भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ८४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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भामती
स्तीति वाच्यम्, तदभावे तदधिष्ठानस्यानृतस्याप्यनुपपत्तेः । शून्यवादिनार्मप शून्यताया एव सत्यत्वात् । अथास्य पुरुषधौरेयस्यानुभवोपपत्तिभ्यामेवं सुनिपुणं निरुपयत आ च सत्यलोकाद् आ चावीचेर्जायस्व म्रियस्वेति विपरिवर्त्तमानं क्षणमुहूर्त्तयामाहोरात्रार्धमासमासर्त्वयनवत्सरयुगचतुर्युगमन्वन्तरप्रलयमहाप्रलय-महासर्गावान्तरसर्गसंसारसागरोर्मिभिरनिशमुह्यमानं तापत्रयपरीतमात्मानं च जीवलोकं चावलोक्यास्मिन् संसारमण्डलेऽनित्याशुचिदुःखात्मकं प्रसंख्यानमुपावर्त्तते ततोऽस्यैतादृशान्नित्यानित्यवस्तुविवेकलक्षणात् प्रसंख्यानात् ॐ इहामुत्रार्थभोगविरागो भवति ॐ । अर्थ्यते प्रार्थ्यत इत्यर्थः फलमिति यावत्, तस्मिन् विरागोऽनाभोगात्मिकोपेक्षाबुद्धिः ।
ॐ ततः शमदमादिसाधनसम्पत् ॐ । रागादिकषायमदिरामत्तं हि मनस्तेषु तेषु विषयेषूच्चावच-मिन्द्रियाणि प्रवर्त्तयद्विविधाश्च प्रवृत्तीः पुण्यापुण्यफला भावयत् पुरुषमतिघोरे विविधदुःखज्वालाजटिले संसारहुतभुजि जुहोति । प्रसंख्यानाभ्यासलब्धवैराग्यपरिपाकभग्नरागादिकषायमदिरामदं तु मनः पुरुषेणा-वजीयते वशीक्रियते । सोऽयमस्य वैराग्यहेतुको मनोविजयः शम इति वशीकारसंज्ञ इति चाख्यायते । विजितं च मनस्तत्त्वविषयविनियोगयोग्यतां नीयते, सेयमस्य योग्यता दमः । यथा दान्तोऽयं वृषभयुवा,
भामती-व्याख्या
होता है । 'इस असत्यात्मक प्रपञ्च में सत्य नाम की कोई वस्तु ही नहीं, तब सत्यासत्य-विवेक क्योंकर होगा ?'—ऐसी शङ्का नहीं कर सकते, क्योंकि यदि कोई सत्य वस्तु नहीं, तब असत्य पदार्थ भी निराधार क्योंकर उत्पन्न होगा ? शून्यवादी भी शून्यता को सत्य मानता है [श्री नागार्जुन शून्यता का स्वरूप बताते हैं—
कर्मक्लेशक्षयान्मोक्षः कर्मक्लेशाः विकल्पतः ।
ते प्रपञ्चात् प्रपञ्चस्तु शून्यतायां निरुध्यते ॥” ( म. शा. १८।५ ) ] ।
यह विवेकशील पुरुष-पुङ्गव अपने अनुभव और उपपत्ति के द्वारा जब गम्भीरतापूर्वक संसार चक्र का सिंहावलोकन करता है, तब ऊपर सत्यलोक से लेकर नीचे अवीचिसंज्ञक नरक लोक तक के विशाल सागर की जन्म-मरण रूपा विकराल प्रोत्तुङ्ग तरङ्गों पर अपने-सहित सभी जीवों को डूबते-उतराते देखता है, जैसा कि श्रुति कहती है—"जायस्व म्रियस्वेत्येतत् तृतीयं स्थानं तेनासौ लोकेन पूर्यते” ( छां. ४।१।१ ) । जन्मते-मरते सभी हैं, केवल उनकी आयु क्षण, मुहूर्त्त, मास, अहोरात्र, अर्धमास, मास, ऋतु, अयन, वत्सर, युग, चतुर्युग, मन्वन्तर, प्रलय, महाप्रलय, महासर्ग और अवान्तर सर्गादि के भेद से भिन्न होता है। यह सब कुछ देख-देख कर एक सच्चे विरक्त महापुरुष में विवेक-जनित उद्वेग की आँधी चलने लगती है, वह आँधी ही ऐसे वैराग्य का रूप धारण कर लेती है—"इहामुत्रार्थभोगविरागो भवति ।” 'अर्थ' पद 'अर्थ्यते प्रार्थ्यते'—इस व्युत्पत्ति के आधार पर फल का वाचक है, उस फल के उपभोग से वैराग्य (अनाभोगात्मिका उपेक्षा बुद्धि) उत्पन्न हो जाता है। उससे शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान नाम की षड्विध सम्पत्ति का लाभ होता है, क्योंकि राग-द्वेषादि दोषों की मदिरा के मद में चूर मानव-मन विविध उच्चावच विषयों में इन्द्रियों को प्रवृत्त कर प्रवृत्ति-जनित पुण्यापुण्य फलों का सञ्चयन करता हुआ मानव की अनन्त दुःखरूपी ज्वालाओं से व्याप्त संसाररूपी अग्नि में आहुति डालता है। विवेक के अभ्यास से प्राप्त वैराग्य का परिपाक रागादिरूपी मदिरा का मद उतार देता है, मद-विहीन मन को पुरुष जीत कर अपने वश में कर लेता है, वैराग्य से जनित इसी मानस-वशीकार की 'शम' संज्ञा होती है। वशीकृत मन में तत्त्वरूपी विषय की ओर अग्रसर होने की योग्यता प्राप्त हो जाती है, इसी योग्यता का नाम दम है, जैसे नये बल को लिए 'दान्तोऽयं वृषभयुवा'—ऐसा लोक-