भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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भामती
स्तीति वाच्यम्, तदभावे तदधिष्ठानस्यानृतस्याप्यनुपपत्तेः । शून्यवादिनार्मप शून्यताया एव सत्यत्वात् । अथास्य पुरुषधौरेयस्यानुभवोपपत्तिभ्यामेवं सुनिपुणं निरुपयत आ च सत्यलोकाद् आ चावीचेर्जायस्व म्रियस्वेति विपरिवर्त्तमानं क्षणमुहूर्त्तयामाहोरात्रार्धमासमासर्त्वयनवत्सरयुगचतुर्युगमन्वन्तरप्रलयमहाप्रलय-महासर्गावान्तरसर्गसंसारसागरोर्मिभिरनिशमुह्यमानं तापत्रयपरीतमात्मानं च जीवलोकं चावलोक्यास्मिन् संसारमण्डलेऽनित्याशुचिदुःखात्मकं प्रसंख्यानमुपावर्त्तते ततोऽस्यैतादृशान्नित्यानित्यवस्तुविवेकलक्षणात् प्रसंख्यानात् ॐ इहामुत्रार्थभोगविरागो भवति ॐ । अर्थ्यते प्रार्थ्यत इत्यर्थः फलमिति यावत्, तस्मिन् विरागोऽनाभोगात्मिकोपेक्षाबुद्धिः ।
ॐ ततः शमदमादिसाधनसम्पत् ॐ । रागादिकषायमदिरामत्तं हि मनस्तेषु तेषु विषयेषूच्चावच-मिन्द्रियाणि प्रवर्त्तयद्विविधाश्च प्रवृत्तीः पुण्यापुण्यफला भावयत् पुरुषमतिघोरे विविधदुःखज्वालाजटिले संसारहुतभुजि जुहोति । प्रसंख्यानाभ्यासलब्धवैराग्यपरिपाकभग्नरागादिकषायमदिरामदं तु मनः पुरुषेणा-वजीयते वशीक्रियते । सोऽयमस्य वैराग्यहेतुको मनोविजयः शम इति वशीकारसंज्ञ इति चाख्यायते । विजितं च मनस्तत्त्वविषयविनियोगयोग्यतां नीयते, सेयमस्य योग्यता दमः । यथा दान्तोऽयं वृषभयुवा,
भामती-व्याख्या
होता है । 'इस असत्यात्मक प्रपञ्च में सत्य नाम की कोई वस्तु ही नहीं, तब सत्यासत्य-विवेक क्योंकर होगा ?'—ऐसी शङ्का नहीं कर सकते, क्योंकि यदि कोई सत्य वस्तु नहीं, तब असत्य पदार्थ भी निराधार क्योंकर उत्पन्न होगा ? शून्यवादी भी शून्यता को सत्य मानता है [श्री नागार्जुन शून्यता का स्वरूप बताते हैं—
कर्मक्लेशक्षयान्मोक्षः कर्मक्लेशाः विकल्पतः ।
ते प्रपञ्चात् प्रपञ्चस्तु शून्यतायां निरुध्यते ॥” ( म. शा. १८।५ ) ] ।
यह विवेकशील पुरुष-पुङ्गव अपने अनुभव और उपपत्ति के द्वारा जब गम्भीरतापूर्वक संसार चक्र का सिंहावलोकन करता है, तब ऊपर सत्यलोक से लेकर नीचे अवीचिसंज्ञक नरक लोक तक के विशाल सागर की जन्म-मरण रूपा विकराल प्रोत्तुङ्ग तरङ्गों पर अपने-सहित सभी जीवों को डूबते-उतराते देखता है, जैसा कि श्रुति कहती है—"जायस्व म्रियस्वेत्येतत् तृतीयं स्थानं तेनासौ लोकेन पूर्यते” ( छां. ४।१।१ ) । जन्मते-मरते सभी हैं, केवल उनकी आयु क्षण, मुहूर्त्त, मास, अहोरात्र, अर्धमास, मास, ऋतु, अयन, वत्सर, युग, चतुर्युग, मन्वन्तर, प्रलय, महाप्रलय, महासर्ग और अवान्तर सर्गादि के भेद से भिन्न होता है। यह सब कुछ देख-देख कर एक सच्चे विरक्त महापुरुष में विवेक-जनित उद्वेग की आँधी चलने लगती है, वह आँधी ही ऐसे वैराग्य का रूप धारण कर लेती है—"इहामुत्रार्थभोगविरागो भवति ।” 'अर्थ' पद 'अर्थ्यते प्रार्थ्यते'—इस व्युत्पत्ति के आधार पर फल का वाचक है, उस फल के उपभोग से वैराग्य (अनाभोगात्मिका उपेक्षा बुद्धि) उत्पन्न हो जाता है। उससे शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान नाम की षड्विध सम्पत्ति का लाभ होता है, क्योंकि राग-द्वेषादि दोषों की मदिरा के मद में चूर मानव-मन विविध उच्चावच विषयों में इन्द्रियों को प्रवृत्त कर प्रवृत्ति-जनित पुण्यापुण्य फलों का सञ्चयन करता हुआ मानव की अनन्त दुःखरूपी ज्वालाओं से व्याप्त संसाररूपी अग्नि में आहुति डालता है। विवेक के अभ्यास से प्राप्त वैराग्य का परिपाक रागादिरूपी मदिरा का मद उतार देता है, मद-विहीन मन को पुरुष जीत कर अपने वश में कर लेता है, वैराग्य से जनित इसी मानस-वशीकार की 'शम' संज्ञा होती है। वशीकृत मन में तत्त्वरूपी विषय की ओर अग्रसर होने की योग्यता प्राप्त हो जाती है, इसी योग्यता का नाम दम है, जैसे नये बल को लिए 'दान्तोऽयं वृषभयुवा'—ऐसा लोक-
अतःशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ८५
च। तेषु हि सत्सु प्रागपि धर्मजिज्ञासाया ऊर्ध्वं च शक्यते ब्रह्म जिज्ञासितुं ज्ञातुं च, न विपर्यये। तस्मादथशब्देन यथोक्तसाधनसंपत्त्यानन्तर्यमुपदिश्यते। अतःशब्दो हेत्वर्थः। यस्माच्चैद एवाग्निहोत्रादीनां श्रेयःसाधनानामनित्यफलतां दर्शयति— 'तद्यथेह
भामती
हलशकटादिवहनयोग्यः कृत इति गम्यते। आदिग्रहणेन च विषयतितिक्षातदुपरमतत्त्वश्रद्धाः संगृह्यन्ते। अत एव श्रुतिः— "तस्मात् शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः श्रद्धावित्तो भूत्वाऽऽत्मन्येवात्मानं पश्येत् सर्व- मात्मनि पश्यति" इति। तदेतस्य शमदमादिरूपस्य साधनस्य सम्पत्प्रकर्षः शमदमादिसाधनसम्पत्। ततोऽस्य संसारबन्धनान्मुमुक्षा भवतीत्याह ॐ मुमुक्षुत्वं च ॐ । तस्य च नित्यशुद्धमुक्तसत्यस्वभावब्रह्मज्ञानं मोक्षस्य कारणमित्युपश्रुत्य तज्जिज्ञासा भवति धर्मजिज्ञासायाः प्रागूर्ध्वं च, तस्मात्तेषामेवानन्तर्यं न धर्मजिज्ञासाया इत्याह ॐ तेषु हि इति ॐ । न केवलं जिज्ञासामात्रमपि तु ज्ञानमपीत्याह ॐ ज्ञातुं च ॐ । उपसंहरति । ॐ तस्माद् इति ॐ । क्रमप्राप्तमतःशब्दं व्याचष्टे । ॐ अतःशब्दो हेत्वर्थः ॐ । तमेवातः- शब्दस्य हेतुरूपमर्थमाह ॐ यस्माद्देव एव इति ॐ । अत्रैवं परिचोद्यते—सत्यं यथोक्तसाधनसम्पत्त्यनन्तरं ब्रह्मजिज्ञासा भवति, सैव त्वनुपपन्ना, इहामुत्र फलोपभोगविरागस्यानुपपत्तेः। अनुकूलवेदनीयं हि फलम्, इष्टलक्षणत्वात् फलस्य। न चानुरागहेतावस्य वैराग्यं भवितुमर्हति। दुःखानुषङ्गदर्शनात् सुखेऽपि वैराग्य- मिति चेत्, हन्त भोः सुःखानुषङ्गाद् दुःखेष्वप्यनुरागो न कस्माद्भवति ? तस्मात्सुखे उपादीयमाने दुःखपरि-
भामती-व्याख्या
व्यवहार होता है, जो हल और शकटादि के खींचने योग्य हो जाता है। भाष्य में प्रयुक्त "शमदमादि" यहाँ आदि शब्द के द्वारा बाह्य विषयों की तितिक्षा, उनसे विरति और आत्मतत्त्व पर श्रद्धा का संग्रह किया जाता है। अत एव श्रुति कहती है— 'तस्माच्छान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः, श्रद्धावित्तो भूत्वा आत्मन्येवात्मानं पश्येत् सर्वमात्मनि पश्यति"। यह शम-दमादिरूप साधनों की सम्पत् (प्रकर्ष) है। शम-दमादि से सम्पन्न पुरुष में संसाररूपी बन्धन से मुमुक्षा उत्पन्न होती है— "मुमुक्षुत्वं च"। मुमुक्षु पुरुष को 'नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्यस्वरूप ब्रह्म का ज्ञान मोक्ष का साधन है'— ऐसा सुन कर ब्रह्म की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। यह ब्रह्म-जिज्ञासा धर्म-जिज्ञासा के पहले भी हो सकती है और पश्चात् भी, अतः विवेक-वैराग्यादि का ही आनन्तर्य ब्रह्म-जिज्ञासा में होता है, धर्म-जिज्ञासा या कर्मविबोध का आनन्तर्य नहीं ऐसा भाष्यकार कहते हैं— "तेषु हि सत्सु प्रागपि धर्म-जिज्ञासाया ऊर्ध्वं च शक्यते ब्रह्म जिज्ञासितुम्"। केवल ब्रह्म की जिज्ञासा ही नहीं होती, अपितु ब्रह्म का ज्ञान भी होता है— "ज्ञातुं च"। अथशब्दार्थ के निरूपण का उपसंहार किया जाता हैं— "तस्मादथ-शब्देन यथोक्तसाधनसम्पत्त्यानन्तर्यमुपदिश्यते"।
क्रम-प्राप्त सूत्रस्थ 'अतः' शब्द की व्याख्या की जाती है— "अतः शब्दो हेत्वर्थः"। उसी हेतुता का सामञ्जस्य किया जाता है— "यस्माद्देव एव"।
शङ्का—यह जो कहा है कि विवेक-वैराग्यादि साधनों की सम्पत्ति के अनन्तर ब्रह्म-जिज्ञासा होती है, वह सम्भव नहीं, क्योंकि इस लोक के भोगों से लेकर परलोक तक के उपभोगों से वैराग्य नहीं हो सकता। उपभोग या फल सदैव अनुकूल ही प्रतीत होता है, अभीष्ट पदार्थ को ही फल कहा जाता है, वह सभी के अनुराग का कारण होता है, उससे वैराग्य क्योंकर होगा ? 'यद्यपि सुखात्मक वस्तु से स्वरूपतः वैराग्य सम्भव नहीं, तथापि लौकिक सुख दुःख-मिश्रित है, अतः उससे वैराग्य हो सकता है'— ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जब लोक में सुख और दुःख मिश्रित हैं, तब मिश्रित तत्त्व से वैराग्य ही क्यों ? दुःख में सुख के सम्बन्ध से अनुराग क्यों नहीं ? अतः न्यायोचीत मार्ग यह है कि सुख के ग्रहण और
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भामती
हारे प्रयत्नितव्यम् अवर्जनीयतया दुःखमागतमपि परिहृत्य सुखमात्रं भोक्तव्यते । तद्यथा—मत्स्यार्थी सशष्कुलान् सकण्टकान् मत्स्यानुपादत्ते, स यावदादेयं तावदादाय विनिवर्त्तते । यथा वा—धान्यार्थी सपलालानि धान्यान्याहरति, स यावदादेयं तावदुपादाय निवर्त्तते । तस्माद् दुःखभयान्नानुकूलवेदनीयमैहिकं वाऽऽमुष्मिकं वा सुखं परित्यक्तुमुचितम् । नहि मृगाः सन्तीति शालयो नोप्यन्ते, भिक्षुकाः सन्तीति स्थाल्यो नाधिश्रीयन्ते । अपि च दृष्टं सुखं चन्दनवनिताबिससङ्गजन्म क्षयितालक्षणेन दुःखेनैवाघ्रातत्वादतिभीषणा त्यज्येतापि, न त्वामुष्मिकं स्वर्गादि, तस्याविनाशित्वात् । श्रूयते हि “अपाम सोमममृता अभूम” इति । तथा च “अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति” । न च कृतकत्वहेतुकं विनाशित्वानुमानमत्र सम्भवति । नरशिरःकपालशौचानुमानवदागमबाधितविषयत्वात् । तस्माद्यथोक्तसाधनसम्पत्त्यभावान्न ब्रह्मजिज्ञासेति प्राप्तम् ।
एवं प्राप्ते आह भगवान् सूत्रकारः ॐ अतः इति ॐ । तस्यार्थं व्याचष्टे भाष्यकारः ॐ यस्माद् वेद एव इति ॐ । अयमभिसन्धिः—सत्यं मृगभिक्षुकादयः शक्याः परिहर्तुं पाचककृषीवलादिभिः, दुःखं त्वनेकविधानेककारणसम्पातजमशक्यपरिहारम् अन्ततः साधनपारतन्त्र्यक्षयितालक्षणयोर्दुःखयोः समस्तकृतकसुखाविनाभावनियमात् । नहि मधुविषसंपृक्तमन्नं विषं परित्यज्य समधु शक्यं शिल्पिप्रवरेणापि भोक्तुम् । क्षयितानुमानोपोद्वलितं च “तद्यथेह कर्मचितः” इत्यादि वचनं क्षयिताप्रतिपादकम् “अपाम सोमम्”
भामती-व्याख्या
दुःख के परिहार में यत्नशील होना चाहिए । अवर्जनीयतया दुःख यदि प्राप्त भी हो जाता है, तब उसको छोड़ कर सुख का उपभोग वैसे ही करना चाहिए, जैसे मछली खानेवाला व्यक्ति काँटे-कूँटे के साथ ही मछली लाता है, किन्तु उसमें जितना उपादेय भाग होता है, उतना लेकर शेष छोड़ देता है । अथवा जैसे छिलकों (भूसी) के साथ धान लेकर उसमें से चावल निकाल कर भूसी का त्याग कर दिया जाता है । उसी प्रकार दुःख के भय से अनुकूल वेदनीय सुख का परित्याग करना उचित नहीं । लोक में खेती को हानि पहुँचानेवाले मृग (जानवर) हैं, तो क्या खेती बीजी नहीं जाती ? भिक्षुकों के डर के मारे क्या भोजन नहीं पकाया जाता ?
दूसरी बात यह भी है कि लोक-प्रसिद्ध चन्दन, वनिता, आदि के सम्पर्क से जनित सुख की क्षयिता और दुःखमिश्रितता को देखकर उसका परित्याग किया भी जा सकता है किन्तु पारलौकिक स्वर्गादि सुखों का त्याग सम्भव नहीं, क्योंकि वे नित्य माने गये हैं । “अपां सोमममृता अभूम” (शत. ब्रा. २।६।२।१), “अक्षय्यं हवै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति” (अथर्वशि० ३) “स्वर्गादिसुखं विनाशि, कृतकत्वाद् घटादिवत्”—इस प्रकार का अनुमान वैसे ही आगम प्रमाण से बाधित है, जैसे कि “नरशिरःकपालं शुचि, प्राण्यङ्गत्वात्”—यह अनुमान “नारं स्पृष्ट्वाऽस्थि सस्नेहं सवासा जलमाविशेत्” इत्यादि आगमों के द्वारा बाधित है । इसलिए कथित वैराग्यादि-घटित साधनों का सम्पादन सम्भव न हो सकने के कारण ब्रह्मजिज्ञासा क्योंकर उपपन्न होगी ?
समाधान—उक्त आशंका का निराकरण भाष्यकार कर रहे हैं—'यस्माद् वेद एव' इत्यादि । आशय यह है कि लोक-विश्रुत मृग और भिक्षुक आदि का निवारण कृषिवल आदि कर सकते हैं किन्तु लौकिक सुख में मिश्रित दुःख का परित्याग सम्भव नहीं । एवं लौकिक सुख की क्षयिता के कारण भी परित्याग ही न्यायोचित है । “तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयते” (छां. उ. ८।१।६) इत्यादि वचन मुख्यरूप से जन्य सुख की क्षयिता के प्रतिपादक हैं किन्तु “अपां सोमम्' इत्यादि वाक्य अर्थवाद होने के कारण मुख्यार्थ के प्रतिपादक नहीं माने जाते, जैसा कि पौराणिकों ने माना है—“आभूतसम्प्लवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते”
अन्तःशब्दार्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ८७
कर्मचितो लोकः क्षीयते; एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते' (छान्दो० ८।१।६) इत्यादिः। तथा ब्रह्मविज्ञानादपि परं पुरुषार्थं दर्शयति - 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्' (तैत्ति० २।१) इत्यादिः। तस्माद्यथोक्तसाधनसंपत्त्यनन्तरं ब्रह्मजिज्ञासा कर्तव्या। ब्रह्मणो जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा। ब्रह्म च वक्ष्यमाणलक्षणं 'जन्माद्यस्य यतः' इति। अत एव न 'ब्रह्म' शब्दस्य जात्याद्यर्थान्तरमाशङ्कितव्यम्। ब्रह्मण इति कर्मणि षष्ठी, न शेषे;
भामती
इत्यादिकं वचनं मुख्यासम्भवे जघन्यवृत्तितामापादयति। यथाहुः पौराणिकाः- 'आभूतसंप्लवं स्थानममृतत्वं हि भाष्यते' इति।
अत्र च ब्रह्मपदेन तत्प्रमाणं वेद उपस्थापितः। स च योग्यत्वात्तद्यथेह कर्मचितः' इत्यादिरत इति सर्वनाम्ना परामृश्य हेतुपञ्चम्या निर्दिश्यते। स्यादेतत् - यथा स्वर्गादेः कृतकस्य सुखस्य दुःखानुषङ्गतस्तथा ब्रह्मणोऽपीत्यत आह ॐ तथा ब्रह्मविज्ञानादपि इति ॐ। तेनायमर्थः - अतः स्वर्गादीनां क्षयिताप्रतिपादकाद् ब्रह्मज्ञानस्य च परमपुरुषार्थताप्रतिपादकादागमाद् यथोक्तसाधनसम्पत् तत्त्वञ्च जिज्ञासेति सिद्धम्।
ब्रह्मजिज्ञासापदव्याख्यानमाह ॐ ब्रह्मणः इति ॐ। षष्ठीसमासप्रदर्शनेन प्राचां वृत्तिकृतां ब्रह्मणे जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासेति चतुर्थीसमासः परास्तो वेदितव्यः। तादर्थ्यसमासे प्रकृतिविकृतिग्रहणं कर्त्तव्यमिति कात्यायनीयवचनेन यूपदारुर्वादिव्वेव प्रकृतिविकारभूतेषु चतुर्थीसमासनियमाद्, अप्रकृतिविकारभूत इत्येवमादौ तन्निषेधात्। अश्वघासादयः षष्ठीसमासा भविष्यन्तीत्यश्वघासादिषु षष्ठीसमासप्रतिविधानात्। षष्ठीसमासेऽपि च ब्रह्मणो वास्तवप्राधान्योपपत्तेरिति। स्यादेतद्-ब्रह्मणो जिज्ञासेत्युक्ते तत्रान्नेकार्थत्वाद् ब्रह्मशब्दस्य संशयः, कस्य ब्रह्मणो जिज्ञासेति? अस्ति ब्रह्मशब्दो विप्रत्वजातौ, यथा-ब्रह्महत्येति। अस्ति
भामती-व्याख्या
(वि. पु. २।८।९६)। अर्थात् भूतसंप्लव या महाप्रलय-पर्यन्त जो स्थायी होता है, उसे अमृत (या अनश्वर) कह दिया जाता है। 'ब्रह्मविज्ञानादपि' इस भाष्य में प्रयुक्त ब्रह्म पद के द्वारा ब्रह्मविषयक प्रमाणभूत वेद और उसमें भी योग्यता के आधार पर 'तद्यथेह कर्मचितः' इत्यादि वैदिक वाक्य गृहीत होते हैं। हेत्वर्थक पञ्चमी के द्वारा उक्त वाक्य का प्रसङ्ग उपस्थित हो जाता है। अतः श्रीभास्कराचार्य ने जो भाष्यकार पर अनुपस्थित विवेकादि के आनन्तर्य के प्रतिपादन का आरोप लगाया है, वह निराधार होकर रह जाता है। जैसे स्वर्गादिरूप सुख में दुःख का सम्बन्ध होता है, वैसा ब्रह्मरूप सुख में नहीं है। अतः स्वर्गादि में क्षयित्वप्रतिपादन के माध्यम से ब्रह्मज्ञान की परम पुरुषार्थ-हेतुता स्पष्ट हो जाती है, जैसा कि श्रुति कहती है—"ब्रह्मविदाप्नोति परम्" (तै. उ. २।१)। भाष्यकार ने 'ब्रह्मणो जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा'—ऐसा षष्ठीसमास दिखाकर अपने से पूर्ववर्त्ती वृत्तिकार के द्वारा प्रदर्शित 'ब्रह्मणे जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा'—इस प्रकार के चतुर्थीसमास का निराकरण ध्वनित कर दिया है, क्योंकि 'तादर्थ्यसमासे प्रकृतिविकृतिग्रहणं कर्त्तव्यम्'—इस प्रकार कात्यायन-वचन के द्वारा यूप-दारु आदि परिगणित स्थानों पर ही चतुर्थीसमास मानते हैं, सर्वत्र नहीं। ब्रह्मजिज्ञासा के समान प्रकृतिविकारभाव-रहित स्थल पर निषेध एवं 'अश्वघासादयः षष्ठीसमासा भविष्यन्ति' इत्यादि वचनों के द्वारा ब्रह्मजिज्ञासा आदि पदों में षष्ठीसमास का विधान माना गया है। षष्ठीसमास में भी ब्रह्म की प्रधानता अक्षुण्ण रह जाती है।
शङ्का - 'ब्रह्मणो जिज्ञासा'—ऐसा कहने पर भी ब्रह्मशब्द के अनेक अर्थों को ध्यान में रखकर सन्देह उपस्थित हो जाता है कि किस ब्रह्म की जिज्ञासा प्रस्तुत की जा रही है? ब्रह्म शब्द विप्रत्व जाति में प्रयुक्त होता है, जैसे कि 'ब्रह्महत्या'। ब्रह्म शब्द वेद में भी प्रयुक्त है, जैसे कि 'ब्रह्मोज्झम्' एवं परमात्मा का भी वाचक ब्रह्म शब्द होता है जैसे कि 'ब्रह्मवेद
८८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १
जिज्ञास्यापेक्षत्वाज्जिज्ञासायाः, जिज्ञास्यान्तरानिर्देशाच्च । ननु शेषषष्ठीपरिग्रहेऽपि
भामती
च वेदे, यथा—ब्रह्मोज्झमिति अस्ति च परमात्मनि, यथा—ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवतीति तमिमं संशयमपा- करोति ॐ ब्रह्म च वक्ष्यमाणलक्षणम् इति ॐ । यतो ब्रह्मजिज्ञासां प्रतिज्ञाय तज्ज्ञापनाय परमात्मलक्षणं प्रणयति ततोऽवगच्छामः परमात्मजिज्ञासैवेयं न विप्रत्वजात्यादिजिज्ञासेत्यर्थः ।
षष्ठीसमासपरिग्रहेऽपि नेयं कर्मषष्ठी, किन्तु शेषलक्षणा, सम्बन्धमात्रं च शेष इति ब्रह्मणो जिज्ञासे- त्युक्ते ब्रह्मसम्बन्धिनी जिज्ञासेत्युक्तं भवति । तथा च ब्रह्मस्वरूपप्रमाणयुक्तिसाधनप्रयोजनजिज्ञासाः सर्वा ब्रह्मजिज्ञासार्थ्या ब्रह्मजिज्ञासायाऽवरुद्धा भवन्ति । साक्षात्पारम्पर्येण च ब्रह्मसम्बन्धात् । कर्मषष्ठ्यां तु ब्रह्मशब्दार्थः कर्म, स च स्वरूपमेवेति तत्प्रमाणादयो नावरुध्येरन्, तथा चाप्रतिज्ञातार्थचिन्ता प्रमाणादिषु भवेदिति ये मन्यन्ते तान् प्रत्याह ॐ ब्रह्मणः इति । ॐ कर्मणि इति ॐ । अत्र हेतुमाह ॐ जिज्ञास्येति ॐ । इच्छायाः प्रतिपत्त्यनुबन्धो ज्ञानं, ज्ञानस्य च ज्ञेयं ब्रह्म, न खलु ज्ञानं ज्ञेयं विना निरूप्यते, न च जिज्ञासा ज्ञानं विनेति प्रतिपत्त्यनुबन्धत्वात् प्रथमं जिज्ञासा कर्मैवापेक्षते, न तु सम्बन्धमात्रम् । तदन्तरेणापि सति कर्मणि तन्निरूपणात् । नहि चन्द्रमसमादित्यं चोपलभ्य कस्यायमिति सम्बन्ध्यन्वेषणा भवति । भवति तु
भामती-व्याख्या
ब्रह्मैव भवति' ।
समाधान—उक्त शंका का परिहार करते हुए भाष्यकार कहते हैं—'ब्रह्म च वक्ष्य- माणलक्षणम्' । ब्रह्मजिज्ञासा की प्रतिज्ञा करने के अनन्तर द्वितीय सूत्र में सूत्रकार परमात्मा का लक्षण कर रहे हैं, उससे यह नितान्त स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्म-जिज्ञासा पद में 'ब्रह्म' पद परमात्मा का ही वाचक है, विप्रत्वादि जाति का नहीं । षष्ठी-समास में भी कर्मषष्ठी नहीं अपितु शेषषष्ठी का ही परिग्रह किया जाता है । सम्बन्धमात्र का शेष पद से विधान किया गया है । ब्रह्मणो जिज्ञासा ऐसा कहने से ब्रह्मसम्बन्धी जिज्ञासा प्रतीत होती है । इस प्रकार ब्रह्म के स्वरूप, प्रमाण, युक्ति, साधन और प्रयोजन आदि की जिज्ञासा ब्रह्मजिज्ञासा में समाविष्ट हो जाती है । फलतः चतुर्लक्षणी वेदान्तमीमांसा का ग्रहण ब्रह्मजिज्ञासा पद से हो जाता है, क्योंकि साक्षात् या परम्पराया ब्रह्म का सम्बन्ध सर्वत्र है । कर्मषष्ठी का ग्रहण करने पर केवल ब्रह्मशब्दार्थ कर्म होता है वह केवल स्वरूप का ही उपस्थापक होता है, प्रमाणादि का संग्राहक नहीं । जो लोग प्रमाणादि के ग्रहण में अप्रतिज्ञात चर्चा का प्रसङ्ग उद्भावित करते हैं, उनके लिए कहा गया है—"ब्रह्मण इति कर्मणि षष्ठी न शेषे" । उसका कारण स्पष्ट करते हुए कहा गया है—जिज्ञास्यापेक्षत्वात् जिज्ञासायाः । इच्छा का विषय है ज्ञान और ज्ञान का ज्ञेय है ब्रह्म । ज्ञेय के बिना ज्ञान का निरूपण सम्भव नहीं और ज्ञान के बिना जिज्ञासा का निरूपण नहीं हो सकता । ज्ञानकर्मक इच्छारूप जिज्ञासा सर्वप्रथम ज्ञान की ही अपेक्षा करती है, सम्बन्धि-मात्र की नहीं । सम्बन्धिसामान्य के बिना भी कर्म का निरूपण किया जा सकता है, जैसे कि चन्द्रमा और आदित्य को देखकर 'कस्यायम्' इस प्रकार की सम्बन्धिसामान्य की अपेक्षा नहीं देखी जाती, किन्तु 'ज्ञानम्' ऐसा सुनने पर 'किविषयकं ज्ञानम् ?' इस प्रकार कर्म की ही अपेक्षा होती है । अतः प्रथम अपेक्षा के बल पर ब्रह्म का जिज्ञासा के साथ कर्मत्वेन ही सम्बन्ध होता है, सामान्य सम्बन्धितया नहीं, क्योंकि सामान्य सम्बन्धिता मुख्य नहीं, गौण मानी जाती है । इस प्रकार 'ब्रह्मणः' में कर्मार्थक षष्ठी विभक्ति मानी गई है । यदि कहा जाय कि जिज्ञास्य पदार्थ के बिना जिज्ञासा का निरूपण नहीं हो सकता—यह ठीक है किन्तु ब्रह्म को छोड़कर जिज्ञास्य कोई अन्य भी हो सकता है । तो वैसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि "जिज्ञास्यान्तरानिर्देशाच्च" ।
षष्ठ्यर्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ८९
षष्ठ्यर्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ८९
ब्रह्मणो जिज्ञासाकर्मत्वं न विरुध्यते, संबन्धसामान्यस्य विशेषनिष्ठत्वात् । एवमपि प्रत्यक्षं ब्रह्मणः कर्मत्वमुत्सृज्य, सामान्यद्वारेण परोक्षं कर्मत्वं कल्पयतो व्यर्थः प्रयासः स्यात् । न व्यर्थः, ब्रह्माभ्रिताशेषविचारप्रतिज्ञानार्थत्वादिति चेन्न, प्रधानपरिग्रहे तदपेक्षितानामार्थाक्षिप्तत्वात् । ब्रह्म हि ज्ञानेनाप्तुमिष्टतमत्वात्प्रधानम् । तस्मिन्प्रधाने जिज्ञासाकर्मणि परिगृहीते यैर्जिज्ञासितैर्विना ब्रह्म जिज्ञासितं न भवति, तान्यर्थाक्षिप्तान्येवेति न पृथक्सूत्रयितव्यानि । यथा राजासौ गच्छतीत्युक्ते सपरिवारस्य राज्ञो गमनमुक्तं भवति, तद्वत् । श्रुत्यनुगमाच्च—‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' (तैत्ति० ३।१) इत्याद्याः श्रुतयः, 'तद्विजिज्ञासस्व, तद्ब्रह्म (तैत्ति० ३।१) इति प्रत्यक्षमेव ब्रह्मणो जिज्ञासाकर्मत्वं दर्शयन्ति । तच्च कर्मणि षष्ठीपरिग्रहे सूत्रेणानुगतं भवति ।
भामती
ज्ञानमित्युक्ते विषयान्वेषण। किविषयमिति ? तस्मात्प्रथममपेक्षितत्वात् कर्मतयेव ब्रह्म सम्बध्यते, न सम्बन्धितामात्रेण, तस्य जघन्यत्वात् । तथा च कर्मणि षष्ठीत्यर्थः । ननु सत्यं न जिज्ञास्यमन्तरेण जिज्ञासा निरूप्यते, जिज्ञास्यान्तरं त्वस्या भविष्यति, ब्रह्म तु शेषतया सम्भन्त्स्यते इत्यत आह ॐ जिज्ञासास्तरेति ॐ । निगूढाभिप्रायश्चोदयति ॐ ननु शेषषष्ठीपरिग्रहेऽपि इति ॐ । सामान्यसम्बन्धस्य विशेषसम्बन्धाविरोघेन कर्मताया अविघातेन जिज्ञासािरुपणोपपत्तेरित्यर्थः ।
निगूढाभिप्राय एव दूषयति ॐ एवमपि प्रत्यक्षं ब्रह्मणः इति ॐ । वाच्यस्य कर्मत्वस्य जिज्ञासाया प्रथममपेक्षितस्य प्रथमसम्बन्धार्हस्य चान्वयपरित्यागेन पश्चात् कथञ्चिदपेक्षितस्य सम्बन्धमात्रस्य सम्बन्धौ जघन्यः प्रथमः प्रथमश्च जघन्य इति सुव्याहृतं न्यायतत्त्वम् । प्रत्यक्षपरोक्षाभिधानं च प्राथम्याप्राथम्यस्फुटत्वास्फुटत्वाभिप्रायम् । चोदकः स्वाभिप्रायमुद्घाटयति ॐ न व्यर्थो ब्रह्माभ्रिताशेषेति ॐ । व्याख्यातमेतदधस्तात् । समाधाता स्वाभिसन्धिमुद्घाटयति ॐ न, प्रधानपरिग्रहे इति ॐ । वास्तवं प्राधान्यं ब्रह्मणः । शेषं सनिदर्शनमतिरोहितार्थं, श्रुत्यनुगमश्चातिरोहितः ।
भामती-व्याख्या
शेषार्थक षष्ठी मानकर भी ब्रह्मगत कर्मता का उपपादन किया जा सकता है—इस आशय को मन में रखकर शेष-षष्ठीवादी शङ्का करता है—“ननु शेषषष्ठीपरिग्रहेऽपि” । 'निर्विशेषं न सामान्यम्'—इस न्याय के अनुसार सामान्य सम्बन्ध का किसी-न-किसी विशेष अर्थ में पर्यवसान मानना होगा, अतः कर्मता में ही उसका तात्पर्य मानकर ब्रह्मकर्मक जिज्ञासा का उपपादन किया जा सकता है। द्राविड़ प्राणायाम का प्रसङ्ग स्मरण कर सिद्धान्ती (कर्मषष्ठीवादी) उक्त शङ्का का निरास करता है—“एवमपि प्रत्यक्षं ब्रह्मणः कर्मत्वमुत्सृज्य ।” उक्त षष्ठी किस अर्थ में प्रयुक्त है ? इस आकांक्षा में प्रथमतः कर्मता का प्रस्ताव ठुकराकर शेष-षष्ठी मान कर पुनः शेषता का कर्मता में उपसंहार करना कर्मतारूप मुख्य अर्थ को गौणता और गौणभूत शेष-षष्ठी को मुख्यता प्रदान करना अत्यन्त अनुचित है और निरर्थक श्रममात्र है। शेष-षष्ठीवादी अपने श्रम की निरर्थकता का परिहार करता है— “न व्यर्थः” । शेष-षष्ठी मानने पर ब्रह्म-सम्बन्धी प्रमाणादि के विचार को प्रतिज्ञा-वाक्य में समाहित करने के लिए शेष-षष्ठी मानना सार्थक है, निरर्थक नहीं। कर्मता-षष्ठीवादी अपना मन्तव्य उद्घाटित कर रहा है—“न, प्रधानपरिग्रहे तदपेक्षितानामार्थाक्षिप्तत्वात्” । संक्षिप्त समाधान का ही विस्तार किया जाता है—“ब्रह्म हि ज्ञानेनाप्तुमिष्टम्” । आशय यह है कि कर्म-षष्ठी मानकर ब्रह्म की प्रधानता का लाभ होता है, प्रधानभूत अर्थ की जिज्ञासा प्रतिज्ञात होने पर अङ्गभूत सभी पदार्थों की जिज्ञासा वैसे ही प्रतिज्ञात हो जाती है, जैसे 'राजासौ गच्छति'—ऐसा कहने पर राजा का समस्त परिजन-वर्ग गृहीत हो जाता है ।
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| ९० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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तस्माद् ब्रह्मण इति कर्मणि षष्ठी । ज्ञातुमिच्छा जिज्ञासा । अवगतिपर्यन्तं ज्ञानं सन्वाच्याया इच्छायाः कर्म, फलविषयत्वादित्छायाः । ज्ञानेन हि प्रमाणेनावगन्तुमिष्टं ब्रह्म । ब्रह्मावगतिर्हि पुरुषार्थः, निःशेषसंसारबीजाविद्याद्यनर्थनिबर्हणात् । तस्माद् ब्रह्म
भामती
तदेवमभिमतं समासं व्यवस्थाप्य जिज्ञासापदार्थमाह ॐ ज्ञातुम् इति ॐ । स्यादेतत्—न ज्ञानमिच्छाविषयः । सुखदुःखावाप्तिपरिहारौ वा तदुपायौ वा तद्द्वारेणेच्छागोचरः । न चैवं ब्रह्मविज्ञानम् । न खल्वेतदनुकूलमिति वा प्रतिकूलनिवृत्तिरिति वाऽनुभूयते । नापि तयोरुपायः, तस्मिन् सत्यपि सुखभेदस्यादर्शनात् । अनुवर्त्तमानस्य च दुःखस्यानिवृत्तेः । तस्मान्न सूत्रकारवचनमात्राद्विषिकर्मता ज्ञानस्येत्यत आह ॐ अवगतिपर्यन्तम् इति ॐ । न केवलं ज्ञानमिष्यते किन्त्ववगतिं साक्षात्कारं कुर्वदवगतिपर्यन्तं सन्वाच्याया इच्छायाः कर्म । कस्मात् ? फलविषयत्वादित्छायाः तदुपायं फलपर्यन्तं गोचरयतीच्छेति शेषः । ननु भवत्ववगतिपर्यन्तं ज्ञानं, किमेतावतापीष्टं भवति । न ह्यपेक्षणीयविषयमवगतिपर्यन्तमपि ज्ञानमिष्यत इत्यत आह ॐ ज्ञानेन हि प्रमाणेनावगन्तुमिष्टं ब्रह्म ॐ । भवतु ब्रह्मविषयावगतिः, एवमपि कथमिष्टेत्यत आह ॐ ब्रह्मावगतिर्हिपुरुषार्थः ॐ । किमभ्युदयः ? न, किन्तु निःश्रेयसं विगलितनिखिलदुःखानुषङ्गपरमानन्दघनब्रह्मावगतिर्ब्रह्मणः स्वभाव इति सैव निःश्रेयसं पुरुषार्थ इति । स्यादेतत्—न ब्रह्मावगतिः पुरुषार्थः । पुरुषव्यापारव्याप्यो हि पुरुषार्थः । न चास्या ब्रह्मस्वभावभूताया उत्पत्तिविकारसंस्कारप्राप्तयः सम्भवन्ति । तथा सत्यनित्यत्वेन तत्स्वभावत्वानुपपत्तेः । न चोत्पत्त्याद्यभावे व्यापारव्याप्यता । तस्मान्न ब्रह्मावगतिः पुरुषार्थ इत्यत आह ॐ निःशेषसंसारवीजाविद्याद्यनर्थनिबर्हणात् ॐ । सत्यं ब्रह्मावगतौ ब्रह्मस्वभावे नोत्पत्त्यादयः सम्भवन्ति । तथाप्यनिर्वचनीयानाद्यविद्यावशाद् ब्रह्मस्वभावोऽ-
भामती-व्याख्या
'जिज्ञासा' पद का अर्थ किया जाता है—"ज्ञातुमिच्छा" ।
**शङ्का—**ऊपर ज्ञान को जो इच्छा का विषय माना गया, वह उचित नहीं, क्योंकि स्वभावतः सुख की प्राप्ति, दुःख का परिहार एवं उनके उपायभूत पदार्थ ही इच्छा के विषय माने जाते हैं, ब्रह्म-ज्ञान न तो सुखरूप हैं, क्योंकि अनुकूल वेदनीय नहीं । न दुःख की निवृत्तिरूप है और न उनका उपाय रूप ही है, क्योंकि उसके होने पर भी न तो सुखादि की प्राप्ति देखी जाती है और न वर्तमान दुःख की निवृत्ति । केवल सूत्रकार के वैसा कह देने मात्र से ज्ञान को इच्छा का विषय नहीं माना जा सकता ।
**समाधान—**भाष्यकार ने उक्त शङ्का का निराकरण करने के लिए ज्ञान का परिष्कार किया है—"अवगतिपर्यन्तं ज्ञानम्" । केवल ज्ञान को इच्छा का कर्म नहीं माना जाता, अपितु आत्मा का साक्षात्कारात्मक ज्ञान विवक्षित है, क्योंकि इच्छा सदैव फलविषयिणी होती है, फल है—मोक्षरूप सुख, अतः इच्छा उसके उपायभूत विचार-जन्य ब्रह्म-साक्षात्कार को विषय करती है । अवगति-पर्यन्त ज्ञान की विवक्षा होने पर अभीष्ट-सिद्धि का प्रकार बताया जाता है—"ज्ञानेन हि प्रमाणेनावगन्तुमिष्टं ब्रह्म, ब्रह्मावगतिर्हि पुरुषार्थः" । 'पुरुषार्थ' पद से यहाँ अभ्युदयरूप पुरुषार्थ विवक्षित नहीं, अपितु मोक्ष अभिप्रेत है, जो कि सभी प्रकार के दुःखों के सम्बन्ध से रहित परमानन्द-घन ब्रह्म की अवगति ब्रह्म का ही स्वरूप है, उसको ही निःश्रेयस् या मोक्ष कहते हैं । ब्रह्मस्वरूपभूत मोक्ष की उत्पत्ति, विकृति या संस्कार सम्भव नहीं, अन्यथा ( उत्पत्त्यादि मानने पर ) मोक्ष अनित्य होकर नित्य कूटस्थ ब्रह्म का स्वरूप न हो सकेगा । मोक्ष की जब उत्पत्त्यादि सम्भव नहीं, तब वह पुरुष के किसी व्यापार से साध्य न होने के कारण पुरुषार्थ क्योंकर बन सकेगा ? इस प्रश्न का उत्तर है—"निःशेषसंसारबीजाविद्याद्यनर्थनिबर्हणात्" । यद्यपि ब्रह्मस्वरूपभूत ब्रह्म की अवगति के उत्पत्त्यादि सम्भव नहीं, तथापि
ब्रह्मप्रसिद्धिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ९१
विजिज्ञासितव्यम् । तत्पुनर्ब्रह्म प्रसिद्धमप्रसिद्धं वा स्यात् । यदि प्रसिद्धं, न जिज्ञासि-
भामती
पराधीनप्रकाशोऽपि प्रतिभासमानोऽपि न प्रतिभातीव पराधीनप्रकाश इव देहेन्द्रियादिभ्यो भिन्नोऽप्यभिन्न इव भासत इति संसारबीजाविद्याद्यनर्थनिबर्हणात् प्रागप्राप्त इव तस्मिन् सति प्राप्त इव भवतीति पुरुषेणार्थ्यमानत्वात् पुरुषार्थ इति युक्तम् । अविद्यादीत्यादिप्रग्रहणेन तत्संस्कारोऽवरुध्यते । अविद्याविनिवृत्तिस्तूपासनाकार्यादन्तःकरणवृत्तिभेदात् साक्षात्कारादिति द्रष्टव्यम् ।
उपसंहरति * तस्माद् ब्रह्म जिज्ञासितव्यमुक्तलक्षणेन मुमुक्षुणा * । न खलु तज्ज्ञानं विना सवासनविविधदुःखनिदानमविद्योच्छिद्यते । न च तदुच्छेदमन्तरेण विगलितनिखिलदुःखानुषङ्गानन्दघनब्रह्मात्मतासाक्षात्काराविर्भावो जीवस्य । तस्मादानन्दघनब्रह्मात्मतामिच्छता तदुपायो ज्ञानमेषितव्यम् । तच्च न केवलेभ्यो वेदान्तेभ्योऽपि तु ब्रह्ममीमांसोपकरणेभ्य इति इच्छामुखे ब्रह्ममीमांसायां प्रवर्त्यते, न तु वेदान्तेषु तदर्थविवक्षायां वा । तत्र फलवदर्थावबोधपरतां स्वाध्यायाध्ययनविधेः सूत्रयताऽथातो धर्मजिज्ञासेत्यनेनैव प्रवर्तितत्वाद्, धर्मग्रहणस्य वेदार्थोपलक्षणत्वेनाधर्मवद् ब्रह्मणोऽप्युपलक्षणाच्च । यद्यपि च धर्ममीमांसावद् वेदार्थमीमांसा ब्रह्ममीमांसाप्याक्षेप्तुं शक्यते, तथापि प्राञ्च्या मीमांसया न तद् व्युत्पाद्यते, नापि ब्रह्ममीमांसाया अध्ययनमात्रानन्तर्यमिति ब्रह्ममीमांसारम्भाय नित्यानित्यविवेकाद्यानन्तर्यप्रदर्शनार्थं
भामती-व्याख्या
ब्रह्म का वह स्वरूप अनिर्वचनीय अनादि अविद्यारूप आवरण से आवृत होने के कारण अप्रतिभात, पर प्रकाश और देहेन्द्रियादि से भिन्न होने पर भी अभिन्न-जैसा प्रतीत होता है । संसाररूप अनर्थ पदार्थों के कारणीभूत अनिर्वचनीय अज्ञान की निवृत्ति से पहले अप्राप्त और अविद्या की निवृत्ति हो जाने पर प्राप्त-जैसा होकर पुरुषार्थ बन जाता है । यहाँ "अविद्यादि"-इस आदि पद के द्वारा अविद्या-जनित संस्कार विवक्षित हैं । अविद्या की निवृत्ति ब्रह्मोपासना के कार्यभूत मानस वृत्ति विशेषरूप साक्षात्कार से होती है—यह कहा जा चुका है । जिज्ञासा-प्रसङ्ग का उपसंहार किया जाता है—"तस्माद् ब्रह्म जिज्ञासितव्यम्" । अर्थात् विवेक-वैराग्यादि साधनों से सम्पन्न मुमुक्षु के द्वारा उक्त ब्रह्म अवश्य जिज्ञासितव्य है, क्योंकि ब्रह्म-ज्ञान के बिना विविध दुःखों की कारणीभूत अविद्या का समूल उच्छेद नहीं हो सकता, उस उच्छेद के बिना जीव को निखिल दुःख-सम्बन्ध से रहित ब्रह्म का अभेद-साक्षात्कार नहीं हो सकता, अतः आनन्द-घन ब्रह्म के अभेद-साक्षात्कार की इच्छा रखनेवाले मुमुक्षु को उक्त साक्षात्कार के उपाय की गवेषणा करनी चाहिए । वह साक्षात्कार केवल वेदान्त-वाक्यों से नहीं, अपितु ब्रह्म-मीमांसारूप सहायक तर्क से संवलित वेदान्त-वाक्यों के द्वारा सम्पन्न होता है । सामान्यतः ज्ञात और विशेषतः सन्दिग्ध ब्रह्म के जानने की इच्छा सहजत: मुमुक्षु पुरुष को होती है, जिससे अनुप्राणित हो कर वह ब्रह्म-विचार में प्रवृत्त होता है, केवल वेदान्तार्थ-ज्ञान की इच्छा से नहीं, क्योंकि केवल अर्थ-ज्ञान की इच्छा रखनेवाले पुरुष की प्रवृत्ति तो महर्षि जैमिनि के अध्ययन-विधि-सूचक "अथातो धर्मजिज्ञासा" (जै. सू. १।१।१) इस सूत्र से ही सिद्ध हो जाती है । उस सूत्र में 'धर्म' पद सकल वेदार्थ का लक्षक है, अतः ब्रह्म का भी वैसे ही संग्राहक हो जाता है, जैसे—अधर्म का, अत एव पार्थसारथि मिश्र कहते हैं—"धर्मग्रहणं चोपलक्षणार्थम्, अधर्मस्यापि हानाय जिज्ञास्यात्" (शास्त्रदी. पृ. १५) । यद्यपि वेदार्थ-मीमांसा के द्वारा धर्म-मीमांसा के समान ब्रह्म-मीमांसा का भी ग्रहण हो सकता है, तथापि पूर्व मीमांसा में न तो ब्रह्म का व्युत्पादन किया गया है और न ब्रह्म-मीमांसा में वेदाध्ययनमात्र का आनन्तर्य विवक्षित है, अतः नित्यानित्य वस्तु के विवेकादि का आनन्तर्य दिखाने के लिए "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" (ब्र. सू. १।१।१) इस सूत्र का आरम्भ आवश्यक है, इसमें किसी प्रकार की
९२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १
लब्धव्यम् । अथाऽप्रसिद्धं, नैव शक्यं जिज्ञासितुमिति । उच्यते—अस्ति तावद् ब्रह्म नित्य-
भामती
वेदं सूत्रमारम्भणीयमित्यपौनरुक्त्यम् । स्यादेतद्—एतेन सूत्रेण ब्रह्मज्ञानं प्रत्युपायता मीमांसायाः प्रति- पाद्यत इत्युक्तं, तदयुक्तं, विकल्पासहत्वादिति चोदयति ॐ तत् पुनर्ब्रह्म इति ॐ । वेदान्तेभ्योऽपौरुषेय- तस्त्वतःसिद्धप्रामाण्येभ्यः प्रसिद्धमप्रसिद्धं वा स्यात् । यदि प्रसिद्धं वेदान्तवाक्यसमुत्थेन निश्चयज्ञानेन विषयीकृतं ततो न जिज्ञासितव्यम्, निष्पादितक्रिये कर्मणि अविशेषाधायिनः साधनस्य साधनन्यायाति- पातात् । अथाप्रसिद्धं वेदान्तेभ्यस्तर्हि न तद् वेदान्ताः प्रतिपादयन्तीति सर्वथाऽप्रसिद्धं नैव शक्यं जिज्ञा- सितुम् । अनुभूते हि प्रिये भवतीच्छा न तु सर्वथाननुभूतपूर्वे । न चेष्यमाणमपि शक्यं ज्ञातुं, प्रमाणा- भावात् । शब्दो हि तस्य प्रमाणं वक्तव्यम् । यथा वक्ष्यति "शास्त्रयोनित्वात्"—इति । स चेन्नावाबोध- यति, कुतस्तस्य तत्र प्रामाण्यम् । न च प्रमाणान्तरं ब्रह्मणि प्रक्रमते । तस्मात्प्रसिद्धस्य ज्ञातुं शक्यस्याप्य- जिज्ञासनाद् अप्रसिद्धस्येच्छाया अविषयत्वाद् अशक्यज्ञानत्वाच्च न ब्रह्म जिज्ञास्यमित्याक्षेपः ।
परिहरति ॐउच्यते अस्ति तावद् ब्रह्म नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावम्ॐ । अयमर्थः—प्रागपि ब्रह्ममीमांसाया अधीतवेदस्य निगमनिरुक्तव्याकरणादिपरिशीलनविदितपदतदर्थसम्बन्धस्य सदेव सोम्येदमग्र आसीदित्युपक्रमात् तत्त्वमसीत्यन्तात् सन्दर्भान्निचयस्वाद्युपेतब्रह्मस्वरूपावगमस्तावदापाततो
भामती-व्याख्या
पुनरुक्ति नहीं।
शङ्का—ब्रह्म-ज्ञान की साधनता जो ब्रह्म-जिज्ञासा में कही गई, वह सम्भव नहीं—ऐसा आक्षेप किया जाता है—"तत्पुनर्ब्रह्म प्रसिद्धमप्रसिद्धं वा स्यात् ?" अपौरुषेय वेद में प्रामाण्य स्वतः सिद्ध है, अतः उसके एकदेशभूत वेदान्त-वाक्यों के द्वारा जीवाभिन्न ब्रह्म का निश्चय है ? अथवा नहीं ? यदि वेदान्त-वाक्य-जन्य निश्चय की विषयता ब्रह्म में पहले से है, तब ब्रह्म-जिज्ञासा की आवश्यकता नहीं, क्योंकि [ जैसे पर्वत में अग्न्यादिरूप कर्मकारक की सिद्धिरूप क्रिया-सम्पन्न हो जाने पर अग्नि में सन्दिग्धता न रहने के कारण अग्नि का साधनीभूत न्याय साधन ही नहीं रहता, वैसे ही ] जिज्ञासा के कर्मभूत ब्रह्म की अवगति हो जाने पर उसकी जिज्ञासा सम्भव नहीं रह जाती । यदि वेदान्त-वाक्यों से ब्रह्म का ज्ञान नहीं होता, तब यह जो कहा जाता है कि "वेदान्ताः ब्रह्म प्रतिपादयन्ति" । वह सर्वथा अप्रसिद्ध हो जाता है, तब ब्रह्म की जिज्ञासा क्योंकर होगी ? क्योंकि जो प्रिय पदार्थ अनुभूत होता है, उसी की ही जिज्ञासा होती है, सर्वथा अननुभूत पदार्थ की नहीं । अननुभूत पदार्थ की जिज्ञासा होने पर भी प्रमाण के अभाव में उसका ज्ञान सम्भव नहीं, शब्द को ही ब्रह्म में प्रमाण कहा जाता है—"शास्त्रयोनित्वात्" । वह आगम यदि ब्रह्म का बाध नहीं कराता, तब वह ब्रह्म में प्रमाण क्योंकर होगा ? ब्रह्म में कोई अन्य प्रमाण सम्भव नहीं । फलतः प्रसिद्ध पदार्थ का ज्ञान सम्भव होने पर भी उसमें जिज्ञास्यता नहीं बनती और अप्रसिद्ध पदार्थ तो इच्छा का विषय ही नहीं होता. उसका ज्ञान भी सम्भव नहीं, अतः ब्रह्म कथमपि जिज्ञास्य नहीं—यह आक्षेपवादी का संक्षिप्त वक्तव्य है ।
समाधान—उक्त आक्षेप का परिहार किया जाता है "उच्यते—अस्ति तावद् ब्रह्म नित्यशुद्धबुद्धस्वभावम्" । भाव यह है कि जिस व्यक्ति ने वेद का अध्ययन कर लिया है, जिसे निघण्टु, निरुक्त और व्याकरणादि के परिशीलन से पद-पदार्थ का संगति-ग्रह हो चुका है, उस व्यक्ति को ब्रह्म-जिज्ञासा से पहले भी आपाततः ब्रह्म-ज्ञान हो जाता है, क्योंकि जो व्यक्ति वेदान्त-प्रकरण के उपक्रम में "सदेव सोम्येदमग्र आसीत्" (छां. ६।२।१ ) इस प्रकार सद्ब्रह्म का उल्लेख, मध्य में "तत्त्वमसि" (छां. ६।२।१ ) इस प्रकार पुनः-पुनः चर्चा और अन्त में "एकमेवाद्वितीयम्" (छां. ६।२।१ ) ऐसा ब्रह्म का स्वरूप देखता है, उसको विचार के विना
ब्रह्मप्रसिद्धिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ९३
शुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं, सर्वज्ञं, सर्वशक्तिसमन्वितम्; ब्रह्मशब्दस्य हि व्युत्पाद्यमानस्य नित्यशुद्धत्वादयोऽर्थाः प्रतीयन्ते; बृहतेर्धातोरर्थानुगमात् । सर्वस्यात्मत्वाच्च ब्रह्मास्ति-
भामती
विचाराद्विनाऽप्यस्ति । अत्र च ब्रह्मत्वादिनाऽवगम्येन तद्विषयमवगमं लक्षयति । तदस्तित्वस्य सति विमर्शे विचारात्प्रागनिर्णयात् । नित्येति क्षयितालक्षणं दुःखमपक्षिपति । शुद्धेति देहाद्युपाधिकमपि दुःखमपाकरोति । बुद्धेत्यपराधीनप्रकाशमानन्दात्मानं दर्शयति, आनन्दप्रकाशयोरभेदात् । स्यादेतत्—मुक्तौ सत्यामस्यैते शुद्धत्वादयः प्रथन्ते, ततस्तु प्राग् देहाद्यभेदेन तद्धर्मजन्मजरामरणादिदुःखयोगादित्यत उक्तं ॐ मुक्तेति ॐ । सदैव मुक्तः सदैव केवलोऽनाद्यविद्यावशात् तु भ्रान्त्या तथाऽवभासतं इत्यर्थः ।
तदेवमनौपाधिकं ब्रह्मणो रूपं दर्शयित्वाऽविद्योपाधिकं रूपमाह ॐ सर्वज्ञं सर्वशक्तिसमन्वितम् ॐ । तदनेन जगत्कारणत्वमस्य दर्शितं, शक्तिज्ञानभावाभावानुविधानात् कारणत्वभावाभावयोः । कुतः पुनरेवम्भूतब्रह्मस्वरूपावगतिरित्यत आह ॐ ब्रह्मशब्दस्य हि इति ॐ । न केवलं सदेव सोम्येदमित्यादीनां वाक्यानां पर्यालोचनया इत्थम्भूतब्रह्मावगतिः अपि तु ब्रह्मपदमपि निर्वचनसामर्थ्यादिममेवार्थं स्वहस्तयति । निर्वचनमाह ॐ बृहतेर्धातोरर्थानुगमात् ॐ । वृद्धिकर्मा हि बृंहतिरतिशयने वर्तते । तच्चेवमतिशयनमनवच्छिन्नं पदान्तरावगमितं नित्यशुद्धबुद्धत्वाद्यस्याभ्यनुजानातीत्यर्थः । तदेवं तत्पदार्थस्य शुद्धत्वादेः प्रसिद्धिमभिधाय त्वम्पदार्थस्याप्याह ॐ सर्वस्यात्मत्वाच्च ब्रह्मास्तित्वप्रसिद्धिः ॐ । सर्वस्य पांसुलपावकस्य
भामती-व्याख्या
भी ब्रह्म का ज्ञान क्यों न होगा ? भाष्यकार ने जो कहा है — "अस्ति तावद् ब्रह्म", वहाँ विषयवाचक 'ब्रह्म' पद की लक्षणा ब्रह्म-ज्ञान में विवक्षित है, अतः 'अस्ति ब्रह्म' का अर्थ है— 'अस्ति ब्रह्मज्ञानम्' । ब्रह्म का अस्तित्व तब तक स्थिर नहीं हो सकता, जब तक वह सन्दिग्ध है । 'नित्य' विशेषण के द्वारा क्षयितात्मक दुःख की निवृत्ति की गई है, 'शुद्ध' पद के द्वारा आत्मा में औपाधिक दुःख का अपनयन और 'बुद्ध' पद के द्वारा स्वप्रकाशरूप आनन्द का प्रदर्शन किया गया है, क्योंकि आनन्द और प्रकाश तत्त्व परस्पर अभिन्न होते हैं । 'मुक्त होने पर ही आत्मा में शुद्धत्वादि धर्म प्रकट होंगे, उससे पहले आत्मा देहादि से तादात्म्यापन्न होने के कारण जरा-मरणादि दुःखों से दुःखी ही है'— ऐसी धारणा का प्रतीकार करने के लिए 'मुक्त' कहा है, अर्थात् वह सदैव मुक्त और सदैव शुद्ध है, अनादि अविद्या के द्वारा केवल वैसी भ्रान्ति हो जाती है । इस प्रकार ब्रह्म का अनौपाधिक रूप दिखाकर अविद्यारूप उपाधि से युक्त स्वरूप दिखाते हैं— "सर्वज्ञं सर्वशक्तिसमन्वितम्" । सर्वज्ञत्वादि के द्वारा जगत्कारणत्व प्रदर्शित किया गया, क्योंकि किसी कार्य की कारणता उसी पदार्थ में रहती है, जिसमें कार्य-कारण-कलाप का ज्ञान एवं कार्योत्पादन की क्षमता विद्यमान हो, वही कर्त्ता माना जाता है । नित्य, शुद्ध, बुद्धादिरूप ब्रह्म का लाभ किस शब्द से होता है ? इस प्रश्न का उत्तर है— "ब्रह्मशब्दस्य व्युत्पाद्यमानस्य नित्यशुद्धत्वादयो धर्माः प्रतीयन्ते" । केवल उपक्रमादि युक्तियों के द्वारा ही वैसा अर्थ प्रतीत नहीं होता, अपितु "बृहतेर्धातोरर्थानुगमात्" । 'बृंहि वृद्धौ' धातु से "बृंहेर्नोऽच्च" ( पा. सू. उण. ४।१४६ ) इस सूत्र के द्वारा 'मनिन्' प्रत्यय और धातु के नकार को 'अकार का आदेश होकर 'ब्रह्म' शब्द बना है । धातु की शक्ति अतिशय ( सर्वविध परिच्छेदों ) से रहित अर्थ में हैं, अतः नित्यादि पदान्तरों से समर्पित नित्यत्वादिरूप अपरिच्छिन्नत्वादि का बोध हो जाता है ।
"तत्त्वमसि" ( छां. ६।२।१ ) इस महावाक्य के घटकीभूत 'तत्' पद के शुद्धत्वादि अर्थों का अभिधान कर त्वम्पदार्थ सूचित किया जाता है— "सर्वस्यात्मत्वाच्च ब्रह्मास्तित्व-
| ९४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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त्वप्रसिद्धिः । सर्वो ह्यात्मास्तित्वं प्रत्येति, न नाहमस्मीति । यदि हि नात्मास्तित्वप्रसिद्धिः स्यात् सर्वो लोको नाहमस्मीति प्रतीयात् । आत्मा च ब्रह्म । यदि तर्हि लोके ब्रह्मात्मत्वेन प्रसिद्धमस्ति, ततो ज्ञातमेवेत्यजिज्ञास्यत्वं पुनरापन्नम् । न; तद्विशेषं प्रति
भामती
हालिकस्यापि ब्रह्मास्तित्वप्रसिद्धिः । कुतः ? आत्मत्वात् । एतदेव स्फुटयति ॐ सर्वो हि इति ॐ । प्रतीतिमेवाप्रतीतिनिराकरणेन द्रढयति ॐ न न इति ॐ । न न प्रत्येत्यहमस्मीति, किन्तु प्रत्येत्येवेति योजना । नन्वहमस्मीति च ज्ञास्यति मा च ज्ञासीदात्मानमित्यत आह ॐ यदि इति ॐ । ॐ अहमस्मीति न प्रतीयात् ॐ । अहङ्कारास्पदं हि जीवात्मानं चेन्न प्रतीयादहमिति न प्रतीयादित्यर्थः । ननु प्रत्येतु सर्वो जन आत्मानमहङ्कारास्पदं ब्रह्मणि तु किमायातमित्यत आह ॐ आत्मा च ब्रह्म ॐ । तदस्त्वमा सामानाधिकरण्यात् तस्मात्तत्पदार्थस्य शुद्धबुद्धत्वादेः शब्दतस्त्वम्पदार्थस्य च जीवात्मनः प्रत्यक्षतः प्रसिद्धेः पदार्थज्ञानपूर्वकत्वाच्च वाक्यार्थज्ञानस्य त्वम्पदार्थस्य ब्रह्मभावावगमस्तत्त्वमसीतिवाक्याद् उपपद्यत इति भावः । आक्षेप्ता प्रथममल्पाश्रयं दोषमाह ॐ यदि तर्हि लोकः इति ॐ । अध्यापकाध्येतृपरम्परा लोकः, तत्र तत्त्वमसीतिवाक्याद् यदि ब्रह्मात्मत्वेन प्रसिद्धमस्ति, आत्मा ब्रह्मत्वेनेति वक्तव्ये ब्रह्मात्मत्वेनेत्यभेदविवक्षया गमयितव्यम् । परिहरति ॐ न ॐ । कुतः ? ॐ तद्विशेषं प्रति विप्रतिपत्तेः ॐ । तदनेन विप्रतिपत्तिः साधकबाधकप्रमाणाभावे सति संशयबीजमुक्तं, ततश्च संशयाज्जिज्ञासोपपद्यत इति भावः ।
विवादाधिकरणं धर्मो सर्वतन्त्रसिद्धान्तसिद्धोऽभ्युपेयः । अन्यथाऽनाश्रयाभिज्ञाश्रया वा विप्रतिपत्तयो
भामती-व्याख्या
प्रसिद्धिः” । एक हालिक से लेकर ऋषियों तक समस्त मनुष्यों की दृष्टि में ब्रह्मास्तित्व की प्रसिद्धि है, क्योंकि वह सभी का अपना आत्मा ही है । उसी का स्पष्टीकरण किया जाता है— “सर्वो ह्यात्मास्तित्वं प्रत्येति” । प्रतीति का अभिनय किया जा रहा है—“न नाहमस्मीति” । ‘अहमस्मि’—ऐसी प्रतीति नहीं होती, यह बात नहीं, अपितु सभी को अपने अस्तित्व की प्रतीति होती ही है । यदि सबको आत्मास्तित्व की प्रतीति नहीं होती, तब सभी को ‘नाहमस्मि’—ऐसी प्रतीति होनी चाहिए अर्थात् अहंकारास्पदीभूत जीवात्मा की प्रतीति यदि नहीं होती, तब ‘अहम्’—ऐसी प्रतीति नहीं होनी चाहिए । जीवात्मा की प्रतीति से ब्रह्म की क्योंकर प्रसिद्धि होगी ? इस प्रश्न का उत्तर है—“आत्मा च ब्रह्म” । ‘तत् त्वमसि’—यहाँ पर ‘तत्’ पद का ‘त्वम्’ पद के साथ सामानाधिकरण्य ( एकार्थपरकत्व ) है, तत्पदार्थभूत जीवात्मा को प्रत्यक्षतः प्रसिद्धि है । वाक्य-घटकीभूत पदों के अर्थों का ज्ञान वाक्यार्थ-ज्ञान का हेतु होता है, अतः “तत्त्वमसि” - इस वाक्य से त्वम्पदार्थ में ब्रह्मरूपता का अवगम हो जाता है ।
‘तत्त्वमसि’—इस वाक्य के द्वारा जीवात्मा में ब्रह्मरूपता की अवगति को सुनकर आक्षेपवादी कहता है—“यदि तर्हि लोके” । अध्यापक और अध्येतृवर्ग की परम्परा ही यहाँ ‘लोक’ पद से गृहीत है । वाक्य के आधार पर आत्मा की ब्रह्मत्वेन प्रसिद्धि का अनुवाद ‘ब्रह्म आत्मत्वेन यदि प्रसिद्धम्’—ऐसा करना यद्यपि उचित नहीं, तथापि जीव और ब्रह्म की अभेद-विवक्षा से वैसा कथन सम्भव है । सिद्धान्ती आक्षेप का परिहार करता है—“न तद्विशेषं प्रति विप्रतिपत्तेः” । कोई देह को कोई इन्द्रिय और कोई प्राणादि को आत्मा कहता है—ऐसी विप्रतिपत्तिः उस समय संशय को जन्म दे डालती है, जब किसी पक्ष का साधक या बाधक प्रमाण उपलब्ध न हो, जैसा कि न्यायसूत्रकार कहते हैं—“समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः” ( न्या. सू. १।१।२३ ) । सन्देह हो जाने के कारण जिज्ञासा उपपन्न हो जाती है । विप्रतिपत्ति या मत-भेद का धर्मी ( विशेष्य ) पदार्थ सर्वतन्त्र-सिद्धान्त के रूप में प्रसिद्ध होना चाहिए, अन्यथा बिना आश्रय के
तत्त्वमर्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ९५
विप्रतिपत्तेः। देहमात्रं चैतन्यविशिष्टमात्मेति प्राकृता जना लोकायतिकाश्च प्रतिपन्नाः। इन्द्रियाण्येव चेतनान्यात्मेत्यपरे। मन इत्यन्ये। विज्ञानमात्रं क्षणिकमित्येके। शून्य- मित्यपरे। अस्ति देहादिव्यतिरिक्तः संसारी कर्त्ता भोक्तेत्यपरे। भोक्तैव केवलं न
भामती
न स्युः। विरुद्धा हि प्रतिपत्तयो विप्रतिपत्तयः। न चानाश्रयाः प्रतिपत्तयो भवन्ति, अनालम्बनत्वापत्तेः। न च भिन्नाश्रया विरुद्धा। न ह्यनित्या बुद्धिनित्य आत्मेति प्रतिपत्तिविप्रतिपत्ती। तस्मात्तत्पदार्थस्य शुद्ध- त्वादेर्वेदान्तेभ्यः प्रतीतिस्त्वम्पदार्थस्य च जीवात्मनो लोकतः सिद्धिः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः। तदाभासत्वाना- भासत्वेन तद्विशेषेषु परमत्र विप्रतिपत्तयः। तस्मात्सामान्यतः प्रसिद्धे धर्मिणि विशेषतो विप्रतिपत्तौ युक्त- स्तद्विशेषेषु संशयः। तत्र त्वम्पदार्थे तावद्विप्रतिपत्तीर्दर्शयति ॐ देहमात्रम् ॐ इत्यादिना ॐ भोक्तैव केवलं न कर्त्ता ॐ इत्यन्तेन। अत्र देहेन्द्रियमनःक्षणिकविज्ञानचैतन्यपक्षे न तत्पदार्थनित्यत्वाद्यस्त्वम्पदार्थेन सम्ब- न्ध्यन्ते, योग्यताविरहात्। शून्यपक्षेऽपि सर्वोपाख्यारहितमपदार्थः कथं तत्त्वमगोचरः ? कर्तृभोक्तृत्व- भावस्यापि परिणामितया तत्पदार्थनित्यत्वासङ्गतिरेव। अकर्तृत्वेऽपि भोक्तृत्वपक्षे परिणामितया नित्यत्वा- द्यसङ्गतिः। अभोक्तृत्वेऽपि नानात्वेनावच्छिन्नत्वाद् अनित्यत्वादिप्रसक्तावद्वैतहानाच्च तत्पदार्थासङ्गति- स्तदवस्थैव। त्वम्पदार्थविप्रतिपत्त्या च तत्पदार्थेऽपि विप्रतिपत्तिर्दर्शिता। वेदाप्रामाण्यवादिनो हि लौका- यतिकादयस्तत्पदार्थप्रत्ययं मिथ्येति मन्यन्ते। वेदप्रामाण्यवादिनोऽप्यौपचारिकं तत्पदार्थमविवक्षितं वा मन्यन्त इति।
भामती-व्याख्या
या भिन्न-भिन्न आश्रयों में विरुद्ध धर्म-प्रदर्शन को विप्रतिपत्ति नहीं कहा जा सकेगा, क्योंकि एक धर्मी में विरुद्ध प्रतिपत्तियों को विप्रतिपत्ति कहा जाता है। विप्रतिपत्ति को आश्रय-हीन मानने पर निरालम्बवाद प्रसक्त होता है और भिन्न-भिन्न आश्रय में प्रदर्शित धर्मों का विरोध नहीं माना जाता, जैसे 'अनित्या बुद्धिः' और 'नित्य आत्मा'—इनका कोई विरोध नहीं होता। अतः तत्पदार्थ के शुद्धत्वादि की प्रतीति वेदान्त-वाक्यों के द्वारा और त्वम्पदार्थभूत जीवात्मा की प्रसिद्धि लोकतः—ऐसा सर्वतन्त्र (सर्वाभ्युपगत) सिद्धान्त है। विविध मत- सिद्ध प्रतीतियों में आभासत्व और अनाभासत्वादि विवादास्पद हैं। अतः सामान्यतः प्रसिद्ध धर्मी में विशेषतः विवाद होने के कारण विशेषाथर्विषयक संशय उपपन्न हो जाता है। त्वम्पदार्थ में विप्रतिपत्ति दिखाते हैं—"देहमात्रं चैतन्यविशिष्टमात्मा"—यहाँ से लेकर "भोक्तैव केवलं न कर्त्ता"—यहाँ तक। यहाँ देह, इन्द्रिय, मन, क्षणिक विज्ञान के आत्मत्व-पक्ष में तत्पदार्थभूत नित्यत्वादि का त्वम्पदार्थ के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें नित्यत्वादि के साथ सम्बन्ध की योग्यता ही नहीं। शून्य के आत्मत्व-पक्ष में शून्य पदार्थ सर्वथा निरुपाख्य और अलीक माना जाता है, वह न तो त्वम्पदार्थ का विषय हो सकता है और न तत्पदार्थ का। कर्त्ता-भोक्ता आत्मा परिणामी होने के कारण उसमें नित्यत्वादि धर्मों की संगति ही नहीं हो सकती। आत्मा को कर्तृत्व-रहित केवल भोक्ता मानने पर भी परिणामी होने से नित्यत्वादि का आश्रय नहीं हो सकता। कर्तृत्व-भोक्तृत्व-रहित आत्मा जो सांख्य मानते हैं, वह भी नानात्व से अवच्छिन्न होने के कारण अनित्य ही हो जाता है, अतः वह नित्य क्योंकर होगा? अद्वैतत्व की भी हानि है, अतः उसमें तत्पदार्थ का संगमन नहीं होता। त्वम्पदार्थ में विप्रतिपत्ति दिखाने मात्र से तत्पदार्थ में भी विप्रतिपत्तियाँ प्रदर्शित ही हो जाती हैं। वेदाप्रामाण्यवादी चार्वाकादि तत्पदार्थ की प्रतीति को मिथ्या ही मानते हैं। वेद- प्रामाण्यादियों में भी प्राभाकरादि तत्पदार्थ को औपचारिक अथवा अविवक्षित मानते हैं, जैसा कि शालिकनाथ मिश्र कहते हैं—'सर्वात्मश्रुतयश्च सर्वस्यात्मार्थत्वात् तदर्थनिमित्तो-
| ९६ | सूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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कतैंत्येके । अस्ति तद्व्यतिरिक्त ईश्वरः सर्वज्ञः सर्वशक्तिरिति केचित् । आत्मा स भोक्तुरित्यपरे । एवं बहवो विप्रतिपन्ना युक्तिवाक्यतदाभाससमाश्रयाः सन्तः । तत्राविचार्य यत्किञ्चित्प्रतिपद्यमानो निःश्रेयसात्प्रतिहन्येतानर्थं चेयात् । तस्माद्ब्रह्मजिज्ञासोपन्यासमुखेन वेदान्तवाक्यमीमांसा तदविरोधिकोपकरणा निःश्रेयसप्रयोजना प्रस्तूयते ॥ १॥
भामती
तदेवं त्वम्पदार्थविप्रतिपत्तिद्वारा तत्पदार्थे विप्रतिपत्तिं सूचयित्वा साक्षात्तत्पदार्थे विप्रतिपत्तिमाह ❀ अस्ति तद्व्यतिरिक्त ईश्वरः सर्वज्ञः सर्वशक्तिरिति केचित् ॥ तदिति जीवात्मानं परामृशति । न केवलं शरीरादिभ्यो जीवात्मभ्योऽपि व्यतिरिक्तः । स च सर्वस्यैव जगत ईष्टे । ऐश्वर्यप्रसिद्धयर्थं स्वाभाविकमस्य रूपद्वयमुक्तं ❀ सर्वज्ञः सर्वशक्तिरिति । तस्यापि जीवात्मभ्योऽपि व्यतिरेकान्न त्वम्पदार्थेन सामानाधिकरण्यमिति स्वमतमाह ❀ आत्मा स भोक्तुरित्यपरे ॥ भोक्तुर्जिवात्मनोऽविद्योपाधिकस्य स ईश्वरस्तत्पदार्थ आत्मा तत ईश्वरादभिन्नो जीवात्मा परमाकाशादिव घटाकाशादय इत्यर्थः । विप्रतिपत्तीरुपसंहरन् विप्रतिपत्तिबीजमाह ❀ एवं बहवः इति । ❀ युक्तियुक्त्याभासवाक्यवाक्याभाससमाश्रयाः सन्तः ❀ इति योजना । ननु सन्तु विप्रतिपत्तयस्तन्निमित्तश्च संशयस्तथापि किमर्थं ब्रह्ममीमांसारभ्यत इत्यत आह ❀ तत्राविचार्येति ॥ तत्त्वज्ञानाच्च निःश्रेयसाधिगमो नातत्त्वज्ञानाद्भुवितुमर्हति । अपि च अतत्त्वज्ञानान्नास्तिक्ये सत्यनर्थप्राप्तिरित्यर्थः । सूत्रतात्पर्यमुपसंहरति ❀ तस्माद् इति ॥ वेदान्तमीमांसा तावत्तर्क एव, तदविरोधिनश्च येऽन्येऽपि तर्का अध्वरमीमांसायां न्याये च वेदप्रत्यक्षादिप्रामाण्यपरिशोधनादियुक्तास्त उपकरणं यस्याः सा तथोक्ता । तस्मात् परंनिःश्रेयससाधनब्रह्मज्ञानप्रयोजना ब्रह्ममीमांसाऽऽरब्धव्येति सिद्धम् ।
भामती-व्याख्या
पचाराः” ( प्र. पं. पृ. ३३९ ) । अब तत्पदार्थ में साक्षाद् विप्रतिपत्ति दिखाते हैं—“अस्ति तद्व्यतिरिक्त ईश्वरः सर्वज्ञः सर्वशक्तिरिति केचित्” । ‘तद्व्यतिरिक्तः’—इस वाक्य में ‘तत्’ पद से जीव का ग्रहण किया गया है, अर्थात् ईश्वर केवल शरीरादि जड़वर्ग से ही भिन्न नहीं, अपितु जीव से भी भिन्न है । वह समस्त जगत् का सञ्चालक है, उस ( ईश्वर ) में स्वाभाविक ऐश्वर्य सिद्ध करने के लिए दो विशेषण दिए गए हैं—‘सर्वज्ञः, सर्वशक्तिः’ ऐसा ईश्वर भी जीवों से भिन्न माना जाता है, अतः उसका त्वम्पदार्थ के साथ सामानाधिकरण्य ( अभेद ) नहीं बन सकता । वेदान्ती अपना मत प्रस्तुत करता है—‘‘आत्मा स भोक्तुरित्यपरे’’ । जीवरूप भोक्ता पुरुष का वह तत्पदार्थभूत ईश्वर आत्मा ( स्वरूप ) है, अतः जीवात्मा ईश्वर से वैसे ही अभिन्न है, जैसे महाकाश से घटाकाशादि । विप्रतिपत्तियों का उपसंहार करते हुए विप्रतिपत्ति का कारण बताया जाता है—‘‘एवं बहव विप्रतिपन्ना युक्तिवाक्यतदाभास-समाश्रयाः सन्तः” । युक्ति-युक्त्याभास, वाक्य-वाक्याभास का समाश्रयण कर अपना-अपना मत प्रस्तुत कर रहे हैं । विप्रतिपत्तियों के द्वारा आत्मविषयक सन्देह मान लेने पर भी ब्रह्म-मीमांसा का आरम्भ किसलिए ? इस प्रश्न का उत्तर है—‘‘तत्राविचार्य यत्किञ्चित् प्रतिपद्यमानो निःश्रेयसात्प्रतिहन्येत” ( तत्त्व-ज्ञान से साध्य मोक्षाधिगम कभी संशयादिरूप अतत्त्व-ज्ञान से नहीं हो सकता, प्रत्युत अतत्त्व-ज्ञान के द्वारा नास्तिकता-मूलक अनर्थ-प्राप्ति भी हो सकती है । सूत्र के तात्पर्य का उपसंहार किया जाता है—‘‘तस्मात्’’ । वेदान्त-मीमांसा भी एक तर्क ही है, इससे अविरुद्ध अन्य जितने भी तर्क धर्म-मीमांसा या न्यायों ( अधिकरणों ) में चर्चित या प्रत्यक्षादि प्रमाणों के परिशोधन में प्रयुक्त हैं, वे सभी तर्क-
ब्रह्मलक्षणविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ९७
( २-जन्माद्यधिकरणम् । सू० २ )
ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्युक्तम् । किंलक्षणं पुनस्तद् ब्रह्मेत्यत आह भगवान् सूत्रकारः— जन्माद्यस्य यतः ॥ २ ॥ जन्मोत्पत्तिरादिरस्येति तद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः । जन्मस्थितिभङ्गं समा-
भामती
तदेवं तावत् प्रथमेन सूत्रेण मीमांसारम्भमुपपाद्य ब्रह्ममीमांसामारभते ॐ जन्माद्यस्य यतः ॐ । एतस्य सूत्रस्य पातनिकामाह भाष्यकारः ॐ ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्युक्तं किंलक्षणं पुनस्तद् ब्रह्म ॐ । अत्र यद्यपि ब्रह्मस्वरूपज्ञानस्य प्रधानस्य प्रतिज्ञया तदङ्गान्यपि प्रमाणादीनि प्रतिज्ञातानि, तथापि स्वरूपस्य प्राधान्यात् तदेवाक्षिप्य प्रथमं समर्थ्यते। तत्र यद्यावदनुभूयते तत्सर्वं परिमितम् अविशुद्धमबुद्धं विध्वंसि न तेनोपलब्धेन तद्विरुद्धस्य नित्यशुद्धबुद्धस्वभावस्य ब्रह्मणः स्वरूपं शक्यं लक्षयितुम्। नहि जातु कश्चित् कृतकत्वेन नित्यं लक्षयति । न च तद्धर्मेण नित्यत्वादिना तल्लक्ष्यते, तस्यानुपलब्धचरत्वात्। प्रसिद्धं हि लक्षणं भवति, नात्यन्ताप्रसिद्धम्। एवं च न शब्दोऽप्यत्र क्रमते। अत्यन्ताप्रसिद्धतया ब्रह्मणोऽपदार्थ-स्यावाक्यार्थत्वात्। तस्माल्लक्षणाभावान्न ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्याक्षेपाभिप्रायः। तमिममाक्षेपं भगवान् सूत्रकारः परिहरति ॐ जन्माद्यस्य यतः इति ॐ । मा भूदनुभूयमानं जगत् तद्धर्मतया तादात्म्येन वा
भामती-व्याख्या
प्रकार जिसके उपकरण (सहायक) हैं, ऐसी वेदान्त-वाक्य-मीमांसा प्रस्तुत की जा रही है। इसका प्रयोजन एकमात्र मोक्ष-साधनीभूत ब्रह्म-ज्ञान है, अतः सप्रयोजन होने के कारण ब्रह्म-जिज्ञासा का आरम्भ न्यायोचित सिद्ध हो जाता है।
प्रथम सूत्र के द्वारा ब्रह्म-मीमांसा के आरम्भ का समर्थन करके द्वितीय सूत्र से ब्रह्म-मीमांसा का आरम्भ किया जाता है—"जन्माद्यस्य यतः।" भाष्यकार इस सूत्र की अवतरणिका प्रस्तुत कर रहे हैं—"ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्युक्तम्, किं लक्षणं पुनस्तद् ब्रह्म"। यहाँ जब प्रधानभूत ब्रह्मस्वरूप की जिज्ञासा के द्वारा उसके अङ्गभूत प्रमाणादि की जिज्ञासा भी प्रति-ज्ञात हो गई, तब द्वितीय सूत्र की अवतरणिका में प्रमाणादि का आक्षेप न उठाकर केवल ब्रह्म के स्वरूप पर आक्षेप क्यों किया गया ? इस प्रश्न के उत्तर में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि प्रधान होने के कारण ब्रह्म के स्वरूप पर आक्षेप करके उसका ही समाधान द्वितीय सूत्र के माध्यम से किया जाता है। 'किंलक्षणम्'—यहाँ 'किं' शब्द आक्षेपार्थक है, आक्षेपवादी का आशय यह है कि विश्व में जो भी वस्तु अनुभूत होती है, वह परिमित (परिच्छिन्न), अविशुद्ध, अबुद्ध और नश्वर है। उसकी उपलब्धि से उसके विरुद्ध नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्तस्वभाव ब्रह्म का स्वरूप नहीं जाना जा सकता, क्योंकि लोक में कृतक (जन्य) पदार्थ के द्वारा नित्य पदार्थ कभी भी अभिलक्षित नहीं होता। हाँ, नित्य-त्वादि धर्मों के द्वारा नित्य ब्रह्म का लक्षण किया जा सकता है, किन्तु नित्यत्वादि धर्म कहीं उपलब्ध नहीं। लोक-प्रसिद्ध धर्म ही लक्षण माना जाता है, अत्यन्त अप्रसिद्ध नहीं। जब नित्य, शुद्ध, बुद्धस्वरूप ब्रह्म प्रसिद्ध ही नहीं, तब कोई पद भी उसका अभिधान कैसे करेगा ? पदार्थ ही वाक्यार्थ होता है, अतः किसी वाक्य के द्वारा ब्रह्म का बोध नहीं कराया जा सकता। फलतः ब्रह्म का कोई लक्षण न हो सकने के कारण ब्रह्म जिज्ञासितव्य (वेदान्त-वाक्यों के द्वारा विचारणीय) नहीं।
उक्त आक्षेप का परिहार भगवान् सूत्रकार ने किया है—"जन्माद्यस्य यतः"। अनुभूयमान जगत् तादात्म्येन या तद्धर्मत्वेन ब्रह्म का लक्षण यदि नहीं होता तो न सही,
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९८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. २ सार्थः । जन्मनश्चादित्वं श्रुतिनिर्देशापेक्षं वस्तुवृत्तापेक्षं च । श्रुतिनिर्देशस्तावद्- 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' (तैत्ति० ३।१) इत्यस्मिन् वाक्ये जन्मस्थितिप्रलयानां क्रमदर्शनात् । वस्तुवृत्तमपि जन्मना लब्धसत्ताकस्य धर्मिणः स्थितिप्रलयसंभवात् । अस्येति प्रत्यक्षादिसंनिधापितस्य धर्मिण इदमा निर्देशः । षष्ठी जन्मादिधर्मसंब- न्धार्था । यत इति कारणनिर्देशः । अस्य जगतो नामरूपाभ्यां व्याकृतस्यानेककर्तृभोक्तृ- भामती ब्रह्मणो लक्षणं तदुत्पत्त्या तु भविष्यति । देशान्तरप्राप्तिरिव सवितुर्व्रज्याया इति तात्पर्य्यार्थः । सूत्रावयवान् विभजते ॐ जन्मोत्पत्तिरादिरस्य इति ॐ । लाघवाय सूत्रकृता जन्मादीति नपुंसकप्रयोगः कृतस्तदुपपाद- नाय समाहारमाह ॐ जन्मस्थितिभङ्गमिति ॐ । ॐ जन्मनश्च ॐ इत्यादिः ॐ कारणनिर्देशः ॐ इत्यन्तः सन्दर्भों निगदव्याख्यातः । स्यादेतत्- प्रधानकालग्रहलोकपालक्रियायदृच्छास्वभावाभावेषूपप्लवमानेषु भामती-व्याख्या तज्जन्यत्वेन अवश्य ब्रह्म का लक्षण वैसे ही बन जायगा, जैसे सूर्य की देशान्तर-प्राप्ति सूर्य की व्रज्या ( गमन क्रिया ) का लक्षण होती है [ कोई लक्षण लक्ष्य से तादात्म्यापन्न होता है, जैसे शिंशपा वृक्ष का, कोई लक्षण लक्ष्य का धर्म होता है, जैसे सास्नादिमत्त्व गौ का और कोई लक्षण लक्ष्य से उत्पन्न होकर लक्ष्य का लक्षण माना जाता है, जैसे धूम अग्नि का अथवा देशान्तर-प्राप्ति सूर्य की गति का। प्रकृत में आकाशादि प्रपञ्च ब्रह्म से जनित होने के कारण ब्रह्म का लक्षण माना जाता है ]। सूत्र-घटक जन्मादि की व्याख्या की जाती है- “जन्मो- त्पत्तिः” । प्रयोग-लाघव को ध्यान में रख कर सूत्रकार ने 'जन्मादि'- ऐसा नपुंसक लिङ्ग का प्रयोग किया है, उसकी उपपत्ति करने के लिए भाष्यकार समाहार द्वन्द्व को प्रकट कर रहे हैं- "जन्मस्थितिभङ्गं समासार्थः” [ समाहार द्वन्द्व में समुदायी पदार्थों की प्रधानता न होकर समुदाय का प्राधान्य माना जाता है, समुदायगत एकत्व की विवक्षा में एकवचन और वह भी सामान्यतः नपुंसक लिङ्ग होता है ] । जन्म, स्थिति और भङ्ग में सर्व-प्रथम जन्म के साथ जगत् का सम्बन्ध होने के कारण जन्मादिरस्य-ऐसा कहा गया है। पाठक्रम के आधार पर जन्म का आदि में उल्लेख किया गया है, क्योंकि श्रुति कहती है- "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति च' (तै. उ. ३।१)। यहाँ क्रमशः जन्म, स्थिति और प्रलय का निर्देश किया गया है। वस्तु-स्थिति के आधार पर भी जन्म का प्रथम स्थान निश्चित होता है, क्योंकि जन्म हो जाने पर ही कोई वस्तु सत्ता में आती है, कुछ समय स्थित रहती और अन्त में प्रलीन हो जाती है। सूत्रस्थ 'अस्य' पद के द्वारा प्रत्यक्षादि से सन्निकृष्ट जगद् रूप धर्मी का ग्रहण किया गया है, क्योंकि 'इदम्' शब्द सन्निहित पदार्थ का वाचक होता है। 'अस्य' पद में षष्ठी विभक्ति जगत् के साथ जन्मादि धर्मों का सम्बन्ध प्रतिपादित करती है । 'यतः' पद के द्वारा उस कारण तत्त्व का निर्देश किया गया है, जिससे जगद्रूप कार्य उत्पन्न होता है । शङ्का - जगत्कारणता को ईश्वर का तब लक्षण माना जा सकता था, जब ईश्वर को छोड़ कर अन्यत्र कहीं भी कारणता श्रुत न होती, किन्तु “अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानाम्” (श्वेता. ४।५ ), "कालः स्वभावो, नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः” ( श्वेता. १।२) इत्यादि श्रुतियों के द्वारा प्रधान (त्रिगुणा प्रकृति ), काल, ग्रह ( सूर्यादि ), लोकपाल, क्रिया, यदृच्छा (अनियमित ) स्वभाव, अभाव ( शून्य ) आदि अन्य पदार्थों में भी जगत् की कारणता प्रतिपादित है, अतः यह कैसे माना जा सकता है कि सर्वज्ञ और सर्वशक्ति-सम्पन्न ब्रह्म ही जगत् का कारण है ?
ब्रह्मलक्षणविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ९९
संयुक्तस्य प्रतिनियतदेशकालनिमित्तक्रियाफलाश्रयस्य मनसाप्यचिन्त्यरचनारूपस्य
भामती
सत्सु सर्वज्ञं सर्वशक्तिस्वभावं ब्रह्म जगज्जन्मादिकारणमिति कुतः सम्भावनेत्यत आह ॐ अस्य जगतः इति ॐ । अत्र ॐ नामरूपाभ्यां व्याकृतस्य ॐ इति चेतनभावकर्तृकत्वसम्भावनया प्रधानाद्यचेतनकर्तृकत्वं निरुपाख्यकर्तृकत्वं च व्यासेधति । यत् खलु नाम्ना रूपेण च व्याक्रियते तच्चेतनकर्तृकं दृष्टं, यथा घटादि, विवादाध्यासितं च जगन्नामरूपव्याकृतं तस्माच्चेतनकर्तृकं सम्भाव्यते । चेतनो हि बुद्ध्यावालिख्य नामरूपे घट इति नाम्ना रूपेण च कम्बुग्रीवादिना बाह्यं घटं निष्पादयति । अत एव घटस्य निर्वर्त्यंस्याप्यन्तःसङ्कल्पात्मना सिद्धस्य कर्मकारकभावो घटं करोतीति । यदाहुः 'बुद्धिसिद्धं तु न तदसद्' इति । तथा चाचेतनो बुद्ध्यानालिखितं करोतीति न शक्यं सम्भावयितुमिति भावः ।
स्यादेतत्—चेतना ग्रहा लोकपाला वा नामरूपे बुद्ध्यावालिख्य जगज्जनयिष्यन्ति, कृतमुत्पत्तस्वभावेन ब्रह्मणेत्यत आह ॐ अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य इति ॐ । केचित् कर्त्तारो भवन्ति, यथा सूदर्त्विगादयः, न भोक्तारः । केचित्तु भोक्तारः, यथा श्राद्धवैश्वानरीयेष्ट्यादिषु पितापुत्रादयः, न कर्त्तारः । तस्मादुभयग्रहणम् । ॐ देशकालनिमित्तक्रियाफलानि ॐ इतीतरेतरद्वन्द्वः । देशादीनि च प्रतिनियतानि चेति
भामती-व्याख्या
समाधान—उक्त शङ्का का खण्डन करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"अस्य जगतो नामरूपाभ्यां व्याकृतस्य"। व्याकृतत्वादि विशेषणों के द्वारा जगत् में चेतनकर्तृकत्व और भावकर्तृकत्व ध्वनित होता है, अतः प्रधानादि अचेतनकर्तृकत्व एवं अभावकर्तृकत्व का निराकरण हो जाता है, क्योंकि जिस पदार्थ को नाम और रूप दिया जाता है, वह चेतनकर्तृक ही होता है, जैसे—घटादि । विवादास्पद जगत् नाम-रूपात्मक है, अतः चेतनकर्तृक ही है। चेतन पुरुष ही अपने मन में वस्तु की रूप-रेखा बनाकर उसे मूर्तरूप देकर कहता है कि इसका नाम है—घट और उसका रूप है—कम्बुग्रीवादिमान् । अत एव 'घटं करोति'—इत्यादि व्यवहारों में किस घट को कर्म कारक बनाया जाता है ? इस प्रश्न का भी सटीक उत्तर मिल जाता है कि कर्त्ता पुरुष के मन में कल्पित घट को कर्म माना जाता है, जैसा कि सत्कार्यवादियों ने कहा है—"बुद्धिसिद्धं तु न तदसत्" [ शान्तरक्षित ने भी 'घटादि' शब्दों के द्वारा बुद्धिस्थ आकार का ही अभिधान माना है—"बुद्धौ ये वा विवर्तन्ते तानाहाभ्यन्तरानयम्" ( तत्त्वसं. श्लो. १०७० ) । अतः चेतन पुरुष अपने मन में रूप-रेखा तैयार किए बिना किसी कार्य को करता है—ऐसी सम्भावना नहीं कर सकते । 'ग्रह और लोकपालादि देवगण चेतन हैं, वे ही अपनी बुद्धि में निर्देश करके जगत् की रचना कर देंगे, उसके लिए ब्रह्म की क्या आवश्यकता ?' इस शङ्का का निरास करने के लिए कहा है—"अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य ।" ग्रह लोकपालादि भी उसी जगत् में समाविष्ट हैं, जिसका कर्त्ता ब्रह्म माना जाता है, लोकपालादि अपनी रचना स्वयं नहीं कर सकते । कतिपय पुरुष किसी कार्य के कर्त्ता ही होते हैं, भोक्ता नहीं, जैसे रसोइया मालिक को भोजन बनाकर खिला देता है, स्वयं नहीं खाता, अथवा जैसे ऋत्विग्गण, यजमान से दक्षिणा लेकर यजमान के लिए कर्म करते हैं, कर्म-जन्य फल का भोक्ता यजमान ही होता है, ऋत्विक् नहीं। इसी प्रकार कुछ पुरुष कर्म-जन्य फल के भोक्ता ही होते हैं, कर्त्ता नहीं, जैसे श्राद्ध कर्म से जन्य फल के भोक्ता ही पितृगण होते हैं, कर्त्ता नहीं। अथवा वैश्वानरीय इष्टि-जन्य फल का भोक्ता ही पुत्र होता है, कर्त्ता नहीं [ पुत्र के उत्पन्न होने पर पिता जो वैश्वानर इष्टि करता है, उसका फल पुत्र को ही मिलता है—"वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् पुत्रे जाते । यस्मिन् जाते एतामिष्टिं निर्वपति, पूतः एव तेजस्व्मन्नाद इन्द्रियावी, पशुमान् भवति" ( तै. सं. २।२।५ ) ] । ब्रह्म के द्वारा रचित जगत् में कर्त्ता और भोक्ता—दोनों का समावेश है, केवल कर्त्ता या केवल भोक्ता का नहीं—यह दिखाने के लिए भाष्यकार
१०० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. २
जन्मस्थितिभङ्गं यतः सर्वज्ञात्सर्वशक्तेः कारणाद्भवति, तद् ब्रह्मेति वाक्यशेषः। अन्येषामपि भावविकाराणां त्रिष्वेवान्तर्भाव इति जन्मस्थितिनाशनामिह ग्रहणम्। यास्क-
भामती
विग्रहः। तदाश्रयो जगत् तस्य। केचित् खलु प्रतिनियतदेशोत्पादाः, यथा कृष्णमृगादयः। केचित् प्रतिनियतकालोत्पादाः, यथा कोकिलारवादयः। केचित्प्रतिनियतनिमित्ताः, यथा नवाम्बुदध्वनादिनिमित्ता बलाकागर्भादयः। केचित्प्रतिनियतक्रियाः, यथा ब्राह्मणानां याजनादयो नेतरेषाम्। एवं प्रतिनियतफलाः यथा केचित् सुखिनः, केचिद् दुःखिनः, एवं य एव सुखिनस्त एव कदाचिद् दुःखिनः। सर्वमेतदाकस्मिकापरनाम्नि यादृच्छिकत्वे च स्वाभाविकत्वे चासर्वशक्तिकर्तृकत्वे च न घटते। परिमितज्ञानशक्तिभिर्ग्रहलोकपालादिभिर्ज्ञातुं कर्तुं चाशक्यत्वात्। तदिदमुक्तं ॐ मनसाप्यचिन्त्यरचनारूपस्य इति ॐ। एकस्या अपि हि शरीररचनायां रूपं मनसा न शक्यं चिन्तयितुं कदाचित्, प्रागेव जगद्रचनायाः, किमङ्ग पुनः कर्त्तुमित्यर्थः। सूत्रवाक्यं पूरयति ॐ तद् ब्रह्मेति वाक्यशेषः ॐ। स्यादेतत्—कस्मात् पुनर्जन्मस्थितिभङ्गमात्रमिहाविग्रहेण गृह्यते, न तु वृद्धिपरिणामापक्षया अपीत्यत आह ॐ अन्येषामपि भावविकाराणां वृद्ध्यादीनां त्रिष्वेवान्तर्भाव इति ॐ। वृद्धिस्तावदवयवोपचयः। तेनाल्पावयवादवयविनो द्वित्तणुकादेरस्य
भामती-व्याख्या
ने “अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य”—ऐसा कहा है। “देशकालनिमित्तक्रियाफलानि”—यहाँ पर देशश्च, कालश्च, निमित्तं च, क्रिया च, फलं च—एतेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः देशकालनिमित्तक्रियाफलानि। प्रतिनियतानि च देशकालनिमित्तक्रियाफलानि च, तेषामाश्रयो, जगत्, तस्य—ऐसा समास यहाँ विवक्षित है। कुछ पदार्थ प्रतिनियतदेशोत्पत्तिक होते हैं, जैसे काले हरिण स्वभावतः यज्ञ करने के योग्य देश में ही रहते हैं—
कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः।
स ज्ञेयो यज्ञियो देशो म्लेच्छदेशस्त्वतः परम्॥ (मनु. २।२३)
कतिपय पदार्थ किसी काल विशेष में ही होते हैं, जैसे कोयल का मधुर स्वर वसन्त काल में ही सुना जाता है। कुछ वस्तुएँ नियत-निमित्तक होती हैं, जैसे नवल मेघमाला का गर्जन सुनकर बलाका (बगुलियाँ) गर्भ धारण करती हैं। कुछ लोगों की क्रिया नियत (निश्चित) होती है, जैसे ब्राह्मणों का ही यागादि कर्म कराना काम होता है, क्षत्रियादि का नहीं। इसी प्रकार कुछ प्राणियों का सुखादि रूप फल नियत होता है, जैसे ब्रह्मलोकस्थ जीवों को सुख और नरकवासी प्राणियों को दुःख ही होता है। इस प्रकार का प्रपञ्च न तो स्वाभाविक हो सकता है और न यादृच्छिक (बिना किसी निमित्त के) किन्तु किसी सर्वज्ञ और सर्वशक्ति-समन्वित ईश्वर के द्वारा ही रचित हो सकता है। परिमित शक्तिवाले ग्रह, लोकपालादि की सूझ-बूझ से बहुत परे यह संसार-रचना है, इसलिए भाष्यकार कहते हैं—"मनसाऽप्यचिन्त्य-रचनारूपस्य।" आशय यह है कि किसी एक शरीर की रचना भी साधारण जीव की समझ में नहीं आती, उसका करना तो दूर रहा, फिर इतनी विकट जटिलताओं से पूर्ण जगत् की रचना ईश्वर के सिवा और कोई नहीं कर सकता। सूत्रस्थ अधूरे वाक्य की पूर्ति की जाती है—"तद् ब्रह्मेति वाक्यशेषः"। 'जगत् के जन्म, स्थिति और प्रलय—इन तीन विकारों का ही ग्रहण क्यों किया गया वृद्धि, परिणाम और अपक्षय नाम की तीन अवस्थाओं को क्यों छोड़ दिया गया?' इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है—"अन्येषामपि भावविकाराणां त्रिष्वे-वान्तर्भावः"। यास्काचार्य ने जो कहा है—"षड् भावविकारा भवन्तीति वार्ष्यायणिः (१) जायते, (२) अस्ति, (३) विपरिणमते, (४) वर्धते, (५) अपक्षीयते, (६) नश्यति" (निरुक्त० १)। इनमें से वृद्धि नाम है—अवयवों का उपचय (बढ़ना या जुड़ना)। उसके
ब्रह्मलक्षणविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १०१
परिपठितानां तु ‘जायतेऽस्ति’ इत्यादीनां ग्रहणे तेषां जगतः स्थितिकाले संभाव्यमानत्वान्मूलकारणादुत्पत्तिस्थितिनाशा जगतो न गृहीताः स्युरित्याशङ्क्येत, तन्माशङ्कीति योत्पत्तिर्ब्रह्मणस्तत्रैव स्थितिः प्रलयश्च त एव गृह्यन्ते । न यथोक्तविशेषणस्य
भामती एव महान् पटो जायत इति जन्मैव वृद्धिः । परिणामोऽपि त्रिविधो धर्मलक्षणावस्थालक्षण उत्पत्तिरेव । धर्मिणो हि हाटकादेर्धर्मलक्षणः परिणामः कटकमुकुटादिस्तस्योत्पत्तिः । एवं कटकादेरपि प्रत्युत्पन्नत्वादिलक्षणो लक्षणपरिणाम उत्पत्तिः । एवमवस्थापरिणामो नवपुराणत्वाद्युत्पत्तिः । अपक्षयस्त्ववयवह्रासो नाश एव । तस्माज्जन्मादिषु यथास्वमन्तर्भावाद् वृद्ध्यादयः पृथङ्नोक्ता इत्यर्थः । अथैते वृद्ध्यादयो न जन्मादिष्वन्तर्भवन्ति तथाप्युत्पत्तिस्थितिभङ्गमेवोपादातव्यम् । तथा सति हि तत्प्रतिपादके ‘यतो वा इमानि भूतानि’ इति वेदवाक्यं बुद्धिस्वीकृते जगन्मूलकारणं ब्रह्म लक्षितं भवति । अन्यथा तु जायतेऽस्ति वर्द्धत इत्यादीनां ग्रहणे तत्प्रतिपादकं नैरुक्तवाक्यं बुद्धौ भवेत् , तच्च न मूलकारणप्रतिपादनपरम् , महासर्गादूर्ध्वं स्थितिकालेऽपि तद्वाक्योदितानां जन्मादीनां भावविकाराणामुपपत्तेः, इति शङ्कानिराकरणार्थं वेदोक्तोत्पत्तिस्थितिभङ्गग्रहणमित्याह ॐ यास्कपरिपठितानां तु इति ॐ । नन्वेवमुत्पत्तिमात्रं सूच्यतां, तन्नान्तरीयकत्या तु स्थितिभङ्गं गम्यत इत्यत आह ॐ या उत्पत्तिर्ब्रह्मणः कारणाद् इति ॐ । त्रिभिरस्योपादानत्वं सूच्यते । उत्पत्तिमात्रं तु निमित्तकारणसाधारणमिति नोपादानं सूचयेत् । तदिदमुक्तं ॐ तत्रैव इति ॐ । पूर्वोक्तानां कार्य्यकारणविशेषणानां प्रयोजनमाह ॐ न यथोक्त इति ॐ । तदनेन
भामती-व्याख्या द्वारा तन्तुओं के जुड़ते जाने पर एक सहस्रतन्तुक महान् पट बन जाता है, आचार्य यास्क भी कहते हैं— “वर्धते इति स्वाङ्गाभ्युच्चयं सांख्योगिकानां वार्थानाम्, वर्द्धते विजयेन वा वर्द्धते शरीरेणेति वा”। इस प्रकार की वृद्धि का जन्म में समावेश हो जाता है । परिणाम भी तीन प्रकार का होता है—(१) धर्म-परिणाम, जैसे सुवर्ण-पिण्डादि धर्मी पदार्थों का कटक, मुकुटादि धर्मों के रूप में उत्पन्न होना । (२) लक्षण-परिणाम, जैसे कटकादि धर्मों के वर्तमानत्व-अतीतत्वादि रूप लक्षणों की उत्पत्ति । (३) अवस्था-परिणाम, जैसे कटक-मुकुटादि की नवत्व-पुराणत्वादि अवस्थाओं की उत्पत्ति । इस प्रकार परिणाम रूप विकार भी जन्म ही है । अपक्षय का अन्तर्भाव नाश में होता है, अतः वृद्धि आदि विकारों को पृथक् नहीं गिनाया गया है । यदि वृद्धि आदि विकारों का जन्मादि में अन्तर्भाव नहीं भी होता, तब भी जन्म, स्थिति और भङ्ग का ही ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वैसा करने से ही “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति च” (तै० उ० ३।१) इस बुद्धिस्थ श्रुति-वाक्य के द्वारा ब्रह्म-लक्षण के प्रतिपादन की संगति बैठती है, अन्यथा (षड् भाव विकारों का ग्रहण करने पर ) उसका प्रतिपादक उक्त निरुक्त-वाक्य उपस्थित होगा, वह जगत् के मूलभूत ब्रह्म का लक्षण प्रस्तुत नहीं करता, अपितु महासृष्टि के पश्चात् जगत् की स्थितिकाल में षड् भाव विकारों की उपपत्ति हो जाती है । उससे मूलकारणीभूत ब्रह्म का लक्षण क्योंकर होगा ? इस शङ्का की निवृत्ति करने के लिए वेदोक्त उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का ग्रहण ही न्यायोचित है, यह भाष्यकार कह रहे हैं— “यास्कपरिपठितानां तु”। केवल ‘जगज्जन्महेतुत्वम्’—इतना ही लक्षण पर्याप्त है, सूत्र में ‘आदि’ पद की क्या आवश्यकता ? एवं भाष्यकार के द्वारा ‘आदि’ पद की व्याख्या के रूप में स्थिति और भङ्ग का उल्लेख क्यों?’ इस शङ्का का निराकरण किया जा रहा है— “योत्पत्तिर्ब्रह्मणः कारणात्”। जन्म, स्थिति और भङ्ग—इन तीनों की हेतुता ही ब्रह्मगत उपादानता है, केवल जन्म-हेतुता तो निमित्तकारण में भी रह जाती है, अतः सूत्र में आदि पद रखना एवं भाष्यकार का जन्म, स्थिति और
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जगतो यथोक्तविशेषणमीश्वरं मुक्त्वाऽन्यतः प्रधानादचेतनाद्, अणुभ्योऽभावात्, संसारिणो वा उत्पत्त्यादि संभावयितुं शक्यम् । न च स्वभावतः, विशिष्टदेशकालनिमित्तानामिहोपादानात् । एतदेवानुमानं संसारिव्यतिरिक्तेश्वरास्तित्वादिसाधनं मन्यन्त ईश्वरकारणिनः । नन्विहापि तदेवोपन्यस्तं जन्मादिसूत्रे । न, वेदान्तवाक्यकुसुमग्रथनार्थत्वात्सूत्राणाम् - वेदान्तवाक्यानि हि सूत्रैरुदाहृत्य विचार्यन्ते । वाक्या-
भामती
प्रबन्धेन प्रतिज्ञाविषयस्य ब्रह्मस्वरूपस्य लक्षणद्वारेण सम्भावनोक्ता । तत्र प्रमाणं वक्तव्यम् । यथाह्युर्नैयायिकाः—
"सम्भावितः प्रतिज्ञायां पक्षः साध्येत हेतुना ।
न तस्य हेतुभिस्त्राणमुत्पतन्नेव यो हतः ॥"
यथा च बन्ध्या जननीत्यादिः' इति । इत्थं नाम जन्मादिसम्भावनावहेतुः, यदन्ये वैशेषिकादय इत एवानुमानादीश्वरविनिश्चयमिच्छन्तीति, सम्भावनाहेतुतां द्रढयितुमाह ॐ एतदेव इति ॐ । चोदयति ॐ नन्विहापि इति ॐ । एतावत्तैवाधिकरणार्थं समाप्ते वक्ष्यमाणाधिकरणार्थं वदन् सुहृद्भावेन परिहरति ॐ न इति ॐ । वेदान्तवाक्यकुसुमप्रथनार्थतामेव दर्शयति ॐ वेदान्तेति ॐ । विचारस्याध्यवसानं सवा-
भामती-व्याख्या
भङ्ग—तीनों का निर्देश करना सार्थक है । जगद्रूप कार्य के जो विशेषण दिए गए हैं—अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तत्त्वादि और कारणभूत ब्रह्म के जो सर्वज्ञत्वादि विशेषण दिए गए हैं, उनका प्रयोजन स्पष्ट किया जाता है—"न यथोक्तविशेषणस्य जगतो यथोक्तविशेषणमीश्वरं मुक्त्वा अन्यतः उत्पत्त्यादि सम्भावयितुं शक्यम्" । सांख्य-सम्मत प्रधान (प्रकृति), वैशेषिक-कल्पित परमाणु जड और माध्यमिक-सिद्धान्त-सिद्ध शून्य (अभाव) तत्त्व निरुपाख्य (अलीक) है एवं संसारी जीव अल्पज्ञ हैं, अतः वे जगत् की रचना नहीं कर सकते ।
शङ्का—यहाँ तक की चर्चा का निष्कर्ष यह है कि प्रथम सूत्र में प्रतिज्ञात ब्रह्म का द्वितीय सूत्र में जो लक्षण (जगज्जन्मादिकर्तृत्व) प्रस्तुत किया गया, उसके द्वारा ब्रह्मस्वरूप की सम्भावना प्रकट की गई, अब ब्रह्म में प्रमाण प्रदर्शित करना चाहिए, जैसा कि नैयायिकगण मानते हैं -
"सम्भावितः प्रतिज्ञायां पक्षः साध्येत हेतुना ।
न तस्य हेतुभिस्त्राणमुत्पतन्नेव यो हतः ॥"
अर्थात् पर्वतरूप पक्ष पर्वतत्वेन सिद्ध और वह्निमत्त्वेन साध्य माना जाता है, लक्षण के द्वारा सम्भावित वह्निमत्त्वेन पर्वत रूप पक्ष ही धूमादि हेतु के द्वारा सिद्ध किया जाता है, लक्षणरहित अत एव असम्भावित उस पक्षकी हेतुओं के द्वारा सिद्धि नहीं की जा सकती, जो कि प्रतीति में आते ही व्याहत हो जाता है, जैसे 'वन्ध्या में माता' । फलतः जन्मादिकर्तृत्वरूप लक्षण के द्वारा सम्भावित ब्रह्म में प्रमाण-प्रदर्शन की अपेक्षा से वैशेषिकादि "जन्माद्यस्य यतः"—इस सूत्र को लक्षण के साथ-साथ अनुमान प्रमाण का भी सूचक मानते हैं—'क्षित्यादिकं जगत्, सकर्तृकम्, जन्मादियुक्तत्वाद्, घटादिवत्' ।
समाधान—यह विचार-शास्त्र है, प्रमाण-शास्त्र नहीं कि प्रमाण-प्रदर्शन मात्र से अधिकरण का उद्देश्य पूरा हो जाय । यहाँ सभी वक्ष्यमाण अधिकरणों में विवादास्पद वेदान्त वाक्यों पर संशयादि-प्रदर्शन पूर्वक यह विचार किया जाता है कि इन वाक्यों का ब्रह्म में समन्वय किस प्रकार है ? वेदान्त-वाक्यरूपी पुष्पों को पिरोने के लिए यह सूत्र-ग्रन्थ रचा गया है । इस विचार-माला का पर्यवसान ब्रह्मावगतिरूप सुमेरु में ही होता है, अनुमानादि
ब्रह्मलक्षणविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १०३
र्थविचारणाध्यवसाननिर्वृत्ता हि ब्रह्मावगतिः, नानुमानादिप्रमाणान्तरनिर्वृत्ता । सत्सु तु वेदान्तवाक्येषु जगतो जन्मादिकारणवादिषु तदर्थग्रहणदार्ढ्यायोनुमानमपि वेदान्तवाक्याविरोधि प्रमाणं भवन्न निवार्यते, श्रुत्यैव च सहायत्वेन तर्कस्याभ्युपेतत्वात् । तथा हि—'श्रोतव्यो मन्तव्यः' (बृह० २।४।५) इति श्रुतिः 'पण्डितो मेधावी गन्धारानैवोपसंपद्येतैवमेवेहाचार्यवान् पुरुषो वेद' (छान्दो० ६।१४।२) इति च पुरुषबुद्धिसाहाय्यमात्मनो दर्शयति । न धर्मजिज्ञासायामिव श्रुत्यादय एव प्रमाणं
भामती सनावियाद्वयोच्छेदः । ततो हि ब्रह्मावगतेर्निर्वृत्तिराविर्भावः । तत्किं ब्रह्मण शब्दादृते न मानान्तरमनुसरणीयम् । तथा च कुतो मननं, कुतश्च तदनुभवः साक्षात्कार इत्यत आह ॐ सत्सु तु वेदान्तवाक्येषु इति ॐ । अनुमानं वेदान्ताविरोधि तदुपजीवि चेत्यपि द्रष्टव्यम् । शब्दाविरोधिन्या तदुपजीविन्या च युक्त्या विवेचनं मननम् । युक्तिश्चार्थापत्तिरनुमानं वा । स्यादेतद्—यथा धर्मे न पुरुषबुद्धिसाहाय्यम् , एवं ब्रह्मण्यपि कस्मान्न भवतीत्यत आह ॐ न धर्मजिज्ञासायामिव इति ॐ । ॐ श्रुत्यादयः इति ॐ ।
भामती-व्याख्या प्रमाणों के द्वारा वह अवगति सम्भव नहीं, जैसा कि श्रुति कहती है—"नैषा तर्केण मतिरापनेया" (कठो० १।२।९)। वेदान्त-वाक्य-प्रसूत ब्रह्मावगति से ही कथित द्विविध अविद्या का उच्छेद एवं जीव में ब्रह्मारूपता का आविर्भाव होता है। 'तब क्या ब्रह्म के बोधन में प्रवृत्त अनुमानादि (वेदान्त-भिन्न) प्रमाणों का आदर नहीं करना चाहिए ? उनकी उपेक्षा कर देने से मनन (अनुमानादिपूर्वक अनुचिन्तन ) और साक्षात्कार क्योंकर होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है—"सत्सु वेदान्तवाक्येषु" । अर्थात् जगज्जन्मादि-कारण-वेदी वेदान्त वाक्यों के द्वारा ही प्रथमतः ब्रह्म का बोध उत्पन्न होता है, उसको दृढ़ता प्रदान करने के लिए यदि अनुमानादि प्रवृत्त होते हैं, तब उनको उचित समादर ही दिया जायगा, उनकी उपेक्षा नहीं की जायगी, क्योंकि श्रुति ही अपने सहायक के रूप में तर्कादि को मान्यता प्रदान करती है—"श्रोतव्यो मन्तव्यः" (बृह० उ० २।४।५) ! "पण्डितो मेधावी गन्धारानैवोपसम्पद्येतैवमेवेहाचार्यवान् पुरुषो वेद" (छां० ६।१४।२) यह श्रुति स्पष्टरूप से पुरुष-बुद्धि की सहायता को स्वीकार करती हुई कहती है कि जैसे कोई मेधावी पण्डित पुरुष अन्य व्यक्तियों से मार्ग-दर्शन लेकर सुदूर गन्धार देश तक पहुँच जाता है, वैसे ही अधिकारी पुरुष आचार्य के निर्देशन में वेदान्त वाक्यों के द्वारा ब्रह्म का वेदन (अवगम) कर लेता है।
शङ्का—जैसे धर्म के बोधन में वेद पुरुष बुद्धि की सहायता को स्वीकार नहीं करता [ कुमारिल भट्ट ने कहा है—
"द्रव्यक्रियागुणादीनां धर्मत्वं स्थापयिष्यति।
तेषामैन्द्रियकत्वेऽपि न ताद्रूप्येण धर्मता ॥
श्रेयःसाधनता ह्येषां नित्यं वेदात् प्रतीयते।
ताद्रूप्येण च धर्मत्वं तस्मान्नेन्द्रियगोचरः ॥" (श्लो. वा. पृ. ४९)
व्रीहि आदि द्रव्य, यागादि क्रिया, आरुण्यादि गुण ही धर्मरूप माने गए हैं। यद्यपि वे ऐन्द्रियक हैं, तथापि उनमें धर्मता ऐन्द्रियक नहीं मानी जाती, क्योंकि उनमें श्रेयःसाधनत्वेन रूपेण धर्मता मानी जाती है, श्रेयःसाधनता का ज्ञान नियमतः "व्रीहिभिर्यजेत" इत्यादि वैदिक वाक्यों से ही होती है, अतः धर्म वैदिकसमधिगम्य है, धर्म के बोधन में अन्य किसी प्रमाण की सहायता अपेक्षित नहीं] । वैसे ही औपनिषद पुरुष (ब्रह्म) के बोधन में भी वेदान्त-वाक्य अन्य किसी भी प्रमाण या युक्ति की अपेक्षा क्यों करेंगे ?
समाधान—उक्त शङ्का का निराकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं—'न धर्मजिज्ञा-