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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ
६८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

चैतावता ब्रह्मणो नापराधीनप्रकाशता । नहि शब्दज्ञानप्रकाश्यं ब्रह्म स्वयंप्रकाशं न भवति । सर्वोपाधिरहितं हि स्वयंज्योतिरिति गीयते, न तूपहितमपि । यथाहु स्म भगवान् भाष्यकारः ॐ नायमेकान्तेनाविषयः इति ॐ । न चान्तःकरणवृत्तावध्यस्य साक्षात्कारे सर्वोपाधिविनिर्मोकः । तस्यैव तदुपाधेर्विनश्यदवस्थस्य स्वपरोपाधिविरोधिनो विद्यमानत्वात् । अन्यथा चैतन्यच्छायापत्तिं विनाऽन्तःकरणवृत्तेः स्वयमचेतनायाः स्वप्रकाशत्वानुपपत्तौ साक्षात्कारत्वायोगात् । न चानुमितभावितवह्निशाक्षात्कारवत्प्रतिभासत्वेनास्याप्रामाण्यं, तत्र वह्नित्वलक्षणस्य परोक्षत्वात् , इह तु ब्रह्मरूपस्योपाधिकलुषीतस्य जीवस्य प्रागप्यपरोक्षत्वात् । नहि शुद्धबुद्धत्वादयो वस्तुतस्ततोऽतिरिच्यन्ते । जीव एव तु तत्तदुपाधिरहितः शुद्धबुद्धविस्वभावो ब्रह्मेति गीयते । न च तत्तदुपाधिविरहोऽपि ततोऽतिरिच्यते । तस्माद्यथा गान्धर्वशास्त्रार्थज्ञानाभ्यासाहितसंस्कारसचिवश्रोत्रेन्दियेण षड्जादिस्वरग्राममूर्च्छनाभेदमध्यक्षमनुभवति, एवं वेदान्तार्थज्ञानाभ्यासाहितसंस्कारो जीवस्य ब्रह्मभावमन्तःकरणेनेति ।

अन्तःकरणवृत्तौ ब्रह्मसाक्षात्कारे जनयितव्येऽस्ति तदुपासनायाः कर्मापेक्षेति चेत्, न, तस्याः कर्मानुष्ठानेन सहभावाभावेन तत्सहकारित्वानुपपत्तेः । न खलु तत्त्वमसीत्यादिवाक्यान्निर्विकित्सं शुद्ध-


भामती-व्याख्या

ब्रह्मरूपता का आविर्भाव करा सकता है। यह जीव में ब्रह्मरूपता का अनुभव ब्रह्म-स्वभाव नहीं कि उत्पन्न न किया जा सके। उक्त अनुभव अन्तःकरण की एक विशेष ब्रह्म-विषयिणी वृत्ति है। इतने मात्र से ब्रह्म में अस्वप्रकाशता प्रसक्त नहीं होती, क्योंकि शब्द ज्ञान से प्रकाशित ब्रह्म स्वयंप्रकाश नहीं रहता—ऐसी बात नहीं। समस्त उपाधियों से रहित ब्रह्म ही स्वयंप्रकाश माना जाता है, उपाधि-युक्त नहीं, जैसा भगवान् भाष्यकार ने कहा है—"नायमेकान्तेनाविषयः"। अर्थात् यह ब्रह्माभिन्न जीव सर्वथा अविषय ही होता है—ऐसा नहीं, अपितु अहमाकार वृत्ति का विषय माना जाता है। अन्तःकरण की अखण्डाकार वृत्ति में ब्रह्म का साक्षात्कार होने पर ब्रह्म समस्त उपाधियों से निर्मुक्त नहीं होता, क्योंकि अन्ततोगत्वा वह अखण्डाकार वृत्ति ही एक उपाधि होती है, भले ही वह वृत्ति नाशोन्मुख एवं स्वात्मक और परात्मक उपाधियों की विरोधिनी होती है। यदि उक्त वृत्ति को चिदात्मा की उपाधि न माना जाय, तब चैतन्य-तादात्म्यापत्ति के बिना अन्तःकरण की जडरूप वृत्ति में प्रकाशकत्व ही न बनेगा। यह जो कहा गया कि अनुमित और भावित अग्नि के साक्षात्कार के समान ही उक्त ब्रह्म-साक्षात्कार भी एक अप्रमाणात्मक प्रतिभास ज्ञानमात्र है, वह उचित नहीं, क्योंकि अनुमान-स्थल पर अग्नि का प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं, अपितु परोक्ष ही होता है, किन्तु जीव कर्तृत्ववादि उपाधियों से कलुषित होने पर भी वस्तुतः ब्रह्मरूपेण अपरोक्ष होता है। शुद्धत्व, बुद्धत्वादि धर्म चैतन्य तत्त्व से वस्तुतः भिन्न नहीं होते, जीव ही सभी उपाधियों से रहित होकर शुद्ध-बुद्धादिरूप ब्रह्म होता है। उपाधियों का अभाव भी चैतन्य से भिन्न नहीं होता, अतः जैस गन्धर्व-शास्त्र से जनित ज्ञान के अभ्यास द्वारा आहित संस्कारों से युक्त श्रोत्र इन्द्रिय (१) निषाद, (२) ऋषभ, (३) गान्धार, (४) षड्ज, (५) मध्यम, (६) धैवत और (७) पञ्चम—इन सात स्वरों के भेद-प्रभेद-समूह और उसकी मूर्च्छना (उतार-चढ़ाव) का प्रत्यक्ष अनुभव कर लेता है। वैसे ही वेदान्त-वाक्यार्थ ज्ञान के अभ्यास से जनित संस्कार वाला अन्तःकरण जीव में ब्रह्मभाव का साक्षात्कार कर लेता है। उक्त अन्तःकरण की वृत्तिरूप साक्षात्कार के उत्पादन में कर्मानुष्ठान की अपेक्षा होती है।

समाधान—उक्त ब्रह्म भावना में कर्मानुष्ठान का सहभाव सम्भव न होने के कारण कर्म-सहकारित्व उपपन्न नहीं हो सकता, क्योंकि "तत्त्वमसि"—इत्यादि वाक्यों को

आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६९


भामती

बुद्धोदासीनस्वभावमकत्त्र्‌त्वाद्युपेतमपेतब्राह्मणत्त्वादिजातिं देहाद्यतिरिक्तमेकमात्मानं प्रतिपद्यमानः कर्मस्वधिकारमवबोद्धुमर्हति । अनहंज्ञः कथं कर्त्ता वाऽधिकृतो वा ? यद्युच्येत निश्चितेऽपि तत्त्वे विपर्यासनिबन्धनो व्यवहारोऽनुवर्त्तमानो दृश्यते, यथा गुडस्य माधुर्य्यविनिश्चयेऽपि पित्तोपहतेन्द्रियाणां तिक्तावभासानुवृत्तिः, आस्वाद्य थूत्कृत्य त्यागात् । तस्मादविद्यासंस्कारानुवृत्त्या कर्मानुष्ठानं, तेन च विद्यासहकारिणा तत्समुच्छेद उपपत्स्यते । न च कर्माविद्यात्मकं कथमविद्यामुच्छिनत्ति, कर्मणो वा तदुच्छेदकस्य कुत उच्छेद इति वाच्यम्, सजातीयस्वपरविरोधिनां भावानां बहुलमुपलब्धेः । यथा पयः पयोऽन्तरं जरयति, स्वयं च जीर्य्यति । यथा विषं विषान्तरं शमयति, स्वयं च शाम्यति । यथा वा कतकरजो रजोऽन्तराविले पयसि प्रक्षिप्तं रजोऽन्तराणि भिन्दत् स्वयमाप भिद्यमानमनाविलं पाथः करोति । एवं कर्माविद्यात्मकमपि अविद्यन्तराणि अपगमयत् स्वयमप्यपगच्छतीति ॥

अत्रोच्यते—सत्यं सदेव सोम्येवमित्युपक्रमात्तत्त्वमसीत्यन्तात् शब्दाद् ब्रह्ममीमांसोपकरणादसकृदभ्यस्ताद् निर्विचिकित्सेनाद्यविद्योपादानदेहाद्यतिरिक्तप्रत्यगात्मतत्त्वावबोधे जातेऽपि अविद्यासंस्कारानुवृत्तावनुवर्त्तन्ते सांसारिकाः प्रत्ययास्तद्व्यवहाराश्च, तथापि तान्पश्यं व्यवहारप्रत्ययान् मिथ्येति मन्य-


भामती-व्याख्या

सुन कर जो पुरुष अपने को असन्दिग्ध रूप से शुद्ध, बुद्ध और उदासीन, कर्तृत्व, भोक्तृत्वादि धर्मों से रहित, देहादि से भिन्न जान लेता है, वह पुरुष कर्मानुष्ठान का अधिकारी अपने को कभी नहीं मान सकता। जिसका कर्म में अधिकार नहीं, वह कभी कर्मों का कर्त्ता-भोक्ता नहीं हो सकता ।

शङ्का—यदि कहा जाय कि जीव में ब्रह्मरूपता का निश्चय हो जाने पर भी अध्यास-प्रयुक्त व्यवहार की अनुवृत्ति वैसे ही देखी जाती है, जैसे गुड़ में माधुर्य का निश्चय हो जाने पर भी पित्तरोग से दूषित इन्द्रिय वाले व्यक्ति को गुड़गत तिक्तता की अनुवृत्ति होती है, क्योंकि वह गुड़ का स्वाद लेता हुआ उसका थूक देता है। अतः अविद्या-संस्कारों की अनुवृत्ति से कर्मानुष्ठान सम्भव हो जाता है, इस प्रकार कर्म-सहकृत विद्या के द्वारा अविद्या का उच्छेद हो जाता है। कर्म स्वयं अविद्यात्मक है, वह अविद्या का उच्छेद क्योंकर कर सकेगा ? अविद्या का जो कर्म उच्छेदक है, उस कर्म का उच्छेद किससे होगा ? तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसे बहुत-से पदार्थ देखे जाते हैं, जो स्व और पर—दोनों के निवर्तक होते हैं, जैसे दुग्धपान प्रथमतः पीत दूध को पचाता हुआ स्वयं पच जाता है। या एक विष को उतारने के लिए दिया गया अन्य विष पहले के विष को शान्त करता हुआ स्वयं भी शान्त हो जाता है। अथवा कतक नामक फल का चूर्ण पानी में डालने पर अन्य धूलि-कणों को नीचे बिठाता हुआ स्वयं भी बैठ जाता है। इसी प्रकार कर्म स्वयं अविद्यारूप होने पर भी अविद्या का नाश करता हुआ स्वयं अपना भी नाश कर डालता है [आचार्य मण्डन मिश्र भी कहते हैं—"यथा रजःसम्पर्ककलुषितमुदकं द्रव्यविशेषचूर्णरजः प्रक्षिप्तं रजोऽन्तराणि संहरत् स्वयमपि संश्लिष्यमाणं स्वच्छं स्वरूपावस्थामुपनेयति, एवमेव श्रवणादिभिर्भेददर्शने प्रविलीयमाने विशेषाभावात् तद्गते च भेद, स्वच्छे परिशुद्धे स्वरूपे जीवोऽवतिष्ठते । यथा पयः पयो जरयति स्वयं च जीर्य्यति । यथा च विषं विषान्तरं शमयति स्वयं च शाम्यति" (ब्र. सि. पृ. १२–१३)] ।

समाधान—यह सत्य है कि "सदेव सोम्येदम" (छां. उ. ६।२।१) यहाँ से लेकर "तत्त्वमसि" (छां. उ. ६।२।१) यहाँ तक का वेदान्त-प्रकरण जब ब्रह्ममीमांसारूप तर्क से उपोट्ठलित होकर असंशयात्मक, अनादि अविद्यारूप उपादान के उपादेयभूत देहादि से भिन्न प्रत्यगात्मा का तत्त्वावबोध उत्पन्न कर देता है। तब भी अविद्या-जनित संस्कारों की अनुवृत्ति

७०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

मानी विद्वान्न श्रद्धत्ते पित्तोपहतेन्द्रिय इव गुडं थूत्कृत्य त्यजन्नपि तस्य तिक्तताम्। तथा चायं क्रिया-कर्तृकरणेतिकर्त्तव्यताफलप्रपञ्चमतात्त्विकं विनिश्चिन्वन् कथमधिकृतो नाम ? विदुषो ह्यधिकारोऽन्यथा पशु-शूद्रादीनामप्यधिकारो दुर्वारः स्यात्। क्रियाकर्त्रादिस्वरूपविभागं च विद्वस्यमान इह विद्वानभिमतः कर्म-काण्डे। अत एव भगवानविद्वद्विषयत्वं शास्त्रस्य वर्णयाम्बभूव भाष्यकारः। तस्माद्यथा राजजातीयाभि-मानकर्त्तृके राजसूये न विप्रवैश्यजातीयाभिमानिनोरधिकारः, एवं द्विजातिकर्त्तृक्रियाकरणादिविभा-गाभिमानिकर्त्तृके कर्मणि न तदनभिमानिनोऽधिकारः। न चानधिकृतेन समर्थेनापि कृतं वैदिकं कर्म फलाय कल्पते वैश्यस्तोम इव ब्राह्मणराजन्याभ्याम्। तेन दृष्टार्थेषु कर्मसु शक्तः प्रवर्त्तमानः प्राप्नोतु फलं दृष्टत्वात्। अदृष्टार्थेषु तु शास्त्रैकसमधिगम्यं फलमनधिकारिणि न युज्यत इति नोपासनायाः कार्ये कर्मापेक्षा।

स्यादेतत्—मनुष्याभिमानवदधिकारिके कर्मणि विहिते यथा तदभिमानरहितस्यानधिकारः। एवं निषेधविधयोऽपि मनुष्याधिकारा इति तदभिमानरहितस्तेष्वपि नाधिक्रियेत पश्वादिवत्। तथा चायं


भामती-व्याख्या

से संस्कारिक प्रतीतियों और व्यवहारों की अनुवृत्ति देखी जाती है। तथापि उन प्रतीतियों और व्यवहारों को अपने आचरण में लाता हुआ भी विद्वान् पुरुष उन्हें मिथ्या मानता है, उन पर वैसे ही श्रद्धा नहीं रखता, जैसे कि पित्तरोग से आक्रान्त व्यक्ति गुड़ का स्वाद लेकर थूकता हुआ भी उसकी तिक्तता पर विश्वास नहीं करता। अतः क्रिया, कर्त्ता, करण, इति-कर्तव्यता और फलादि प्रपञ्च अतात्त्विक है—ऐसा निश्चय कर लेनेवाला व्यक्ति कर्म-काण्ड का अधिकारी क्योंकर माना जा सकेगा ? क्योंकि क्रिया, कर्त्ता आदि प्रपञ्च सत्य है—इस प्रकार का निश्चय रखनेवाले (विद्वान्) पुरुष का ही कर्म में अधिकार माना जाता है। अन्यथा (वैसे ज्ञान की अपेक्षा न होने पर) पशु और शूद्रादि अज्ञानी प्राणियों का भी कर्म में अधिकार प्राप्त हो जायगा। यह एक वास्तविकता है कि क्रिया और कर्त्ता आदि विभाग का जानकार व्यक्ति ही कर्मकाण्ड का अधिकारी होता है। अत एव भगवान् भाष्यकार ने क्रिया, कर्त्ता आदि को वास्तविक समझनेवाले अविद्वान् (वस्तुतत्त्वानभिज्ञ) व्यक्ति को ही शास्त्र का अधिकारी कहा है। अतः जैसे क्षत्रियत्व-जाति का अभिमान रखनेवाले व्यक्ति के द्वारा सम्पादनीय 'राजसूय' कर्म में ब्राह्मणत्व या वैश्यत्व जाति के अभिमानवाले पुरुष का अधिकार नहीं माना जाता, वैसे ही द्विजाति क्रिया, कर्त्ता आदि विभाग के अभिमानी द्विजाति (केवल ब्रह्म, क्षत्रिय और वैश्य) के द्वारा सम्पादनीय वैदिक कर्मों में पशु और शूद्रादि का अधिकार नहीं माना जा सकता। अनधिकारी व्यक्ति के द्वारा किए जानेवाले वैदिक कर्म वैसे ही निष्फल माने जाते हैं, जैसे केवल वैश्य-द्वारा कर्त्तव्य वैश्यस्तोम कर्म यदि ब्राह्मण और क्षत्रिय के द्वारा किया जाता है, तब वह निष्फल ही होता है। दृष्टफलक कृषि आदि कर्मों में कोई भी समर्थ व्यक्ति प्रवृत्त होकर फल प्राप्त कर सकता है, किन्तु शास्त्रैकसमधि-गम्य स्वर्गादि अदृष्ट फल के जनकीभूत कर्मों का फल किसी अनधिकारी व्यक्ति को कभी नहीं प्राप्त हो सकता। फलतः उपासना-साध्य साक्षात्काररूप फल के सम्पादन में कर्मानुष्ठान की अपेक्षा नहीं।

शङ्का—जैसे मनुष्याधिकारिक विहित कर्मों में मनुष्यत्वाभिमान-रहित प्राणियों का अधिकार नहीं, वैसे ही "न हिंस्यात्"—इत्यादि निषेध वाक्यों में भी मनुष्य ही अधिकारी माना जाता है, अतः मनुष्यत्वाभिमान-रहित व्यक्ति का वैसे ही अधिकार नहीं होना चाहिए, जैसे पशु-पक्षी आदि का। तब तो मनुष्यत्वाभिमान-रहित तत्त्ववेत्ता पुरुष को हिंसादि निषिद्ध

आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७१


भामती

निषिद्धमनुतिष्ठन् न प्रत्यवेयात् तिर्यगादिवदिति भिन्नकर्मतापातः । मैवम्, न खल्वयं सर्वथा मनुष्या- भिमानरहितः, किं त्वविद्यासंस्कारानुवृत्त्याऽस्य मात्रया तदभिमानोऽनुवर्त्तते । अनुवर्त्तमानं च मिथ्येति मन्यमानो न श्रद्धत्त इत्युक्तम् । किमतो यद्येवम् ? एतदतो भवति—विधिषु श्राद्धोऽधिकारी नाश्राद्धः । ततश्च मनुष्याद्यभिमाने नाशद्दधानो न विधिशास्त्रेणाधिक्रियते । तथा च स्मृतिरश्रद्धया हुतं दत्तमित्या- दिका । निषेधशास्त्रं तु न श्रद्धामपेक्षते, अपि तु निषिध्यमानक्रियोन्मुखो नर इत्येव प्रवर्त्तते । तथा च सांसारिक इव श्रद्धावगतब्रह्मतत्त्वोऽपि निषेधमतिक्रम्य प्रवर्त्तमानः प्रत्यवैतीति न भिन्नकर्मदर्शनाभ्युप- गमः । तस्मान्नोपासनायाः कार्ये कर्मापेक्षा । अत एव नोपासनोत्पत्तावपि निर्विचिकित्सशाब्दज्ञानोत्पत्त्यु- त्तरकालमनधिकारः कर्मणीत्युक्तम् । तथा च श्रुतिः—"न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्व- मानशुः” ।

तत्किमिदानीमनुपयोग एव सर्वथैव कर्मणाम् ? तथा च "विविदिषन्ति यज्ञेन” इत्याद्याः श्रुतयो विरुद्धयेरन् । न, आरादुपकारकत्वात् कर्मणां यज्ञादीनाम् । तथाहि—'तमेतमात्मानं वेदानुवचनेन' नित्य- स्वाध्यायेन 'ब्राह्मणा विविदिषन्ति' वेदितुमिच्छन्ति, न तु विदन्ति, वस्तुतः प्रधानस्यापि वेदनस्य प्रकृत्य-


भामती-व्याख्या

कर्मों का अनुष्ठान करने पर वैसे ही प्रत्यवाय ( पापादि ) नहीं होना चाहिए, जैसे पशु-पक्षी आदि तिर्यक् ( मेरुदण्ड को धरातल के समानान्तर रखनेवाले ) प्राणियों को । इस प्रकार एक ही कर्म किसी के लिए फलप्रद होता है और किसी के लिए नहीं । एवं किसी के लिए न्यून और किसी के लिए अधिक फल का वैसे ही समर्पक माना जायेगा जैसे ही एक ही स्वर्ग के लिए विहित अग्निहोत्र एवं ज्योतिष्टोम हैं तथापि इन दोनों कर्मों की गुरुता और लघुता को देखकर फल में भी वैसे ही मान-दण्ड की कल्पना की जाती है । इस प्रकार भिन्नकर्मता का प्रसङ्ग उपस्थित होता है ।

समाधान—तत्त्ववेत्ता पुरुष सर्वथा मनुष्यत्वाभिमान से निर्लिप्त नहीं माना जाता, अपिनु लेशाविद्या या अविद्या के अनुवर्तमान संस्कारों के आधार पर वैसा ही व्यावहारिक अभिमान भी रखता है भले ही उसे यह मिथ्या समझता हो ( उस पर इसकी श्रद्धा न हो ) । श्रद्धारहित होने के कारण विहितकर्मों में इसका अधिकार नहीं माना जाता । बिना श्रद्धा के किया हुआ कर्म फलप्रद नहीं होता जैसा कि कहा गया है—

“अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥” ( गी० १७।२८ )

किन्तु निषेध-शास्त्रों की गति उसके विपरीत है । श्रद्धा या अश्रद्धा की वहाँ अपेक्षा नहीं होती, अपिनु निषिद्धाचरणोन्मुख व्यक्ति ही उनका अधिकारी होता है । अतः तत्त्ववेत्ता पुरुष यदि निषिद्धाचरण करता है, तब उसे अवश्य प्रत्यवाय वैसे ही होगा जैसे कि एक सांसारिक व्यक्ति को । अतः विधिनिषेधशास्त्रों में किसी प्रकार का पक्षपात या भिन्नकर्मता प्रसक्त नहीं होती । फलतः उपासना के कार्य में कर्म की अपेक्षा किसी प्रकार नहीं । उपासना की उत्पत्ति में भी कर्म का उपयोग नहीं क्योंकि असंशयात्मक तत्त्वविषयक शाब्दज्ञानमात्र हो जाने के अनन्तर कर्मानुष्ठान का अधिकार समाप्त हो जाता है । श्रुति कहती है—"न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः” ( महाना० उ० ८।१४) । तब क्या वेद-विहित कर्म सर्वथा अनुपयुक्त हैं ? यदि हाँ, “तब विविदिषन्ति यज्ञेन” इत्यादि श्रुतियों का विरोध उपस्थित होता है । इस प्रश्न का समाधान आचार्यों ने ऐसा किया है कि कर्मानुष्ठान का साक्षात् तत्त्वज्ञान में उपयोग नहीं किन्तु परम्परया उपयोग का प्रतिपादन किया गया है । “विविदिषन्ति

७२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

र्थतया शब्दतो गुणत्वादिच्छायाश्च प्रत्ययार्थतया प्राधान्यात्। प्रधानेन च कार्यसम्प्रत्ययात्। नहि राजपुरुषमानयेत्युक्ते वस्तुतः प्रधानमपि राजा पुरुषविशेषणतया शब्दत उपसर्जनमानीयतेऽपि तु पुरुष एव। शब्दतस्तस्य प्राधान्यात्। एवं वेदानुवचनस्येव यज्ञस्यापीच्छासाधनतया विधानम्। एवं तपसोऽ-नाशकस्य, कामानशनमेव तपः, हितमितमेध्याशिनो हि ब्रह्मणि विविदिषा भवति, न तु सर्वथाऽनश्नतो, मरणात्। नापि चान्द्रायणादितपःशीलस्य, धातुवैषम्यापत्तेः। एतानि च नित्यान्युपात्तदुरितनिबर्हणेन पुरुषं संस्कुर्वन्ति। तथा च श्रुतिः—"स ह वा आत्मयाजी यो वेद इदं मेऽनेनाङ्गं संस्क्रियत इदं मेऽने-नाङ्गमपचीयते” इति। अनेनेति प्रकृतं यज्ञादि परामृशति। स्मृतिश्च "यस्यैतेऽष्टाचत्वारिंशत्संस्काराः" इति। नित्यनैमित्तिकानुष्ठानप्रक्षीणकल्मषस्य च विशुद्धसत्त्वस्याविदुष एव उत्पन्नविविदिषस्य ज्ञानोत्पत्तिं दर्शयत्याथर्वणी श्रुतिः— "विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यति निष्कलं ध्यायमानः" इति। स्मृतिश्च—"ज्ञान-मुत्पद्यते पुंसां क्षयात् पापस्य कर्मणः" इत्यादिका।

क्लृप्तेनैव च नित्यानां कर्मणां नित्ये हि तेनोपात्तदुरितनिबर्हणेन पुरुषसंस्कारेण ज्ञानोत्पत्तावङ्ग-भावोपपत्तौ न संयोगपृथक्त्वेन साक्षादङ्गभावो युक्तः, कल्पनागौरवापत्तेः। तथाहि—नित्यकर्मानुष्ठाना-द्धर्मोत्पादः, ततः पाप्मा निवर्त्तते, स ह्यनित्याशुचिदुःखरूपे संसारे नित्यशुचिसुखख्यातिलक्षणेन विपर्य्यासेन


भामती-व्याख्या

यज्ञेन"—इस श्रुति में भी नित्यस्वाध्यायात्मक वेदानुवचन के द्वारा अवगत आत्मा के विशेष स्वरूप की विविदिषा कर्मानुष्ठान का फल माना जाता है, वेदन या तत्त्वज्ञान नहीं। यद्यपि वेदन तात्त्विकदृष्टि से प्रधान है तथापि 'सन्' प्रत्यय की प्रकृति का अर्थ होने के कारण अप्रधान माना जाता है और प्रधान का ही अन्वय अन्य पदार्थों के साथ होता है जैसे कि 'राजपुरुषमानय'—यहाँ पर पुरुष की अपेक्षा राजा प्रधान है तथापि आनयन आदि के साथ उसका अन्वय वाँछनीय नहीं, क्योंकि शब्दतः राजा की पुरुषविशेषणत्वेन उपस्थिति है स्वतन्त्रतया नहीं। पुरुषपदार्थ प्रधान होने के कारण आनयनादि के साथ अन्वित होता है। अतः वेदानुवचन के समान यज्ञादि कर्मों का भी वेदनविषयक इच्छा की साधनता के रूप में विधान माना जाता है। इसी प्रकार तप का भी इच्छा में विनियोग होता है। यथाकाम अनशन ( यथेच्छ भोजनादि का ग्रहण न कर हित, मित और मेध्य पदार्थों का स्वल्पमात्रा में ग्रहण ) तप कहलाता है। उसके द्वारा ही विविदिषा उत्पन्न होती है, सर्वथा अनशन से नहीं क्योंकि सर्वथा आहार-त्याग से प्राणियों का मरण हो जाता है। चान्द्रायण आदि क्लिष्ट तपों का भी विविदिषा में उपयोग नहीं, क्योंकि उनसे शरीरगत धातुवैषम्य हो जाने से मानसचिन्तन भी अस्त-व्यस्त हो जाता है। नित्यकर्म प्रस्तुत-दुरित की निवृत्ति के द्वारा पुरुष को संस्कृत करते हैं, जैसा कि श्रुति कहती है—"स ह वा आत्मयाजी यो वेद इदं मेऽनेनाऽङ्गं संस्क्रियत इदं मेऽनेनाऽङ्गमपचीयते” (शत०ब्रा० ११।२।६।१३)। इस श्रुति में 'अनेन' पद के द्वारा प्रकृत यज्ञादि कर्मों का ग्रहण किया गया है। स्मृतिकार भी कहते हैं—'यस्यैतेऽ-ष्टाचत्वारिंशत्संस्काराः' ( गौतमस्मृ० ८) । नित्य-नैमित्तिक-कर्मानुष्ठान के द्वारा जिसका पाप निवृत्त हो गया है किन्तु तत्त्वसाक्षात्कार नहीं हुआ ऐसे अधिकारी पुरुष को विविदिषा और उसके पश्चात् ज्ञान का लाभ श्रुति कहती है—"विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यति निष्कलं ध्यायमानः” ( मुण्डक० ३।१।८)। नित्यकर्मों का पुरुषगत-दुरित-निवृत्तिरूप संस्कार के द्वारा ज्ञान की उत्पत्ति में जब उपयोग बन जाता है, तब संयोगपृथक्त्व-न्याय के द्वारा साक्षात् ज्ञान में नित्यकर्म का उपयोग मानना उचित नहीं। अतः यही क्रम सर्वथा उचित प्रतीत होता है कि नित्यकर्मानुष्ठान से धर्म की उत्पत्ति और उससे उस पाप की निवृत्ति होती है

आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७३

भामती

चित्तसत्त्वं मलिनयति, अतः पापनिवृत्तौ प्रत्यक्षोपपत्तिद्वारापावरणे सति प्रत्यक्षोपपत्तिभ्यां संसारस्या- नित्याशुचिदुःखरूपतामप्रत्यवहमवबुध्यते, ततोऽस्यास्मिन्ननभिरतिसंज्ञं वैराग्यमुपजायते, ततस्तज्जिहासोपा- वर्त्तते, ततो हानोपायं पर्य्येषते, पर्य्येषमाणश्चात्मतत्त्वज्ञानमस्योपाय इत्युपश्रुत्य तज्जिज्ञासते, ततः श्रवणा- दिक्रमेण तज्जानातीत्यारादुपकारकत्वं तत्त्वज्ञानोत्पादं प्रति चित्तसत्त्वशुद्ध्या कर्मणां युक्तम्। इममेवार्थम- नुवदति भगवद्गीता— "आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥" एवं चाननुष्ठितकर्मापि प्राग्भवीयकर्मवशाद्यो विशुद्धसत्त्वः संसारासारतावर्शनेन निष्पन्नवैराग्यः कृतं तस्य कर्मानुष्ठानेन वैराग्योत्पादोपयोगिना, प्राग्भवीयकर्मानुष्ठानादेव तत्सिद्धेः। इममेव च पुरुष- धौरेयमेवमधिकृत्य प्रवृत्ते श्रुतिः—'यदि वेतरथा ब्रह्मचर्य्यादेव प्रव्रजेत्' इति। तदिदमुक्तम् ⁕ कर्माव- बोधात् प्रागप्यधीतवेदान्तस्य ब्रह्मजिज्ञासोपपत्तेः इति ⁕ । अत एव न ब्रह्मचारिण ऋर्णानि सन्ति येन

भामती-व्याख्या

जिससे चित्तगत सत्त्व मलिन होकर अनित्य, अशुचि और दुःखरूप प्रपञ्च में नित्य, शुचि और सुखरूपता का भान करा देता है। कथित पाप की निवृत्ति हो जाने पर प्रत्यक्ष और उपपत्ति का द्वार उद्घाटित हो जाता है। और दृश्यमान प्रपञ्च में अनित्यत्वादि का ज्ञान प्रत्यक्षप्रमाण के द्वारा एवं अदृष्ट जगत् में अनित्यत्वादि का बोध (उपपत्ति या युक्ति के द्वारा उपपन्न) हो जाता है। उसके पश्चात् संसार से अनभिरतिसंज्ञक वैराग्य हो जाता है। उस वैराग्य के आधार पर संसार की जिहासा (त्याग करने की इच्छा) समुद्भूत हो जाती है और संसार के सर्वथा परिहार का मार्ग पुरुष खोजने लगता है। आत्मतत्त्वसाक्षात्कार ही कर्तृत्वादि प्रपञ्च के परिहाण का उपाय है—ऐसा सुनकर उसकी जिज्ञासा उत्पन्न हो जाती है और आत्मा के श्रवण-मननादि में प्रवृत्त होकर आत्मज्ञान का लाभ कर लेता है। इस प्रकार चित्तशुद्धि के द्वारा कर्मों का परम्परया उपयोग भगवान् भी बताते हैं—

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ (गी० ६।३)

[अन्तःकरणशुद्धिरूप वैराग्य के पद पर आरुरुक्षु (आरूढ़ होने के अभिलाषी) पुरुष के लिए कर्मानुष्ठान की उपयोगिता होती है अन्तःकरण-शुद्धिरूप योग पर आरूढ़ पुरुष का कर्त्तव्य केवल शम (संन्यास) रह जाता है]। जिस व्यक्ति ने इस जन्म में कर्मानुष्ठान नहीं किया, पूर्वजन्मोपार्जित धर्म के द्वारा ही जिस का बुद्धि-सत्त्व शुद्ध हो गया है, संसार की असारता का भान एवं वैराग्य उत्पन्न हो गया है, उस व्यक्ति के लिए कर्मानुष्ठान की आवश्यकता नहीं, क्योंकि जिस वैराग्य की उत्पत्ति में कर्मानुष्ठान का उपयोग होता है, उसका लाभ तो उसे पहले ही हो चुका है। ऐसे ही विरक्त-शिरोमणि को उद्देश्य करके श्रुति कहती है—"यदि वेतरथा ब्रह्मचर्य्यादेव प्रव्रजेत् [नारदपरिव्राजकोपनिषत् (तृतीयोपदेश) में कहा है—"ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद्, गृहाद् वनीभूत्वा प्रव्रजेद्, यदि वेतरथा ब्रह्मचर्या- देव प्रव्रजेद् गृहाद्वा वनाद्वा, यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्।" सारांश यह है कि वैराग्य पर ही संन्यास निर्भर है, जब भी वैराग्य उत्पन्न हो जाय तब ही परिव्रज्या ग्रहण की जा सकती है]। इसी भाव की अभिव्यक्ति भाष्यकार ने की है—"कर्मावबोधात् प्रागप्यधीतवेदा- न्तस्य ब्रह्मजिज्ञासोपपत्तेः"। इससे यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मचारी पर कथित जन्म-सिद्ध तीन ऋण नहीं होते, अतः उन ऋणों का उद्धार करने के लिए कर्मानुष्ठान अपेक्षित नहीं। यदि ब्रह्मचारी तीन ऋणों का ऋणी नहीं, तब “जायमानो वै ब्राह्मणः त्रिभिऋ णवाजायते”

१०

७४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

तदपाकरणार्थं कर्मानुतिष्ठेत् । एतदनुरोधाच्च 'जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिर्ऋणवान् जायते' इति गृहस्थः सम्पद्यमान इति व्याख्येयम् । अन्यथा 'यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव' इति श्रुतिर्विरुध्येत । गृहस्थस्यापि च ऋणापाकरणं सत्त्वशुद्ध्यर्थमेव । जरामर्यवादो भस्मान्ततावादोऽन्त्येष्ट्यश्च कर्मजडानविदुषः प्रति, न स्वात्मतत्त्वपण्डितान् । तस्मात्तस्यानन्तर्यमथशब्दार्थो यद्विना ब्रह्मजिज्ञासा न भवति यस्मिंस्तु सति भवन्ती भवत्येव । न चेत्थं कर्मावबोधः । तस्मान्न कर्मावबोधानन्तर्यमथशब्दार्थ इति सर्वमवदातम् ।

स्यादेतत्—मा भूदग्निहोत्रयवागूपाकवदार्थः क्रमः, श्रौतस्तु भविष्यति, 'गृही भूत्वा वनी भवेत्'

भामती-व्याख्या

(तै० सं० ३।१०) इस श्रुति की क्या व्यवस्था होगी ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि उक्त श्रुति का 'गृहस्थः सम्पद्यमानः'—ऐसा वाक्यशेष लगाकर यह अर्थ करना होगा कि 'जो ब्राह्मण गृहस्थाश्रम में प्रवेश करनेवाला है, उस पर ही वे तीन ऋण होते हैं, सब पर नहीं'। अन्यथा (ब्राह्मणमात्र को ऋणी मानने पर) "यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्"—इस श्रुति का विरोध उपस्थित होता है । गृहस्थ पुरुष के लिए भी जो कथित ऋणों की निवृत्ति के लिए कर्मानुष्ठान विहित है, उसका भी फल चित्तगत सत्त्व गुण की शुद्धि ही है । जरामर्यवाद [ जरामर्यं वा एतत्सत्रं यदग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ च । जरया ह वा एष एताभ्यां निर्मुच्यते मृत्युना च" (तं० आ० १०।६४।१)। यहाँ पर श्री सायणाचार्य ने "जरामर्यम्' का अर्थ 'जरामरणावधिम्' किया है, अर्थात् अग्निहोत्र और दर्शपूर्णमास नाम के दोनों कर्म आहिताग्नि पुरुष को जीवनपर्यन्त करना है, अतः यह वह सत्र कर्म है, जो कि जरा-मरण-पर्यन्त किया जाता है ], भस्मान्ततावाद [ जिस व्यक्ति ने अग्न्याधान नहीं किया, वह यावज्जीवन सन्ध्या-वन्दनादि नित्य कर्मों का सम्पादन करता है और प्राणान्त हो जाने पर उसके शरीर का दाहसंस्कार (भस्मान्त) सम्पन्न किया जाता है ] और अन्त्येष्टि संस्कार [ किसी अग्निहोत्री पुरुष के मर जाने पर उसकी अन्तिम इष्टि इस प्रकार सम्पन्न की जाती है कि चिता में उसके शव को सीधा लिटाकर उसके मुख में घृत-पूर्ण स्रुक् (जुहू आदि ), नासिका में स्रुवा, अधर अरणी को पैरों पर उत्तराणि को छाती पर, शूर्प (सूप) को वाम पार्श्व में चमस को दक्षिण पार्श्व में, मूसल और उलूखल को दोनों जाँघों के बीच में रखकर उसकी अग्नि से दाहसंस्कार किया जाता है—

तत्रोत्तानं निपात्यैनं दक्षिणशिरस्कं मुखे ।
आज्यपूर्णां स्रुचं दद्याद् दक्षिणाग्रां नासि स्रुवम् ॥
पादयोरधरां प्राचीमरणीमुरसीतराम् ।
पार्श्वयोः शूर्पंचमसे सव्यदक्षिणयोः क्रमात् ॥
मुसलेन सह न्युब्जमन्तरूरुवोरुलूखलम् ।
चात्रे विलीकमत्रैवमनश्रुनयनो विभोः ॥ (कात्या० स्मृ० ९)]

इत्यादि कर्मों का विधान कर्मकाण्ड के अन्धश्रद्धालु अज्ञानी व्यक्तियों के लिए ही है, आत्मतत्त्व के पण्डित पुरुषों के लिए नहीं, इस प्रकार कर्मावबोधानन्तर्य 'अथ' शब्द का अर्थ नहीं हो सकता, अतः ब्रह्म-जिज्ञासा में उस पदार्थ का आनन्तर्य प्रतिपादित करना होगा कि जिसके बिना ब्रह्म-जिज्ञासा सम्भव न होकर जिसके सम्पन्न होने पर ही हो सके । कर्माबोध ऐसा नहीं कि जिसके बिना ब्रह्म-जिज्ञासा न हो सके, अतः कर्मावबोध का आनन्तर्य कभी भी 'अथ' शब्द का अर्थ नहीं हो सकता ।

शङ्का

आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७५

जिज्ञासोपपत्तेः । यथा च हृदयाद्यवदानानामानन्तर्यनियमः, क्रमस्य विवक्षितत्वात्

भामती

'वनी भूत्वा प्रव्रजेद्' इति जाबालश्रुतिर्गाहस्थ्येन हि यज्ञाद्यनुष्ठानं सूचयति । स्मरन्ति च—

“अधीत्य विधिवद् वेदान् पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः ।
इष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत् ॥”

निन्दन्ति च—

"अनधीत्य द्विजो वेदाननुत्पाद्य तथात्मजान् ।
अनिष्ट्वा चैव यज्ञैश्च मोक्षमिच्छन् व्रजत्यधः ॥” इति ।

इत्यत आह ॐ यथा च हृदयाद्यवदानानामानन्तर्यनियमः ॐ । कुतः 'हृदयस्याग्रेऽवद्यति अथ जिह्वाया अथ वक्षसः' इत्यथाग्रशब्दाभ्यां क्रमस्य विवक्षितत्वात्, न तथेह क्रमो विवक्षितः, श्रुत्या


भामती-व्याख्या

कहा है—“अग्निहोत्रं जुहोतीति पूर्वमाम्नातम्, ओदनं पचतीति पश्चात् । अर्थात् विपरीत: कार्य:।” पकी हुई यवागू (दलिया) अथवा पके चावल अग्निहोत्र कर्म की हवि होते हैं, अतः ] कर्मानुष्ठान से पश्चात्पठित यवागू-पाक प्रयोजन (साध्य-साधनभाव) क्रम को लेकर पहले किया जाता है और उसके अनन्तर अग्निहोत्र कर्म का अनुष्ठान किया जाता है। ऐसे ही वैदिक वाक्यों से अर्थावबोध न होने पर ब्रह्मजिज्ञासा सम्भव नहीं, अतः कर्मविबोध या वेदार्थविबोध के अनन्तर ब्रह्म-जिज्ञासा का जो अर्थक्रम रखा जाता है, वह यदि अर्थ (प्रयोजन या साध्य-साधनभाव) के आधार पर नहीं माना जा सकता, तब श्रुति (आनन्तर्यार्थक 'क्त्वा' आदि शब्दों) के आधार पर वह क्रम वैसे ही मानना होगा, जैसा कि “वेदं कृत्वा वेदीं करोति” इत्यादि स्थलों पर माना जाता है, क्योंकि यहाँ भी “गृही भूत्वा वनी-भवेद्, वनीभूत्वा प्रव्रजेत्” (जाबालो० ४) इस प्रकार जाबालोपनिषत् में 'गृहीभूत्वा'—इस 'क्त्वा' प्रत्ययरूप श्रुति के द्वारा गृहस्थ आश्रम का पालन करने के पश्चात् परिव्रज्या का क्रम प्रतिपादित है। 'गृही' पद के द्वारा कर्मानुष्ठान और 'परिव्रजति' पद से ब्रह्म-जिज्ञासा की सूचना की गई है। मनु जी भी कहते हैं—

अधीत्य विधिवद्वेदान् पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः ।
इष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत् ॥ ( मनु० ६।३६)

[ विधिवत् वेदाध्ययन, पुत्रोत्पत्ति और वनस्थ यज्ञादि-अनुष्ठान के द्वारा क्रमशः ब्रह्मचर्य, गृहस्थ और वानप्रस्थ आश्रम सूचित किये गये हैं ] केवल इतना ही नहीं, वेदाध्ययनादि के बिना मुमुक्षा सरणि का अनुसरण अधःपतन का कारण माना गया है—

अनधीत्य द्विजो वेदाननुत्पाद्य तथा सुतान् ।
अनिष्ट्वा चैव यज्ञैश्च मोक्षमिच्छन् व्रजत्यधः ॥ ( मनु० ६।३७)

समाधान—उक्त शङ्का का समाधान करते हुए भाष्यकार ने कहा है—“यथा च हृदयाद्यवदानानामानन्तर्यनियमः, क्रमस्य विवक्षितत्वात्, न तथेह क्रमो विवक्षितः”। पशु-याग के लिए हवि के निष्पादन का क्रम बताते हुए कहा गया है—“हृदयस्याग्रेऽवद्यति, अथ जिह्वाया, अथ वक्षसो यथाकामीतरेषाम्” (आप. श्रौ. सू. २४।२) । [ स्वधिति नाम की छुरी के द्वारा छाग के हृदय का भाग सबसे अग्रे (पहले) उसके पश्चात् जिह्वा और जिह्वावदान के अनन्तर वक्षःस्थल का अवदान (टुकड़ा काटना) करना चाहिए ] ।

यहाँ पर 'अग्रे' और 'अथ' शब्दों के बल पर जैसे अवदान-क्रम की विवक्षा की जाती है, वैसे प्रकृत (गृहीभूत्वा प्रव्रजेत्—इस वाक्य) में कर्मविबोध और ब्रह्म-जिज्ञासा का पौर्वापर्य-

७६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती तथैवानियमप्रदर्शनात्— "यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद्वा वनाद् वा" इति। एतावता हि वैराग्यमुपलक्षयति। अत एव "यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत्" इति श्रुतिः। निन्दावचनं चाविशुद्धसत्त्वपुरुषाभिप्रायम्। अविशुद्धसत्त्वो हि मोक्षमिच्छन्नालस्यात्तदुपायेष्वप्रवर्त्तमानो गृहस्थधर्ममपि नित्यनैमित्तिकमनाचरन् प्रतिक्षणमुपचीयमानपाप्माऽधोगतिं गच्छतीत्यर्थः। स्यादेतत्— मा भूच्छ्रौत आर्थो वा क्रमः, पाठस्थानमुख्यप्रवृत्तिप्रमाणकस्तु कस्मान्न भवतीत्यत


भामती-व्याख्या भाव विवक्षित नहीं, अन्यथा "यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद्वा" (जाबालो. ४) इस श्रुति के द्वारा प्रतिपादित अनियम का सामञ्जस्य नहीं रहता। इस अनियम के द्वारा एकमात्र वैराग्य को परिव्रज्या में कारण ध्वनित किया गया है, श्रुति स्पष्ट कहती है— "यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेत्" (जाबालो. ४)। "अनधीत्य द्विजो वेदान्" इत्यादि निन्दा-वचन उस व्यक्ति के लिए लागू होते हैं, जिसका अन्तःसत्त्व अविशुद्ध है, क्योंकि अविशुद्धसत्त्ववाला व्यक्ति यदि मोक्ष की इच्छा करता है, तब वह आलस्य के कारण नित्यादि कर्मों का भी परित्याग कर बैठता है और शमादि का पालन भी नहीं करता, अतः प्रतिक्षण उपचीयमान पाप-राशि से दब कर अधोगति को प्राप्त होता है।

शङ्का— क्रम या पौर्वापर्यभाव के नियामक (१) श्रुति, (२) अर्थ, (३) पाठ, (४) स्थान, (५) मुख्य और (६) प्रवृत्ति नाम के छः प्रमाण मीमांसा दर्शन के पञ्चम अध्याय में वर्णित हैं [(१) क्रम या पूर्वापर काल के वाचक शब्द को यहाँ श्रुति पद से अभिहित किया गया है, जैसे "वेदं कृत्वा वेदीं करोति" इत्यादि स्थलों पर 'क्त्वा' प्रत्यय पूर्वकाल का वाचक होने के कारण 'श्रुति' कहलाता है, अतः एक मुट्ठी कुशा को बीच से मोड़-तोड़ कर एक गाँठ लगा दी जाती है, उसे वेद कहते हैं, वेद का निर्माण कर लेने के पश्चात् ही वेदी का निर्माण किया जाता है।

(२) 'अर्थ' शब्द प्रयोजन का वाचक है, प्रयोजन या साध्य-साधनभाव के आधार पर ओदनादि का पाक पहले और अग्निहोत्रादि कर्म का अनुष्ठान पश्चात् किया जाता है।

(३) "समिधो यजति वसन्तमेवर्तूनामवरुन्धे, तनूनपातं यजति ग्रीष्ममेवावरुन्धे, इडो यजति वर्षा एवावरुन्धे, बर्हिर्यजति शरदमेवावरुन्धे, स्वाहाकारं यजति हेमन्तमेवावरुन्धे" (त. सं. २।६।१।१) यहाँ पर समिधादिसंज्ञक पाँच प्रयाज कर्मों के विधायक पाँचों वाक्यों का पाठ जिस क्रम से है, उसी क्रम से उन कर्मों का अनुष्ठान किया जाता है, इस क्रम को पाठ-क्रम कहते हैं।

(४) ज्योतिष्टोम नाम के प्रकृतिभूत कर्म का अनुष्ठान पाँच दिनों में सम्पन्न होता है, अत एव उसके अङ्गभूत 'अग्नीषोमीय, सवनीय और आनुबन्ध्य'—इन तीन पशु-यागों का अनुष्ठान भिन्न-भिन्न दिनों में होता है—सर्वप्रथम अग्नीषोमीय पशु-याग का अनुष्ठान चतुर्थ दिन में, सवनीय पशु-याग का अनुष्ठान पञ्चम दिन प्रातःसवन के पश्चात् और आनुबन्ध्य-याग का अनुष्ठान पञ्चम दिन में ही अवभृथ कर्म के अनन्तर किया जाता है।

प्रकृति याग के सभी अङ्ग विकृति याग में लिए जाते हैं, किन्तु साद्यस्कसंज्ञक विकृति याग एक ही दिन में सम्पन्न किया जाता है। दीक्षादि सभी कृत्यों का सद्यः अनुष्ठान होने के कारण इस विकृति कर्म का नाम साद्यस्क है—"दीक्षादि सद्यः सर्वं क्रियते" (कात्या. श्रौ. सू. २२।३।२७)। कथित तीनों पशु-यागों का अनुष्ठान यहाँ एक ही सवन-काल में किया जाता है—"सह पशूनालभते" (कात्या. श्रौ. सू. २२।३।२८)। प्रकृति कर्म में सवन-काल सवनीय

आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७७

तथेह क्रमो विवक्षितः, शेषशेषित्वेऽधिकृताधिकारे वा प्रमाणाभावात् , धर्मग्रह-

भामती आह ॐ शेषशेषित्वे प्रमाणाभावात् ॐ । शेषाणां समिदादीनां शेषिणाम्नाग्नेयादीनामेकफलवदुपकारोप- निबद्धानामेकफलावच्छिन्नानामेकप्रयोगवचनोपगृहीतानामेकाधिकारिकर्तृकाणामेकपौर्णमास्यमावास्याकाल-

भामती-व्याख्या पशु-याग का स्थान माना जाता है, अतः 'स्थान' प्रमाण के आधार पर सवनीय पशु, उसके पश्चात् अग्नीषोमीय और अन्त में आनुबन्ध्य पशु का अनुष्ठान किया जाता है—"सौत्येऽहनि अग्नीषोमीयसवनीयानुबन्ध्यान् पशून् क्रमेण सहैव ( तन्त्रेण ) सवनीयकाले आलभेत । तत्र स्थानित्वात् सवनीयः स्वस्थान न जहाति, अग्नीषोमीयस्तु स्वस्थानात् प्रच्यावितः सवनीया-त्पश्चाद् भवति" ( कात्या. श्रौ. सू. व्या. २२।३।२८ ) ।

( ५ ) 'मुख्य' का अर्थ प्रधान है, प्रधान कर्म के क्रम से अङ्ग कर्मों का अनुष्ठान करना मुख्य-क्रम कहलाता है । जैसे कि दर्शयाग में तीन प्रधान कर्मों के तीन हवि द्रव्य होते हैं—( १ ) आग्नेय पुरोडाश, ऐन्द्र दधि और ऐन्द्रं पयः । “प्रयाजशेषेण हवींषि अभिघारयति"—इस वाक्य के द्वारा प्रयाज-शेष ( प्रयाज कर्मों के अनुष्ठान से बचे हुए घृत ) से उक्त तीनों हवियों का अभिधारण विहित है । पहले किस हवि का अभिधारण होगा और पश्चात् किसका ? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि प्रधान कर्मों का अनुष्ठान जिस क्रम से होता है, उसी क्रम से उनके हवियों का अभिधारण भी करना चाहिए । आग्नेय याग का अनुष्ठान पहले होता है, उसके पश्चात् ऐन्द्र याग का, अतः आग्नेय हवि ( पुरोडाश ) का अभिधारण पहले और उसके पश्चात् क्रमशः ऐन्द्र दधि और ऐन्द्र पयः का अभिधारण किया जाता है—इसी का नाम मुख्य-क्रम है ।

( ६ ) “सप्तदश प्राजापत्यान् पशूनालभते" ( तै. ब्रा. ३।४।३ ) इस वाक्य के द्वारा प्रजापति देवता के उद्देश्य से सत्तरह पशुओं ( छागों ) का अनुष्ठान विहित है । पशुओं के उपाकरण ( मन्त्रोच्चारणपूर्वक स्पर्श और सम्प्रदानभूत देवता का निर्देश ), नियोजन ( यूप में पशु को बाँधना ) और पर्यग्निकरण आदि जो संस्कार विहित हैं, उनका किस क्रम से अनुष्ठान किया जाय ? इस प्रश्न का उत्तर है—प्रवृत्तिक्रम से [ उपाकरण जिस पशु से आरम्भ कर जिस पशु में समाप्त किया, उसी क्रम से नियोजनादि अङ्गों का अनुष्ठान प्रवृत्ति-क्रम कहलाता है ] । उनमें से कर्मावबोध और ब्रह्म-जिज्ञासा का क्रम ( पौर्वापर्यभाव ) यदि श्रुति और अर्थ ( प्रयोजन ) के आधार पर नहीं हो सकता, तब पाठ, स्थान, मुख्य और प्रवृत्ति के द्वारा सम्भव हो जायगा ।

समाधान - उक्त शंका का परिहार करते हुए भाष्यकार ने कहा है—शेषशेषित्वे प्रमाणाभावात्" । “शेषः परार्थत्वात्" ( जै. सू. ३।१।१ ) इस सूत्र में 'शेष' शब्द का अर्थ अङ्ग और उसका लक्षण किया गया है - परार्थ्य । जो पदार्थ किसी पर ( प्रधान ) को अपने सहयोग से सम्पन्नता या पूर्णता प्रदान करता है, उसे शेष कहते हैं । शेष का लक्षण कर देने से शेषी ( अङ्गी ) का लक्षण अपने-आप सिद्ध हो जाता है —

शेषलक्षणमात्रोक्तावर्थात्स्याच्छेषिलक्षणम् ।
अतः शेषः परार्थत्वादित्युक्तं शेषलक्षणम् ।। ( तं० वा० पृ० ६५३ )

समिध् , तनूनपातादि प्रयाज कर्म शेष हैं उनके शेषी ( अङ्गी ) हैं—आग्नेयादि याग । शेष और शेषी—दोनों एक स्वर्गरूप फल के उद्देश्य से विहित हैं । दोनों एक ही प्रयोग-विधि के द्वारा गृहीत हैं, दोनों एक ही अधिकारी ( स्वर्गकामनावान् ) व्यक्ति के द्वारा सम्पादनीय हैं

७८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

•बद्धानां युगपदनुष्ठानाशक्तेः सामर्थ्यात् क्रमप्राप्तौ तद्विशेषापेक्षायां पाठादयस्तद्भेदनिर्णमाय प्रभवन्ति, यत्र तु न शेषशेषिभावो नाप्येकाधिकारावच्छेदो यथा सौर्य्यार्य्यमणप्राजापत्यादीनां तत्र क्रमभेदापेक्षा-भावान्न पाठादिः क्रमविशेषनियमे प्रमाणम्, अवर्जनीयतया तस्य तत्रागतत्वात् । न चेह धर्मब्रह्मजिज्ञासयोः शेषशेषिभावे श्रुत्यादीनामन्यतमं प्रमाणमस्तीति ॥

ननु शेषशेषिभावाभावेऽपि क्रमनियमो दृष्टः, यथा गोदोहनस्य पुरुषार्थस्य दर्शपूर्णमासिकैरङ्गैः सह, यथा वा दर्शपूर्णमासाभ्यामिष्ट्वा सोमेन यजेतेति दर्शपूर्णमाससोमयोरशेषशेषिणोरित्यत आह

भामती-व्याख्या

और एक ही अमावास्या और पौर्णमासी तिथि में किए जाते हैं। अतः उक्त द्विविध कर्मों का सहानुष्ठान करना है, किन्तु युगपत् सभी कर्मों का अनुष्ठान सम्भव नहीं, फलतः किसी क्रम का अवलम्बन कर साङ्ग प्रधान कर्म का सम्पादन करना होगा, क्रम विशेष का निर्णय करने के लिए पाठ, स्थानादि प्रमाणों की अपेक्षा होती है। जिन कर्मों में न तो शेष-शेषिभाव होता है और न एक ही अधिकारी व्यक्ति के द्वारा सम्पादनीयत्व, जैसे—सौर्य, आर्यमण और प्राजापत्यादि [ सौर्यं चरुं निर्वपेद् ब्रह्मवर्चसकामः” ( तै० सं० २।३।२।३ ), आर्यम्णे चरुं निर्वपेत् सुवर्गकामः” ( तै० सं० २।३।४।१ ) “प्राजापत्यं चरुं निर्वपेच्छतकृष्णलमायुष्कामः” ( तै० सं० २।३।२।१ ) ] कर्मों में क्रम की अपेक्षा ही नहीं, अतः क्रम-विशेष-बोधक पाठादि प्रमाणों का उपयोग नहीं होता। फिर भी उन कर्मों का युगपत् ( एक काल में ) अनुष्ठान न होकर किसी-न किसी क्रम से होता है। वह क्रम वहाँ अवर्जनीय होने के कारण स्वभाव-सिद्ध है, किसी प्रमाण से प्रयुक्त नहीं। प्रकृत ( कर्मावबोध और ब्रह्म-जिज्ञासा ) में शेषशेषिभाव ( अङ्गाङ्गि-भाव ) किसी प्रमाण से सिद्ध नहीं, अतः ब्रह्म-जिज्ञासा में कर्मावबोधानन्तर्य आवश्यक नहीं।

शङ्का—शेषशेषिभाव न होने पर भी क्रम का नियम देखा जाता है, जैसे गोदोहन पात्र में जल-प्रणयन और दर्शपूर्णमास कर्म के अङ्गों में क्रम माना जाता है [दर्शपूर्णमास कर्म के अङ्ग कलाप का आरम्भ जल-प्रणयन से होता है। आचमन के लिए किसी पात्र में जल भर कर रखना जल-प्रणयन कहलाता है। सामान्यतया “चमसेनापः प्रणयेत्” ( आप० श्रौ० सू० ११।१।३ ) इस विधि के द्वारा चमस नाम के काष्ठमय पात्र में जल-प्रणयन किया जाता है, पशुरूप अवान्तर फल के उद्देश्य से उस मृण्मय पात्र में जल-प्रणयन विहित हैं, जिसमें गो दुही जाती है—“गोदोहनेन पशुकामस्य” ( आप० श्रौ० सू० १।१६।२ )। यद्यपि दर्शपूर्णमास का अङ्गभूत जल-प्रणयन गोदोहन में किया जाता है, अतः गोदोहन पात्र में कर्माङ्गत्व और उसका पशु-कामना रूप स्वतन्त्र फल कीर्तित है, अतः गोदोहन में पुरुषार्थत्व ( पुरुषाङ्गत्व ) भी प्रतीत होता है, तथापि गोदोहन में पुरुषार्थत्व माना गया है—“यस्मिन् प्रीतिः पुरुषस्य लिप्सार्थ-लक्षणाऽविभक्तत्वात्” ( जै० सू० ४।१।२ ) ! यद्यपि गोदोहन दर्शपूर्णमासरूप क्रतु (यज्ञ) का उपकारक है, तथापि इतने मात्र से गोदोहन मात्र में क्रत्वङ्गत्व नहीं माना जा सकता, क्योंकि पुरुषार्थभूत गोदोहन से भी क्रतु का उपकार सिद्ध हो जाता है। फलतः गोदोहन और दर्शपूर्णमास का अङ्गाङ्गिभाव न होने पर भी यह क्रम माना जाता है कि गोदोहन पात्र में जल-प्रणयन कर लेने के पश्चात् ही दर्शपूर्णमास के पूर्वाङ्गों का अनुष्ठान किया जाता है ] वैसे ही प्रकृत में कर्मावबोध और ब्रह्म-जिज्ञासा का क्रम ( पूर्वापरभाव ) क्यों नहीं माना जा सकता ?

अथवा “दर्शपूर्णमासाभ्यामिष्ट्वा सोमेन यजेत” इस वाक्य में ‘क्त्वा’ प्रत्यय के द्वारा दर्शपूर्णमास और सोमयाग का क्रम माना जाता है, वैसे ही धर्म-जिज्ञासा और ब्रह्म-जिज्ञासा

आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ७९

भामती

❁ अधिकृताधिकारे च प्रमाणाभावाद् ❁ — इति योजना। स्वर्गकामस्य हि दर्शपूर्णमासाधिकृतरूप पशु-कामस्य सतो दर्शपूर्णमासक्रत्वर्थाप्प्रणयनाश्रिते गोदोहनेऽधिकारः। नो खलु गोदोहनद्रव्यमव्याप्रियमाणं साक्षात् पशून् भावयितुमर्हति। न च व्यापारान्तराविष्टं श्रूयते यतस्तदङ्गक्रममतिपतेत्। अप्रणयनाश्रितं तु प्रतीयते "चमसेनापः प्रणयेद् गोदोहनेन पशुकामस्य" इति समभिव्याहारात्, योग्यत्वाच्चास्यापां प्रणयनं प्रति। तस्मात् क्रत्वर्थाप्प्रणयनाश्रितत्वाद् गोदोहनस्य तत्क्रमेण पुरुषार्थमपि गोदोहनं क्रमवदिति सिद्धम्। श्रुतिनिराकरणेनेवेष्टिसोमक्रमवदपि क्रमोऽप्यपास्तो वेदितव्यः।

शेषशेषित्वाधिकृताधिकाराभावेऽपि क्रमो विवक्ष्येत, यद्येकफलावच्छेदो भवेत्, यथाग्नेयादीनां षण्णामेकस्वर्गफलावच्छिन्नानां, यदि वा जिज्ञास्यब्रह्मांगोंऽशो धर्मः स्यात्, यथा चतुलंक्षणीव्युत्पाद्यं ब्रह्म केनचित्केनचिदंशेनेकेन लक्षणेन व्युत्पाद्यते तत्र चतुर्णां लक्षणानां जिज्ञास्याभेदेन परस्परसम्बन्धे सति


भामती-व्याख्या

का क्रम स्थिर हो सकता है [ सोमयाग का अनुष्ठान दो प्रकार से होता है—(१) अग्न्याधान करने के अनन्तर अथवा (२) अग्न्याधान करके दर्शपूर्णमास याग का अनुष्ठान कर लेने के पश्चात्। द्वितीय कल्प में दर्शपूर्णमास और सोमयाग का क्रम विवक्षित है। सोमयाग और दर्शपूर्णमास—दोनों स्वतन्त्र कर्म हैं, उनमें किसी प्रकार का अङ्गाङ्गिभाव नहीं होता, फिर भी आनन्तर्य काल का विधान माना गया है— "उत्पत्तिकालविशये कालः स्याद्, वाक्यस्य तत्प्रधानत्वात्" (जै० सू० ४।३।३७) ]।

समाधान— उक्त आशङ्का का परिहार करते हुए भाष्यकार ने कहा है— "अधिकृता-धिकारे वा प्रमाणाभावात्"। स्वर्गफलक दर्शपूर्णमास कर्म का जो अधिकारी पुरुष है, उसी का गोदोहन में जल-प्रणयन का अधिकार है, अन्य का नहीं। अर्थात् "गोदोहनेन पशुकामस्य"— यहाँ पर तृतीया विभक्तिरूप श्रुति के द्वारा जो गोदोहन पात्र में पशुरूप फल की करणता प्रतिपादित है, वह तब तक उपपन्न नहीं हो सकती, जब तक कि गोदोहन पात्ररूप द्रव्य किसी व्यापार से युक्त नहीं हो जाता, उद्यमन-निपातनादि व्यापार से युक्त कुठारादि में ही करणता मानी जाती है, अतः प्रकृत में जल-प्रणयनरूप व्यापार से युक्त गोदोहन में फल-साधनता बन सकेगी। "चमसेनापः प्रणयेद् गोदोहनेन पशुकामस्य"— ऐसा समभिव्याहार जलप्रणयनरूप व्यापार का ही समर्पण करता है और गोदोहन-व्यापार में उस जलप्रणयन की योग्यता निहित होती है। अतः क्रत्वङ्गभूत जलप्रणयन का आश्रयी होने के कारण गोदोहन पात्र का भी वही क्रम माना जाता है जो दर्शपूर्णमासगत जल-प्रणयन का है। इसी प्रकार सोम का अधिकारी व्यक्ति ही दर्शपूर्णमास का अनुष्ठान करता है। इस प्रकार कथित दोनों उदाहरणों में अधिकृताधिकार समानरूप से होने के कारण उनमें आनन्तर्य का नियम सम्भव हो जाता है। किन्तु प्रकृत में कर्मावबोध और ब्रह्मजिज्ञासा में किसी प्रकार का अधिकृताधिकार नहीं, प्रत्युत दोनों जिज्ञासाओं के अधिकारी पुरुष अत्यन्त भिन्न होते हैं। अधिकृताधिकारभाव न होने के कारण धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा का पौर्वापर्यभाव सम्भव नहीं। 'दर्शपूर्णमासाभ्यामिष्ट्वा'— यहाँ 'क्त्वा' प्रत्यय के द्वारा पौर्वापर्यभाव जैसा प्रतीत होता है वैसा धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा का कोई श्रौतक्रम सम्भव नहीं है।

शेषशेषिभाव या अधिकृताधिकारभाव न होने पर भी क्रम माना जाता है जैसे दर्श-पूर्णमासगत आग्नेय आदि छः कर्मों का, क्योंकि वे सभी एक स्वर्गरूप फल के उद्देश्य से विहित हैं। अथवा धर्म जिज्ञास्यभूत ब्रह्म का यदि अंश होता तब भी धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा का वैसे ही क्रम विवक्षित हो सकता था, जैसे कि ब्रह्मसूत्र के चार अध्यायों का

८० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १

जिज्ञास्ययोः फलजिज्ञास्यभेदाच्च । अभ्युदयफलं धर्मज्ञानं, तच्चानुष्ठानापेक्षम् । निःश्रेयसफलं तु ब्रह्मविज्ञानं, न चानुष्ठानान्तरापेक्षम् । भव्यश्च धर्मो जिज्ञास्यो न ज्ञानकालेऽस्ति, पुरुषव्यापारतन्त्रत्वात् । इह तु भूतं ब्रह्म जिज्ञास्यं नित्यत्वान्न पुरुषव्यापारतन्त्रम् । चोदनाप्रवृत्तिभेदाच्च । या हि चोदना धर्मस्य लक्षणं सा स्वविषये

भामती

क्रमो विवक्षितस्तयेहाप्येकजिज्ञास्यतया धर्मब्रह्मजिज्ञासयोः क्रमो विवक्ष्येत, न चैतदुभयमप्यस्तीत्याह ॐ फलजिज्ञास्यभेदाच्च ॐ । फलभेदं विभज्यते ॐ अभ्युदयफलं धर्मज्ञानम् इति ॐ । जिज्ञासाया वस्तुतो ज्ञानतन्त्रत्वाज्ज्ञानफलं जिज्ञासाफलमिति भावः । न केवलं स्वरूपतः फलभेदः, तदुत्पादनप्रकारभेदादपि तद्भेदे इत्याह ॐ तच्चानुष्ठानापेक्षं ब्रह्मज्ञानं च नानुष्ठानान्तरापेक्षम् ॐ । शाब्दज्ञानाभ्यासान्नानुष्ठानान्तरमपेक्षते, नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानसहभावस्यापास्तत्वादिति भावः ।

जिज्ञास्यभेदमात्यन्तिकमाह ॐ भव्यश्च धर्म इति ॐ । भविता भव्यः, कर्तरि कृत्यः । भविता च भावकव्यापारनिर्वर्त्यतया तत्तन्त्र इति ततः प्राग् ज्ञानकाले नास्तीत्यर्थः । भूतं सत्यं, सदेकान्ततो न कदा चिदसन्नित्यर्थः । न केवलं स्वरूपतो जिज्ञास्ययोर्भेदो ज्ञापकप्रमाणप्रवृत्तिभेदादपि भेद इत्याह ॐ चोदनाप्रवृत्तिभेदाच्च ॐ । चोदनेति वैदिकं शब्दमाह, विशेषेण सामान्यस्य लक्षणात् । प्रवृत्तिभेदं

भामती-व्याख्या

विचारणीय एक ब्रह्मतत्त्व को लेकर चारों अध्यायों का क्रम माना जाता है, वैसे ही प्रकृत में धर्मजिज्ञासा और ब्रह्मजिज्ञासा का क्रम माना जा सकता था। इन (एकफलोद्देश्यत्व और जिज्ञास्याभेद) दोनों का अभाव दिखाते हुए भाष्यकार कहते हैं—"फलजिज्ञास्यभेदाच्च ।" फलभेद का स्पष्टीकरण किया जाता है—अभ्युदयफलं धर्मज्ञानं, निःश्रेयसफलं तु ब्रह्मज्ञानम् । जिज्ञासा ज्ञान का अङ्ग होने के कारण ज्ञान के फल को ही जिज्ञासा का फल कह दिया गया है। स्वर्ग आदि अभ्युदय और मोक्षरूप फल का स्वरूपतः ही भेद नहीं अपितु उनके उत्पादन क्रम में भी स्पष्ट भेद होता है—तच्चानुष्ठानापेक्षम् । अर्थात् केवल धर्मज्ञान से स्वर्ग आदि फल की निष्पत्ति नहीं होती अपितु वेदार्थज्ञान के पश्चात् कर्मानुष्ठान अपेक्षित होता है, किन्तु ब्रह्मज्ञान के अनन्तर किसी प्रकार के कर्मानुष्ठान की अपेक्षा नहीं होती। शाब्दज्ञानाभ्यास को छोड़कर नित्य-नैमित्तिक आदि कर्मानुष्ठान का सहभाव निराकृत हो चुका है। जिज्ञास्य-भेद प्रकट किया जाता है—भव्यश्च धर्मो जिज्ञास्यो न ज्ञानकालेऽस्ति । 'भव्यः' इस पद में 'कृत्य' प्रत्यय का अर्थ कर्त्ता है। भावक के व्यापार से जनित होने के कारण ज्ञानकाल में उसकी सत्ता नहीं मानी जा सकती। प्रकृत में जिज्ञास्य है—"इह तु भूतं ब्रह्म जिज्ञास्यं नित्यत्वान्न पुरुषव्यापारतन्त्रम् ।" 'भूतम्' पद का अर्थ है—सत्यम् । सत्य कभी असत् नहीं हो सकता कि उसे सत् बनाने में कर्मानुष्ठान की अपेक्षा होती। दोनों जिज्ञास्य पदार्थों का स्वरूपतः ही भेद नहीं, अपितु ज्ञापक (प्रमाणादि) का भेद भी है—चोदनाप्रवृत्तिभेदाच्च । 'चोदना' पद के द्वारा सामान्य वैदिकशब्दों का ग्रहण किया गया है। चोदना, विधि या प्रवर्तक शब्द वैदिक शब्दों के एकदेशभूत हैं। अतः चोदना पद की लक्षणा समस्त वैदिकशब्दराशि में की गई है। [ "चोदना हि भूतं भवन्तं भविष्यन्तं सूक्ष्मं व्यवहितं विप्रकृष्टमित्येवं जातीयकमर्थं शक्नोत्यव गमयितुम्" (शा० भा० पृ० १३) इस भाष्य की व्याख्या करते हुए श्री कुमारिलभट्ट ने कहा है— "चोदनेत्यब्रवीच्चात्र शब्दमात्रविवक्षया । न हि भूतादिविषयः कश्चिदस्ति विधायकः ॥" (श्लो० वा० पृ० ४७)] प्रवृत्ति-भेद दिखाया जाता है—"या हि चोदना धर्मस्य लक्षणं सा स्वविषये नियुञ्जानैव

आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ८१

नियुञ्जानैव पुरुषमवबोधयति । ब्रह्मचोदना तु पुरुषमवबोधयत्येव केवलम्, अवबो-

भामती

विभजते ॐ या हि चोदना धर्मस्य इति ॐ । आज्ञादीनां पुरुषाभिप्रायभेदानामसम्भवादपौरुषेये वेदे चोदनोपदेशः । अत एवोक्तं “तस्य ज्ञानमुपदेशः” इति । सा च साध्ये च पुरुषव्यापारे भावनायां, तद्विषये च यागादौ, स हि भावनाविषयः, तदधीननिरूपणत्वात् प्रयत्नस्य भावनायाः । षिञ् बन्धन इत्यस्य धातोर्विषयपदव्युत्पत्तेः । भावनायास्तद्द्वारेण च यागादेरपेक्षितोपायतामवगमयन्तो तत्रेच्छोपहारमुखेन पुरुषं नियुञ्जानैव यागादिधर्ममवबोधयति नान्यथा । ब्रह्मचोदना तु पुरुषमवबोधयत्येव केवलं न तु प्रवर्त्तयन्त्यवबोधयति । कुतः, अवबोध्यस्य प्रवृत्तिरहितस्य चोदनाजन्यत्वात् ।

भामती-व्याख्या

पुरुषमवबोधयति, ब्रह्मचोदना पुरुषमवबोधयत्येव केवलम् ।” प्रवर्त्तक वाक्य को चोदना कहते हैं, जैसा कि शबरस्वामी कहते हैं- "चोदनेति क्रियायाः प्रवर्त्तकं वचनमाहुः" (शाबर. पृ. १२) । लोक में वैसे वाक्य तीन प्रकार के होते हैं-(१) आज्ञा, (२) प्रार्थना और (३) अनुज्ञा [जैसे—'गां नय' यह वाक्य जब बड़े पद का कोई व्यक्ति अपने से छोटे पदवाले को कहता है, तब इस वाक्य को आज्ञा वाक्य कहा जाता है, जब उसके विपरीत छोटी पदवी का व्यक्ति अपने से बड़ी पदवीवाले को कहता है, तब उस वाक्य को प्रार्थना वाक्य कहते हैं और उक्त दोनों विधाओं से भिन्न जब किसी कार्य का अनुमोदन या समर्थन मात्र किया जाता है, तब वह वाक्य अनुज्ञा वाक्य माना जाता है ] । पौरुषेय वाक्यों में ही आज्ञादि सम्भावित हैं, वेद में नहीं, अतः वेद में 'चोदना' शब्द का 'उपदेश' अर्थ माना जाता है । इष्ट-साधनता के प्रदर्शक वाक्य को उपदेश कहते हैं, जैसे श्री शबरस्वामी ने “श्येनेन अभिचरन् यजेत”— इस वाक्य के विषय में कहा है— “नैव श्येनादयः कर्त्तव्या विज्ञायन्ते, यो हि हिंसितुमिच्छेत् तस्यायमभ्युपाय इति हि तेषामुपदेशः” (शाबर पृ. १९) । महर्षि जैमिनि भी कहते हैं – “तस्य ज्ञानमुपदेशः” (जै. सू. १।१।५) । यहाँ 'तस्य ज्ञानमुपदेशः' का अर्थ है—धर्मस्य ( ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञापकं ) प्रमाणमुपदेशः ।

वह धर्म-चोदना [ “अग्निहोत्रं जुहुयात्”—इत्यादि वाक्यावली ] अपने साध्यभूत पुरुष-व्यापारात्मक आर्थीभावना और आर्थीभावना के विषयीभूत यागादि में पुरुष को नियुक्त करती हुई यागादि कर्म का ज्ञान कराती है, क्योंकि वह (यागादि कर्म) आर्थी भावना का विषय होता है। आर्थी भावना को नैयायिकों की भाषा में आत्मा का प्रयत्न (कृतिसंज्ञक गुण) कहा जाता है। जैसे ज्ञान का निरूपण विषय के बिना नहीं हो सकता, वैसे ही प्रयत्न-रूप भावना का विषय के बिना निरूपण नहीं हो सकता, अत एव यागादि को भावना का विषय (नियत सम्बन्धी) माना जाता है, जो बन्धनार्थक 'षिञ्' धातु से निष्पन्न हुआ है, यह विगत पृ. ७ पर कहा जा चुका है । “यजेत स्वर्गकामः” इत्यादि चोदना (विधि) वाक्यों का प्रतिपाद्य है— आर्थी भावना, भावना का विषय है—याग, अतः याग में स्वर्गादिरूप इष्ट पदार्थ की साधनता का बोध कराता हुआ उक्त चोदना वाक्य यागानुष्ठान की इच्छा उत्पन्न कर देता है, उस इच्छा से यागादि के सम्पादन में पुरुष की प्रवृत्ति स्वतः हो जाती है [चोदना वाक्य केवल विषय वस्तु का अवबोध ही नहीं कराता, अपितु बोध्यमान पदार्थ में इष्ट-साधनता बताकर प्रवृत्त कर देता है, अत एव चोदना वाक्य को प्रवर्त्तक वाक्य भी कहा जाता है ] । “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”—इत्यादि ब्रह्म-प्रतिपादक वाक्य केवल अज्ञात ब्रह्म का ज्ञानमात्र कराते हैं, विषय वस्तु के सम्पादन में प्रवृत्त नहीं करते, क्योंकि जो किसी प्रकार की प्रवृत्ति का जनक नहीं होता, ऐसा ही ब्रह्मावबोध केवल वेदान्त वाक्यों से उत्पन्न होता है।

११

८२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

धस्य चोदनाजन्यत्वान्न पुरुषोऽवबोधे नियुज्यते । यथाऽक्षार्थसंनिकर्षेणार्थावबोधे,

भामती

नन्वात्मा ज्ञातव्य इत्येतद्विधिपरैर्वेदान्तैस्तदेकवाक्यतयाऽवबोधे प्रवर्त्तयद्भिरेव पुरुषो ब्रह्मावबोध्यत इति समानत्वं धर्मचोदनाभिर्ब्रह्मचोदनानामित्यत आह ॐ न पुरुषोऽवबोधे नियुज्यते ॐ । अयमभि-सन्धिः—न तावद् ब्रह्मसाक्षात्कारे पुरुषो नियोक्तव्यः; तस्य ब्रह्मस्वाभाव्येन नित्यत्वादकार्यत्वात् । नाप्युपासनायां, तस्या अपि ज्ञानप्रकर्षे हेतुभावस्यान्वयव्यतिरेकसिद्धतया प्राप्तत्वेनाविधेयत्वात् । नापि शाब्दबोधे, तस्याप्यधीतवेदस्य पुरुषस्य विदितपदतदर्थस्य समधिगतशाब्दन्यायतत्त्वस्याप्रत्यहमुत्पत्तेः । अत्रैव दृष्टान्तमाह ॐ यथाक्षार्था इति ॐ । दार्ष्टान्तिके योजयति ॐ तद्वद् इति ॐ । अपि चात्मज्ञान-विधिपरेषु वेदान्तेषु नात्मतत्त्वविनिश्चयः शाब्दः स्याद्, नहि तदात्मतत्त्वपरास्ते, किन्तु तज्ज्ञानविधिपराः, यत्पराश्च ते त एव तेषामर्थाः । न च बोधस्य बोधनिष्ठत्वावपेक्षितत्वादन्यपरेभ्योऽपि बोध्यतत्त्वविनिश्चयः, समारोपेणापि तदुपपत्तेः । तस्मान्न बोधविधिपरा वेदान्ता इति सिद्धम् ।

भामती-व्याख्या

शङ्का—"आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यो मन्तव्यः" (बृह. उ. २।४।५) इत्यादि विधि परक वेदान्त-वाक्य केवल ब्रह्मावबोध के जनक नहीं, अपितु उसमें प्रवर्तक भी होते हैं, क्योंकि 'तव्य' प्रत्ययरूप विधि से एकवाक्यतापन्न हैं, अतः उन वेदान्त-वाक्यों में प्रवर्तकता का रहना अनिवार्य है। इस प्रकार धर्म-चोदना की समानता ही ब्रह्म-चोदना में पर्यवसित होती है।

समाधान—उक्त आशङ्का का प्रतीकार करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"न पुरुषोऽ-वबोधे नियुज्यते"। आशय यह है कि यदि वेदान्त-वाक्यों को ब्रह्मावबोध में प्रवर्तक माना जाता है, तब क्या (१) ब्रह्मविषयक प्रत्यक्षात्मक ज्ञान में ? या (२) ब्रह्मोपासना में ? अथवा (३) परोक्षात्मक शाब्दबोध में ? प्रथम कल्प उचित नहीं, क्योंकि ब्रह्म-साक्षात्कार ब्रह्म-रूप होने के कारण नित्य है, किसी प्रकार की कृति के द्वारा निष्पादनीय नहीं होता। द्वितीय कल्प भी संगत नहीं, क्योंकि किसी वस्तु का निरन्तर दीर्घ समय तक अनुचिन्तन (उपासन) करने से उस विषय का साक्षात्कार सहजतः (अन्वय-व्यतिरेक से) सिद्ध है, अतः 'ब्रह्मो-पासनया ब्रह्मसाक्षात्कारं भावयेत्'—ऐसा विधान निरर्थक है। तृतीय कल्प भी सम्भव नहीं, क्योंकि जिस व्यक्ति को पद पदार्थ का संगति-ग्रहणादि हो गया है, उसे वेदान्त-वाक्यों का श्रवण करते ही ब्रह्म का शाब्द-बोधात्मक ज्ञान विधि के विना वैसे ही सम्पन्न हो जाता है, जैसे इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष के अनन्तर नियमतः अर्थ-ज्ञान उत्पन्न हो जाता है।

दूसरी बात यह भी है कि यदि वेदान्त-वाक्य ज्ञान-विधिपरक माने जाते हैं, तब वेदान्त-वाक्यों के द्वारा आत्मतत्त्व का शाब्दबोधात्मक निश्चय नहीं हो सकेगा, क्योंकि वेदान्त-वाक्य आत्मतत्त्वपरक न होकर ज्ञानविधिपरक माने जाते हैं। उस शब्द का वही मुख्य अर्थ माना जाता है, जो शब्द यत्परक होता है, फलतः इस पक्ष में वेदान्त-वाक्यों से जन्य आत्म-ज्ञानविषयक बोध ही उत्पन्न होगा, आत्मतत्त्वविषयक बोध नहीं। यदि कहा जाय कि आत्म-विषयक बोध की विधि में भी विधेयभूत बोध अपेक्षित है और उक्त बोध अपने विषयीभूत आत्मतत्त्व के बिना सम्भव नहीं, अतः बोधविधिपरक वेदान्तवाक्यों से भी आत्मतत्त्व का निश्चय क्यों न होगा ? तो वैसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि विधेयभूत ज्ञान वास्तविक विषय की अपेक्षा वैसे ही नहीं करता, जैसे "वाचं धेनुमुपासीत" (बृह. उ. ५।८।१) यहाँ पर धेनु-भावना वास्तविक धेनु की अपेक्षा नहीं करती [ जैसा कि आगे चल कर कहा जायगा—"कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः" (ब्र. सू. १।४।१०)। श्रुति भी विस्पष्ट

आनन्तर्यार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ८३

तद्वत्। तस्मात्किमपि वक्तव्यम्—यदनन्तरं ब्रह्मजिज्ञासोपदिश्यत इति । उच्यते—नित्यानित्यवस्तुविवेकः, इहामुत्रार्थभोगविरागः, शमदमादिसाधनसंपत्, मुमुक्षुत्वं

भामती

प्रकृतमुपसंहरति ॐ तस्मात्किमपि वक्तव्यम् इति ॐ । यस्मिन्नसति ब्रह्मजिज्ञासा न भवति सति तु भवन्ती भवत्येवेत्यर्थस्तदाह ॐ उच्यते—नित्यानित्यवस्तुविवेकः इत्यादि ॐ । नित्यः प्रत्यगात्मा, अनित्या देहेन्द्रियविषयादयः, तद्विषयश्चेद्विवेको निश्चयः, कृतमस्य ब्रह्मजिज्ञासया, ज्ञातत्वाद् ब्रह्मणः । अथ विवेको ज्ञानमात्रं न निश्चयः, तथा सत्येष विपर्ययादसन्नः संशयः स्यात्, तथा च न वैराग्यं भावयेत्, अभावयन् कथं ब्रह्मजिज्ञासाहेतुः ? तस्मादेवं व्याख्येयम् । नित्यानित्ययोर्धर्मिणोस्तद्धर्माणां च विवेको नित्यानित्यवस्तुविवेकः । एतदुक्तं भवति—मा भूदिदं तद्भूतं नित्यमिदं तदनृतमनित्यमिति धर्मिविशेषयो विवेकः धर्मिमात्रयोनित्यानित्ययोस्तद्धर्मयोश्च विवेकं निश्चिनोत्येव । नित्यत्वं सत्यत्वं तद्यस्यास्ति तन्नित्यं सत्यं तथा चाऽऽस्थागोचरः । अनित्यत्वमसत्यत्वं तद्यस्यास्ति तदनित्यमनृतं, तथा चानास्थागोचरः । तदेतेष्वनुभूयमानेषु युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरेषु विषयविषयिषु यदृतं नित्यं सुखं व्यवस्थाप्यते तदास्थागोचरो भविष्यति, यस्त्वनित्यमनृतं भविष्यति तापत्रयपरीतं तत् त्यक्ष्यत इति । सोऽयं नित्यानित्यवस्तुविवेकः प्राग्भवीयादैहिकाद्वा कर्मणो विशुद्धसत्त्वस्य भवत्यनुभवोपपत्तिभ्याम् । न खलु सत्यं नाम न किञ्चिद-

भामती-व्याख्या

कहती है—"वाचश्चाधेनोर्धेनुत्वम्" (बृह. उ. ५।८ ) ] । फलतः अब्रह्म में ब्रह्मत्व-ज्ञान की जहाँ विधि है, वहाँ विधेय ज्ञान ब्रह्मतत्त्वनिश्चयात्मक नहीं हो सकता । फलतः वेदान्त-वाक्यों को बोधविधिपरक नहीं माना जा सकता, धर्म-जिज्ञासा और ब्रह्म-जिज्ञासा का साम्य कथमपि स्थापित नहीं किया जा सकता, अतः कर्मावबोध को छोड़ कर "तस्मात् किमपि वक्तव्यम्, यस्मिन्सति ब्रह्मजिज्ञासा न भवति" । ब्रह्म-जिज्ञासा का असाधारण कारण प्रस्तुत करना होगा, वह है— "नित्यानित्यवस्तु-विवेकादि" । यहाँ नित्य (प्रत्यगात्मा) और अनित्य (देह, इन्द्रिय और विषयादि) का विवेक (भेद-निश्चय)—ऐसी व्याख्या नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यदि वैसा विवेक-निश्चय है, तब ब्रह्म-जिज्ञासा की क्या आवश्यकता ? उसका फलीभूत ब्रह्मावबोध पहले ही सुलभ है । यदि विवेक का अर्थ किया जाता है—ज्ञानमात्र । तब तो वह विपरीत ज्ञान से भिन्न संशयात्मक ज्ञान ही मानना होगा । संशयात्मक ज्ञान से उसका कार्य वैराग्य उत्पन्न नहीं हो सकता, वैराग्य की उत्पत्ति न करके विवेक-ज्ञान ब्रह्म-जिज्ञासा का हेतु क्योंकर हो सकेगा ? अतः उक्त भाष्य की ऐसी व्याख्या करनी चाहिए—नित्य और अनित्य पदार्थों में वास करनेवाले पदार्थ को नित्यानित्यवस्तु कहा गया है, वह है—नित्यादि का धर्म । नित्य और अनित्यरूप धर्मी एवं उनके धर्मों का विवेक-नित्यानित्यवस्तुविवेक है । आशय यह है कि 'यह आत्मा नित्य और ये देहादि अनित्य हैं'—इस प्रकार धर्मि विशेष का उल्लेख करते हुए नित्यानित्य पदार्थों का विवेक भले ही न हो, सामान्यतः नित्य, अनित्य पदार्थ एवं उनके धर्मों का विवेक निश्चित ही है । नित्यत्व नाम है—सत्यत्व का, वह सत्यत्व जिसमें रहता है, वह सत्य पदार्थ सर्वथा श्रद्धेय और उपादेय है । इसी प्रकार अनित्यत्व का अर्थ असत्यत्व है, वह जिसमें रहता है, वह अनित्य या असत्य है, जो कि अनुपादेय है । समस्त अनुभूयमान युष्मद् और अस्मत्प्रत्यय के विषयीभूत विषय और विषयी पदार्थों में जो ऋत, नित्य और सुखरूप सिद्ध होगा, वह उपादेय और जो अनित्य, अनृत और तापत्रय से युक्त (दुःखरूप) सिद्ध होगा, वह हेय होगा। यह है—नित्य और अनित्य वस्तु का विवेक जो कि पूर्वजन्म अथवा इसी जन्म में उपार्जित पुण्य-राशि के द्वारा विशुद्ध अन्तःकरण में समुत्पादित होता है । यह विवेक दृष्ट पदार्थों में अनुभव और अदृष्ट पदार्थों में युक्ति के द्वारा व्यवस्थापित

८४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

स्तीति वाच्यम्, तदभावे तदधिष्ठानस्यानृतस्याप्यनुपपत्तेः । शून्यवादिनार्मप शून्यताया एव सत्यत्वात् । अथास्य पुरुषधौरेयस्यानुभवोपपत्तिभ्यामेवं सुनिपुणं निरुपयत आ च सत्यलोकाद् आ चावीचेर्जायस्व म्रियस्वेति विपरिवर्त्तमानं क्षणमुहूर्त्तयामाहोरात्रार्धमासमासर्त्वयनवत्सरयुगचतुर्युगमन्वन्तरप्रलयमहाप्रलय-महासर्गावान्तरसर्गसंसारसागरोर्मिभिरनिशमुह्यमानं तापत्रयपरीतमात्मानं च जीवलोकं चावलोक्यास्मिन् संसारमण्डलेऽनित्याशुचिदुःखात्मकं प्रसंख्यानमुपावर्त्तते ततोऽस्यैतादृशान्नित्यानित्यवस्तुविवेकलक्षणात् प्रसंख्यानात् ॐ इहामुत्रार्थभोगविरागो भवति ॐ । अर्थ्यते प्रार्थ्यत इत्यर्थः फलमिति यावत्, तस्मिन् विरागोऽनाभोगात्मिकोपेक्षाबुद्धिः ।

ॐ ततः शमदमादिसाधनसम्पत् ॐ । रागादिकषायमदिरामत्तं हि मनस्तेषु तेषु विषयेषूच्चावच-मिन्द्रियाणि प्रवर्त्तयद्विविधाश्च प्रवृत्तीः पुण्यापुण्यफला भावयत् पुरुषमतिघोरे विविधदुःखज्वालाजटिले संसारहुतभुजि जुहोति । प्रसंख्यानाभ्यासलब्धवैराग्यपरिपाकभग्नरागादिकषायमदिरामदं तु मनः पुरुषेणा-वजीयते वशीक्रियते । सोऽयमस्य वैराग्यहेतुको मनोविजयः शम इति वशीकारसंज्ञ इति चाख्यायते । विजितं च मनस्तत्त्वविषयविनियोगयोग्यतां नीयते, सेयमस्य योग्यता दमः । यथा दान्तोऽयं वृषभयुवा,

भामती-व्याख्या

होता है । 'इस असत्यात्मक प्रपञ्च में सत्य नाम की कोई वस्तु ही नहीं, तब सत्यासत्य-विवेक क्योंकर होगा ?'—ऐसी शङ्का नहीं कर सकते, क्योंकि यदि कोई सत्य वस्तु नहीं, तब असत्य पदार्थ भी निराधार क्योंकर उत्पन्न होगा ? शून्यवादी भी शून्यता को सत्य मानता है [श्री नागार्जुन शून्यता का स्वरूप बताते हैं—

कर्मक्लेशक्षयान्मोक्षः कर्मक्लेशाः विकल्पतः ।
ते प्रपञ्चात् प्रपञ्चस्तु शून्यतायां निरुध्यते ॥” ( म. शा. १८।५ ) ] ।

यह विवेकशील पुरुष-पुङ्गव अपने अनुभव और उपपत्ति के द्वारा जब गम्भीरतापूर्वक संसार चक्र का सिंहावलोकन करता है, तब ऊपर सत्यलोक से लेकर नीचे अवीचिसंज्ञक नरक लोक तक के विशाल सागर की जन्म-मरण रूपा विकराल प्रोत्तुङ्ग तरङ्गों पर अपने-सहित सभी जीवों को डूबते-उतराते देखता है, जैसा कि श्रुति कहती है—"जायस्व म्रियस्वेत्येतत् तृतीयं स्थानं तेनासौ लोकेन पूर्यते” ( छां. ४।१।१ ) । जन्मते-मरते सभी हैं, केवल उनकी आयु क्षण, मुहूर्त्त, मास, अहोरात्र, अर्धमास, मास, ऋतु, अयन, वत्सर, युग, चतुर्युग, मन्वन्तर, प्रलय, महाप्रलय, महासर्ग और अवान्तर सर्गादि के भेद से भिन्न होता है। यह सब कुछ देख-देख कर एक सच्चे विरक्त महापुरुष में विवेक-जनित उद्वेग की आँधी चलने लगती है, वह आँधी ही ऐसे वैराग्य का रूप धारण कर लेती है—"इहामुत्रार्थभोगविरागो भवति ।” 'अर्थ' पद 'अर्थ्यते प्रार्थ्यते'—इस व्युत्पत्ति के आधार पर फल का वाचक है, उस फल के उपभोग से वैराग्य (अनाभोगात्मिका उपेक्षा बुद्धि) उत्पन्न हो जाता है। उससे शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान नाम की षड्विध सम्पत्ति का लाभ होता है, क्योंकि राग-द्वेषादि दोषों की मदिरा के मद में चूर मानव-मन विविध उच्चावच विषयों में इन्द्रियों को प्रवृत्त कर प्रवृत्ति-जनित पुण्यापुण्य फलों का सञ्चयन करता हुआ मानव की अनन्त दुःखरूपी ज्वालाओं से व्याप्त संसाररूपी अग्नि में आहुति डालता है। विवेक के अभ्यास से प्राप्त वैराग्य का परिपाक रागादिरूपी मदिरा का मद उतार देता है, मद-विहीन मन को पुरुष जीत कर अपने वश में कर लेता है, वैराग्य से जनित इसी मानस-वशीकार की 'शम' संज्ञा होती है। वशीकृत मन में तत्त्वरूपी विषय की ओर अग्रसर होने की योग्यता प्राप्त हो जाती है, इसी योग्यता का नाम दम है, जैसे नये बल को लिए 'दान्तोऽयं वृषभयुवा'—ऐसा लोक-

अतःशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ८५

च। तेषु हि सत्सु प्रागपि धर्मजिज्ञासाया ऊर्ध्वं च शक्यते ब्रह्म जिज्ञासितुं ज्ञातुं च, न विपर्यये। तस्मादथशब्देन यथोक्तसाधनसंपत्त्यानन्तर्यमुपदिश्यते। अतःशब्दो हेत्वर्थः। यस्माच्चैद एवाग्निहोत्रादीनां श्रेयःसाधनानामनित्यफलतां दर्शयति— 'तद्यथेह

भामती

हलशकटादिवहनयोग्यः कृत इति गम्यते। आदिग्रहणेन च विषयतितिक्षातदुपरमतत्त्वश्रद्धाः संगृह्यन्ते। अत एव श्रुतिः— "तस्मात् शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः श्रद्धावित्तो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्येत् सर्व- मात्मनि पश्यति" इति। तदेतस्य शमदमादिरूपस्य साधनस्य सम्पत्प्रकर्षः शमदमादिसाधनसम्पत्। ततोऽस्य संसारबन्धनान्मुमुक्षा भवतीत्याह ॐ मुमुक्षुत्वं च ॐ । तस्य च नित्यशुद्धमुक्तसत्यस्वभावब्रह्मज्ञानं मोक्षस्य कारणमित्युपश्रुत्य तज्जिज्ञासा भवति धर्मजिज्ञासायाः प्रागूर्ध्वं च, तस्मात्तेषामेवानन्तर्यं न धर्मजिज्ञासाया इत्याह ॐ तेषु हि इति ॐ । न केवलं जिज्ञासामात्रमपि तु ज्ञानमपीत्याह ॐ ज्ञातुं च ॐ । उपसंहरति । ॐ तस्माद् इति ॐ । क्रमप्राप्तमतःशब्दं व्याचष्टे । ॐ अतःशब्दो हेत्वर्थः ॐ । तमेवातः- शब्दस्य हेतुरूपमर्थमाह ॐ यस्माद्देव एव इति ॐ । अत्रैवं परिचोद्यते—सत्यं यथोक्तसाधनसम्पत्त्यनन्तरं ब्रह्मजिज्ञासा भवति, सैव त्वनुपपन्ना, इहामुत्र फलोपभोगविरागस्यानुपपत्तेः। अनुकूलवेदनीयं हि फलम्, इष्टलक्षणत्वात् फलस्य। न चानुरागहेतावस्य वैराग्यं भवितुमर्हति। दुःखानुषङ्गदर्शनात् सुखेऽपि वैराग्य- मिति चेत्, हन्त भोः सुःखानुषङ्गाद् दुःखेष्वप्यनुरागो न कस्माद्भवति ? तस्मात्सुखे उपादीयमाने दुःखपरि-

भामती-व्याख्या

व्यवहार होता है, जो हल और शकटादि के खींचने योग्य हो जाता है। भाष्य में प्रयुक्त "शमदमादि" यहाँ आदि शब्द के द्वारा बाह्य विषयों की तितिक्षा, उनसे विरति और आत्मतत्त्व पर श्रद्धा का संग्रह किया जाता है। अत एव श्रुति कहती है— 'तस्माच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः, श्रद्धावित्तो भूत्वा आत्मन्येवात्मानं पश्येत् सर्वमात्मनि पश्यति"। यह शम-दमादिरूप साधनों की सम्पत् (प्रकर्ष) है। शम-दमादि से सम्पन्न पुरुष में संसाररूपी बन्धन से मुमुक्षा उत्पन्न होती है— "मुमुक्षुत्वं च"। मुमुक्षु पुरुष को 'नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्यस्वरूप ब्रह्म का ज्ञान मोक्ष का साधन है'— ऐसा सुन कर ब्रह्म की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। यह ब्रह्म-जिज्ञासा धर्म-जिज्ञासा के पहले भी हो सकती है और पश्चात् भी, अतः विवेक-वैराग्यादि का ही आनन्तर्य ब्रह्म-जिज्ञासा में होता है, धर्म-जिज्ञासा या कर्मविबोध का आनन्तर्य नहीं ऐसा भाष्यकार कहते हैं— "तेषु हि सत्सु प्रागपि धर्म-जिज्ञासाया ऊर्ध्वं च शक्यते ब्रह्म जिज्ञासितुम्"। केवल ब्रह्म की जिज्ञासा ही नहीं होती, अपितु ब्रह्म का ज्ञान भी होता है— "ज्ञातुं च"। अथशब्दार्थ के निरूपण का उपसंहार किया जाता हैं— "तस्मादथ-शब्देन यथोक्तसाधनसम्पत्त्यानन्तर्यमुपदिश्यते"।

क्रम-प्राप्त सूत्रस्थ 'अतः' शब्द की व्याख्या की जाती है— "अतः शब्दो हेत्वर्थः"। उसी हेतुता का सामञ्जस्य किया जाता है— "यस्माद्देव एव"।

शङ्का—यह जो कहा है कि विवेक-वैराग्यादि साधनों की सम्पत्ति के अनन्तर ब्रह्म-जिज्ञासा होती है, वह सम्भव नहीं, क्योंकि इस लोक के भोगों से लेकर परलोक तक के उपभोगों से वैराग्य नहीं हो सकता। उपभोग या फल सदैव अनुकूल ही प्रतीत होता है, अभीष्ट पदार्थ को ही फल कहा जाता है, वह सभी के अनुराग का कारण होता है, उससे वैराग्य क्योंकर होगा ? 'यद्यपि सुखात्मक वस्तु से स्वरूपतः वैराग्य सम्भव नहीं, तथापि लौकिक सुख दुःख-मिश्रित है, अतः उससे वैराग्य हो सकता है'— ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जब लोक में सुख और दुःख मिश्रित हैं, तब मिश्रित तत्त्व से वैराग्य ही क्यों ? दुःख में सुख के सम्बन्ध से अनुराग क्यों नहीं ? अतः न्यायोचीत मार्ग यह है कि सुख के ग्रहण और

८६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

हारे प्रयत्नितव्यम् अवर्जनीयतया दुःखमागतमपि परिहृत्य सुखमात्रं भोक्तव्यते । तद्यथा—मत्स्यार्थी सशष्कुलान् सकण्टकान् मत्स्यानुपादत्ते, स यावदादेयं तावदादाय विनिवर्त्तते । यथा वा—धान्यार्थी सपलालानि धान्यान्याहरति, स यावदादेयं तावदुपादाय निवर्त्तते । तस्माद् दुःखभयान्नानुकूलवेदनीयमैहिकं वाऽऽमुष्मिकं वा सुखं परित्यक्तुमुचितम् । नहि मृगाः सन्तीति शालयो नोप्यन्ते, भिक्षुकाः सन्तीति स्थाल्यो नाधिश्रीयन्ते । अपि च दृष्टं सुखं चन्दनवनिताबिससङ्गजन्म क्षयितालक्षणेन दुःखेनैवाघ्रातत्वादतिभीषणा त्यज्येतापि, न त्वामुष्मिकं स्वर्गादि, तस्याविनाशित्वात् । श्रूयते हि “अपाम सोमममृता अभूम” इति । तथा च “अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति” । न च कृतकत्वहेतुकं विनाशित्वानुमानमत्र सम्भवति । नरशिरःकपालशौचानुमानवदागमबाधितविषयत्वात् । तस्माद्यथोक्तसाधनसम्पत्त्यभावान्न ब्रह्मजिज्ञासेति प्राप्तम् ।

एवं प्राप्ते आह भगवान् सूत्रकारः ॐ अतः इति ॐ । तस्यार्थं व्याचष्टे भाष्यकारः ॐ यस्माद् वेद एव इति ॐ । अयमभिसन्धिः—सत्यं मृगभिक्षुकादयः शक्याः परिहर्तुं पाचककृषीवलादिभिः, दुःखं त्वनेकविधानेककारणसम्पातजमशक्यपरिहारम् अन्ततः साधनपारतन्त्र्यक्षयितालक्षणयोर्दुःखयोः समस्तकृतकसुखाविनाभावनियमात् । नहि मधुविषसंपृक्तमन्नं विषं परित्यज्य समधु शक्यं शिल्पिप्रवरेणापि भोक्तुम् । क्षयितानुमानोपोद्वलितं च “तद्यथेह कर्मचितः” इत्यादि वचनं क्षयिताप्रतिपादकम् “अपाम सोमम्”

भामती-व्याख्या

दुःख के परिहार में यत्नशील होना चाहिए । अवर्जनीयतया दुःख यदि प्राप्त भी हो जाता है, तब उसको छोड़ कर सुख का उपभोग वैसे ही करना चाहिए, जैसे मछली खानेवाला व्यक्ति काँटे-कूँटे के साथ ही मछली लाता है, किन्तु उसमें जितना उपादेय भाग होता है, उतना लेकर शेष छोड़ देता है । अथवा जैसे छिलकों (भूसी) के साथ धान लेकर उसमें से चावल निकाल कर भूसी का त्याग कर दिया जाता है । उसी प्रकार दुःख के भय से अनुकूल वेदनीय सुख का परित्याग करना उचित नहीं । लोक में खेती को हानि पहुँचानेवाले मृग (जानवर) हैं, तो क्या खेती बीजी नहीं जाती ? भिक्षुकों के डर के मारे क्या भोजन नहीं पकाया जाता ?

दूसरी बात यह भी है कि लोक-प्रसिद्ध चन्दन, वनिता, आदि के सम्पर्क से जनित सुख की क्षयिता और दुःखमिश्रितता को देखकर उसका परित्याग किया भी जा सकता है किन्तु पारलौकिक स्वर्गादि सुखों का त्याग सम्भव नहीं, क्योंकि वे नित्य माने गये हैं । “अपां सोमममृता अभूम” (शत. ब्रा. २।६।२।१), “अक्षय्यं हवै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति” (अथर्वशि० ३) “स्वर्गादिसुखं विनाशि, कृतकत्वाद् घटादिवत्”—इस प्रकार का अनुमान वैसे ही आगम प्रमाण से बाधित है, जैसे कि “नरशिरःकपालं शुचि, प्राण्यङ्गत्वात्”—यह अनुमान “नारं स्पृष्ट्वाऽस्थि सस्नेहं सवासा जलमाविशेत्” इत्यादि आगमों के द्वारा बाधित है । इसलिए कथित वैराग्यादि-घटित साधनों का सम्पादन सम्भव न हो सकने के कारण ब्रह्मजिज्ञासा क्योंकर उपपन्न होगी ?

समाधान—उक्त आशंका का निराकरण भाष्यकार कर रहे हैं—'यस्माद् वेद एव' इत्यादि । आशय यह है कि लोक-विश्रुत मृग और भिक्षुक आदि का निवारण कृषिवल आदि कर सकते हैं किन्तु लौकिक सुख में मिश्रित दुःख का परित्याग सम्भव नहीं । एवं लौकिक सुख की क्षयिता के कारण भी परित्याग ही न्यायोचित है । “तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते” (छां. उ. ८।१।६) इत्यादि वचन मुख्यरूप से जन्य सुख की क्षयिता के प्रतिपादक हैं किन्तु “अपां सोमम्' इत्यादि वाक्य अर्थवाद होने के कारण मुख्यार्थ के प्रतिपादक नहीं माने जाते, जैसा कि पौराणिकों ने माना है—“आभूतसम्प्लवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते”

अन्तःशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ८७

कर्मचितो लोकः क्षीयते; एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते' (छान्दो० ८।१।६) इत्यादिः। तथा ब्रह्मविज्ञानादपि परं पुरुषार्थं दर्शयति - 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' (तैत्ति० २।१) इत्यादिः। तस्माद्यथोक्तसाधनसंपत्त्यनन्तरं ब्रह्मजिज्ञासा कर्तव्या। ब्रह्मणो जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा। ब्रह्म च वक्ष्यमाणलक्षणं 'जन्माद्यस्य यतः' इति। अत एव न 'ब्रह्म' शब्दस्य जात्याद्यर्थान्तरमाशङ्कितव्यम्। ब्रह्मण इति कर्मणि षष्ठी, न शेषे;

भामती

इत्यादिकं वचनं मुख्यासम्भवे जघन्यवृत्तितामापादयति। यथाहुः पौराणिकाः- 'आभूतसंप्लवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते' इति।

अत्र च ब्रह्मपदेन तत्प्रमाणं वेद उपस्थापितः। स च योग्यत्वात्तद्यथेह कर्मचितः' इत्यादिरत इति सर्वनाम्ना परामृश्य हेतुपञ्चम्या निर्दिश्यते। स्यादेतत् - यथा स्वर्गादेः कृतकस्य सुखस्य दुःखानुषङ्गतस्तथा ब्रह्मणोऽपीत्यत आह ॐ तथा ब्रह्मविज्ञानादपि इति ॐ। तेनायमर्थः - अतः स्वर्गादीनां क्षयिताप्रतिपादकाद् ब्रह्मज्ञानस्य च परमपुरुषार्थताप्रतिपादकादागमाद् यथोक्तसाधनसम्पत् तत्त्वञ्च जिज्ञासेति सिद्धम्।

ब्रह्मजिज्ञासापदव्याख्यानमाह ॐ ब्रह्मणः इति ॐ। षष्ठीसमासप्रदर्शनेन प्राचां वृत्तिकृतां ब्रह्मणे जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासेति चतुर्थीसमासः परास्तो वेदितव्यः। तादर्थ्यसमासे प्रकृतिविकृतिग्रहणं कर्त्तव्यमिति कात्यायनीयवचनेन यूपदारुर्वादिव्वेव प्रकृतिविकारभूतेषु चतुर्थीसमासनियमाद्, अप्रकृतिविकारभूत इत्येवमादौ तन्निषेधात्। अश्वघासादयः षष्ठीसमासा भविष्यन्तीत्यश्वघासादिषु षष्ठीसमासप्रतिविधानात्। षष्ठीसमासेऽपि च ब्रह्मणो वास्तवप्राधान्योपपत्तेरिति। स्यादेतद्-ब्रह्मणो जिज्ञासेत्युक्ते तत्रान्नेकार्थत्वाद् ब्रह्मशब्दस्य संशयः, कस्य ब्रह्मणो जिज्ञासेति? अस्ति ब्रह्मशब्दो विप्रत्वजातौ, यथा-ब्रह्महत्येति। अस्ति


भामती-व्याख्या

(वि. पु. २।८।९६)। अर्थात् भूतसंप्लव या महाप्रलय-पर्यन्त जो स्थायी होता है, उसे अमृत (या अनश्वर) कह दिया जाता है। 'ब्रह्मविज्ञानादपि' इस भाष्य में प्रयुक्त ब्रह्म पद के द्वारा ब्रह्मविषयक प्रमाणभूत वेद और उसमें भी योग्यता के आधार पर 'तद्यथेह कर्मचितः' इत्यादि वैदिक वाक्य गृहीत होते हैं। हेत्वर्थक पञ्चमी के द्वारा उक्त वाक्य का प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है। अतः श्रीभास्कराचार्य ने जो भाष्यकार पर अनुपस्थित विवेकादि के आनन्तर्य के प्रतिपादन का आरोप लगाया है, वह निराधार होकर रह जाता है। जैसे स्वर्गादिरूप सुख में दुःख का सम्बन्ध होता है, वैसा ब्रह्मरूप सुख में नहीं है। अतः स्वर्गादि में क्षयित्वप्रतिपादन के माध्यम से ब्रह्मज्ञान की परम पुरुषार्थ-हेतुता स्पष्ट हो जाती है, जैसा कि श्रुति कहती है—"ब्रह्मविदाप्नोति परम्" (तै. उ. २।१)। भाष्यकार ने 'ब्रह्मणो जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा'—ऐसा षष्ठीसमास दिखाकर अपने से पूर्ववर्त्ती वृत्तिकार के द्वारा प्रदर्शित 'ब्रह्मणे जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा'—इस प्रकार के चतुर्थीसमास का निराकरण ध्वनित कर दिया है, क्योंकि 'तादर्थ्यसमासे प्रकृतिविकृतिग्रहणं कर्त्तव्यम्'—इस प्रकार कात्यायन-वचन के द्वारा यूप-दारु आदि परिगणित स्थानों पर ही चतुर्थीसमास मानते हैं, सर्वत्र नहीं। ब्रह्मजिज्ञासा के समान प्रकृतिविकारभाव-रहित स्थल पर निषेध एवं 'अश्वघासादयः षष्ठीसमासा भविष्यन्ति' इत्यादि वचनों के द्वारा ब्रह्मजिज्ञासा आदि पदों में षष्ठीसमास का विधान माना गया है। षष्ठीसमास में भी ब्रह्म की प्रधानता अक्षुण्ण रह जाती है।

शङ्का - 'ब्रह्मणो जिज्ञासा'—ऐसा कहने पर भी ब्रह्मशब्द के अनेक अर्थों को ध्यान में रखकर सन्देह उपस्थित हो जाता है कि किस ब्रह्म की जिज्ञासा प्रस्तुत की जा रही है? ब्रह्म शब्द विप्रत्व जाति में प्रयुक्त होता है, जैसे कि 'ब्रह्महत्या'। ब्रह्म शब्द वेद में भी प्रयुक्त है, जैसे कि 'ब्रह्मोज्झम्' एवं परमात्मा का भी वाचक ब्रह्म शब्द होता है जैसे कि 'ब्रह्मवेद