा, यथाऽवघातस्य व्रीहयः। संस्कार्यो वा, यथा प्रोक्षणस्योलूखलादयः। प्राप्यो वा, यथा दोहनस्य पयः। न तावदुत्पाद्यः, न खलु घटादिसाक्षात्कार इव जडस्वभावेभ्यो घटादिभ्यो भिन्न इन्द्रियाद्याधेयो ब्रह्मसाक्षात्कारो भावनाधेयः सम्भवति ब्रह्मणोऽपराधीनप्रकाशतया
भामती-व्याख्या
भिन्नस्वरूपवाले कर्म एवं उनके अधिकारी (फल-भोक्ता) पुरुषों के भेद का यथावत् ज्ञान नहीं होता, और धर्म-मीमांसा शास्त्र का परिशीलन किए बिना कथित कर्म-भेद का ज्ञान नहीं हो सकता। फलतः जो यह कहा गया कि "कर्मावबोधानन्तर्यं विशेषः", वह अत्यन्त उचित है अर्थात् कर्म-ज्ञान का आनन्तर्य ब्रह्म-जिज्ञासा में अत्यावश्यक है। पहले जो कहा गया कि कर्मानुष्ठान-साहित्य ब्रह्मभावना में विवक्षित है, वह कर्म-ज्ञान के द्वारा ही सम्पन्न हो सकता है।
उत्तर-पक्ष—कथित पूर्व-पक्ष का निराकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"न, कर्मावबोधात् प्रागप्यधीतवेदान्तस्य ब्रह्मजिज्ञासोपपत्तेः।" सिद्धान्ती का अभिप्राय यह है कि जो यह कहा गया है कि ब्रह्म की उपासना (भावना) कर्मानुष्ठान की अपेक्षा करती है, वहाँ जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मोपासना को कर्मानुष्ठान की अपेक्षा किस अंश में है ? (१) क्या ब्रह्मोपासना को अपने कार्यभूत ब्रह्मज्ञान की सिद्धि करने के लिए कर्मानुष्ठान की वैसे ही अपेक्षा है, जैसे कि दर्शपूर्णमास-घटक आग्नेयादि छः प्रधान कर्मों को अपने कार्यभूत परमापूर्व से अन्तिम (स्वर्गादिरूप) फल की निष्पत्ति करने के लिए 'समिधु, तनूनपात, इडा, बर्हिः और स्वाहाकार'—इन नामों से प्रख्यात पाँच प्रयाज कर्मों की अपेक्षा होती है ? (२) अथवा जैसे आग्नेयादि कर्मों को ही अपने स्वरूप का लाभ करने के लिए द्विरवत्त (दो बार काटे गये) पुरोडाश के दो टुकड़ों और अग्न्यादिरूप देवता की अपेक्षा होती है, वैसे ही ब्रह्मभावना को अपने स्वरूप की सम्पत्ति करने के लिए कर्मानुष्ठान की अपेक्षा होती है ?
प्रथम कल्प के अनुसार ब्रह्मोपासना को अपने कार्य का लाभ करने के लिए कर्मानुष्ठान की अपेक्षा नहीं मानी जा सकती, क्योंकि तब तो ब्रह्म-साक्षात्कार को ब्रह्म-भावना का कार्य मानना होगा। सभी कार्य चार प्रकार के होते हैं—(१) उत्पाद्य, (२) विकार्य, (३) संस्कार्य और (४) प्राप्य। आटा सानने से जो पिण्ड (बाटी) बनता है, वह उत्पाद्य कार्य है। धानों के छिलके उतार देने से जो चावल बनाए जाते हैं, वे विकार्यभूत कार्य हैं। "व्रीहीन् प्रोक्षति"—इत्यादि विधि के द्वारा विहित प्रोक्षण कर्म से संस्कृत व्रीह्यादि को संस्कार्य तथा गौ को दुहने से प्राप्त दूध को प्राप्य कार्य कहा जाता है। इनमें ब्रह्म-साक्षात्कार को उत्पाद्यरूप कार्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि जैसे जडस्वरूप घटादि पदार्थों का साक्षात्कार घटादि से भिन्न इन्द्रिय-साध्य माना जाता है, वैसे ब्रह्म-साक्षात्कार को भावना-साध्य नहीं माना जा सकता, अपितु स्वयंप्रकाशात्मक ब्रह्म का साक्षात्कार ब्रह्मरूप
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६६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १
भामती
तत्साक्षात्कारस्य तत्स्वभाव्येन नित्यतयोत्पाद्यत्वानुपपत्तेः । ततो भिन्नस्य वा भावनाधेयस्य साक्षात्कारस्य प्रतिभासप्रत्ययवत्संशयाक्रान्ततया प्रामाण्यायोगात् । तद्विषयस्य तत्सामग्रीकस्यैव बहुलं व्यभिचारोपलब्धेः । न खल्वनुमानविबुद्धं वह्निं भावयतः शीतातुरस्य शिशिरभरमन्थरतरकायकाण्डस्य स्फुरज्ज्यालाजटिलानलसाक्षात्कारः प्रमाणान्तरेण संवाद्यते, विसंवादस्य बहुलमुपलम्भात् । तस्मात् प्रामाणिकसाक्षात्कारलक्षणकार्याभावान्नोपासनाया उत्पाद्ये कर्मापेक्षा । न च कूटस्थनित्यस्य सर्वव्यापिनो ब्रह्मण उपासनातो विकारसंस्कारप्राप्तयः सम्भवन्ति । स्यादेतत्—मा भूद् ब्रह्मसाक्षात्कार उत्पाद्यादिरूप उपासनायाः, संस्कार्यस्त्वनिर्वचनीयानाद्यविद्याद्वयापिधानापनयनेन भविष्यति, प्रतिसीरापिहिता नर्त्तकीव प्रतिसीरापनयद्वारा रङ्गव्यापृतेन । तत्र च कर्मणामुपयोगः । एतावांस्तु विशेषः—प्रतिसीरापनये पारिषदानां नर्तकीविषयसाक्षात्कारो भवति । इह तु अविद्यापिधानापनयमात्रमेव नापरमुत्पाद्यमस्ति । ब्रह्मसाक्षात्कारस्य ब्रह्मस्वभावस्य नित्यत्वेनानुत्पाद्यत्वात् ।
अत्रोच्यते—का पुनरियं ब्रह्मोपासना ? किं शाब्दज्ञानमात्रसन्ततिराहो निर्विचिकित्सशाब्दज्ञान-
भामती-व्याख्या
होने से नित्य है। नित्य पदार्थ की कभी भी उत्पत्ति नहीं होती, अतः उसे उत्पाद्य क्योंकर कहा जा सकेगा ? ब्रह्मात्मक साक्षात्कार से भिन्न भावना-साध्य साक्षात्कार तो वैसा ही संशयाक्रान्त होता है, जैसा कि प्रतिभास ( अनवधारणात्मक ) ज्ञान, अतः उसे प्रमाण ही नहीं माना जा सकता, क्योंकि भावनाविषयविषयक और भावनारूप सामग्री से जनित ज्ञान प्रायः अपने विषय से व्यभिचरित ही पाए जाते हैं, जैसे कि हिमाच्छादित पर्वत-कन्दरा में भयङ्कर शीत से कांपता हुआ कोई व्यक्ति कभी अपनी अनुमित अग्नि की भावना ( निरन्तर चिन्तना ) करता-करता मूर्छित-सी अवस्था में जो अग्नि की विकराल ज्वाला का साक्षात्कार कर लेता है, वह प्रमाणभूत कदापि नहीं हो सकता, क्योंकि वह अन्य किसी भी प्रमाण से संवादित नहीं, प्रत्युत उसका प्रायः विसंवादन ( बाध ) ही उपलब्ध होता है । फलतः भावना के द्वारा कोई प्रमाणरूप साक्षात्कारात्मक कार्य उत्पन्न नहीं किया जा सकता कि भावना को अपने कार्य में कर्मानुष्ठान की अपेक्षा मानी जा सके ।
इसी प्रकार कूटस्थ, नित्य, सर्वत्र सर्वदा प्राप्त ब्रह्मतत्त्व का भावना ( उपासना ) के द्वारा कोई विकार, संस्कार या अप्राप्त-प्रापण भी नहीं किया जा सकता कि ब्रह्मरूप साक्षात्कार को विकार्य, संस्कार्य या प्राप्य कहा जा सकता ।
शङ्का—ब्रह्मात्मक साक्षात्कार भले ही उत्पाद्य या विकार्य न हो, किन्तु संस्कार्य हो सकता है। जैसे रङ्ग-मञ्च पर किसी परदे के पीछे बैठी नर्तकी रङ्ग-व्यापृत नट के द्वारा परदा हटाए जाने पर दर्शकों को दिखने लग जाती है, वैसे ही अनादि अनिर्वचनीय द्विविध अविद्या का आवरण हटते ही चिति शक्ति जाज्वल्यमान हो जाती है, फलतः आवरण-निवर्तन-रूप संस्कार से संस्कृत ब्रह्मतत्त्व को संस्कार्य मानना सर्वथा न्याय-संगत है। आवरण की निवृत्ति में कर्मानुष्ठान की अपेक्षा होती है। दृष्टान्त से दाष्टर्न्तिक में इतना अन्तर है कि रङ्गस्थल पर पहले प्रतिसीर ( परदे ) के उठने पर रङ्गस्थ पुरुषों के द्वारा नर्तकी का साक्षात्कार होता है, किन्तु प्रकृत में ब्रह्म के अविद्यारूप आवरण की निवृत्ति मात्र होती है, अतः आवरण का नाश ही उत्पाद्य होता है, ब्रह्म-साक्षात्कार नित्य ब्रह्मरूप होने से उत्पाद्य नहीं होता ।
समाधान—यह ब्रह्मोपासना क्या वस्तु है ? क्या सामान्य शाब्द ज्ञान की अविरल धारा है ? अथवा असंशयात्मक शाब्द-बोध की धारा ? यदि सामान्य शाब्द ज्ञान की सन्तति
आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६७
भामती
सन्ततिः ? यदि शाब्दज्ञानमात्रसन्ततिः, किमियमभ्यस्यमानाप्यविद्यां समुच्छेत्तुमर्हति ? तत्त्वविनिश्चय- स्तदभ्यासो वा सवासनं विपर्ययसमुन्मूलयेत्, न संशयाभ्यासः, सामान्यमात्रदर्शनाभ्यासो वा। नहि स्थाणुर्वा पुरुषो वेति वाऽऽरोहपरिणाहवद्द्रव्यमिति वा शतशोऽपि ज्ञानमभ्यस्यमानं पुरुष एवेति निश्च- याय पर्याप्नुमृते विशेषदर्शनात् । ननूक्तं श्रुतमयेन ज्ञानेन जीवात्मनः परमात्मभावं गृहीत्वा युक्तिमयेन च व्यवस्थाप्यत इति । तस्मान्निर्विकित्सशाब्दज्ञानसन्ततिरुपासना कर्मसहकारिण्यविद्याद्वयोच्छेद- हेतुः । न चासावनुत्पादितब्रह्मानुभवा तदुच्छेदाय पर्याप्ता । साक्षात्काररूपो हि विपर्यासः साक्षात्- काररूपेणैव तत्त्वज्ञानेनोच्छिद्यते, न तु परोक्षावभासेन । दिङ्मोहालातचक्रचलवृक्षमरुमरीचिसलिलादि- विभ्रमेष्वपरोक्षावभासिषु अपरोक्षावभासिभिरेव दिगादितत्त्वप्रत्ययैर्निवृत्तिदर्शनात् । नो खल्वाप्तवचन- लिङ्गादिनिश्चितदिगादितत्त्वानां दिङ्मोहादयो निवर्तन्ते । तस्मात् त्वम्पदार्थस्य तत्पदार्थत्वेन साक्षात्कार एषितव्यः । एतावता हि त्वंपदार्थस्य दुःखिशोकित्वादिसाक्षात्कारनिवृत्तिर्नान्यथा ।
न चैष साक्षात्कारो मीमांसासहितस्यापि शब्दस्य प्रमाणस्य फलम् अपि तु प्रत्यक्षस्य, तस्यैव तत्फलत्वनियमात् । अन्यथा कुटजबीजादपि वटाङ्कुरोत्पत्तिप्रसङ्गात् । तस्मान्निर्विकित्सवाक्यार्थभाव- नापरिपाकहितमन्तःकरणं त्वंपदार्थस्यापरोक्षस्य तत्तदुपाध्याकारनिषेधेन तत्पदार्थतामनुभावयतीति युक्तम् । न चायमनुभवो ब्रह्मस्वभावो येन न जन्येत, अपि त्वन्तःकरणस्यैव वृत्तिभेदो ब्रह्मविषयः । न
भामती-व्याख्या
है, तब यह बार-बार अभ्यस्यमान होकर भी अविद्या की समुच्छेदिका क्योंकर होगी ? तत्त्वज्ञान का निश्चय अथवा उसका अभ्यास ही संस्कार-सहित विपर्यय ( अविद्या ) का उच्छेद कर सकता है। संशयात्मक ज्ञान का अभ्यास या वस्तुगत सामान्यांशमात्र के दर्शन का अभ्यास अध्यास का विनाश नहीं कर सकता, क्योंकि 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा ?' इस प्रकार का संशय अथवा 'कोई लम्बी-चौड़ी यह वस्तु है'— इस प्रकार का सामान्य-ज्ञान शतशः अभ्यस्यमान होकर भी 'पुरुष एव'—इस प्रकार के निश्चय का जनक नहीं होता, हाँ पुरुषत्व- व्याप्य कर-चरणादिरूप विशेष का दर्शन ही 'पुरुषोऽयम्'—ऐसा निश्चय करा सकता है ।
शङ्का— यह कहा जा चुका है कि "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्यों से जनित शब्द के द्वारा जीव में ब्रह्मरूपता का ग्रहण होता है और मननरूप यौक्तिक ज्ञान के द्वारा कथित ब्रह्मभाव का दृढीकरण, उसके पश्चात् निदिध्यासनात्मक संशय-रहित शब्द ज्ञान की सन्तति ही कर्मानुष्ठान से सहकृत होकर द्विविध अविद्या के उच्छेद का कारण मानी जाती है। कथित सन्ततिरूप ब्रह्म-भावना तब तक अविद्या का उच्छेद नहीं कर सकती, जब तक ब्रह्म- साक्षात्कार को उत्पन्न न करे, क्योंकि साक्षात्काररूप विपर्यय साक्षात्काररूप तत्त्व-निश्चय के द्वारा ही उच्छेदनीय होता है, परोक्ष ज्ञान के द्वारा नहीं । दिम्भ्रम, आलात-चक्र, वृक्षों की गतिशीलता, मरुमरीचिगत जलरूपतादि अपरोक्ष भ्रमों की अपरोक्षात्मक दिगादि तत्त्व- निश्चय के द्वारा ही निवृत्ति देखी जाती है, आप्त-वचन और लिङ्गादि से उत्पादित दिगादि के तत्त्व-ज्ञान के द्वारा नहीं ।
यहाँ त्वम्पदार्थ ( जीव ) का ब्रह्मरूपेण साक्षात्कार विवक्षित है। उस साक्षात्कार के द्वारा ही त्वम्पदार्थरूप जीवगत दुःखशोकादिमत्त्व का साक्षात्कार निवृत्त होगा, अन्यथा नहीं । यह जीव की ब्रह्मरूपता का साक्षात्कार मीमांसा-सहित शब्द प्रमाण का फल नहीं, अपितु प्रत्यक्ष प्रमाण का ही साक्षात्कार फल होता है, अन्यथा कुटज के बीज से भी वटाङ्कुर की उत्पत्ति 'ने लग जायगी । फलतः संशय-रहित शब्द-भावना से युक्त अन्तःकरणरूप प्रत्यक्ष प्रमाण अपरोक्षात्मक जीव में अब्रह्मरूपता का निषेध करके
| ६८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
चैतावता ब्रह्मणो नापराधीनप्रकाशता । नहि शब्दज्ञानप्रकाश्यं ब्रह्म स्वयंप्रकाशं न भवति । सर्वोपाधिरहितं हि स्वयंज्योतिरिति गीयते, न तूपहितमपि । यथाहु स्म भगवान् भाष्यकारः ॐ नायमेकान्तेनाविषयः इति ॐ । न चान्तःकरणवृत्तावध्यस्य साक्षात्कारे सर्वोपाधिविनिर्मोकः । तस्यैव तदुपाधेर्विनश्यदवस्थस्य स्वपरोपाधिविरोधिनो विद्यमानत्वात् । अन्यथा चैतन्यच्छायापत्तिं विनाऽन्तःकरणवृत्तेः स्वयमचेतनायाः स्वप्रकाशत्वानुपपत्तौ साक्षात्कारत्वायोगात् । न चानुमितभावितवह्निशाक्षात्कारवत्प्रतिभासत्वेनास्याप्रामाण्यं, तत्र वह्नित्वलक्षणस्य परोक्षत्वात् , इह तु ब्रह्मरूपस्योपाधिकलुषीतस्य जीवस्य प्रागप्यपरोक्षत्वात् । नहि शुद्धबुद्धत्वादयो वस्तुतस्ततोऽतिरिच्यन्ते । जीव एव तु तत्तदुपाधिरहितः शुद्धबुद्धविस्वभावो ब्रह्मेति गीयते । न च तत्तदुपाधिविरहोऽपि ततोऽतिरिच्यते । तस्माद्यथा गान्धर्वशास्त्रार्थज्ञानाभ्यासाहितसंस्कारसचिवश्रोत्रेन्दियेण षड्जादिस्वरग्राममूर्च्छनाभेदमध्यक्षमनुभवति, एवं वेदान्तार्थज्ञानाभ्यासाहितसंस्कारो जीवस्य ब्रह्मभावमन्तःकरणेनेति ।
अन्तःकरणवृत्तौ ब्रह्मसाक्षात्कारे जनयितव्येऽस्ति तदुपासनायाः कर्मापेक्षेति चेत्, न, तस्याः कर्मानुष्ठानेन सहभावाभावेन तत्सहकारित्वानुपपत्तेः । न खलु तत्त्वमसीत्यादिवाक्यान्निर्विकित्सं शुद्ध-
भामती-व्याख्या
ब्रह्मरूपता का आविर्भाव करा सकता है। यह जीव में ब्रह्मरूपता का अनुभव ब्रह्म-स्वभाव नहीं कि उत्पन्न न किया जा सके। उक्त अनुभव अन्तःकरण की एक विशेष ब्रह्म-विषयिणी वृत्ति है। इतने मात्र से ब्रह्म में अस्वप्रकाशता प्रसक्त नहीं होती, क्योंकि शब्द ज्ञान से प्रकाशित ब्रह्म स्वयंप्रकाश नहीं रहता—ऐसी बात नहीं। समस्त उपाधियों से रहित ब्रह्म ही स्वयंप्रकाश माना जाता है, उपाधि-युक्त नहीं, जैसा भगवान् भाष्यकार ने कहा है—"नायमेकान्तेनाविषयः"। अर्थात् यह ब्रह्माभिन्न जीव सर्वथा अविषय ही होता है—ऐसा नहीं, अपितु अहमाकार वृत्ति का विषय माना जाता है। अन्तःकरण की अखण्डाकार वृत्ति में ब्रह्म का साक्षात्कार होने पर ब्रह्म समस्त उपाधियों से निर्मुक्त नहीं होता, क्योंकि अन्ततोगत्वा वह अखण्डाकार वृत्ति ही एक उपाधि होती है, भले ही वह वृत्ति नाशोन्मुख एवं स्वात्मक और परात्मक उपाधियों की विरोधिनी होती है। यदि उक्त वृत्ति को चिदात्मा की उपाधि न माना जाय, तब चैतन्य-तादात्म्यापत्ति के बिना अन्तःकरण की जडरूप वृत्ति में प्रकाशकत्व ही न बनेगा। यह जो कहा गया कि अनुमित और भावित अग्नि के साक्षात्कार के समान ही उक्त ब्रह्म-साक्षात्कार भी एक अप्रमाणात्मक प्रतिभास ज्ञानमात्र है, वह उचित नहीं, क्योंकि अनुमान-स्थल पर अग्नि का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं, अपितु परोक्ष ही होता है, किन्तु जीव कर्तृत्ववादि उपाधियों से कलुषित होने पर भी वस्तुतः ब्रह्मरूपेण अपरोक्ष होता है। शुद्धत्व, बुद्धत्वादि धर्म चैतन्य तत्त्व से वस्तुतः भिन्न नहीं होते, जीव ही सभी उपाधियों से रहित होकर शुद्ध-बुद्धादिरूप ब्रह्म होता है। उपाधियों का अभाव भी चैतन्य से भिन्न नहीं होता, अतः जैस गन्धर्व-शास्त्र से जनित ज्ञान के अभ्यास द्वारा आहित संस्कारों से युक्त श्रोत्र इन्द्रिय (१) निषाद, (२) ऋषभ, (३) गान्धार, (४) षड्ज, (५) मध्यम, (६) धैवत और (७) पञ्चम—इन सात स्वरों के भेद-प्रभेद-समूह और उसकी मूर्च्छना (उतार-चढ़ाव) का प्रत्यक्ष अनुभव कर लेता है। वैसे ही वेदान्त-वाक्यार्थ ज्ञान के अभ्यास से जनित संस्कार वाला अन्तःकरण जीव में ब्रह्मभाव का साक्षात्कार कर लेता है। उक्त अन्तःकरण की वृत्तिरूप साक्षात्कार के उत्पादन में कर्मानुष्ठान की अपेक्षा होती है।
समाधान—उक्त ब्रह्म भावना में कर्मानुष्ठान का सहभाव सम्भव न होने के कारण कर्म-सहकारित्व उपपन्न नहीं हो सकता, क्योंकि "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्यों को
आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६९
भामती
बुद्धोदासीनस्वभावमकत्त्र्त्वाद्युपेतमपेतब्राह्मणत्त्वादिजातिं देहाद्यतिरिक्तमेकमात्मानं प्रतिपद्यमानः कर्मस्वधिकारमवबोद्धुमर्हति । अनहंज्ञः कथं कर्त्ता वाऽधिकृतो वा ? यद्युच्येत निश्चितेऽपि तत्त्वे विपर्यासनिबन्धनो व्यवहारोऽनुवर्त्तमानो दृश्यते, यथा गुडस्य माधुर्य्यविनिश्चयेऽपि पित्तोपहतेन्द्रियाणां तिक्तावभासानुवृत्तिः, आस्वाद्य थूत्कृत्य त्यागात् । तस्मादविद्यासंस्कारानुवृत्त्या कर्मानुष्ठानं, तेन च विद्यासहकारिणा तत्समुच्छेद उपपत्स्यते । न च कर्माविद्यात्मकं कथमविद्यामुच्छिनत्ति, कर्मणो वा तदुच्छेदकस्य कुत उच्छेद इति वाच्यम्, सजातीयस्वपरविरोधिनां भावानां बहुलमुपलब्धेः । यथा पयः पयोऽन्तरं जरयति, स्वयं च जीर्य्यति । यथा विषं विषान्तरं शमयति, स्वयं च शाम्यति । यथा वा कतकरजो रजोऽन्तराविले पयसि प्रक्षिप्तं रजोऽन्तराणि भिन्दत् स्वयमाप भिद्यमानमनाविलं पाथः करोति । एवं कर्माविद्यात्मकमपि अविद्यन्तराणि अपगमयत् स्वयमप्यपगच्छतीति ॥
अत्रोच्यते—सत्यं सदेव सोम्येवमित्युपक्रमात्तत्त्वमसीत्यन्तात् शब्दाद् ब्रह्ममीमांसोपकरणादसकृदभ्यस्ताद् निर्विचिकित्सेनाद्यविद्योपादानदेहाद्यतिरिक्तप्रत्यगात्मतत्त्वावबोधे जातेऽपि अविद्यासंस्कारानुवृत्तावनुवर्त्तन्ते सांसारिकाः प्रत्ययास्तद्व्यवहाराश्च, तथापि तान्पश्यं व्यवहारप्रत्ययान् मिथ्येति मन्य-
भामती-व्याख्या
सुन कर जो पुरुष अपने को असन्दिग्ध रूप से शुद्ध, बुद्ध और उदासीन, कर्तृत्व, भोक्तृत्वादि धर्मों से रहित, देहादि से भिन्न जान लेता है, वह पुरुष कर्मानुष्ठान का अधिकारी अपने को कभी नहीं मान सकता। जिसका कर्म में अधिकार नहीं, वह कभी कर्मों का कर्त्ता-भोक्ता नहीं हो सकता ।
शङ्का—यदि कहा जाय कि जीव में ब्रह्मरूपता का निश्चय हो जाने पर भी अध्यास-प्रयुक्त व्यवहार की अनुवृत्ति वैसे ही देखी जाती है, जैसे गुड़ में माधुर्य का निश्चय हो जाने पर भी पित्तरोग से दूषित इन्द्रिय वाले व्यक्ति को गुड़गत तिक्तता की अनुवृत्ति होती है, क्योंकि वह गुड़ का स्वाद लेता हुआ उसका थूक देता है। अतः अविद्या-संस्कारों की अनुवृत्ति से कर्मानुष्ठान सम्भव हो जाता है, इस प्रकार कर्म-सहकृत विद्या के द्वारा अविद्या का उच्छेद हो जाता है। कर्म स्वयं अविद्यात्मक है, वह अविद्या का उच्छेद क्योंकर कर सकेगा ? अविद्या का जो कर्म उच्छेदक है, उस कर्म का उच्छेद किससे होगा ? तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसे बहुत-से पदार्थ देखे जाते हैं, जो स्व और पर—दोनों के निवर्तक होते हैं, जैसे दुग्धपान प्रथमतः पीत दूध को पचाता हुआ स्वयं पच जाता है। या एक विष को उतारने के लिए दिया गया अन्य विष पहले के विष को शान्त करता हुआ स्वयं भी शान्त हो जाता है। अथवा कतक नामक फल का चूर्ण पानी में डालने पर अन्य धूलि-कणों को नीचे बिठाता हुआ स्वयं भी बैठ जाता है। इसी प्रकार कर्म स्वयं अविद्यारूप होने पर भी अविद्या का नाश करता हुआ स्वयं अपना भी नाश कर डालता है [आचार्य मण्डन मिश्र भी कहते हैं—"यथा रजःसम्पर्ककलुषितमुदकं द्रव्यविशेषचूर्णरजः प्रक्षिप्तं रजोऽन्तराणि संहरत् स्वयमपि संश्लिष्यमाणं स्वच्छं स्वरूपावस्थामुपनेयति, एवमेव श्रवणादिभिर्भेददर्शने प्रविलीयमाने विशेषाभावात् तद्गते च भेद, स्वच्छे परिशुद्धे स्वरूपे जीवोऽवतिष्ठते । यथा पयः पयो जरयति स्वयं च जीर्य्यति । यथा च विषं विषान्तरं शमयति स्वयं च शाम्यति" (ब्र. सि. पृ. १२–१३)] ।
समाधान—यह सत्य है कि "सदेव सोम्येदम" (छां. उ. ६।२।१) यहाँ से लेकर "तत्त्वमसि" (छां. उ. ६।२।१) यहाँ तक का वेदान्त-प्रकरण जब ब्रह्ममीमांसारूप तर्क से उपोट्ठलित होकर असंशयात्मक, अनादि अविद्यारूप उपादान के उपादेयभूत देहादि से भिन्न प्रत्यगात्मा का तत्त्वावबोध उत्पन्न कर देता है। तब भी अविद्या-जनित संस्कारों की अनुवृत्ति
| ७० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
मानी विद्वान्न श्रद्धत्ते पित्तोपहतेन्द्रिय इव गुडं थूत्कृत्य त्यजन्नपि तस्य तिक्तताम्। तथा चायं क्रिया-कर्तृकरणेतिकर्त्तव्यताफलप्रपञ्चमतात्त्विकं विनिश्चिन्वन् कथमधिकृतो नाम ? विदुषो ह्यधिकारोऽन्यथा पशु-शूद्रादीनामप्यधिकारो दुर्वारः स्यात्। क्रियाकर्त्रादिस्वरूपविभागं च विद्वस्यमान इह विद्वानभिमतः कर्म-काण्डे। अत एव भगवानविद्वद्विषयत्वं शास्त्रस्य वर्णयाम्बभूव भाष्यकारः। तस्माद्यथा राजजातीयाभि-मानकर्त्तृके राजसूये न विप्रवैश्यजातीयाभिमानिनोरधिकारः, एवं द्विजातिकर्त्तृक्रियाकरणादिविभा-गाभिमानिकर्त्तृके कर्मणि न तदनभिमानिनोऽधिकारः। न चानधिकृतेन समर्थेनापि कृतं वैदिकं कर्म फलाय कल्पते वैश्यस्तोम इव ब्राह्मणराजन्याभ्याम्। तेन दृष्टार्थेषु कर्मसु शक्तः प्रवर्त्तमानः प्राप्नोतु फलं दृष्टत्वात्। अदृष्टार्थेषु तु शास्त्रैकसमधिगम्यं फलमनधिकारिणि न युज्यत इति नोपासनायाः कार्ये कर्मापेक्षा।
स्यादेतत्—मनुष्याभिमानवदधिकारिके कर्मणि विहिते यथा तदभिमानरहितस्यानधिकारः। एवं निषेधविधयोऽपि मनुष्याधिकारा इति तदभिमानरहितस्तेष्वपि नाधिक्रियेत पश्वादिवत्। तथा चायं
भामती-व्याख्या
से संस्कारिक प्रतीतियों और व्यवहारों की अनुवृत्ति देखी जाती है। तथापि उन प्रतीतियों और व्यवहारों को अपने आचरण में लाता हुआ भी विद्वान् पुरुष उन्हें मिथ्या मानता है, उन पर वैसे ही श्रद्धा नहीं रखता, जैसे कि पित्तरोग से आक्रान्त व्यक्ति गुड़ का स्वाद लेकर थूकता हुआ भी उसकी तिक्तता पर विश्वास नहीं करता। अतः क्रिया, कर्त्ता, करण, इति-कर्तव्यता और फलादि प्रपञ्च अतात्त्विक है—ऐसा निश्चय कर लेनेवाला व्यक्ति कर्म-काण्ड का अधिकारी क्योंकर माना जा सकेगा ? क्योंकि क्रिया, कर्त्ता आदि प्रपञ्च सत्य है—इस प्रकार का निश्चय रखनेवाले (विद्वान्) पुरुष का ही कर्म में अधिकार माना जाता है। अन्यथा (वैसे ज्ञान की अपेक्षा न होने पर) पशु और शूद्रादि अज्ञानी प्राणियों का भी कर्म में अधिकार प्राप्त हो जायगा। यह एक वास्तविकता है कि क्रिया और कर्त्ता आदि विभाग का जानकार व्यक्ति ही कर्मकाण्ड का अधिकारी होता है। अत एव भगवान् भाष्यकार ने क्रिया, कर्त्ता आदि को वास्तविक समझनेवाले अविद्वान् (वस्तुतत्त्वानभिज्ञ) व्यक्ति को ही शास्त्र का अधिकारी कहा है। अतः जैसे क्षत्रियत्व-जाति का अभिमान रखनेवाले व्यक्ति के द्वारा सम्पादनीय 'राजसूय' कर्म में ब्राह्मणत्व या वैश्यत्व जाति के अभिमानवाले पुरुष का अधिकार नहीं माना जाता, वैसे ही द्विजाति क्रिया, कर्त्ता आदि विभाग के अभिमानी द्विजाति (केवल ब्रह्म, क्षत्रिय और वैश्य) के द्वारा सम्पादनीय वैदिक कर्मों में पशु और शूद्रादि का अधिकार नहीं माना जा सकता। अनधिकारी व्यक्ति के द्वारा किए जानेवाले वैदिक कर्म वैसे ही निष्फल माने जाते हैं, जैसे केवल वैश्य-द्वारा कर्त्तव्य वैश्यस्तोम कर्म यदि ब्राह्मण और क्षत्रिय के द्वारा किया जाता है, तब वह निष्फल ही होता है। दृष्टफलक कृषि आदि कर्मों में कोई भी समर्थ व्यक्ति प्रवृत्त होकर फल प्राप्त कर सकता है, किन्तु शास्त्रैकसमधि-गम्य स्वर्गादि अदृष्ट फल के जनकीभूत कर्मों का फल किसी अनधिकारी व्यक्ति को कभी नहीं प्राप्त हो सकता। फलतः उपासना-साध्य साक्षात्काररूप फल के सम्पादन में कर्मानुष्ठान की अपेक्षा नहीं।
शङ्का—जैसे मनुष्याधिकारिक विहित कर्मों में मनुष्यत्वाभिमान-रहित प्राणियों का अधिकार नहीं, वैसे ही "न हिंस्यात्"—इत्यादि निषेध वाक्यों में भी मनुष्य ही अधिकारी माना जाता है, अतः मनुष्यत्वाभिमान-रहित व्यक्ति का वैसे ही अधिकार नहीं होना चाहिए, जैसे पशु-पक्षी आदि का। तब तो मनुष्यत्वाभिमान-रहित तत्त्ववेत्ता पुरुष को हिंसादि निषिद्ध
आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७१
भामती
निषिद्धमनुतिष्ठन् न प्रत्यवेयात् तिर्यगादिवदिति भिन्नकर्मतापातः । मैवम्, न खल्वयं सर्वथा मनुष्या- भिमानरहितः, किं त्वविद्यासंस्कारानुवृत्त्याऽस्य मात्रया तदभिमानोऽनुवर्त्तते । अनुवर्त्तमानं च मिथ्येति मन्यमानो न श्रद्धत्त इत्युक्तम् । किमतो यद्येवम् ? एतदतो भवति—विधिषु श्राद्धोऽधिकारी नाश्राद्धः । ततश्च मनुष्याद्यभिमाने नाशद्दधानो न विधिशास्त्रेणाधिक्रियते । तथा च स्मृतिरश्रद्धया हुतं दत्तमित्या- दिका । निषेधशास्त्रं तु न श्रद्धामपेक्षते, अपि तु निषिध्यमानक्रियोन्मुखो नर इत्येव प्रवर्त्तते । तथा च सांसारिक इव श्रद्धावगतब्रह्मतत्त्वोऽपि निषेधमतिक्रम्य प्रवर्त्तमानः प्रत्यवैतीति न भिन्नकर्मदर्शनाभ्युप- गमः । तस्मान्नोपासनायाः कार्ये कर्मापेक्षा । अत एव नोपासनोत्पत्तावपि निर्विचिकित्सशाब्दज्ञानोत्पत्त्यु- त्तरकालमनधिकारः कर्मणीत्युक्तम् । तथा च श्रुतिः—"न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्व- मानशुः” ।
तत्किमिदानीमनुपयोग एव सर्वथैव कर्मणाम् ? तथा च "विविदिषन्ति यज्ञेन” इत्याद्याः श्रुतयो विरुद्धयेरन् । न, आरादुपकारकत्वात् कर्मणां यज्ञादीनाम् । तथाहि—'तमेतमात्मानं वेदानुवचनेन' नित्य- स्वाध्यायेन 'ब्राह्मणा विविदिषन्ति' वेदितुमिच्छन्ति, न तु विदन्ति, वस्तुतः प्रधानस्यापि वेदनस्य प्रकृत्य-
भामती-व्याख्या
कर्मों का अनुष्ठान करने पर वैसे ही प्रत्यवाय ( पापादि ) नहीं होना चाहिए, जैसे पशु-पक्षी आदि तिर्यक् ( मेरुदण्ड को धरातल के समानान्तर रखनेवाले ) प्राणियों को । इस प्रकार एक ही कर्म किसी के लिए फलप्रद होता है और किसी के लिए नहीं । एवं किसी के लिए न्यून और किसी के लिए अधिक फल का वैसे ही समर्पक माना जायेगा जैसे ही एक ही स्वर्ग के लिए विहित अग्निहोत्र एवं ज्योतिष्टोम हैं तथापि इन दोनों कर्मों की गुरुता और लघुता को देखकर फल में भी वैसे ही मान-दण्ड की कल्पना की जाती है । इस प्रकार भिन्नकर्मता का प्रसङ्ग उपस्थित होता है ।
समाधान—तत्त्ववेत्ता पुरुष सर्वथा मनुष्यत्वाभिमान से निर्लिप्त नहीं माना जाता, अपिनु लेशाविद्या या अविद्या के अनुवर्तमान संस्कारों के आधार पर वैसा ही व्यावहारिक अभिमान भी रखता है भले ही उसे यह मिथ्या समझता हो ( उस पर इसकी श्रद्धा न हो ) । श्रद्धारहित होने के कारण विहितकर्मों में इसका अधिकार नहीं माना जाता । बिना श्रद्धा के किया हुआ कर्म फलप्रद नहीं होता जैसा कि कहा गया है—
“अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥” ( गी० १७।२८ )
किन्तु निषेध-शास्त्रों की गति उसके विपरीत है । श्रद्धा या अश्रद्धा की वहाँ अपेक्षा नहीं होती, अपिनु निषिद्धाचरणोन्मुख व्यक्ति ही उनका अधिकारी होता है । अतः तत्त्ववेत्ता पुरुष यदि निषिद्धाचरण करता है, तब उसे अवश्य प्रत्यवाय वैसे ही होगा जैसे कि एक सांसारिक व्यक्ति को । अतः विधिनिषेधशास्त्रों में किसी प्रकार का पक्षपात या भिन्नकर्मता प्रसक्त नहीं होती । फलतः उपासना के कार्य में कर्म की अपेक्षा किसी प्रकार नहीं । उपासना की उत्पत्ति में भी कर्म का उपयोग नहीं क्योंकि असंशयात्मक तत्त्वविषयक शाब्दज्ञानमात्र हो जाने के अनन्तर कर्मानुष्ठान का अधिकार समाप्त हो जाता है । श्रुति कहती है—"न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः” ( महाना० उ० ८।१४) । तब क्या वेद-विहित कर्म सर्वथा अनुपयुक्त हैं ? यदि हाँ, “तब विविदिषन्ति यज्ञेन” इत्यादि श्रुतियों का विरोध उपस्थित होता है । इस प्रश्न का समाधान आचार्यों ने ऐसा किया है कि कर्मानुष्ठान का साक्षात् तत्त्वज्ञान में उपयोग नहीं किन्तु परम्परया उपयोग का प्रतिपादन किया गया है । “विविदिषन्ति
| ७२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
र्थतया शब्दतो गुणत्वादिच्छायाश्च प्रत्ययार्थतया प्राधान्यात्। प्रधानेन च कार्यसम्प्रत्ययात्। नहि राजपुरुषमानयेत्युक्ते वस्तुतः प्रधानमपि राजा पुरुषविशेषणतया शब्दत उपसर्जनमानीयतेऽपि तु पुरुष एव। शब्दतस्तस्य प्राधान्यात्। एवं वेदानुवचनस्येव यज्ञस्यापीच्छासाधनतया विधानम्। एवं तपसोऽ-नाशकस्य, कामानशनमेव तपः, हितमितमेध्याशिनो हि ब्रह्मणि विविदिषा भवति, न तु सर्वथाऽनश्नतो, मरणात्। नापि चान्द्रायणादितपःशीलस्य, धातुवैषम्यापत्तेः। एतानि च नित्यान्युपात्तदुरितनिबर्हणेन पुरुषं संस्कुर्वन्ति। तथा च श्रुतिः—"स ह वा आत्मयाजी यो वेद इदं मेऽनेनाङ्गं संस्क्रियत इदं मेऽने-नाङ्गमपचीयते” इति। अनेनेति प्रकृतं यज्ञादि परामृशति। स्मृतिश्च "यस्यैतेऽष्टाचत्वारिंशत्संस्काराः" इति। नित्यनैमित्तिकानुष्ठानप्रक्षीणकल्मषस्य च विशुद्धसत्त्वस्याविदुष एव उत्पन्नविविदिषस्य ज्ञानोत्पत्तिं दर्शयत्याथर्वणी श्रुतिः— "विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यति निष्कलं ध्यायमानः" इति। स्मृतिश्च—"ज्ञान-मुत्पद्यते पुंसां क्षयात् पापस्य कर्मणः" इत्यादिका।
क्लृप्तेनैव च नित्यानां कर्मणां नित्ये हि तेनोपात्तदुरितनिबर्हणेन पुरुषसंस्कारेण ज्ञानोत्पत्तावङ्ग-भावोपपत्तौ न संयोगपृथक्त्वेन साक्षादङ्गभावो युक्तः, कल्पनागौरवापत्तेः। तथाहि—नित्यकर्मानुष्ठाना-द्धर्मोत्पादः, ततः पाप्मा निवर्त्तते, स ह्यनित्याशुचिदुःखरूपे संसारे नित्यशुचिसुखख्यातिलक्षणेन विपर्य्यासेन
भामती-व्याख्या
यज्ञेन"—इस श्रुति में भी नित्यस्वाध्यायात्मक वेदानुवचन के द्वारा अवगत आत्मा के विशेष स्वरूप की विविदिषा कर्मानुष्ठान का फल माना जाता है, वेदन या तत्त्वज्ञान नहीं। यद्यपि वेदन तात्त्विकदृष्टि से प्रधान है तथापि 'सन्' प्रत्यय की प्रकृति का अर्थ होने के कारण अप्रधान माना जाता है और प्रधान का ही अन्वय अन्य पदार्थों के साथ होता है जैसे कि 'राजपुरुषमानय'—यहाँ पर पुरुष की अपेक्षा राजा प्रधान है तथापि आनयन आदि के साथ उसका अन्वय वाँछनीय नहीं, क्योंकि शब्दतः राजा की पुरुषविशेषणत्वेन उपस्थिति है स्वतन्त्रतया नहीं। पुरुषपदार्थ प्रधान होने के कारण आनयनादि के साथ अन्वित होता है। अतः वेदानुवचन के समान यज्ञादि कर्मों का भी वेदनविषयक इच्छा की साधनता के रूप में विधान माना जाता है। इसी प्रकार तप का भी इच्छा में विनियोग होता है। यथाकाम अनशन ( यथेच्छ भोजनादि का ग्रहण न कर हित, मित और मेध्य पदार्थों का स्वल्पमात्रा में ग्रहण ) तप कहलाता है। उसके द्वारा ही विविदिषा उत्पन्न होती है, सर्वथा अनशन से नहीं क्योंकि सर्वथा आहार-त्याग से प्राणियों का मरण हो जाता है। चान्द्रायण आदि क्लिष्ट तपों का भी विविदिषा में उपयोग नहीं, क्योंकि उनसे शरीरगत धातुवैषम्य हो जाने से मानसचिन्तन भी अस्त-व्यस्त हो जाता है। नित्यकर्म प्रस्तुत-दुरित की निवृत्ति के द्वारा पुरुष को संस्कृत करते हैं, जैसा कि श्रुति कहती है—"स ह वा आत्मयाजी यो वेद इदं मेऽनेनाऽङ्गं संस्क्रियत इदं मेऽनेनाऽङ्गमपचीयते” (शत०ब्रा० ११।२।६।१३)। इस श्रुति में 'अनेन' पद के द्वारा प्रकृत यज्ञादि कर्मों का ग्रहण किया गया है। स्मृतिकार भी कहते हैं—'यस्यैतेऽ-ष्टाचत्वारिंशत्संस्काराः' ( गौतमस्मृ० ८) । नित्य-नैमित्तिक-कर्मानुष्ठान के द्वारा जिसका पाप निवृत्त हो गया है किन्तु तत्त्वसाक्षात्कार नहीं हुआ ऐसे अधिकारी पुरुष को विविदिषा और उसके पश्चात् ज्ञान का लाभ श्रुति कहती है—"विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यति निष्कलं ध्यायमानः” ( मुण्डक० ३।१।८)। नित्यकर्मों का पुरुषगत-दुरित-निवृत्तिरूप संस्कार के द्वारा ज्ञान की उत्पत्ति में जब उपयोग बन जाता है, तब संयोगपृथक्त्व-न्याय के द्वारा साक्षात् ज्ञान में नित्यकर्म का उपयोग मानना उचित नहीं। अतः यही क्रम सर्वथा उचित प्रतीत होता है कि नित्यकर्मानुष्ठान से धर्म की उत्पत्ति और उससे उस पाप की निवृत्ति होती है
आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७३
भामती
चित्तसत्त्वं मलिनयति, अतः पापनिवृत्तौ प्रत्यक्षोपपत्तिद्वारापावरणे सति प्रत्यक्षोपपत्तिभ्यां संसारस्या- नित्याशुचिदुःखरूपतामप्रत्यवहमवबुध्यते, ततोऽस्यास्मिन्ननभिरतिसंज्ञं वैराग्यमुपजायते, ततस्तज्जिहासोपा- वर्त्तते, ततो हानोपायं पर्य्येषते, पर्य्येषमाणश्चात्मतत्त्वज्ञानमस्योपाय इत्युपश्रुत्य तज्जिज्ञासते, ततः श्रवणा- दिक्रमेण तज्जानातीत्यारादुपकारकत्वं तत्त्वज्ञानोत्पादं प्रति चित्तसत्त्वशुद्ध्या कर्मणां युक्तम्। इममेवार्थम- नुवदति भगवद्गीता— "आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥" एवं चाननुष्ठितकर्मापि प्राग्भवीयकर्मवशाद्यो विशुद्धसत्त्वः संसारासारतावर्शनेन निष्पन्नवैराग्यः कृतं तस्य कर्मानुष्ठानेन वैराग्योत्पादोपयोगिना, प्राग्भवीयकर्मानुष्ठानादेव तत्सिद्धेः। इममेव च पुरुष- धौरेयमेवमधिकृत्य प्रवृत्ते श्रुतिः—'यदि वेतरथा ब्रह्मचर्य्यादेव प्रव्रजेत्' इति। तदिदमुक्तम् ⁕ कर्माव- बोधात् प्रागप्यधीतवेदान्तस्य ब्रह्मजिज्ञासोपपत्तेः इति ⁕ । अत एव न ब्रह्मचारिण ऋर्णानि सन्ति येन
भामती-व्याख्या
जिससे चित्तगत सत्त्व मलिन होकर अनित्य, अशुचि और दुःखरूप प्रपञ्च में नित्य, शुचि और सुखरूपता का भान करा देता है। कथित पाप की निवृत्ति हो जाने पर प्रत्यक्ष और उपपत्ति का द्वार उद्घाटित हो जाता है। और दृश्यमान प्रपञ्च में अनित्यत्वादि का ज्ञान प्रत्यक्षप्रमाण के द्वारा एवं अदृष्ट जगत् में अनित्यत्वादि का बोध (उपपत्ति या युक्ति के द्वारा उपपन्न) हो जाता है। उसके पश्चात् संसार से अनभिरतिसंज्ञक वैराग्य हो जाता है। उस वैराग्य के आधार पर संसार की जिहासा (त्याग करने की इच्छा) समुद्भूत हो जाती है और संसार के सर्वथा परिहार का मार्ग पुरुष खोजने लगता है। आत्मतत्त्वसाक्षात्कार ही कर्तृत्वादि प्रपञ्च के परिहाण का उपाय है—ऐसा सुनकर उसकी जिज्ञासा उत्पन्न हो जाती है और आत्मा के श्रवण-मननादि में प्रवृत्त होकर आत्मज्ञान का लाभ कर लेता है। इस प्रकार चित्तशुद्धि के द्वारा कर्मों का परम्परया उपयोग भगवान् भी बताते हैं—
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ (गी० ६।३)
[अन्तःकरणशुद्धिरूप वैराग्य के पद पर आरुरुक्षु (आरूढ़ होने के अभिलाषी) पुरुष के लिए कर्मानुष्ठान की उपयोगिता होती है अन्तःकरण-शुद्धिरूप योग पर आरूढ़ पुरुष का कर्त्तव्य केवल शम (संन्यास) रह जाता है]। जिस व्यक्ति ने इस जन्म में कर्मानुष्ठान नहीं किया, पूर्वजन्मोपार्जित धर्म के द्वारा ही जिस का बुद्धि-सत्त्व शुद्ध हो गया है, संसार की असारता का भान एवं वैराग्य उत्पन्न हो गया है, उस व्यक्ति के लिए कर्मानुष्ठान की आवश्यकता नहीं, क्योंकि जिस वैराग्य की उत्पत्ति में कर्मानुष्ठान का उपयोग होता है, उसका लाभ तो उसे पहले ही हो चुका है। ऐसे ही विरक्त-शिरोमणि को उद्देश्य करके श्रुति कहती है—"यदि वेतरथा ब्रह्मचर्य्यादेव प्रव्रजेत् [नारदपरिव्राजकोपनिषत् (तृतीयोपदेश) में कहा है—"ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद्, गृहाद् वनीभूत्वा प्रव्रजेद्, यदि वेतरथा ब्रह्मचर्या- देव प्रव्रजेद् गृहाद्वा वनाद्वा, यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्।" सारांश यह है कि वैराग्य पर ही संन्यास निर्भर है, जब भी वैराग्य उत्पन्न हो जाय तब ही परिव्रज्या ग्रहण की जा सकती है]। इसी भाव की अभिव्यक्ति भाष्यकार ने की है—"कर्मावबोधात् प्रागप्यधीतवेदा- न्तस्य ब्रह्मजिज्ञासोपपत्तेः"। इससे यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मचारी पर कथित जन्म-सिद्ध तीन ऋण नहीं होते, अतः उन ऋणों का उद्धार करने के लिए कर्मानुष्ठान अपेक्षित नहीं। यदि ब्रह्मचारी तीन ऋणों का ऋणी नहीं, तब “जायमानो वै ब्राह्मणः त्रिभिऋ णवाजायते”
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| ७४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
तदपाकरणार्थं कर्मानुतिष्ठेत् । एतदनुरोधाच्च 'जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिर्ऋणवान् जायते' इति गृहस्थः सम्पद्यमान इति व्याख्येयम् । अन्यथा 'यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव' इति श्रुतिर्विरुध्येत । गृहस्थस्यापि च ऋणापाकरणं सत्त्वशुद्ध्यर्थमेव । जरामर्यवादो भस्मान्ततावादोऽन्त्येष्ट्यश्च कर्मजडानविदुषः प्रति, न स्वात्मतत्त्वपण्डितान् । तस्मात्तस्यानन्तर्यमथशब्दार्थो यद्विना ब्रह्मजिज्ञासा न भवति यस्मिंस्तु सति भवन्ती भवत्येव । न चेत्थं कर्मावबोधः । तस्मान्न कर्मावबोधानन्तर्यमथशब्दार्थ इति सर्वमवदातम् ।
स्यादेतत्—मा भूदग्निहोत्रयवागूपाकवदार्थः क्रमः, श्रौतस्तु भविष्यति, 'गृही भूत्वा वनी भवेत्'
भामती-व्याख्या
(तै० सं० ३।१०) इस श्रुति की क्या व्यवस्था होगी ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि उक्त श्रुति का 'गृहस्थः सम्पद्यमानः'—ऐसा वाक्यशेष लगाकर यह अर्थ करना होगा कि 'जो ब्राह्मण गृहस्थाश्रम में प्रवेश करनेवाला है, उस पर ही वे तीन ऋण होते हैं, सब पर नहीं'। अन्यथा (ब्राह्मणमात्र को ऋणी मानने पर) "यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्"—इस श्रुति का विरोध उपस्थित होता है । गृहस्थ पुरुष के लिए भी जो कथित ऋणों की निवृत्ति के लिए कर्मानुष्ठान विहित है, उसका भी फल चित्तगत सत्त्व गुण की शुद्धि ही है । जरामर्यवाद [ जरामर्यं वा एतत्सत्रं यदग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ च । जरया ह वा एष एताभ्यां निर्मुच्यते मृत्युना च" (तं० आ० १०।६४।१)। यहाँ पर श्री सायणाचार्य ने "जरामर्यम्' का अर्थ 'जरामरणावधिम्' किया है, अर्थात् अग्निहोत्र और दर्शपूर्णमास नाम के दोनों कर्म आहिताग्नि पुरुष को जीवनपर्यन्त करना है, अतः यह वह सत्र कर्म है, जो कि जरा-मरण-पर्यन्त किया जाता है ], भस्मान्ततावाद [ जिस व्यक्ति ने अग्न्याधान नहीं किया, वह यावज्जीवन सन्ध्या-वन्दनादि नित्य कर्मों का सम्पादन करता है और प्राणान्त हो जाने पर उसके शरीर का दाहसंस्कार (भस्मान्त) सम्पन्न किया जाता है ] और अन्त्येष्टि संस्कार [ किसी अग्निहोत्री पुरुष के मर जाने पर उसकी अन्तिम इष्टि इस प्रकार सम्पन्न की जाती है कि चिता में उसके शव को सीधा लिटाकर उसके मुख में घृत-पूर्ण स्रुक् (जुहू आदि ), नासिका में स्रुवा, अधर अरणी को पैरों पर उत्तराणि को छाती पर, शूर्प (सूप) को वाम पार्श्व में चमस को दक्षिण पार्श्व में, मूसल और उलूखल को दोनों जाँघों के बीच में रखकर उसकी अग्नि से दाहसंस्कार किया जाता है—
तत्रोत्तानं निपात्यैनं दक्षिणशिरस्कं मुखे ।
आज्यपूर्णां स्रुचं दद्याद् दक्षिणाग्रां नासि स्रुवम् ॥
पादयोरधरां प्राचीमरणीमुरसीतराम् ।
पार्श्वयोः शूर्पंचमसे सव्यदक्षिणयोः क्रमात् ॥
मुसलेन सह न्युब्जमन्तरूरुवोरुलूखलम् ।
चात्रे विलीकमत्रैवमनश्रुनयनो विभोः ॥ (कात्या० स्मृ० ९)]
इत्यादि कर्मों का विधान कर्मकाण्ड के अन्धश्रद्धालु अज्ञानी व्यक्तियों के लिए ही है, आत्मतत्त्व के पण्डित पुरुषों के लिए नहीं, इस प्रकार कर्मावबोधानन्तर्य 'अथ' शब्द का अर्थ नहीं हो सकता, अतः ब्रह्म-जिज्ञासा में उस पदार्थ का आनन्तर्य प्रतिपादित करना होगा कि जिसके बिना ब्रह्म-जिज्ञासा सम्भव न होकर जिसके सम्पन्न होने पर ही हो सके । कर्माबोध ऐसा नहीं कि जिसके बिना ब्रह्म-जिज्ञासा न हो सके, अतः कर्मावबोध का आनन्तर्य कभी भी 'अथ' शब्द का अर्थ नहीं हो सकता ।
शङ्का—
आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७५
जिज्ञासोपपत्तेः । यथा च हृदयाद्यवदानानामानन्तर्यनियमः, क्रमस्य विवक्षितत्वात्
भामती
'वनी भूत्वा प्रव्रजेद्' इति जाबालश्रुतिर्गाहस्थ्येन हि यज्ञाद्यनुष्ठानं सूचयति । स्मरन्ति च—
“अधीत्य विधिवद् वेदान् पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः ।
इष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत् ॥”
निन्दन्ति च—
"अनधीत्य द्विजो वेदाननुत्पाद्य तथात्मजान् ।
अनिष्ट्वा चैव यज्ञैश्च मोक्षमिच्छन् व्रजत्यधः ॥” इति ।
इत्यत आह ॐ यथा च हृदयाद्यवदानानामानन्तर्यनियमः ॐ । कुतः 'हृदयस्याग्रेऽवद्यति अथ जिह्वाया अथ वक्षसः' इत्यथाग्रशब्दाभ्यां क्रमस्य विवक्षितत्वात्, न तथेह क्रमो विवक्षितः, श्रुत्या
भामती-व्याख्या
कहा है—“अग्निहोत्रं जुहोतीति पूर्वमाम्नातम्, ओदनं पचतीति पश्चात् । अर्थात् विपरीत: कार्य:।” पकी हुई यवागू (दलिया) अथवा पके चावल अग्निहोत्र कर्म की हवि होते हैं, अतः ] कर्मानुष्ठान से पश्चात्पठित यवागू-पाक प्रयोजन (साध्य-साधनभाव) क्रम को लेकर पहले किया जाता है और उसके अनन्तर अग्निहोत्र कर्म का अनुष्ठान किया जाता है। ऐसे ही वैदिक वाक्यों से अर्थावबोध न होने पर ब्रह्मजिज्ञासा सम्भव नहीं, अतः कर्मविबोध या वेदार्थविबोध के अनन्तर ब्रह्म-जिज्ञासा का जो अर्थक्रम रखा जाता है, वह यदि अर्थ (प्रयोजन या साध्य-साधनभाव) के आधार पर नहीं माना जा सकता, तब श्रुति (आनन्तर्यार्थक 'क्त्वा' आदि शब्दों) के आधार पर वह क्रम वैसे ही मानना होगा, जैसा कि “वेदं कृत्वा वेदीं करोति” इत्यादि स्थलों पर माना जाता है, क्योंकि यहाँ भी “गृही भूत्वा वनी-भवेद्, वनीभूत्वा प्रव्रजेत्” (जाबालो० ४) इस प्रकार जाबालोपनिषत् में 'गृहीभूत्वा'—इस 'क्त्वा' प्रत्ययरूप श्रुति के द्वारा गृहस्थ आश्रम का पालन करने के पश्चात् परिव्रज्या का क्रम प्रतिपादित है। 'गृही' पद के द्वारा कर्मानुष्ठान और 'परिव्रजति' पद से ब्रह्म-जिज्ञासा की सूचना की गई है। मनु जी भी कहते हैं—
अधीत्य विधिवद्वेदान् पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः ।
इष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत् ॥ ( मनु० ६।३६)
[ विधिवत् वेदाध्ययन, पुत्रोत्पत्ति और वनस्थ यज्ञादि-अनुष्ठान के द्वारा क्रमशः ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रम सूचित किये गये हैं ] केवल इतना ही नहीं, वेदाध्ययनादि के बिना मुमुक्षा सरणि का अनुसरण अधःपतन का कारण माना गया है—
अनधीत्य द्विजो वेदाननुत्पाद्य तथा सुतान् ।
अनिष्ट्वा चैव यज्ञैश्च मोक्षमिच्छन् व्रजत्यधः ॥ ( मनु० ६।३७)
समाधान—उक्त शङ्का का समाधान करते हुए भाष्यकार ने कहा है—“यथा च हृदयाद्यवदानानामानन्तर्यनियमः, क्रमस्य विवक्षितत्वात्, न तथेह क्रमो विवक्षितः”। पशु-याग के लिए हवि के निष्पादन का क्रम बताते हुए कहा गया है—“हृदयस्याग्रेऽवद्यति, अथ जिह्वाया, अथ वक्षसो यथाकामीतरेषाम्” (आप. श्रौ. सू. २४।२) । [ स्वधिति नाम की छुरी के द्वारा छाग के हृदय का भाग सबसे अग्रे (पहले) उसके पश्चात् जिह्वा और जिह्वावदान के अनन्तर वक्षःस्थल का अवदान (टुकड़ा काटना) करना चाहिए ] ।
यहाँ पर 'अग्रे' और 'अथ' शब्दों के बल पर जैसे अवदान-क्रम की विवक्षा की जाती है, वैसे प्रकृत (गृहीभूत्वा प्रव्रजेत्—इस वाक्य) में कर्मविबोध और ब्रह्म-जिज्ञासा का पौर्वापर्य-
| ७६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती तथैवानियमप्रदर्शनात्— "यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद्वा वनाद् वा" इति। एतावता हि वैराग्यमुपलक्षयति। अत एव "यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत्" इति श्रुतिः। निन्दावचनं चाविशुद्धसत्त्वपुरुषाभिप्रायम्। अविशुद्धसत्त्वो हि मोक्षमिच्छन्नालस्यात्तदुपायेष्वप्रवर्त्तमानो गृहस्थधर्ममपि नित्यनैमित्तिकमनाचरन् प्रतिक्षणमुपचीयमानपाप्माऽधोगतिं गच्छतीत्यर्थः। स्यादेतत्— मा भूच्छ्रौत आर्थो वा क्रमः, पाठस्थानमुख्यप्रवृत्तिप्रमाणकस्तु कस्मान्न भवतीत्यत
भामती-व्याख्या भाव विवक्षित नहीं, अन्यथा "यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद्वा" (जाबालो. ४) इस श्रुति के द्वारा प्रतिपादित अनियम का सामञ्जस्य नहीं रहता। इस अनियम के द्वारा एकमात्र वैराग्य को परिव्रज्या में कारण ध्वनित किया गया है, श्रुति स्पष्ट कहती है— "यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्" (जाबालो. ४)। "अनधीत्य द्विजो वेदान्" इत्यादि निन्दा-वचन उस व्यक्ति के लिए लागू होते हैं, जिसका अन्तःसत्त्व अविशुद्ध है, क्योंकि अविशुद्धसत्त्ववाला व्यक्ति यदि मोक्ष की इच्छा करता है, तब वह आलस्य के कारण नित्यादि कर्मों का भी परित्याग कर बैठता है और शमादि का पालन भी नहीं करता, अतः प्रतिक्षण उपचीयमान पाप-राशि से दब कर अधोगति को प्राप्त होता है।
शङ्का— क्रम या पौर्वापर्यभाव के नियामक (१) श्रुति, (२) अर्थ, (३) पाठ, (४) स्थान, (५) मुख्य और (६) प्रवृत्ति नाम के छः प्रमाण मीमांसा दर्शन के पञ्चम अध्याय में वर्णित हैं [(१) क्रम या पूर्वापर काल के वाचक शब्द को यहाँ श्रुति पद से अभिहित किया गया है, जैसे "वेदं कृत्वा वेदीं करोति" इत्यादि स्थलों पर 'क्त्वा' प्रत्यय पूर्वकाल का वाचक होने के कारण 'श्रुति' कहलाता है, अतः एक मुट्ठी कुशा को बीच से मोड़-तोड़ कर एक गाँठ लगा दी जाती है, उसे वेद कहते हैं, वेद का निर्माण कर लेने के पश्चात् ही वेदी का निर्माण किया जाता है।
(२) 'अर्थ' शब्द प्रयोजन का वाचक है, प्रयोजन या साध्य-साधनभाव के आधार पर ओदनादि का पाक पहले और अग्निहोत्रादि कर्म का अनुष्ठान पश्चात् किया जाता है।
(३) "समिधो यजति वसन्तमेवर्तूनामवरुन्धे, तनूनपातं यजति ग्रीष्ममेवावरुन्धे, इडो यजति वर्षा एवावरुन्धे, बर्हिर्यजति शरदमेवावरुन्धे, स्वाहाकारं यजति हेमन्तमेवावरुन्धे" (त. सं. २।६।१।१) यहाँ पर समिधादिसंज्ञक पाँच प्रयाज कर्मों के विधायक पाँचों वाक्यों का पाठ जिस क्रम से है, उसी क्रम से उन कर्मों का अनुष्ठान किया जाता है, इस क्रम को पाठ-क्रम कहते हैं।
(४) ज्योतिष्टोम नाम के प्रकृतिभूत कर्म का अनुष्ठान पाँच दिनों में सम्पन्न होता है, अत एव उसके अङ्गभूत 'अग्नीषोमीय, सवनीय और आनुबन्ध्य'—इन तीन पशु-यागों का अनुष्ठान भिन्न-भिन्न दिनों में होता है—सर्वप्रथम अग्नीषोमीय पशु-याग का अनुष्ठान चतुर्थ दिन में, सवनीय पशु-याग का अनुष्ठान पञ्चम दिन प्रातःसवन के पश्चात् और आनुबन्ध्य-याग का अनुष्ठान पञ्चम दिन में ही अवभृथ कर्म के अनन्तर किया जाता है।
प्रकृति याग के सभी अङ्ग विकृति याग में लिए जाते हैं, किन्तु साद्यस्कसंज्ञक विकृति याग एक ही दिन में सम्पन्न किया जाता है। दीक्षादि सभी कृत्यों का सद्यः अनुष्ठान होने के कारण इस विकृति कर्म का नाम साद्यस्क है—"दीक्षादि सद्यः सर्वं क्रियते" (कात्या. श्रौ. सू. २२।३।२७)। कथित तीनों पशु-यागों का अनुष्ठान यहाँ एक ही सवन-काल में किया जाता है—"सह पशूनालभते" (कात्या. श्रौ. सू. २२।३।२८)। प्रकृति कर्म में सवन-काल सवनीय
आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७७
तथेह क्रमो विवक्षितः, शेषशेषित्वेऽधिकृताधिकारे वा प्रमाणाभावात् , धर्मग्रह-
भामती आह ॐ शेषशेषित्वे प्रमाणाभावात् ॐ । शेषाणां समिदादीनां शेषिणाम्नाग्नेयादीनामेकफलवदुपकारोप- निबद्धानामेकफलावच्छिन्नानामेकप्रयोगवचनोपगृहीतानामेकाधिकारिकर्तृकाणामेकपौर्णमास्यमावास्याकाल-
भामती-व्याख्या पशु-याग का स्थान माना जाता है, अतः 'स्थान' प्रमाण के आधार पर सवनीय पशु, उसके पश्चात् अग्नीषोमीय और अन्त में आनुबन्ध्य पशु का अनुष्ठान किया जाता है—"सौत्येऽहनि अग्नीषोमीयसवनीयानुबन्ध्यान् पशून् क्रमेण सहैव ( तन्त्रेण ) सवनीयकाले आलभेत । तत्र स्थानित्वात् सवनीयः स्वस्थान न जहाति, अग्नीषोमीयस्तु स्वस्थानात् प्रच्यावितः सवनीया-त्पश्चाद् भवति" ( कात्या. श्रौ. सू. व्या. २२।३।२८ ) ।
( ५ ) 'मुख्य' का अर्थ प्रधान है, प्रधान कर्म के क्रम से अङ्ग कर्मों का अनुष्ठान करना मुख्य-क्रम कहलाता है । जैसे कि दर्शयाग में तीन प्रधान कर्मों के तीन हवि द्रव्य होते हैं—( १ ) आग्नेय पुरोडाश, ऐन्द्र दधि और ऐन्द्रं पयः । “प्रयाजशेषेण हवींषि अभिघारयति"—इस वाक्य के द्वारा प्रयाज-शेष ( प्रयाज कर्मों के अनुष्ठान से बचे हुए घृत ) से उक्त तीनों हवियों का अभिधारण विहित है । पहले किस हवि का अभिधारण होगा और पश्चात् किसका ? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि प्रधान कर्मों का अनुष्ठान जिस क्रम से होता है, उसी क्रम से उनके हवियों का अभिधारण भी करना चाहिए । आग्नेय याग का अनुष्ठान पहले होता है, उसके पश्चात् ऐन्द्र याग का, अतः आग्नेय हवि ( पुरोडाश ) का अभिधारण पहले और उसके पश्चात् क्रमशः ऐन्द्र दधि और ऐन्द्र पयः का अभिधारण किया जाता है—इसी का नाम मुख्य-क्रम है ।
( ६ ) “सप्तदश प्राजापत्यान् पशूनालभते" ( तै. ब्रा. ३।४।३ ) इस वाक्य के द्वारा प्रजापति देवता के उद्देश्य से सत्तरह पशुओं ( छागों ) का अनुष्ठान विहित है । पशुओं के उपाकरण ( मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्पर्श और सम्प्रदानभूत देवता का निर्देश ), नियोजन ( यूप में पशु को बाँधना ) और पर्यग्निकरण आदि जो संस्कार विहित हैं, उनका किस क्रम से अनुष्ठान किया जाय ? इस प्रश्न का उत्तर है—प्रवृत्तिक्रम से [ उपाकरण जिस पशु से आरम्भ कर जिस पशु में समाप्त किया, उसी क्रम से नियोजनादि अङ्गों का अनुष्ठान प्रवृत्ति-क्रम कहलाता है ] । उनमें से कर्मावबोध और ब्रह्म-जिज्ञासा का क्रम ( पौर्वापर्यभाव ) यदि श्रुति और अर्थ ( प्रयोजन ) के आधार पर नहीं हो सकता, तब पाठ, स्थान, मुख्य और प्रवृत्ति के द्वारा सम्भव हो जायगा ।
समाधान - उक्त शंका का परिहार करते हुए भाष्यकार ने कहा है—शेषशेषित्वे प्रमाणाभावात्" । “शेषः परार्थत्वात्" ( जै. सू. ३।१।१ ) इस सूत्र में 'शेष' शब्द का अर्थ अङ्ग और उसका लक्षण किया गया है - परार्थ्य । जो पदार्थ किसी पर ( प्रधान ) को अपने सहयोग से सम्पन्नता या पूर्णता प्रदान करता है, उसे शेष कहते हैं । शेष का लक्षण कर देने से शेषी ( अङ्गी ) का लक्षण अपने-आप सिद्ध हो जाता है —
शेषलक्षणमात्रोक्तावर्थात्स्याच्छेषिलक्षणम् ।
अतः शेषः परार्थत्वादित्युक्तं शेषलक्षणम् ।। ( तं० वा० पृ० ६५३ )
समिध् , तनूनपातादि प्रयाज कर्म शेष हैं उनके शेषी ( अङ्गी ) हैं—आग्नेयादि याग । शेष और शेषी—दोनों एक स्वर्गरूप फल के उद्देश्य से विहित हैं । दोनों एक ही प्रयोग-विधि के द्वारा गृहीत हैं, दोनों एक ही अधिकारी ( स्वर्गकामनावान् ) व्यक्ति के द्वारा सम्पादनीय हैं
| ७८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
•बद्धानां युगपदनुष्ठानाशक्तेः सामर्थ्यात् क्रमप्राप्तौ तद्विशेषापेक्षायां पाठादयस्तद्भेदनिर्णमाय प्रभवन्ति, यत्र तु न शेषशेषिभावो नाप्येकाधिकारावच्छेदो यथा सौर्य्यार्य्यमणप्राजापत्यादीनां तत्र क्रमभेदापेक्षा-भावान्न पाठादिः क्रमविशेषनियमे प्रमाणम्, अवर्जनीयतया तस्य तत्रागतत्वात् । न चेह धर्मब्रह्मजिज्ञासयोः शेषशेषिभावे श्रुत्यादीनामन्यतमं प्रमाणमस्तीति ॥
ननु शेषशेषिभावाभावेऽपि क्रमनियमो दृष्टः, यथा गोदोहनस्य पुरुषार्थस्य दर्शपूर्णमासिकैरङ्गैः सह, यथा वा दर्शपूर्णमासाभ्यामिष्ट्वा सोमेन यजेतेति दर्शपूर्णमाससोमयोरशेषशेषिणोरित्यत आह
भामती-व्याख्या
और एक ही अमावास्या और पौर्णमासी तिथि में किए जाते हैं। अतः उक्त द्विविध कर्मों का सहानुष्ठान करना है, किन्तु युगपत् सभी कर्मों का अनुष्ठान सम्भव नहीं, फलतः किसी क्रम का अवलम्बन कर साङ्ग प्रधान कर्म का सम्पादन करना होगा, क्रम विशेष का निर्णय करने के लिए पाठ, स्थानादि प्रमाणों की अपेक्षा होती है। जिन कर्मों में न तो शेष-शेषिभाव होता है और न एक ही अधिकारी व्यक्ति के द्वारा सम्पादनीयत्व, जैसे—सौर्य, आर्यमण और प्राजापत्यादि [ सौर्यं चरुं निर्वपेद् ब्रह्मवर्चसकामः” ( तै० सं० २।३।२।३ ), आर्यम्णे चरुं निर्वपेत् सुवर्गकामः” ( तै० सं० २।३।४।१ ) “प्राजापत्यं चरुं निर्वपेच्छतकृष्णलमायुष्कामः” ( तै० सं० २।३।२।१ ) ] कर्मों में क्रम की अपेक्षा ही नहीं, अतः क्रम-विशेष-बोधक पाठादि प्रमाणों का उपयोग नहीं होता। फिर भी उन कर्मों का युगपत् ( एक काल में ) अनुष्ठान न होकर किसी-न किसी क्रम से होता है। वह क्रम वहाँ अवर्जनीय होने के कारण स्वभाव-सिद्ध है, किसी प्रमाण से प्रयुक्त नहीं। प्रकृत ( कर्मावबोध और ब्रह्म-जिज्ञासा ) में शेषशेषिभाव ( अङ्गाङ्गि-भाव ) किसी प्रमाण से सिद्ध नहीं, अतः ब्रह्म-जिज्ञासा में कर्मावबोधानन्तर्य आवश्यक नहीं।
शङ्का—शेषशेषिभाव न होने पर भी क्रम का नियम देखा जाता है, जैसे गोदोहन पात्र में जल-प्रणयन और दर्शपूर्णमास कर्म के अङ्गों में क्रम माना जाता है [दर्शपूर्णमास कर्म के अङ्ग कलाप का आरम्भ जल-प्रणयन से होता है। आचमन के लिए किसी पात्र में जल भर कर रखना जल-प्रणयन कहलाता है। सामान्यतया “चमसेनापः प्रणयेत्” ( आप० श्रौ० सू० ११।१।३ ) इस विधि के द्वारा चमस नाम के काष्ठमय पात्र में जल-प्रणयन किया जाता है, पशुरूप अवान्तर फल के उद्देश्य से उस मृण्मय पात्र में जल-प्रणयन विहित हैं, जिसमें गो दुही जाती है—“गोदोहनेन पशुकामस्य” ( आप० श्रौ० सू० १।१६।२ )। यद्यपि दर्शपूर्णमास का अङ्गभूत जल-प्रणयन गोदोहन में किया जाता है, अतः गोदोहन पात्र में कर्माङ्गत्व और उसका पशु-कामना रूप स्वतन्त्र फल कीर्तित है, अतः गोदोहन में पुरुषार्थत्व ( पुरुषाङ्गत्व ) भी प्रतीत होता है, तथापि गोदोहन में पुरुषार्थत्व माना गया है—“यस्मिन् प्रीतिः पुरुषस्य लिप्सार्थ-लक्षणाऽविभक्तत्वात्” ( जै० सू० ४।१।२ ) ! यद्यपि गोदोहन दर्शपूर्णमासरूप क्रतु (यज्ञ) का उपकारक है, तथापि इतने मात्र से गोदोहन मात्र में क्रत्वङ्गत्व नहीं माना जा सकता, क्योंकि पुरुषार्थभूत गोदोहन से भी क्रतु का उपकार सिद्ध हो जाता है। फलतः गोदोहन और दर्शपूर्णमास का अङ्गाङ्गिभाव न होने पर भी यह क्रम माना जाता है कि गोदोहन पात्र में जल-प्रणयन कर लेने के पश्चात् ही दर्शपूर्णमास के पूर्वाङ्गों का अनुष्ठान किया जाता है ] वैसे ही प्रकृत में कर्मावबोध और ब्रह्म-जिज्ञासा का क्रम ( पूर्वापरभाव ) क्यों नहीं माना जा सकता ?
अथवा “दर्शपूर्णमासाभ्यामिष्ट्वा सोमेन यजेत” इस वाक्य में ‘क्त्वा’ प्रत्यय के द्वारा दर्शपूर्णमास और सोमयाग का क्रम माना जाता है, वैसे ही धर्म-जिज्ञासा और ब्रह्म-जिज्ञासा
आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७९
भामती
❁ अधिकृताधिकारे च प्रमाणाभावाद् ❁ — इति योजना। स्वर्गकामस्य हि दर्शपूर्णमासाधिकृतरूप पशु-कामस्य सतो दर्शपूर्णमासक्रत्वर्थाप्प्रणयनाश्रिते गोदोहनेऽधिकारः। नो खलु गोदोहनद्रव्यमव्याप्रियमाणं साक्षात् पशून् भावयितुमर्हति। न च व्यापारान्तराविष्टं श्रूयते यतस्तदङ्गक्रममतिपतेत्। अप्रणयनाश्रितं तु प्रतीयते "चमसेनापः प्रणयेद् गोदोहनेन पशुकामस्य" इति समभिव्याहारात्, योग्यत्वाच्चास्यापां प्रणयनं प्रति। तस्मात् क्रत्वर्थाप्प्रणयनाश्रितत्वाद् गोदोहनस्य तत्क्रमेण पुरुषार्थमपि गोदोहनं क्रमवदिति सिद्धम्। श्रुतिनिराकरणेनेवेष्टिसोमक्रमवदपि क्रमोऽप्यपास्तो वेदितव्यः।
शेषशेषित्वाधिकृताधिकाराभावेऽपि क्रमो विवक्ष्येत, यद्येकफलावच्छेदो भवेत्, यथाग्नेयादीनां षण्णामेकस्वर्गफलावच्छिन्नानां, यदि वा जिज्ञास्यब्रह्मांगोंऽशो धर्मः स्यात्, यथा चतुलंक्षणीव्युत्पाद्यं ब्रह्म केनचित्केनचिदंशेनेकेन लक्षणेन व्युत्पाद्यते तत्र चतुर्णां लक्षणानां जिज्ञास्याभेदेन परस्परसम्बन्धे सति
भामती-व्याख्या
का क्रम स्थिर हो सकता है [ सोमयाग का अनुष्ठान दो प्रकार से होता है—(१) अग्न्याधान करने के अनन्तर अथवा (२) अग्न्याधान करके दर्शपूर्णमास याग का अनुष्ठान कर लेने के पश्चात्। द्वितीय कल्प में दर्शपूर्णमास और सोमयाग का क्रम विवक्षित है। सोमयाग और दर्शपूर्णमास—दोनों स्वतन्त्र कर्म हैं, उनमें किसी प्रकार का अङ्गाङ्गिभाव नहीं होता, फिर भी आनन्तर्य काल का विधान माना गया है— "उत्पत्तिकालविशये कालः स्याद्, वाक्यस्य तत्प्रधानत्वात्" (जै० सू० ४।३।३७) ]।
समाधान— उक्त आशङ्का का परिहार करते हुए भाष्यकार ने कहा है— "अधिकृता-धिकारे वा प्रमाणाभावात्"। स्वर्गफलक दर्शपूर्णमास कर्म का जो अधिकारी पुरुष है, उसी का गोदोहन में जल-प्रणयन का अधिकार है, अन्य का नहीं। अर्थात् "गोदोहनेन पशुकामस्य"— यहाँ पर तृतीया विभक्तिरूप श्रुति के द्वारा जो गोदोहन पात्र में पशुरूप फल की करणता प्रतिपादित है, वह तब तक उपपन्न नहीं हो सकती, जब तक कि गोदोहन पात्ररूप द्रव्य किसी व्यापार से युक्त नहीं हो जाता, उद्यमन-निपातनादि व्यापार से युक्त कुठारादि में ही करणता मानी जाती है, अतः प्रकृत में जल-प्रणयनरूप व्यापार से युक्त गोदोहन में फल-साधनता बन सकेगी। "चमसेनापः प्रणयेद् गोदोहनेन पशुकामस्य"— ऐसा समभिव्याहार जलप्रणयनरूप व्यापार का ही समर्पण करता है और गोदोहन-व्यापार में उस जलप्रणयन की योग्यता निहित होती है। अतः क्रत्वङ्गभूत जलप्रणयन का आश्रयी होने के कारण गोदोहन पात्र का भी वही क्रम माना जाता है जो दर्शपूर्णमासगत जल-प्रणयन का है। इसी प्रकार सोम का अधिकारी व्यक्ति ही दर्शपूर्णमास का अनुष्ठान करता है। इस प्रकार कथित दोनों उदाहरणों में अधिकृताधिकार समानरूप से होने के कारण उनमें आनन्तर्य का नियम सम्भव हो जाता है। किन्तु प्रकृत में कर्मावबोध और ब्रह्मजिज्ञासा में किसी प्रकार का अधिकृताधिकार नहीं, प्रत्युत दोनों जिज्ञासाओं के अधिकारी पुरुष अत्यन्त भिन्न होते हैं। अधिकृताधिकारभाव न होने के कारण धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा का पौर्वापर्यभाव सम्भव नहीं। 'दर्शपूर्णमासाभ्यामिष्ट्वा'— यहाँ 'क्त्वा' प्रत्यय के द्वारा पौर्वापर्यभाव जैसा प्रतीत होता है वैसा धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा का कोई श्रौतक्रम सम्भव नहीं है।
शेषशेषिभाव या अधिकृताधिकारभाव न होने पर भी क्रम माना जाता है जैसे दर्श-पूर्णमासगत आग्नेय आदि छः कर्मों का, क्योंकि वे सभी एक स्वर्गरूप फल के उद्देश्य से विहित हैं। अथवा धर्म जिज्ञास्यभूत ब्रह्म का यदि अंश होता तब भी धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा का वैसे ही क्रम विवक्षित हो सकता था, जैसे कि ब्रह्मसूत्र के चार अध्यायों का
८० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १
जिज्ञास्ययोः फलजिज्ञास्यभेदाच्च । अभ्युदयफलं धर्मज्ञानं, तच्चानुष्ठानापेक्षम् । निःश्रेयसफलं तु ब्रह्मविज्ञानं, न चानुष्ठानान्तरापेक्षम् । भव्यश्च धर्मो जिज्ञास्यो न ज्ञानकालेऽस्ति, पुरुषव्यापारतन्त्रत्वात् । इह तु भूतं ब्रह्म जिज्ञास्यं नित्यत्वान्न पुरुषव्यापारतन्त्रम् । चोदनाप्रवृत्तिभेदाच्च । या हि चोदना धर्मस्य लक्षणं सा स्वविषये
भामती
क्रमो विवक्षितस्तयेहाप्येकजिज्ञास्यतया धर्मब्रह्मजिज्ञासयोः क्रमो विवक्ष्येत, न चैतदुभयमप्यस्तीत्याह ॐ फलजिज्ञास्यभेदाच्च ॐ । फलभेदं विभज्यते ॐ अभ्युदयफलं धर्मज्ञानम् इति ॐ । जिज्ञासाया वस्तुतो ज्ञानतन्त्रत्वाज्ज्ञानफलं जिज्ञासाफलमिति भावः । न केवलं स्वरूपतः फलभेदः, तदुत्पादनप्रकारभेदादपि तद्भेदे इत्याह ॐ तच्चानुष्ठानापेक्षं ब्रह्मज्ञानं च नानुष्ठानान्तरापेक्षम् ॐ । शाब्दज्ञानाभ्यासान्नानुष्ठानान्तरमपेक्षते, नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानसहभावस्यापास्तत्वादिति भावः ।
जिज्ञास्यभेदमात्यन्तिकमाह ॐ भव्यश्च धर्म इति ॐ । भविता भव्यः, कर्तरि कृत्यः । भविता च भावकव्यापारनिर्वर्त्यतया तत्तन्त्र इति ततः प्राग् ज्ञानकाले नास्तीत्यर्थः । भूतं सत्यं, सदेकान्ततो न कदा चिदसन्नित्यर्थः । न केवलं स्वरूपतो जिज्ञास्ययोर्भेदो ज्ञापकप्रमाणप्रवृत्तिभेदादपि भेद इत्याह ॐ चोदनाप्रवृत्तिभेदाच्च ॐ । चोदनेति वैदिकं शब्दमाह, विशेषेण सामान्यस्य लक्षणात् । प्रवृत्तिभेदं
भामती-व्याख्या
विचारणीय एक ब्रह्मतत्त्व को लेकर चारों अध्यायों का क्रम माना जाता है, वैसे ही प्रकृत में धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा का क्रम माना जा सकता था। इन (एकफलोद्देश्यत्व और जिज्ञास्याभेद) दोनों का अभाव दिखाते हुए भाष्यकार कहते हैं—"फलजिज्ञास्यभेदाच्च ।" फलभेद का स्पष्टीकरण किया जाता है—अभ्युदयफलं धर्मज्ञानं, निःश्रेयसफलं तु ब्रह्मज्ञानम् । जिज्ञासा ज्ञान का अङ्ग होने के कारण ज्ञान के फल को ही जिज्ञासा का फल कह दिया गया है। स्वर्ग आदि अभ्युदय और मोक्षरूप फल का स्वरूपतः ही भेद नहीं अपितु उनके उत्पादन क्रम में भी स्पष्ट भेद होता है—तच्चानुष्ठानापेक्षम् । अर्थात् केवल धर्मज्ञान से स्वर्ग आदि फल की निष्पत्ति नहीं होती अपितु वेदार्थज्ञान के पश्चात् कर्मानुष्ठान अपेक्षित होता है, किन्तु ब्रह्मज्ञान के अनन्तर किसी प्रकार के कर्मानुष्ठान की अपेक्षा नहीं होती। शाब्दज्ञानाभ्यास को छोड़कर नित्य-नैमित्तिक आदि कर्मानुष्ठान का सहभाव निराकृत हो चुका है। जिज्ञास्य-भेद प्रकट किया जाता है—भव्यश्च धर्मो जिज्ञास्यो न ज्ञानकालेऽस्ति । 'भव्यः' इस पद में 'कृत्य' प्रत्यय का अर्थ कर्त्ता है। भावक के व्यापार से जनित होने के कारण ज्ञानकाल में उसकी सत्ता नहीं मानी जा सकती। प्रकृत में जिज्ञास्य है—"इह तु भूतं ब्रह्म जिज्ञास्यं नित्यत्वान्न पुरुषव्यापारतन्त्रम् ।" 'भूतम्' पद का अर्थ है—सत्यम् । सत्य कभी असत् नहीं हो सकता कि उसे सत् बनाने में कर्मानुष्ठान की अपेक्षा होती। दोनों जिज्ञास्य पदार्थों का स्वरूपतः ही भेद नहीं, अपितु ज्ञापक (प्रमाणादि) का भेद भी है—चोदनाप्रवृत्तिभेदाच्च । 'चोदना' पद के द्वारा सामान्य वैदिकशब्दों का ग्रहण किया गया है। चोदना, विधि या प्रवर्तक शब्द वैदिक शब्दों के एकदेशभूत हैं। अतः चोदना पद की लक्षणा समस्त वैदिकशब्दराशि में की गई है। [ "चोदना हि भूतं भवन्तं भविष्यन्तं सूक्ष्मं व्यवहितं विप्रकृष्टमित्येवं जातीयकमर्थं शक्नोत्यव गमयितुम्" (शा० भा० पृ० १३) इस भाष्य की व्याख्या करते हुए श्री कुमारिलभट्ट ने कहा है— "चोदनेत्यब्रवीच्चात्र शब्दमात्रविवक्षया । न हि भूतादिविषयः कश्चिदस्ति विधायकः ॥" (श्लो० वा० पृ० ४७)] प्रवृत्ति-भेद दिखाया जाता है—"या हि चोदना धर्मस्य लक्षणं सा स्वविषये नियुञ्जानैव
आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ८१
नियुञ्जानैव पुरुषमवबोधयति । ब्रह्मचोदना तु पुरुषमवबोधयत्येव केवलम्, अवबो-
भामती
विभजते ॐ या हि चोदना धर्मस्य इति ॐ । आज्ञादीनां पुरुषाभिप्रायभेदानामसम्भवादपौरुषेये वेदे चोदनोपदेशः । अत एवोक्तं “तस्य ज्ञानमुपदेशः” इति । सा च साध्ये च पुरुषव्यापारे भावनायां, तद्विषये च यागादौ, स हि भावनाविषयः, तदधीननिरूपणत्वात् प्रयत्नस्य भावनायाः । षिञ् बन्धन इत्यस्य धातोर्विषयपदव्युत्पत्तेः । भावनायास्तद्द्वारेण च यागादेरपेक्षितोपायतामवगमयन्तो तत्रेच्छोपहारमुखेन पुरुषं नियुञ्जानैव यागादिधर्ममवबोधयति नान्यथा । ब्रह्मचोदना तु पुरुषमवबोधयत्येव केवलं न तु प्रवर्त्तयन्त्यवबोधयति । कुतः, अवबोध्यस्य प्रवृत्तिरहितस्य चोदनाजन्यत्वात् ।
भामती-व्याख्या
पुरुषमवबोधयति, ब्रह्मचोदना पुरुषमवबोधयत्येव केवलम् ।” प्रवर्त्तक वाक्य को चोदना कहते हैं, जैसा कि शबरस्वामी कहते हैं- "चोदनेति क्रियायाः प्रवर्त्तकं वचनमाहुः" (शाबर. पृ. १२) । लोक में वैसे वाक्य तीन प्रकार के होते हैं-(१) आज्ञा, (२) प्रार्थना और (३) अनुज्ञा [जैसे—'गां नय' यह वाक्य जब बड़े पद का कोई व्यक्ति अपने से छोटे पदवाले को कहता है, तब इस वाक्य को आज्ञा वाक्य कहा जाता है, जब उसके विपरीत छोटी पदवी का व्यक्ति अपने से बड़ी पदवीवाले को कहता है, तब उस वाक्य को प्रार्थना वाक्य कहते हैं और उक्त दोनों विधाओं से भिन्न जब किसी कार्य का अनुमोदन या समर्थन मात्र किया जाता है, तब वह वाक्य अनुज्ञा वाक्य माना जाता है ] । पौरुषेय वाक्यों में ही आज्ञादि सम्भावित हैं, वेद में नहीं, अतः वेद में 'चोदना' शब्द का 'उपदेश' अर्थ माना जाता है । इष्ट-साधनता के प्रदर्शक वाक्य को उपदेश कहते हैं, जैसे श्री शबरस्वामी ने “श्येनेन अभिचरन् यजेत”— इस वाक्य के विषय में कहा है— “नैव श्येनादयः कर्त्तव्या विज्ञायन्ते, यो हि हिंसितुमिच्छेत् तस्यायमभ्युपाय इति हि तेषामुपदेशः” (शाबर पृ. १९) । महर्षि जैमिनि भी कहते हैं – “तस्य ज्ञानमुपदेशः” (जै. सू. १।१।५) । यहाँ 'तस्य ज्ञानमुपदेशः' का अर्थ है—धर्मस्य ( ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञापकं ) प्रमाणमुपदेशः ।
वह धर्म-चोदना [ “अग्निहोत्रं जुहुयात्”—इत्यादि वाक्यावली ] अपने साध्यभूत पुरुष-व्यापारात्मक आर्थीभावना और आर्थीभावना के विषयीभूत यागादि में पुरुष को नियुक्त करती हुई यागादि कर्म का ज्ञान कराती है, क्योंकि वह (यागादि कर्म) आर्थी भावना का विषय होता है। आर्थी भावना को नैयायिकों की भाषा में आत्मा का प्रयत्न (कृतिसंज्ञक गुण) कहा जाता है। जैसे ज्ञान का निरूपण विषय के बिना नहीं हो सकता, वैसे ही प्रयत्न-रूप भावना का विषय के बिना निरूपण नहीं हो सकता, अत एव यागादि को भावना का विषय (नियत सम्बन्धी) माना जाता है, जो बन्धनार्थक 'षिञ्' धातु से निष्पन्न हुआ है, यह विगत पृ. ७ पर कहा जा चुका है । “यजेत स्वर्गकामः” इत्यादि चोदना (विधि) वाक्यों का प्रतिपाद्य है— आर्थी भावना, भावना का विषय है—याग, अतः याग में स्वर्गादिरूप इष्ट पदार्थ की साधनता का बोध कराता हुआ उक्त चोदना वाक्य यागानुष्ठान की इच्छा उत्पन्न कर देता है, उस इच्छा से यागादि के सम्पादन में पुरुष की प्रवृत्ति स्वतः हो जाती है [चोदना वाक्य केवल विषय वस्तु का अवबोध ही नहीं कराता, अपितु बोध्यमान पदार्थ में इष्ट-साधनता बताकर प्रवृत्त कर देता है, अत एव चोदना वाक्य को प्रवर्त्तक वाक्य भी कहा जाता है ] । “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”—इत्यादि ब्रह्म-प्रतिपादक वाक्य केवल अज्ञात ब्रह्म का ज्ञानमात्र कराते हैं, विषय वस्तु के सम्पादन में प्रवृत्त नहीं करते, क्योंकि जो किसी प्रकार की प्रवृत्ति का जनक नहीं होता, ऐसा ही ब्रह्मावबोध केवल वेदान्त वाक्यों से उत्पन्न होता है।
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