भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 110

९२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. १ सू. १

लब्धव्यम् । अथाऽप्रसिद्धं, नैव शक्यं जिज्ञासितुमिति । उच्यते—अस्ति तावद् ब्रह्म नित्य-

भामती

वेदं सूत्रमारम्भणीयमित्यपौनरुक्त्यम् । स्यादेतद्—एतेन सूत्रेण ब्रह्मज्ञानं प्रत्युपायता मीमांसायाः प्रति- पाद्यत इत्युक्तं, तदयुक्तं, विकल्पासहत्वादिति चोदयति ॐ तत् पुनर्ब्रह्म इति ॐ । वेदान्तेभ्योऽपौरुषेय- तस्त्वतःसिद्धप्रामाण्येभ्यः प्रसिद्धमप्रसिद्धं वा स्यात् । यदि प्रसिद्धं वेदान्तवाक्यसमुत्थेन निश्चयज्ञानेन विषयीकृतं ततो न जिज्ञासितव्यम्, निष्पादितक्रिये कर्मणि अविशेषाधायिनः साधनस्य साधनन्यायाति- पातात् । अथाप्रसिद्धं वेदान्तेभ्यस्तर्हि न तद् वेदान्ताः प्रतिपादयन्तीति सर्वथाऽप्रसिद्धं नैव शक्यं जिज्ञा- सितुम् । अनुभूते हि प्रिये भवतीच्छा न तु सर्वथाननुभूतपूर्वे । न चेष्यमाणमपि शक्यं ज्ञातुं, प्रमाणा- भावात् । शब्दो हि तस्य प्रमाणं वक्तव्यम् । यथा वक्ष्यति "शास्त्रयोनित्वात्"—इति । स चेन्नावाबोध- यति, कुतस्तस्य तत्र प्रामाण्यम् । न च प्रमाणान्तरं ब्रह्मणि प्रक्रमते । तस्मात्प्रसिद्धस्य ज्ञातुं शक्यस्याप्य- जिज्ञासनाद् अप्रसिद्धस्येच्छाया अविषयत्वाद् अशक्यज्ञानत्वाच्च न ब्रह्म जिज्ञास्यमित्याक्षेपः ।

परिहरति ॐउच्यते अस्ति तावद् ब्रह्म नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावम्ॐ । अयमर्थः—प्रागपि ब्रह्ममीमांसाया अधीतवेदस्य निगमनिरुक्तव्याकरणादिपरिशीलनविदितपदतदर्थसम्बन्धस्य सदेव सोम्येदमग्र आसीदित्युपक्रमात् तत्त्वमसीत्यन्तात् सन्दर्भान्निचयस्वाद्युपेतब्रह्मस्वरूपावगमस्तावदापाततो

भामती-व्याख्या

पुनरुक्ति नहीं।

शङ्का—ब्रह्म-ज्ञान की साधनता जो ब्रह्म-जिज्ञासा में कही गई, वह सम्भव नहीं—ऐसा आक्षेप किया जाता है—"तत्पुनर्ब्रह्म प्रसिद्धमप्रसिद्धं वा स्यात् ?" अपौरुषेय वेद में प्रामाण्य स्वतः सिद्ध है, अतः उसके एकदेशभूत वेदान्त-वाक्यों के द्वारा जीवाभिन्न ब्रह्म का निश्चय है ? अथवा नहीं ? यदि वेदान्त-वाक्य-जन्य निश्चय की विषयता ब्रह्म में पहले से है, तब ब्रह्म-जिज्ञासा की आवश्यकता नहीं, क्योंकि [ जैसे पर्वत में अग्न्यादिरूप कर्मकारक की सिद्धिरूप क्रिया-सम्पन्न हो जाने पर अग्नि में सन्दिग्धता न रहने के कारण अग्नि का साधनीभूत न्याय साधन ही नहीं रहता, वैसे ही ] जिज्ञासा के कर्मभूत ब्रह्म की अवगति हो जाने पर उसकी जिज्ञासा सम्भव नहीं रह जाती । यदि वेदान्त-वाक्यों से ब्रह्म का ज्ञान नहीं होता, तब यह जो कहा जाता है कि "वेदान्ताः ब्रह्म प्रतिपादयन्ति" । वह सर्वथा अप्रसिद्ध हो जाता है, तब ब्रह्म की जिज्ञासा क्योंकर होगी ? क्योंकि जो प्रिय पदार्थ अनुभूत होता है, उसी की ही जिज्ञासा होती है, सर्वथा अननुभूत पदार्थ की नहीं । अननुभूत पदार्थ की जिज्ञासा होने पर भी प्रमाण के अभाव में उसका ज्ञान सम्भव नहीं, शब्द को ही ब्रह्म में प्रमाण कहा जाता है—"शास्त्रयोनित्वात्" । वह आगम यदि ब्रह्म का बाध नहीं कराता, तब वह ब्रह्म में प्रमाण क्योंकर होगा ? ब्रह्म में कोई अन्य प्रमाण सम्भव नहीं । फलतः प्रसिद्ध पदार्थ का ज्ञान सम्भव होने पर भी उसमें जिज्ञास्यता नहीं बनती और अप्रसिद्ध पदार्थ तो इच्छा का विषय ही नहीं होता. उसका ज्ञान भी सम्भव नहीं, अतः ब्रह्म कथमपि जिज्ञास्य नहीं—यह आक्षेपवादी का संक्षिप्त वक्तव्य है ।

समाधान—उक्त आक्षेप का परिहार किया जाता है "उच्यते—अस्ति तावद् ब्रह्म नित्यशुद्धबुद्धस्वभावम्" । भाव यह है कि जिस व्यक्ति ने वेद का अध्ययन कर लिया है, जिसे निघण्टु, निरुक्त और व्याकरणादि के परिशीलन से पद-पदार्थ का संगति-ग्रह हो चुका है, उस व्यक्ति को ब्रह्म-जिज्ञासा से पहले भी आपाततः ब्रह्म-ज्ञान हो जाता है, क्योंकि जो व्यक्ति वेदान्त-प्रकरण के उपक्रम में "सदेव सोम्येदमग्र आसीत्" (छां. ६।२।१ ) इस प्रकार सद्ब्रह्म का उल्लेख, मध्य में "तत्त्वमसि" (छां. ६।२।१ ) इस प्रकार पुनः-पुनः चर्चा और अन्त में "एकमेवाद्वितीयम्" (छां. ६।२।१ ) ऐसा ब्रह्म का स्वरूप देखता है, उसको विचार के विना