भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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९६सूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. १

कतैंत्येके । अस्ति तद्व्यतिरिक्त ईश्वरः सर्वज्ञः सर्वशक्तिरिति केचित् । आत्मा स भोक्तुरित्यपरे । एवं बहवो विप्रतिपन्ना युक्तिवाक्यतदाभाससमाश्रयाः सन्तः । तत्राविचार्य यत्किञ्चित्प्रतिपद्यमानो निःश्रेयसात्प्रतिहन्येतानर्थं चेयात् । तस्माद्ब्रह्मजिज्ञासोपन्यासमुखेन वेदान्तवाक्यमीमांसा तदविरोधिकोपकरणा निःश्रेयसप्रयोजना प्रस्तूयते ॥ १॥


भामती

तदेवं त्वम्पदार्थविप्रतिपत्तिद्वारा तत्पदार्थे विप्रतिपत्तिं सूचयित्वा साक्षात्तत्पदार्थे विप्रतिपत्तिमाह ❀ अस्ति तद्व्यतिरिक्त ईश्वरः सर्वज्ञः सर्वशक्तिरिति केचित् ॥ तदिति जीवात्मानं परामृशति । न केवलं शरीरादिभ्यो जीवात्मभ्योऽपि व्यतिरिक्तः । स च सर्वस्यैव जगत ईष्टे । ऐश्वर्यप्रसिद्धयर्थं स्वाभाविकमस्य रूपद्वयमुक्तं ❀ सर्वज्ञः सर्वशक्तिरिति । तस्यापि जीवात्मभ्योऽपि व्यतिरेकान्न त्वम्पदार्थेन सामानाधिकरण्यमिति स्वमतमाह ❀ आत्मा स भोक्तुरित्यपरे ॥ भोक्तुर्जिवात्मनोऽविद्योपाधिकस्य स ईश्वरस्तत्पदार्थ आत्मा तत ईश्वरादभिन्नो जीवात्मा परमाकाशादिव घटाकाशादय इत्यर्थः । विप्रतिपत्तीरुपसंहरन् विप्रतिपत्तिबीजमाह ❀ एवं बहवः इति । ❀ युक्तियुक्त्याभासवाक्यवाक्याभाससमाश्रयाः सन्तःइति योजना । ननु सन्तु विप्रतिपत्तयस्तन्निमित्तश्च संशयस्तथापि किमर्थं ब्रह्ममीमांसारभ्यत इत्यत आह ❀ तत्राविचार्येति ॥ तत्त्वज्ञानाच्च निःश्रेयसाधिगमो नातत्त्वज्ञानाद्भुवितुमर्हति । अपि च अतत्त्वज्ञानान्नास्तिक्ये सत्यनर्थप्राप्तिरित्यर्थः । सूत्रतात्पर्यमुपसंहरति ❀ तस्माद् इति ॥ वेदान्तमीमांसा तावत्तर्क एव, तदविरोधिनश्च येऽन्येऽपि तर्का अध्वरमीमांसायां न्याये च वेदप्रत्यक्षादिप्रामाण्यपरिशोधनादियुक्तास्त उपकरणं यस्याः सा तथोक्ता । तस्मात् परंनिःश्रेयससाधनब्रह्मज्ञानप्रयोजना ब्रह्ममीमांसाऽऽरब्धव्येति सिद्धम् ।


भामती-व्याख्या

पचाराः” ( प्र. पं. पृ. ३३९ ) । अब तत्पदार्थ में साक्षाद् विप्रतिपत्ति दिखाते हैं—“अस्ति तद्व्यतिरिक्त ईश्वरः सर्वज्ञः सर्वशक्तिरिति केचित्” । ‘तद्व्यतिरिक्तः’—इस वाक्य में ‘तत्’ पद से जीव का ग्रहण किया गया है, अर्थात् ईश्वर केवल शरीरादि जड़वर्ग से ही भिन्न नहीं, अपितु जीव से भी भिन्न है । वह समस्त जगत् का सञ्चालक है, उस ( ईश्वर ) में स्वाभाविक ऐश्वर्य सिद्ध करने के लिए दो विशेषण दिए गए हैं—‘सर्वज्ञः, सर्वशक्तिः’ ऐसा ईश्वर भी जीवों से भिन्न माना जाता है, अतः उसका त्वम्पदार्थ के साथ सामानाधिकरण्य ( अभेद ) नहीं बन सकता । वेदान्ती अपना मत प्रस्तुत करता है—‘‘आत्मा स भोक्तुरित्यपरे’’ । जीवरूप भोक्ता पुरुष का वह तत्पदार्थभूत ईश्वर आत्मा ( स्वरूप ) है, अतः जीवात्मा ईश्वर से वैसे ही अभिन्न है, जैसे महाकाश से घटाकाशादि । विप्रतिपत्तियों का उपसंहार करते हुए विप्रतिपत्ति का कारण बताया जाता है—‘‘एवं बहव विप्रतिपन्ना युक्तिवाक्यतदाभास-समाश्रयाः सन्तः” । युक्ति-युक्त्याभास, वाक्य-वाक्याभास का समाश्रयण कर अपना-अपना मत प्रस्तुत कर रहे हैं । विप्रतिपत्तियों के द्वारा आत्मविषयक सन्देह मान लेने पर भी ब्रह्म-मीमांसा का आरम्भ किसलिए ? इस प्रश्न का उत्तर है—‘‘तत्राविचार्य यत्किञ्चित् प्रतिपद्यमानो निःश्रेयसात्प्रतिहन्येत” ( तत्त्व-ज्ञान से साध्य मोक्षाधिगम कभी संशयादिरूप अतत्त्व-ज्ञान से नहीं हो सकता, प्रत्युत अतत्त्व-ज्ञान के द्वारा नास्तिकता-मूलक अनर्थ-प्राप्ति भी हो सकती है । सूत्र के तात्पर्य का उपसंहार किया जाता है—‘‘तस्मात्’’ । वेदान्त-मीमांसा भी एक तर्क ही है, इससे अविरुद्ध अन्य जितने भी तर्क धर्म-मीमांसा या न्यायों ( अधिकरणों ) में चर्चित या प्रत्यक्षादि प्रमाणों के परिशोधन में प्रयुक्त हैं, वे सभी तर्क-