भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 113

तत्त्वमर्थविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ९५

विप्रतिपत्तेः। देहमात्रं चैतन्यविशिष्टमात्मेति प्राकृता जना लोकायतिकाश्च प्रतिपन्नाः। इन्द्रियाण्येव चेतनान्यात्मेत्यपरे। मन इत्यन्ये। विज्ञानमात्रं क्षणिकमित्येके। शून्य- मित्यपरे। अस्ति देहादिव्यतिरिक्तः संसारी कर्त्ता भोक्तेत्यपरे। भोक्तैव केवलं न

भामती

न स्युः। विरुद्धा हि प्रतिपत्तयो विप्रतिपत्तयः। न चानाश्रयाः प्रतिपत्तयो भवन्ति, अनालम्बनत्वापत्तेः। न च भिन्नाश्रया विरुद्धा। न ह्यनित्या बुद्धिनित्य आत्मेति प्रतिपत्तिविप्रतिपत्ती। तस्मात्तत्पदार्थस्य शुद्ध- त्वादेर्वेदान्तेभ्यः प्रतीतिस्त्वम्पदार्थस्य च जीवात्मनो लोकतः सिद्धिः सर्वतन्त्रसिद्धान्तः। तदाभासत्वाना- भासत्वेन तद्विशेषेषु परमत्र विप्रतिपत्तयः। तस्मात्सामान्यतः प्रसिद्धे धर्मिणि विशेषतो विप्रतिपत्तौ युक्त- स्तद्विशेषेषु संशयः। तत्र त्वम्पदार्थे तावद्विप्रतिपत्तीर्दर्शयति ॐ देहमात्रम् ॐ इत्यादिना ॐ भोक्तैव केवलं न कर्त्ता ॐ इत्यन्तेन। अत्र देहेन्द्रियमनःक्षणिकविज्ञानचैतन्यपक्षे न तत्पदार्थनित्यत्वाद्यस्त्वम्पदार्थेन सम्ब- न्ध्यन्ते, योग्यताविरहात्। शून्यपक्षेऽपि सर्वोपाख्यारहितमपदार्थः कथं तत्त्वमगोचरः ? कर्तृभोक्तृत्व- भावस्यापि परिणामितया तत्पदार्थनित्यत्वासङ्गतिरेव। अकर्तृत्वेऽपि भोक्तृत्वपक्षे परिणामितया नित्यत्वा- द्यसङ्गतिः। अभोक्तृत्वेऽपि नानात्वेनावच्छिन्नत्वाद् अनित्यत्वादिप्रसक्तावद्वैतहानाच्च तत्पदार्थासङ्गति- स्तदवस्थैव। त्वम्पदार्थविप्रतिपत्त्या च तत्पदार्थेऽपि विप्रतिपत्तिर्दर्शिता। वेदाप्रामाण्यवादिनो हि लौका- यतिकादयस्तत्पदार्थप्रत्ययं मिथ्येति मन्यन्ते। वेदप्रामाण्यवादिनोऽप्यौपचारिकं तत्पदार्थमविवक्षितं वा मन्यन्त इति।

भामती-व्याख्या

या भिन्न-भिन्न आश्रयों में विरुद्ध धर्म-प्रदर्शन को विप्रतिपत्ति नहीं कहा जा सकेगा, क्योंकि एक धर्मी में विरुद्ध प्रतिपत्तियों को विप्रतिपत्ति कहा जाता है। विप्रतिपत्ति को आश्रय-हीन मानने पर निरालम्बवाद प्रसक्त होता है और भिन्न-भिन्न आश्रय में प्रदर्शित धर्मों का विरोध नहीं माना जाता, जैसे 'अनित्या बुद्धिः' और 'नित्य आत्मा'—इनका कोई विरोध नहीं होता। अतः तत्पदार्थ के शुद्धत्वादि की प्रतीति वेदान्त-वाक्यों के द्वारा और त्वम्पदार्थभूत जीवात्मा की प्रसिद्धि लोकतः—ऐसा सर्वतन्त्र (सर्वाभ्युपगत) सिद्धान्त है। विविध मत- सिद्ध प्रतीतियों में आभासत्व और अनाभासत्वादि विवादास्पद हैं। अतः सामान्यतः प्रसिद्ध धर्मी में विशेषतः विवाद होने के कारण विशेषाथर्विषयक संशय उपपन्न हो जाता है। त्वम्पदार्थ में विप्रतिपत्ति दिखाते हैं—"देहमात्रं चैतन्यविशिष्टमात्मा"—यहाँ से लेकर "भोक्तैव केवलं न कर्त्ता"—यहाँ तक। यहाँ देह, इन्द्रिय, मन, क्षणिक विज्ञान के आत्मत्व-पक्ष में तत्पदार्थभूत नित्यत्वादि का त्वम्पदार्थ के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें नित्यत्वादि के साथ सम्बन्ध की योग्यता ही नहीं। शून्य के आत्मत्व-पक्ष में शून्य पदार्थ सर्वथा निरुपाख्य और अलीक माना जाता है, वह न तो त्वम्पदार्थ का विषय हो सकता है और न तत्पदार्थ का। कर्त्ता-भोक्ता आत्मा परिणामी होने के कारण उसमें नित्यत्वादि धर्मों की संगति ही नहीं हो सकती। आत्मा को कर्तृत्व-रहित केवल भोक्ता मानने पर भी परिणामी होने से नित्यत्वादि का आश्रय नहीं हो सकता। कर्तृत्व-भोक्तृत्व-रहित आत्मा जो सांख्य मानते हैं, वह भी नानात्व से अवच्छिन्न होने के कारण अनित्य ही हो जाता है, अतः वह नित्य क्योंकर होगा? अद्वैतत्व की भी हानि है, अतः उसमें तत्पदार्थ का संगमन नहीं होता। त्वम्पदार्थ में विप्रतिपत्ति दिखाने मात्र से तत्पदार्थ में भी विप्रतिपत्तियाँ प्रदर्शित ही हो जाती हैं। वेदाप्रामाण्यवादी चार्वाकादि तत्पदार्थ की प्रतीति को मिथ्या ही मानते हैं। वेद- प्रामाण्यादियों में भी प्राभाकरादि तत्पदार्थ को औपचारिक अथवा अविवक्षित मानते हैं, जैसा कि शालिकनाथ मिश्र कहते हैं—'सर्वात्मश्रुतयश्च सर्वस्यात्मार्थत्वात् तदर्थनिमित्तो-