भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मलक्षणविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ९९
संयुक्तस्य प्रतिनियतदेशकालनिमित्तक्रियाफलाश्रयस्य मनसाप्यचिन्त्यरचनारूपस्य
भामती
सत्सु सर्वज्ञं सर्वशक्तिस्वभावं ब्रह्म जगज्जन्मादिकारणमिति कुतः सम्भावनेत्यत आह ॐ अस्य जगतः इति ॐ । अत्र ॐ नामरूपाभ्यां व्याकृतस्य ॐ इति चेतनभावकर्तृकत्वसम्भावनया प्रधानाद्यचेतनकर्तृकत्वं निरुपाख्यकर्तृकत्वं च व्यासेधति । यत् खलु नाम्ना रूपेण च व्याक्रियते तच्चेतनकर्तृकं दृष्टं, यथा घटादि, विवादाध्यासितं च जगन्नामरूपव्याकृतं तस्माच्चेतनकर्तृकं सम्भाव्यते । चेतनो हि बुद्ध्यावालिख्य नामरूपे घट इति नाम्ना रूपेण च कम्बुग्रीवादिना बाह्यं घटं निष्पादयति । अत एव घटस्य निर्वर्त्यंस्याप्यन्तःसङ्कल्पात्मना सिद्धस्य कर्मकारकभावो घटं करोतीति । यदाहुः 'बुद्धिसिद्धं तु न तदसद्' इति । तथा चाचेतनो बुद्ध्यानालिखितं करोतीति न शक्यं सम्भावयितुमिति भावः ।
स्यादेतत्—चेतना ग्रहा लोकपाला वा नामरूपे बुद्ध्यावालिख्य जगज्जनयिष्यन्ति, कृतमुत्पत्तस्वभावेन ब्रह्मणेत्यत आह ॐ अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य इति ॐ । केचित् कर्त्तारो भवन्ति, यथा सूदर्त्विगादयः, न भोक्तारः । केचित्तु भोक्तारः, यथा श्राद्धवैश्वानरीयेष्ट्यादिषु पितापुत्रादयः, न कर्त्तारः । तस्मादुभयग्रहणम् । ॐ देशकालनिमित्तक्रियाफलानि ॐ इतीतरेतरद्वन्द्वः । देशादीनि च प्रतिनियतानि चेति
भामती-व्याख्या
समाधान—उक्त शङ्का का खण्डन करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"अस्य जगतो नामरूपाभ्यां व्याकृतस्य"। व्याकृतत्वादि विशेषणों के द्वारा जगत् में चेतनकर्तृकत्व और भावकर्तृकत्व ध्वनित होता है, अतः प्रधानादि अचेतनकर्तृकत्व एवं अभावकर्तृकत्व का निराकरण हो जाता है, क्योंकि जिस पदार्थ को नाम और रूप दिया जाता है, वह चेतनकर्तृक ही होता है, जैसे—घटादि । विवादास्पद जगत् नाम-रूपात्मक है, अतः चेतनकर्तृक ही है। चेतन पुरुष ही अपने मन में वस्तु की रूप-रेखा बनाकर उसे मूर्तरूप देकर कहता है कि इसका नाम है—घट और उसका रूप है—कम्बुग्रीवादिमान् । अत एव 'घटं करोति'—इत्यादि व्यवहारों में किस घट को कर्म कारक बनाया जाता है ? इस प्रश्न का भी सटीक उत्तर मिल जाता है कि कर्त्ता पुरुष के मन में कल्पित घट को कर्म माना जाता है, जैसा कि सत्कार्यवादियों ने कहा है—"बुद्धिसिद्धं तु न तदसत्" [ शान्तरक्षित ने भी 'घटादि' शब्दों के द्वारा बुद्धिस्थ आकार का ही अभिधान माना है—"बुद्धौ ये वा विवर्तन्ते तानाहाभ्यन्तरानयम्" ( तत्त्वसं. श्लो. १०७० ) । अतः चेतन पुरुष अपने मन में रूप-रेखा तैयार किए बिना किसी कार्य को करता है—ऐसी सम्भावना नहीं कर सकते । 'ग्रह और लोकपालादि देवगण चेतन हैं, वे ही अपनी बुद्धि में निर्देश करके जगत् की रचना कर देंगे, उसके लिए ब्रह्म की क्या आवश्यकता ?' इस शङ्का का निरास करने के लिए कहा है—"अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य ।" ग्रह लोकपालादि भी उसी जगत् में समाविष्ट हैं, जिसका कर्त्ता ब्रह्म माना जाता है, लोकपालादि अपनी रचना स्वयं नहीं कर सकते । कतिपय पुरुष किसी कार्य के कर्त्ता ही होते हैं, भोक्ता नहीं, जैसे रसोइया मालिक को भोजन बनाकर खिला देता है, स्वयं नहीं खाता, अथवा जैसे ऋत्विग्गण, यजमान से दक्षिणा लेकर यजमान के लिए कर्म करते हैं, कर्म-जन्य फल का भोक्ता यजमान ही होता है, ऋत्विक् नहीं। इसी प्रकार कुछ पुरुष कर्म-जन्य फल के भोक्ता ही होते हैं, कर्त्ता नहीं, जैसे श्राद्ध कर्म से जन्य फल के भोक्ता ही पितृगण होते हैं, कर्त्ता नहीं। अथवा वैश्वानरीय इष्टि-जन्य फल का भोक्ता ही पुत्र होता है, कर्त्ता नहीं [ पुत्र के उत्पन्न होने पर पिता जो वैश्वानर इष्टि करता है, उसका फल पुत्र को ही मिलता है—"वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् पुत्रे जाते । यस्मिन् जाते एतामिष्टिं निर्वपति, पूतः एव तेजस्व्मन्नाद इन्द्रियावी, पशुमान् भवति" ( तै. सं. २।२।५ ) ] । ब्रह्म के द्वारा रचित जगत् में कर्त्ता और भोक्ता—दोनों का समावेश है, केवल कर्त्ता या केवल भोक्ता का नहीं—यह दिखाने के लिए भाष्यकार