भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ९४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. १ |
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त्वप्रसिद्धिः । सर्वो ह्यात्मास्तित्वं प्रत्येति, न नाहमस्मीति । यदि हि नात्मास्तित्वप्रसिद्धिः स्यात् सर्वो लोको नाहमस्मीति प्रतीयात् । आत्मा च ब्रह्म । यदि तर्हि लोके ब्रह्मात्मत्वेन प्रसिद्धमस्ति, ततो ज्ञातमेवेत्यजिज्ञास्यत्वं पुनरापन्नम् । न; तद्विशेषं प्रति
भामती
हालिकस्यापि ब्रह्मास्तित्वप्रसिद्धिः । कुतः ? आत्मत्वात् । एतदेव स्फुटयति ॐ सर्वो हि इति ॐ । प्रतीतिमेवाप्रतीतिनिराकरणेन द्रढयति ॐ न न इति ॐ । न न प्रत्येत्यहमस्मीति, किन्तु प्रत्येत्येवेति योजना । नन्वहमस्मीति च ज्ञास्यति मा च ज्ञासीदात्मानमित्यत आह ॐ यदि इति ॐ । ॐ अहमस्मीति न प्रतीयात् ॐ । अहङ्कारास्पदं हि जीवात्मानं चेन्न प्रतीयादहमिति न प्रतीयादित्यर्थः । ननु प्रत्येतु सर्वो जन आत्मानमहङ्कारास्पदं ब्रह्मणि तु किमायातमित्यत आह ॐ आत्मा च ब्रह्म ॐ । तदस्त्वमा सामानाधिकरण्यात् तस्मात्तत्पदार्थस्य शुद्धबुद्धत्वादेः शब्दतस्त्वम्पदार्थस्य च जीवात्मनः प्रत्यक्षतः प्रसिद्धेः पदार्थज्ञानपूर्वकत्वाच्च वाक्यार्थज्ञानस्य त्वम्पदार्थस्य ब्रह्मभावावगमस्तत्त्वमसीतिवाक्याद् उपपद्यत इति भावः । आक्षेप्ता प्रथममल्पाश्रयं दोषमाह ॐ यदि तर्हि लोकः इति ॐ । अध्यापकाध्येतृपरम्परा लोकः, तत्र तत्त्वमसीतिवाक्याद् यदि ब्रह्मात्मत्वेन प्रसिद्धमस्ति, आत्मा ब्रह्मत्वेनेति वक्तव्ये ब्रह्मात्मत्वेनेत्यभेदविवक्षया गमयितव्यम् । परिहरति ॐ न ॐ । कुतः ? ॐ तद्विशेषं प्रति विप्रतिपत्तेः ॐ । तदनेन विप्रतिपत्तिः साधकबाधकप्रमाणाभावे सति संशयबीजमुक्तं, ततश्च संशयाज्जिज्ञासोपपद्यत इति भावः ।
विवादाधिकरणं धर्मो सर्वतन्त्रसिद्धान्तसिद्धोऽभ्युपेयः । अन्यथाऽनाश्रयाभिज्ञाश्रया वा विप्रतिपत्तयो
भामती-व्याख्या
प्रसिद्धिः” । एक हालिक से लेकर ऋषियों तक समस्त मनुष्यों की दृष्टि में ब्रह्मास्तित्व की प्रसिद्धि है, क्योंकि वह सभी का अपना आत्मा ही है । उसी का स्पष्टीकरण किया जाता है— “सर्वो ह्यात्मास्तित्वं प्रत्येति” । प्रतीति का अभिनय किया जा रहा है—“न नाहमस्मीति” । ‘अहमस्मि’—ऐसी प्रतीति नहीं होती, यह बात नहीं, अपितु सभी को अपने अस्तित्व की प्रतीति होती ही है । यदि सबको आत्मास्तित्व की प्रतीति नहीं होती, तब सभी को ‘नाहमस्मि’—ऐसी प्रतीति होनी चाहिए अर्थात् अहंकारास्पदीभूत जीवात्मा की प्रतीति यदि नहीं होती, तब ‘अहम्’—ऐसी प्रतीति नहीं होनी चाहिए । जीवात्मा की प्रतीति से ब्रह्म की क्योंकर प्रसिद्धि होगी ? इस प्रश्न का उत्तर है—“आत्मा च ब्रह्म” । ‘तत् त्वमसि’—यहाँ पर ‘तत्’ पद का ‘त्वम्’ पद के साथ सामानाधिकरण्य ( एकार्थपरकत्व ) है, तत्पदार्थभूत जीवात्मा को प्रत्यक्षतः प्रसिद्धि है । वाक्य-घटकीभूत पदों के अर्थों का ज्ञान वाक्यार्थ-ज्ञान का हेतु होता है, अतः “तत्त्वमसि” - इस वाक्य से त्वम्पदार्थ में ब्रह्मरूपता का अवगम हो जाता है ।
‘तत्त्वमसि’—इस वाक्य के द्वारा जीवात्मा में ब्रह्मरूपता की अवगति को सुनकर आक्षेपवादी कहता है—“यदि तर्हि लोके” । अध्यापक और अध्येतृवर्ग की परम्परा ही यहाँ ‘लोक’ पद से गृहीत है । वाक्य के आधार पर आत्मा की ब्रह्मत्वेन प्रसिद्धि का अनुवाद ‘ब्रह्म आत्मत्वेन यदि प्रसिद्धम्’—ऐसा करना यद्यपि उचित नहीं, तथापि जीव और ब्रह्म की अभेद-विवक्षा से वैसा कथन सम्भव है । सिद्धान्ती आक्षेप का परिहार करता है—“न तद्विशेषं प्रति विप्रतिपत्तेः” । कोई देह को कोई इन्द्रिय और कोई प्राणादि को आत्मा कहता है—ऐसी विप्रतिपत्तिः उस समय संशय को जन्म दे डालती है, जब किसी पक्ष का साधक या बाधक प्रमाण उपलब्ध न हो, जैसा कि न्यायसूत्रकार कहते हैं—“समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः” ( न्या. सू. १।१।२३ ) । सन्देह हो जाने के कारण जिज्ञासा उपपन्न हो जाती है । विप्रतिपत्ति या मत-भेद का धर्मी ( विशेष्य ) पदार्थ सर्वतन्त्र-सिद्धान्त के रूप में प्रसिद्ध होना चाहिए, अन्यथा बिना आश्रय के