भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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ब्रह्मप्रसिद्धिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ९३

शुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं, सर्वज्ञं, सर्वशक्तिसमन्वितम्; ब्रह्मशब्दस्य हि व्युत्पाद्यमानस्य नित्यशुद्धत्वादयोऽर्थाः प्रतीयन्ते; बृहतेर्धातोरर्थानुगमात् । सर्वस्यात्मत्वाच्च ब्रह्मास्ति-

भामती

विचाराद्विनाऽप्यस्ति । अत्र च ब्रह्मत्वादिनाऽवगम्येन तद्विषयमवगमं लक्षयति । तदस्तित्वस्य सति विमर्शे विचारात्प्रागनिर्णयात् । नित्येति क्षयितालक्षणं दुःखमपक्षिपति । शुद्धेति देहाद्युपाधिकमपि दुःखमपाकरोति । बुद्धेत्यपराधीनप्रकाशमानन्दात्मानं दर्शयति, आनन्दप्रकाशयोरभेदात् । स्यादेतत्—मुक्तौ सत्यामस्यैते शुद्धत्वादयः प्रथन्ते, ततस्तु प्राग् देहाद्यभेदेन तद्धर्मजन्मजरामरणादिदुःखयोगादित्यत उक्तं ॐ मुक्तेति ॐ । सदैव मुक्तः सदैव केवलोऽनाद्यविद्यावशात् तु भ्रान्त्या तथाऽवभासतं इत्यर्थः ।

तदेवमनौपाधिकं ब्रह्मणो रूपं दर्शयित्वाऽविद्योपाधिकं रूपमाह ॐ सर्वज्ञं सर्वशक्तिसमन्वितम् ॐ । तदनेन जगत्कारणत्वमस्य दर्शितं, शक्तिज्ञानभावाभावानुविधानात् कारणत्वभावाभावयोः । कुतः पुनरेवम्भूतब्रह्मस्वरूपावगतिरित्यत आह ॐ ब्रह्मशब्दस्य हि इति ॐ । न केवलं सदेव सोम्येदमित्यादीनां वाक्यानां पर्यालोचनया इत्थम्भूतब्रह्मावगतिः अपि तु ब्रह्मपदमपि निर्वचनसामर्थ्यादिममेवार्थं स्वहस्तयति । निर्वचनमाह ॐ बृहतेर्धातोरर्थानुगमात् ॐ । वृद्धिकर्मा हि बृंहतिरतिशयने वर्तते । तच्चेवमतिशयनमनवच्छिन्नं पदान्तरावगमितं नित्यशुद्धबुद्धत्वाद्यस्याभ्यनुजानातीत्यर्थः । तदेवं तत्पदार्थस्य शुद्धत्वादेः प्रसिद्धिमभिधाय त्वम्पदार्थस्याप्याह ॐ सर्वस्यात्मत्वाच्च ब्रह्मास्तित्वप्रसिद्धिः ॐ । सर्वस्य पांसुलपावकस्य

भामती-व्याख्या

भी ब्रह्म का ज्ञान क्यों न होगा ? भाष्यकार ने जो कहा है — "अस्ति तावद् ब्रह्म", वहाँ विषयवाचक 'ब्रह्म' पद की लक्षणा ब्रह्म-ज्ञान में विवक्षित है, अतः 'अस्ति ब्रह्म' का अर्थ है— 'अस्ति ब्रह्मज्ञानम्' । ब्रह्म का अस्तित्व तब तक स्थिर नहीं हो सकता, जब तक वह सन्दिग्ध है । 'नित्य' विशेषण के द्वारा क्षयितात्मक दुःख की निवृत्ति की गई है, 'शुद्ध' पद के द्वारा आत्मा में औपाधिक दुःख का अपनयन और 'बुद्ध' पद के द्वारा स्वप्रकाशरूप आनन्द का प्रदर्शन किया गया है, क्योंकि आनन्द और प्रकाश तत्त्व परस्पर अभिन्न होते हैं । 'मुक्त होने पर ही आत्मा में शुद्धत्वादि धर्म प्रकट होंगे, उससे पहले आत्मा देहादि से तादात्म्यापन्न होने के कारण जरा-मरणादि दुःखों से दुःखी ही है'— ऐसी धारणा का प्रतीकार करने के लिए 'मुक्त' कहा है, अर्थात् वह सदैव मुक्त और सदैव शुद्ध है, अनादि अविद्या के द्वारा केवल वैसी भ्रान्ति हो जाती है । इस प्रकार ब्रह्म का अनौपाधिक रूप दिखाकर अविद्यारूप उपाधि से युक्त स्वरूप दिखाते हैं— "सर्वज्ञं सर्वशक्तिसमन्वितम्" । सर्वज्ञत्वादि के द्वारा जगत्कारणत्व प्रदर्शित किया गया, क्योंकि किसी कार्य की कारणता उसी पदार्थ में रहती है, जिसमें कार्य-कारण-कलाप का ज्ञान एवं कार्योत्पादन की क्षमता विद्यमान हो, वही कर्त्ता माना जाता है । नित्य, शुद्ध, बुद्धादिरूप ब्रह्म का लाभ किस शब्द से होता है ? इस प्रश्न का उत्तर है— "ब्रह्मशब्दस्य व्युत्पाद्यमानस्य नित्यशुद्धत्वादयो धर्माः प्रतीयन्ते" । केवल उपक्रमादि युक्तियों के द्वारा ही वैसा अर्थ प्रतीत नहीं होता, अपितु "बृहतेर्धातोरर्थानुगमात्" । 'बृंहि वृद्धौ' धातु से "बृंहेर्नोऽच्च" ( पा. सू. उण. ४।१४६ ) इस सूत्र के द्वारा 'मनिन्' प्रत्यय और धातु के नकार को 'अकार का आदेश होकर 'ब्रह्म' शब्द बना है । धातु की शक्ति अतिशय ( सर्वविध परिच्छेदों ) से रहित अर्थ में हैं, अतः नित्यादि पदान्तरों से समर्पित नित्यत्वादिरूप अपरिच्छिन्नत्वादि का बोध हो जाता है ।

"तत्त्वमसि" ( छां. ६।२।१ ) इस महावाक्य के घटकीभूत 'तत्' पद के शुद्धत्वादि अर्थों का अभिधान कर त्वम्पदार्थ सूचित किया जाता है— "सर्वस्यात्मत्वाच्च ब्रह्मास्तित्व-