भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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ब्रह्मलक्षणविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ९७

( २-जन्माद्यधिकरणम् । सू० २ )

ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्युक्तम् । किंलक्षणं पुनस्तद् ब्रह्मेत्यत आह भगवान् सूत्रकारः— जन्माद्यस्य यतः ॥ २ ॥ जन्मोत्पत्तिरादिरस्येति तद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः । जन्मस्थितिभङ्गं समा-

भामती

तदेवं तावत् प्रथमेन सूत्रेण मीमांसारम्भमुपपाद्य ब्रह्ममीमांसामारभते ॐ जन्माद्यस्य यतः ॐ । एतस्य सूत्रस्य पातनिकामाह भाष्यकारः ॐ ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्युक्तं किंलक्षणं पुनस्तद् ब्रह्म ॐ । अत्र यद्यपि ब्रह्मस्वरूपज्ञानस्य प्रधानस्य प्रतिज्ञया तदङ्गान्यपि प्रमाणादीनि प्रतिज्ञातानि, तथापि स्वरूपस्य प्राधान्यात् तदेवाक्षिप्य प्रथमं समर्थ्यते। तत्र यद्यावदनुभूयते तत्सर्वं परिमितम् अविशुद्धमबुद्धं विध्वंसि न तेनोपलब्धेन तद्विरुद्धस्य नित्यशुद्धबुद्धस्वभावस्य ब्रह्मणः स्वरूपं शक्यं लक्षयितुम्। नहि जातु कश्चित् कृतकत्वेन नित्यं लक्षयति । न च तद्धर्मेण नित्यत्वादिना तल्लक्ष्यते, तस्यानुपलब्धचरत्वात्। प्रसिद्धं हि लक्षणं भवति, नात्यन्ताप्रसिद्धम्। एवं च न शब्दोऽप्यत्र क्रमते। अत्यन्ताप्रसिद्धतया ब्रह्मणोऽपदार्थ-स्यावाक्यार्थत्वात्। तस्माल्लक्षणाभावान्न ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्याक्षेपाभिप्रायः। तमिममाक्षेपं भगवान् सूत्रकारः परिहरति ॐ जन्माद्यस्य यतः इति ॐ । मा भूदनुभूयमानं जगत् तद्धर्मतया तादात्म्येन वा

भामती-व्याख्या

प्रकार जिसके उपकरण (सहायक) हैं, ऐसी वेदान्त-वाक्य-मीमांसा प्रस्तुत की जा रही है। इसका प्रयोजन एकमात्र मोक्ष-साधनीभूत ब्रह्म-ज्ञान है, अतः सप्रयोजन होने के कारण ब्रह्म-जिज्ञासा का आरम्भ न्यायोचित सिद्ध हो जाता है।

प्रथम सूत्र के द्वारा ब्रह्म-मीमांसा के आरम्भ का समर्थन करके द्वितीय सूत्र से ब्रह्म-मीमांसा का आरम्भ किया जाता है—"जन्माद्यस्य यतः।" भाष्यकार इस सूत्र की अवतरणिका प्रस्तुत कर रहे हैं—"ब्रह्म जिज्ञासितव्यमित्युक्तम्, किं लक्षणं पुनस्तद् ब्रह्म"। यहाँ जब प्रधानभूत ब्रह्मस्वरूप की जिज्ञासा के द्वारा उसके अङ्गभूत प्रमाणादि की जिज्ञासा भी प्रति-ज्ञात हो गई, तब द्वितीय सूत्र की अवतरणिका में प्रमाणादि का आक्षेप न उठाकर केवल ब्रह्म के स्वरूप पर आक्षेप क्यों किया गया ? इस प्रश्न के उत्तर में केवल इतना ही कहा जा सकता है कि प्रधान होने के कारण ब्रह्म के स्वरूप पर आक्षेप करके उसका ही समाधान द्वितीय सूत्र के माध्यम से किया जाता है। 'किंलक्षणम्'—यहाँ 'किं' शब्द आक्षेपार्थक है, आक्षेपवादी का आशय यह है कि विश्व में जो भी वस्तु अनुभूत होती है, वह परिमित (परिच्छिन्न), अविशुद्ध, अबुद्ध और नश्वर है। उसकी उपलब्धि से उसके विरुद्ध नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्तस्वभाव ब्रह्म का स्वरूप नहीं जाना जा सकता, क्योंकि लोक में कृतक (जन्य) पदार्थ के द्वारा नित्य पदार्थ कभी भी अभिलक्षित नहीं होता। हाँ, नित्य-त्वादि धर्मों के द्वारा नित्य ब्रह्म का लक्षण किया जा सकता है, किन्तु नित्यत्वादि धर्म कहीं उपलब्ध नहीं। लोक-प्रसिद्ध धर्म ही लक्षण माना जाता है, अत्यन्त अप्रसिद्ध नहीं। जब नित्य, शुद्ध, बुद्धस्वरूप ब्रह्म प्रसिद्ध ही नहीं, तब कोई पद भी उसका अभिधान कैसे करेगा ? पदार्थ ही वाक्यार्थ होता है, अतः किसी वाक्य के द्वारा ब्रह्म का बोध नहीं कराया जा सकता। फलतः ब्रह्म का कोई लक्षण न हो सकने के कारण ब्रह्म जिज्ञासितव्य (वेदान्त-वाक्यों के द्वारा विचारणीय) नहीं।

उक्त आक्षेप का परिहार भगवान् सूत्रकार ने किया है—"जन्माद्यस्य यतः"। अनुभूयमान जगत् तादात्म्येन या तद्धर्मत्वेन ब्रह्म का लक्षण यदि नहीं होता तो न सही,

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