भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109

ब्रह्मप्रसिद्धिविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ९१

विजिज्ञासितव्यम् । तत्पुनर्ब्रह्म प्रसिद्धमप्रसिद्धं वा स्यात् । यदि प्रसिद्धं, न जिज्ञासि-

भामती

पराधीनप्रकाशोऽपि प्रतिभासमानोऽपि न प्रतिभातीव पराधीनप्रकाश इव देहेन्द्रियादिभ्यो भिन्नोऽप्यभिन्न इव भासत इति संसारबीजाविद्याद्यनर्थनिबर्हणात् प्रागप्राप्त इव तस्मिन् सति प्राप्त इव भवतीति पुरुषेणार्थ्यमानत्वात् पुरुषार्थ इति युक्तम् । अविद्यादीत्यादिप्रग्रहणेन तत्संस्कारोऽवरुध्यते । अविद्याविनिवृत्तिस्तूपासनाकार्यादन्तःकरणवृत्तिभेदात् साक्षात्कारादिति द्रष्टव्यम् ।

उपसंहरति * तस्माद् ब्रह्म जिज्ञासितव्यमुक्तलक्षणेन मुमुक्षुणा * । न खलु तज्ज्ञानं विना सवासनविविधदुःखनिदानमविद्योच्छिद्यते । न च तदुच्छेदमन्तरेण विगलितनिखिलदुःखानुषङ्गानन्दघनब्रह्मात्मतासाक्षात्काराविर्भावो जीवस्य । तस्मादानन्दघनब्रह्मात्मतामिच्छता तदुपायो ज्ञानमेषितव्यम् । तच्च न केवलेभ्यो वेदान्तेभ्योऽपि तु ब्रह्ममीमांसोपकरणेभ्य इति इच्छामुखे ब्रह्ममीमांसायां प्रवर्त्यते, न तु वेदान्तेषु तदर्थविवक्षायां वा । तत्र फलवदर्थावबोधपरतां स्वाध्यायाध्ययनविधेः सूत्रयताऽथातो धर्मजिज्ञासेत्यनेनैव प्रवर्तितत्वाद्, धर्मग्रहणस्य वेदार्थोपलक्षणत्वेनाधर्मवद् ब्रह्मणोऽप्युपलक्षणाच्च । यद्यपि च धर्ममीमांसावद् वेदार्थमीमांसा ब्रह्ममीमांसाप्याक्षेप्तुं शक्यते, तथापि प्राञ्च्या मीमांसया न तद् व्युत्पाद्यते, नापि ब्रह्ममीमांसाया अध्ययनमात्रानन्तर्यमिति ब्रह्ममीमांसारम्भाय नित्यानित्यविवेकाद्यानन्तर्यप्रदर्शनार्थं


भामती-व्याख्या

ब्रह्म का वह स्वरूप अनिर्वचनीय अनादि अविद्यारूप आवरण से आवृत होने के कारण अप्रतिभात, पर प्रकाश और देहेन्द्रियादि से भिन्न होने पर भी अभिन्न-जैसा प्रतीत होता है । संसाररूप अनर्थ पदार्थों के कारणीभूत अनिर्वचनीय अज्ञान की निवृत्ति से पहले अप्राप्त और अविद्या की निवृत्ति हो जाने पर प्राप्त-जैसा होकर पुरुषार्थ बन जाता है । यहाँ "अविद्यादि"-इस आदि पद के द्वारा अविद्या-जनित संस्कार विवक्षित हैं । अविद्या की निवृत्ति ब्रह्मोपासना के कार्यभूत मानस वृत्ति विशेषरूप साक्षात्कार से होती है—यह कहा जा चुका है । जिज्ञासा-प्रसङ्ग का उपसंहार किया जाता है—"तस्माद् ब्रह्म जिज्ञासितव्यम्" । अर्थात् विवेक-वैराग्यादि साधनों से सम्पन्न मुमुक्षु के द्वारा उक्त ब्रह्म अवश्य जिज्ञासितव्य है, क्योंकि ब्रह्म-ज्ञान के बिना विविध दुःखों की कारणीभूत अविद्या का समूल उच्छेद नहीं हो सकता, उस उच्छेद के बिना जीव को निखिल दुःख-सम्बन्ध से रहित ब्रह्म का अभेद-साक्षात्कार नहीं हो सकता, अतः आनन्द-घन ब्रह्म के अभेद-साक्षात्कार की इच्छा रखनेवाले मुमुक्षु को उक्त साक्षात्कार के उपाय की गवेषणा करनी चाहिए । वह साक्षात्कार केवल वेदान्त-वाक्यों से नहीं, अपितु ब्रह्म-मीमांसारूप सहायक तर्क से संवलित वेदान्त-वाक्यों के द्वारा सम्पन्न होता है । सामान्यतः ज्ञात और विशेषतः सन्दिग्ध ब्रह्म के जानने की इच्छा सहजत: मुमुक्षु पुरुष को होती है, जिससे अनुप्राणित हो कर वह ब्रह्म-विचार में प्रवृत्त होता है, केवल वेदान्तार्थ-ज्ञान की इच्छा से नहीं, क्योंकि केवल अर्थ-ज्ञान की इच्छा रखनेवाले पुरुष की प्रवृत्ति तो महर्षि जैमिनि के अध्ययन-विधि-सूचक "अथातो धर्मजिज्ञासा" (जै. सू. १।१।१) इस सूत्र से ही सिद्ध हो जाती है । उस सूत्र में 'धर्म' पद सकल वेदार्थ का लक्षक है, अतः ब्रह्म का भी वैसे ही संग्राहक हो जाता है, जैसे—अधर्म का, अत एव पार्थसारथि मिश्र कहते हैं—"धर्मग्रहणं चोपलक्षणार्थम्, अधर्मस्यापि हानाय जिज्ञास्यात्" (शास्त्रदी. पृ. १५) । यद्यपि वेदार्थ-मीमांसा के द्वारा धर्म-मीमांसा के समान ब्रह्म-मीमांसा का भी ग्रहण हो सकता है, तथापि पूर्व मीमांसा में न तो ब्रह्म का व्युत्पादन किया गया है और न ब्रह्म-मीमांसा में वेदाध्ययनमात्र का आनन्तर्य विवक्षित है, अतः नित्यानित्य वस्तु के विवेकादि का आनन्तर्य दिखाने के लिए "अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" (ब्र. सू. १।१।१) इस सूत्र का आरम्भ आवश्यक है, इसमें किसी प्रकार की