भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअतःशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ८५
च। तेषु हि सत्सु प्रागपि धर्मजिज्ञासाया ऊर्ध्वं च शक्यते ब्रह्म जिज्ञासितुं ज्ञातुं च, न विपर्यये। तस्मादथशब्देन यथोक्तसाधनसंपत्त्यानन्तर्यमुपदिश्यते। अतःशब्दो हेत्वर्थः। यस्माच्चैद एवाग्निहोत्रादीनां श्रेयःसाधनानामनित्यफलतां दर्शयति— 'तद्यथेह
भामती
हलशकटादिवहनयोग्यः कृत इति गम्यते। आदिग्रहणेन च विषयतितिक्षातदुपरमतत्त्वश्रद्धाः संगृह्यन्ते। अत एव श्रुतिः— "तस्मात् शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः श्रद्धावित्तो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्येत् सर्व- मात्मनि पश्यति" इति। तदेतस्य शमदमादिरूपस्य साधनस्य सम्पत्प्रकर्षः शमदमादिसाधनसम्पत्। ततोऽस्य संसारबन्धनान्मुमुक्षा भवतीत्याह ॐ मुमुक्षुत्वं च ॐ । तस्य च नित्यशुद्धमुक्तसत्यस्वभावब्रह्मज्ञानं मोक्षस्य कारणमित्युपश्रुत्य तज्जिज्ञासा भवति धर्मजिज्ञासायाः प्रागूर्ध्वं च, तस्मात्तेषामेवानन्तर्यं न धर्मजिज्ञासाया इत्याह ॐ तेषु हि इति ॐ । न केवलं जिज्ञासामात्रमपि तु ज्ञानमपीत्याह ॐ ज्ञातुं च ॐ । उपसंहरति । ॐ तस्माद् इति ॐ । क्रमप्राप्तमतःशब्दं व्याचष्टे । ॐ अतःशब्दो हेत्वर्थः ॐ । तमेवातः- शब्दस्य हेतुरूपमर्थमाह ॐ यस्माद्देव एव इति ॐ । अत्रैवं परिचोद्यते—सत्यं यथोक्तसाधनसम्पत्त्यनन्तरं ब्रह्मजिज्ञासा भवति, सैव त्वनुपपन्ना, इहामुत्र फलोपभोगविरागस्यानुपपत्तेः। अनुकूलवेदनीयं हि फलम्, इष्टलक्षणत्वात् फलस्य। न चानुरागहेतावस्य वैराग्यं भवितुमर्हति। दुःखानुषङ्गदर्शनात् सुखेऽपि वैराग्य- मिति चेत्, हन्त भोः सुःखानुषङ्गाद् दुःखेष्वप्यनुरागो न कस्माद्भवति ? तस्मात्सुखे उपादीयमाने दुःखपरि-
भामती-व्याख्या
व्यवहार होता है, जो हल और शकटादि के खींचने योग्य हो जाता है। भाष्य में प्रयुक्त "शमदमादि" यहाँ आदि शब्द के द्वारा बाह्य विषयों की तितिक्षा, उनसे विरति और आत्मतत्त्व पर श्रद्धा का संग्रह किया जाता है। अत एव श्रुति कहती है— 'तस्माच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः, श्रद्धावित्तो भूत्वा आत्मन्येवात्मानं पश्येत् सर्वमात्मनि पश्यति"। यह शम-दमादिरूप साधनों की सम्पत् (प्रकर्ष) है। शम-दमादि से सम्पन्न पुरुष में संसाररूपी बन्धन से मुमुक्षा उत्पन्न होती है— "मुमुक्षुत्वं च"। मुमुक्षु पुरुष को 'नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्यस्वरूप ब्रह्म का ज्ञान मोक्ष का साधन है'— ऐसा सुन कर ब्रह्म की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। यह ब्रह्म-जिज्ञासा धर्म-जिज्ञासा के पहले भी हो सकती है और पश्चात् भी, अतः विवेक-वैराग्यादि का ही आनन्तर्य ब्रह्म-जिज्ञासा में होता है, धर्म-जिज्ञासा या कर्मविबोध का आनन्तर्य नहीं ऐसा भाष्यकार कहते हैं— "तेषु हि सत्सु प्रागपि धर्म-जिज्ञासाया ऊर्ध्वं च शक्यते ब्रह्म जिज्ञासितुम्"। केवल ब्रह्म की जिज्ञासा ही नहीं होती, अपितु ब्रह्म का ज्ञान भी होता है— "ज्ञातुं च"। अथशब्दार्थ के निरूपण का उपसंहार किया जाता हैं— "तस्मादथ-शब्देन यथोक्तसाधनसम्पत्त्यानन्तर्यमुपदिश्यते"।
क्रम-प्राप्त सूत्रस्थ 'अतः' शब्द की व्याख्या की जाती है— "अतः शब्दो हेत्वर्थः"। उसी हेतुता का सामञ्जस्य किया जाता है— "यस्माद्देव एव"।
शङ्का—यह जो कहा है कि विवेक-वैराग्यादि साधनों की सम्पत्ति के अनन्तर ब्रह्म-जिज्ञासा होती है, वह सम्भव नहीं, क्योंकि इस लोक के भोगों से लेकर परलोक तक के उपभोगों से वैराग्य नहीं हो सकता। उपभोग या फल सदैव अनुकूल ही प्रतीत होता है, अभीष्ट पदार्थ को ही फल कहा जाता है, वह सभी के अनुराग का कारण होता है, उससे वैराग्य क्योंकर होगा ? 'यद्यपि सुखात्मक वस्तु से स्वरूपतः वैराग्य सम्भव नहीं, तथापि लौकिक सुख दुःख-मिश्रित है, अतः उससे वैराग्य हो सकता है'— ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जब लोक में सुख और दुःख मिश्रित हैं, तब मिश्रित तत्त्व से वैराग्य ही क्यों ? दुःख में सुख के सम्बन्ध से अनुराग क्यों नहीं ? अतः न्यायोचीत मार्ग यह है कि सुख के ग्रहण और