भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अन्तःशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ८७

कर्मचितो लोकः क्षीयते; एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते' (छान्दो० ८।१।६) इत्यादिः। तथा ब्रह्मविज्ञानादपि परं पुरुषार्थं दर्शयति - 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' (तैत्ति० २।१) इत्यादिः। तस्माद्यथोक्तसाधनसंपत्त्यनन्तरं ब्रह्मजिज्ञासा कर्तव्या। ब्रह्मणो जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा। ब्रह्म च वक्ष्यमाणलक्षणं 'जन्माद्यस्य यतः' इति। अत एव न 'ब्रह्म' शब्दस्य जात्याद्यर्थान्तरमाशङ्कितव्यम्। ब्रह्मण इति कर्मणि षष्ठी, न शेषे;

भामती

इत्यादिकं वचनं मुख्यासम्भवे जघन्यवृत्तितामापादयति। यथाहुः पौराणिकाः- 'आभूतसंप्लवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते' इति।

अत्र च ब्रह्मपदेन तत्प्रमाणं वेद उपस्थापितः। स च योग्यत्वात्तद्यथेह कर्मचितः' इत्यादिरत इति सर्वनाम्ना परामृश्य हेतुपञ्चम्या निर्दिश्यते। स्यादेतत् - यथा स्वर्गादेः कृतकस्य सुखस्य दुःखानुषङ्गतस्तथा ब्रह्मणोऽपीत्यत आह ॐ तथा ब्रह्मविज्ञानादपि इति ॐ। तेनायमर्थः - अतः स्वर्गादीनां क्षयिताप्रतिपादकाद् ब्रह्मज्ञानस्य च परमपुरुषार्थताप्रतिपादकादागमाद् यथोक्तसाधनसम्पत् तत्त्वञ्च जिज्ञासेति सिद्धम्।

ब्रह्मजिज्ञासापदव्याख्यानमाह ॐ ब्रह्मणः इति ॐ। षष्ठीसमासप्रदर्शनेन प्राचां वृत्तिकृतां ब्रह्मणे जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासेति चतुर्थीसमासः परास्तो वेदितव्यः। तादर्थ्यसमासे प्रकृतिविकृतिग्रहणं कर्त्तव्यमिति कात्यायनीयवचनेन यूपदारुर्वादिव्वेव प्रकृतिविकारभूतेषु चतुर्थीसमासनियमाद्, अप्रकृतिविकारभूत इत्येवमादौ तन्निषेधात्। अश्वघासादयः षष्ठीसमासा भविष्यन्तीत्यश्वघासादिषु षष्ठीसमासप्रतिविधानात्। षष्ठीसमासेऽपि च ब्रह्मणो वास्तवप्राधान्योपपत्तेरिति। स्यादेतद्-ब्रह्मणो जिज्ञासेत्युक्ते तत्रान्नेकार्थत्वाद् ब्रह्मशब्दस्य संशयः, कस्य ब्रह्मणो जिज्ञासेति? अस्ति ब्रह्मशब्दो विप्रत्वजातौ, यथा-ब्रह्महत्येति। अस्ति


भामती-व्याख्या

(वि. पु. २।८।९६)। अर्थात् भूतसंप्लव या महाप्रलय-पर्यन्त जो स्थायी होता है, उसे अमृत (या अनश्वर) कह दिया जाता है। 'ब्रह्मविज्ञानादपि' इस भाष्य में प्रयुक्त ब्रह्म पद के द्वारा ब्रह्मविषयक प्रमाणभूत वेद और उसमें भी योग्यता के आधार पर 'तद्यथेह कर्मचितः' इत्यादि वैदिक वाक्य गृहीत होते हैं। हेत्वर्थक पञ्चमी के द्वारा उक्त वाक्य का प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है। अतः श्रीभास्कराचार्य ने जो भाष्यकार पर अनुपस्थित विवेकादि के आनन्तर्य के प्रतिपादन का आरोप लगाया है, वह निराधार होकर रह जाता है। जैसे स्वर्गादिरूप सुख में दुःख का सम्बन्ध होता है, वैसा ब्रह्मरूप सुख में नहीं है। अतः स्वर्गादि में क्षयित्वप्रतिपादन के माध्यम से ब्रह्मज्ञान की परम पुरुषार्थ-हेतुता स्पष्ट हो जाती है, जैसा कि श्रुति कहती है—"ब्रह्मविदाप्नोति परम्" (तै. उ. २।१)। भाष्यकार ने 'ब्रह्मणो जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा'—ऐसा षष्ठीसमास दिखाकर अपने से पूर्ववर्त्ती वृत्तिकार के द्वारा प्रदर्शित 'ब्रह्मणे जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा'—इस प्रकार के चतुर्थीसमास का निराकरण ध्वनित कर दिया है, क्योंकि 'तादर्थ्यसमासे प्रकृतिविकृतिग्रहणं कर्त्तव्यम्'—इस प्रकार कात्यायन-वचन के द्वारा यूप-दारु आदि परिगणित स्थानों पर ही चतुर्थीसमास मानते हैं, सर्वत्र नहीं। ब्रह्मजिज्ञासा के समान प्रकृतिविकारभाव-रहित स्थल पर निषेध एवं 'अश्वघासादयः षष्ठीसमासा भविष्यन्ति' इत्यादि वचनों के द्वारा ब्रह्मजिज्ञासा आदि पदों में षष्ठीसमास का विधान माना गया है। षष्ठीसमास में भी ब्रह्म की प्रधानता अक्षुण्ण रह जाती है।

शङ्का - 'ब्रह्मणो जिज्ञासा'—ऐसा कहने पर भी ब्रह्मशब्द के अनेक अर्थों को ध्यान में रखकर सन्देह उपस्थित हो जाता है कि किस ब्रह्म की जिज्ञासा प्रस्तुत की जा रही है? ब्रह्म शब्द विप्रत्व जाति में प्रयुक्त होता है, जैसे कि 'ब्रह्महत्या'। ब्रह्म शब्द वेद में भी प्रयुक्त है, जैसे कि 'ब्रह्मोज्झम्' एवं परमात्मा का भी वाचक ब्रह्म शब्द होता है जैसे कि 'ब्रह्मवेद