भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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९८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. २ सार्थः । जन्मनश्चादित्वं श्रुतिनिर्देशापेक्षं वस्तुवृत्तापेक्षं च । श्रुतिनिर्देशस्तावद्- 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' (तैत्ति० ३।१) इत्यस्मिन् वाक्ये जन्मस्थितिप्रलयानां क्रमदर्शनात् । वस्तुवृत्तमपि जन्मना लब्धसत्ताकस्य धर्मिणः स्थितिप्रलयसंभवात् । अस्येति प्रत्यक्षादिसंनिधापितस्य धर्मिण इदमा निर्देशः । षष्ठी जन्मादिधर्मसंब- न्धार्था । यत इति कारणनिर्देशः । अस्य जगतो नामरूपाभ्यां व्याकृतस्यानेककर्तृभोक्तृ- भामती ब्रह्मणो लक्षणं तदुत्पत्त्या तु भविष्यति । देशान्तरप्राप्तिरिव सवितुर्व्रज्याया इति तात्पर्य्यार्थः । सूत्रावयवान् विभजते ॐ जन्मोत्पत्तिरादिरस्य इति ॐ । लाघवाय सूत्रकृता जन्मादीति नपुंसकप्रयोगः कृतस्तदुपपाद- नाय समाहारमाह ॐ जन्मस्थितिभङ्गमिति ॐ । ॐ जन्मनश्च ॐ इत्यादिः ॐ कारणनिर्देशः ॐ इत्यन्तः सन्दर्भों निगदव्याख्यातः । स्यादेतत्- प्रधानकालग्रहलोकपालक्रियायदृच्छास्वभावाभावेषूपप्लवमानेषु भामती-व्याख्या तज्जन्यत्वेन अवश्य ब्रह्म का लक्षण वैसे ही बन जायगा, जैसे सूर्य की देशान्तर-प्राप्ति सूर्य की व्रज्या ( गमन क्रिया ) का लक्षण होती है [ कोई लक्षण लक्ष्य से तादात्म्यापन्न होता है, जैसे शिंशपा वृक्ष का, कोई लक्षण लक्ष्य का धर्म होता है, जैसे सास्नादिमत्त्व गौ का और कोई लक्षण लक्ष्य से उत्पन्न होकर लक्ष्य का लक्षण माना जाता है, जैसे धूम अग्नि का अथवा देशान्तर-प्राप्ति सूर्य की गति का। प्रकृत में आकाशादि प्रपञ्च ब्रह्म से जनित होने के कारण ब्रह्म का लक्षण माना जाता है ]। सूत्र-घटक जन्मादि की व्याख्या की जाती है- “जन्मो- त्पत्तिः” । प्रयोग-लाघव को ध्यान में रख कर सूत्रकार ने 'जन्मादि'- ऐसा नपुंसक लिङ्ग का प्रयोग किया है, उसकी उपपत्ति करने के लिए भाष्यकार समाहार द्वन्द्व को प्रकट कर रहे हैं- "जन्मस्थितिभङ्गं समासार्थः” [ समाहार द्वन्द्व में समुदायी पदार्थों की प्रधानता न होकर समुदाय का प्राधान्य माना जाता है, समुदायगत एकत्व की विवक्षा में एकवचन और वह भी सामान्यतः नपुंसक लिङ्ग होता है ] । जन्म, स्थिति और भङ्ग में सर्व-प्रथम जन्म के साथ जगत् का सम्बन्ध होने के कारण जन्मादिरस्य-ऐसा कहा गया है। पाठक्रम के आधार पर जन्म का आदि में उल्लेख किया गया है, क्योंकि श्रुति कहती है- "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति च' (तै. उ. ३।१)। यहाँ क्रमशः जन्म, स्थिति और प्रलय का निर्देश किया गया है। वस्तु-स्थिति के आधार पर भी जन्म का प्रथम स्थान निश्चित होता है, क्योंकि जन्म हो जाने पर ही कोई वस्तु सत्ता में आती है, कुछ समय स्थित रहती और अन्त में प्रलीन हो जाती है। सूत्रस्थ 'अस्य' पद के द्वारा प्रत्यक्षादि से सन्निकृष्ट जगद् रूप धर्मी का ग्रहण किया गया है, क्योंकि 'इदम्' शब्द सन्निहित पदार्थ का वाचक होता है। 'अस्य' पद में षष्ठी विभक्ति जगत् के साथ जन्मादि धर्मों का सम्बन्ध प्रतिपादित करती है । 'यतः' पद के द्वारा उस कारण तत्त्व का निर्देश किया गया है, जिससे जगद्रूप कार्य उत्पन्न होता है । शङ्का - जगत्कारणता को ईश्वर का तब लक्षण माना जा सकता था, जब ईश्वर को छोड़ कर अन्यत्र कहीं भी कारणता श्रुत न होती, किन्तु “अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानाम्” (श्वेता. ४।५ ), "कालः स्वभावो, नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः” ( श्वेता. १।२) इत्यादि श्रुतियों के द्वारा प्रधान (त्रिगुणा प्रकृति ), काल, ग्रह ( सूर्यादि ), लोकपाल, क्रिया, यदृच्छा (अनियमित ) स्वभाव, अभाव ( शून्य ) आदि अन्य पदार्थों में भी जगत् की कारणता प्रतिपादित है, अतः यह कैसे माना जा सकता है कि सर्वज्ञ और सर्वशक्ति-सम्पन्न ब्रह्म ही जगत् का कारण है ?