भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१०० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. १ सू. २

जन्मस्थितिभङ्गं यतः सर्वज्ञात्सर्वशक्तेः कारणाद्भवति, तद् ब्रह्मेति वाक्यशेषः। अन्येषामपि भावविकाराणां त्रिष्वेवान्तर्भाव इति जन्मस्थितिनाशनामिह ग्रहणम्। यास्क-


भामती

विग्रहः। तदाश्रयो जगत् तस्य। केचित् खलु प्रतिनियतदेशोत्पादाः, यथा कृष्णमृगादयः। केचित् प्रतिनियतकालोत्पादाः, यथा कोकिलारवादयः। केचित्प्रतिनियतनिमित्ताः, यथा नवाम्बुदध्वनादिनिमित्ता बलाकागर्भादयः। केचित्प्रतिनियतक्रियाः, यथा ब्राह्मणानां याजनादयो नेतरेषाम्। एवं प्रतिनियतफलाः यथा केचित् सुखिनः, केचिद् दुःखिनः, एवं य एव सुखिनस्त एव कदाचिद् दुःखिनः। सर्वमेतदाकस्मिकापरनाम्नि यादृच्छिकत्वे च स्वाभाविकत्वे चासर्वशक्तिकर्तृकत्वे च न घटते। परिमितज्ञानशक्तिभिर्ग्रहलोकपालादिभिर्ज्ञातुं कर्तुं चाशक्यत्वात्। तदिदमुक्तं ॐ मनसाप्यचिन्त्यरचनारूपस्य इति ॐ। एकस्या अपि हि शरीररचनायां रूपं मनसा न शक्यं चिन्तयितुं कदाचित्, प्रागेव जगद्रचनायाः, किमङ्ग पुनः कर्त्तुमित्यर्थः। सूत्रवाक्यं पूरयति ॐ तद् ब्रह्मेति वाक्यशेषः ॐ। स्यादेतत्—कस्मात् पुनर्जन्मस्थितिभङ्गमात्रमिहाविग्रहेण गृह्यते, न तु वृद्धिपरिणामापक्षया अपीत्यत आह ॐ अन्येषामपि भावविकाराणां वृद्ध्यादीनां त्रिष्वेवान्तर्भाव इति ॐ। वृद्धिस्तावदवयवोपचयः। तेनाल्पावयवादवयविनो द्वित्तणुकादेरस्य


भामती-व्याख्या

ने “अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तस्य”—ऐसा कहा है। “देशकालनिमित्तक्रियाफलानि”—यहाँ पर देशश्च, कालश्च, निमित्तं च, क्रिया च, फलं च—एतेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः देशकालनिमित्तक्रियाफलानि। प्रतिनियतानि च देशकालनिमित्तक्रियाफलानि च, तेषामाश्रयो, जगत्, तस्य—ऐसा समास यहाँ विवक्षित है। कुछ पदार्थ प्रतिनियतदेशोत्पत्तिक होते हैं, जैसे काले हरिण स्वभावतः यज्ञ करने के योग्य देश में ही रहते हैं—

कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः।
स ज्ञेयो यज्ञियो देशो म्लेच्छदेशस्त्वतः परम्॥ (मनु. २।२३)

कतिपय पदार्थ किसी काल विशेष में ही होते हैं, जैसे कोयल का मधुर स्वर वसन्त काल में ही सुना जाता है। कुछ वस्तुएँ नियत-निमित्तक होती हैं, जैसे नवल मेघमाला का गर्जन सुनकर बलाका (बगुलियाँ) गर्भ धारण करती हैं। कुछ लोगों की क्रिया नियत (निश्चित) होती है, जैसे ब्राह्मणों का ही यागादि कर्म कराना काम होता है, क्षत्रियादि का नहीं। इसी प्रकार कुछ प्राणियों का सुखादि रूप फल नियत होता है, जैसे ब्रह्मलोकस्थ जीवों को सुख और नरकवासी प्राणियों को दुःख ही होता है। इस प्रकार का प्रपञ्च न तो स्वाभाविक हो सकता है और न यादृच्छिक (बिना किसी निमित्त के) किन्तु किसी सर्वज्ञ और सर्वशक्ति-समन्वित ईश्वर के द्वारा ही रचित हो सकता है। परिमित शक्तिवाले ग्रह, लोकपालादि की सूझ-बूझ से बहुत परे यह संसार-रचना है, इसलिए भाष्यकार कहते हैं—"मनसाऽप्यचिन्त्य-रचनारूपस्य।" आशय यह है कि किसी एक शरीर की रचना भी साधारण जीव की समझ में नहीं आती, उसका करना तो दूर रहा, फिर इतनी विकट जटिलताओं से पूर्ण जगत् की रचना ईश्वर के सिवा और कोई नहीं कर सकता। सूत्रस्थ अधूरे वाक्य की पूर्ति की जाती है—"तद् ब्रह्मेति वाक्यशेषः"। 'जगत् के जन्म, स्थिति और प्रलय—इन तीन विकारों का ही ग्रहण क्यों किया गया वृद्धि, परिणाम और अपक्षय नाम की तीन अवस्थाओं को क्यों छोड़ दिया गया?' इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है—"अन्येषामपि भावविकाराणां त्रिष्वे-वान्तर्भावः"। यास्काचार्य ने जो कहा है—"षड् भावविकारा भवन्तीति वार्ष्यायणिः (१) जायते, (२) अस्ति, (३) विपरिणमते, (४) वर्धते, (५) अपक्षीयते, (६) नश्यति" (निरुक्त० १)। इनमें से वृद्धि नाम है—अवयवों का उपचय (बढ़ना या जुड़ना)। उसके