भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 104
८६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

भामती

हारे प्रयत्नितव्यम् अवर्जनीयतया दुःखमागतमपि परिहृत्य सुखमात्रं भोक्तव्यते । तद्यथा—मत्स्यार्थी सशष्कुलान् सकण्टकान् मत्स्यानुपादत्ते, स यावदादेयं तावदादाय विनिवर्त्तते । यथा वा—धान्यार्थी सपलालानि धान्यान्याहरति, स यावदादेयं तावदुपादाय निवर्त्तते । तस्माद् दुःखभयान्नानुकूलवेदनीयमैहिकं वाऽऽमुष्मिकं वा सुखं परित्यक्तुमुचितम् । नहि मृगाः सन्तीति शालयो नोप्यन्ते, भिक्षुकाः सन्तीति स्थाल्यो नाधिश्रीयन्ते । अपि च दृष्टं सुखं चन्दनवनिताबिससङ्गजन्म क्षयितालक्षणेन दुःखेनैवाघ्रातत्वादतिभीषणा त्यज्येतापि, न त्वामुष्मिकं स्वर्गादि, तस्याविनाशित्वात् । श्रूयते हि “अपाम सोमममृता अभूम” इति । तथा च “अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति” । न च कृतकत्वहेतुकं विनाशित्वानुमानमत्र सम्भवति । नरशिरःकपालशौचानुमानवदागमबाधितविषयत्वात् । तस्माद्यथोक्तसाधनसम्पत्त्यभावान्न ब्रह्मजिज्ञासेति प्राप्तम् ।

एवं प्राप्ते आह भगवान् सूत्रकारः ॐ अतः इति ॐ । तस्यार्थं व्याचष्टे भाष्यकारः ॐ यस्माद् वेद एव इति ॐ । अयमभिसन्धिः—सत्यं मृगभिक्षुकादयः शक्याः परिहर्तुं पाचककृषीवलादिभिः, दुःखं त्वनेकविधानेककारणसम्पातजमशक्यपरिहारम् अन्ततः साधनपारतन्त्र्यक्षयितालक्षणयोर्दुःखयोः समस्तकृतकसुखाविनाभावनियमात् । नहि मधुविषसंपृक्तमन्नं विषं परित्यज्य समधु शक्यं शिल्पिप्रवरेणापि भोक्तुम् । क्षयितानुमानोपोद्वलितं च “तद्यथेह कर्मचितः” इत्यादि वचनं क्षयिताप्रतिपादकम् “अपाम सोमम्”

भामती-व्याख्या

दुःख के परिहार में यत्नशील होना चाहिए । अवर्जनीयतया दुःख यदि प्राप्त भी हो जाता है, तब उसको छोड़ कर सुख का उपभोग वैसे ही करना चाहिए, जैसे मछली खानेवाला व्यक्ति काँटे-कूँटे के साथ ही मछली लाता है, किन्तु उसमें जितना उपादेय भाग होता है, उतना लेकर शेष छोड़ देता है । अथवा जैसे छिलकों (भूसी) के साथ धान लेकर उसमें से चावल निकाल कर भूसी का त्याग कर दिया जाता है । उसी प्रकार दुःख के भय से अनुकूल वेदनीय सुख का परित्याग करना उचित नहीं । लोक में खेती को हानि पहुँचानेवाले मृग (जानवर) हैं, तो क्या खेती बीजी नहीं जाती ? भिक्षुकों के डर के मारे क्या भोजन नहीं पकाया जाता ?

दूसरी बात यह भी है कि लोक-प्रसिद्ध चन्दन, वनिता, आदि के सम्पर्क से जनित सुख की क्षयिता और दुःखमिश्रितता को देखकर उसका परित्याग किया भी जा सकता है किन्तु पारलौकिक स्वर्गादि सुखों का त्याग सम्भव नहीं, क्योंकि वे नित्य माने गये हैं । “अपां सोमममृता अभूम” (शत. ब्रा. २।६।२।१), “अक्षय्यं हवै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति” (अथर्वशि० ३) “स्वर्गादिसुखं विनाशि, कृतकत्वाद् घटादिवत्”—इस प्रकार का अनुमान वैसे ही आगम प्रमाण से बाधित है, जैसे कि “नरशिरःकपालं शुचि, प्राण्यङ्गत्वात्”—यह अनुमान “नारं स्पृष्ट्वाऽस्थि सस्नेहं सवासा जलमाविशेत्” इत्यादि आगमों के द्वारा बाधित है । इसलिए कथित वैराग्यादि-घटित साधनों का सम्पादन सम्भव न हो सकने के कारण ब्रह्मजिज्ञासा क्योंकर उपपन्न होगी ?

समाधान—उक्त आशंका का निराकरण भाष्यकार कर रहे हैं—'यस्माद् वेद एव' इत्यादि । आशय यह है कि लोक-विश्रुत मृग और भिक्षुक आदि का निवारण कृषिवल आदि कर सकते हैं किन्तु लौकिक सुख में मिश्रित दुःख का परित्याग सम्भव नहीं । एवं लौकिक सुख की क्षयिता के कारण भी परित्याग ही न्यायोचित है । “तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते” (छां. उ. ८।१।६) इत्यादि वचन मुख्यरूप से जन्य सुख की क्षयिता के प्रतिपादक हैं किन्तु “अपां सोमम्' इत्यादि वाक्य अर्थवाद होने के कारण मुख्यार्थ के प्रतिपादक नहीं माने जाते, जैसा कि पौराणिकों ने माना है—“आभूतसम्प्लवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते”