भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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ब्रह्मलक्षणविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १०१

परिपठितानां तु ‘जायतेऽस्ति’ इत्यादीनां ग्रहणे तेषां जगतः स्थितिकाले संभाव्यमानत्वान्मूलकारणादुत्पत्तिस्थितिनाशा जगतो न गृहीताः स्युरित्याशङ्क्येत, तन्माशङ्कीति योत्पत्तिर्ब्रह्मणस्तत्रैव स्थितिः प्रलयश्च त एव गृह्यन्ते । न यथोक्तविशेषणस्य

भामती एव महान् पटो जायत इति जन्मैव वृद्धिः । परिणामोऽपि त्रिविधो धर्मलक्षणावस्थालक्षण उत्पत्तिरेव । धर्मिणो हि हाटकादेर्धर्मलक्षणः परिणामः कटकमुकुटादिस्तस्योत्पत्तिः । एवं कटकादेरपि प्रत्युत्पन्नत्वादिलक्षणो लक्षणपरिणाम उत्पत्तिः । एवमवस्थापरिणामो नवपुराणत्वाद्युत्पत्तिः । अपक्षयस्त्ववयवह्रासो नाश एव । तस्माज्जन्मादिषु यथास्वमन्तर्भावाद् वृद्ध्यादयः पृथङ्नोक्ता इत्यर्थः । अथैते वृद्ध्यादयो न जन्मादिष्वन्तर्भवन्ति तथाप्युत्पत्तिस्थितिभङ्गमेवोपादातव्यम् । तथा सति हि तत्प्रतिपादके ‘यतो वा इमानि भूतानि’ इति वेदवाक्यं बुद्धिस्वीकृते जगन्मूलकारणं ब्रह्म लक्षितं भवति । अन्यथा तु जायतेऽस्ति वर्द्धत इत्यादीनां ग्रहणे तत्प्रतिपादकं नैरुक्तवाक्यं बुद्धौ भवेत् , तच्च न मूलकारणप्रतिपादनपरम् , महासर्गादूर्ध्वं स्थितिकालेऽपि तद्वाक्योदितानां जन्मादीनां भावविकाराणामुपपत्तेः, इति शङ्कानिराकरणार्थं वेदोक्तोत्पत्तिस्थितिभङ्गग्रहणमित्याह ॐ यास्कपरिपठितानां तु इति ॐ । नन्वेवमुत्पत्तिमात्रं सूच्यतां, तन्नान्तरीयकत्या तु स्थितिभङ्गं गम्यत इत्यत आह ॐ या उत्पत्तिर्ब्रह्मणः कारणाद् इति ॐ । त्रिभिरस्योपादानत्वं सूच्यते । उत्पत्तिमात्रं तु निमित्तकारणसाधारणमिति नोपादानं सूचयेत् । तदिदमुक्तं ॐ तत्रैव इति ॐ । पूर्वोक्तानां कार्य्यकारणविशेषणानां प्रयोजनमाह ॐ न यथोक्त इति ॐ । तदनेन

भामती-व्याख्या द्वारा तन्तुओं के जुड़ते जाने पर एक सहस्रतन्तुक महान् पट बन जाता है, आचार्य यास्क भी कहते हैं— “वर्धते इति स्वाङ्गाभ्युच्चयं सांख्योगिकानां वार्थानाम्, वर्द्धते विजयेन वा वर्द्धते शरीरेणेति वा”। इस प्रकार की वृद्धि का जन्म में समावेश हो जाता है । परिणाम भी तीन प्रकार का होता है—(१) धर्म-परिणाम, जैसे सुवर्ण-पिण्डादि धर्मी पदार्थों का कटक, मुकुटादि धर्मों के रूप में उत्पन्न होना । (२) लक्षण-परिणाम, जैसे कटकादि धर्मों के वर्तमानत्व-अतीतत्वादि रूप लक्षणों की उत्पत्ति । (३) अवस्था-परिणाम, जैसे कटक-मुकुटादि की नवत्व-पुराणत्वादि अवस्थाओं की उत्पत्ति । इस प्रकार परिणाम रूप विकार भी जन्म ही है । अपक्षय का अन्तर्भाव नाश में होता है, अतः वृद्धि आदि विकारों को पृथक् नहीं गिनाया गया है । यदि वृद्धि आदि विकारों का जन्मादि में अन्तर्भाव नहीं भी होता, तब भी जन्म, स्थिति और भङ्ग का ही ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि वैसा करने से ही “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति च” (तै० उ० ३।१) इस बुद्धिस्थ श्रुति-वाक्य के द्वारा ब्रह्म-लक्षण के प्रतिपादन की संगति बैठती है, अन्यथा (षड् भाव विकारों का ग्रहण करने पर ) उसका प्रतिपादक उक्त निरुक्त-वाक्य उपस्थित होगा, वह जगत् के मूलभूत ब्रह्म का लक्षण प्रस्तुत नहीं करता, अपितु महासृष्टि के पश्चात् जगत् की स्थितिकाल में षड् भाव विकारों की उपपत्ति हो जाती है । उससे मूलकारणीभूत ब्रह्म का लक्षण क्योंकर होगा ? इस शङ्का की निवृत्ति करने के लिए वेदोक्त उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का ग्रहण ही न्यायोचित है, यह भाष्यकार कह रहे हैं— “यास्कपरिपठितानां तु”। केवल ‘जगज्जन्महेतुत्वम्’—इतना ही लक्षण पर्याप्त है, सूत्र में ‘आदि’ पद की क्या आवश्यकता ? एवं भाष्यकार के द्वारा ‘आदि’ पद की व्याख्या के रूप में स्थिति और भङ्ग का उल्लेख क्यों?’ इस शङ्का का निराकरण किया जा रहा है— “योत्पत्तिर्ब्रह्मणः कारणात्”। जन्म, स्थिति और भङ्ग—इन तीनों की हेतुता ही ब्रह्मगत उपादानता है, केवल जन्म-हेतुता तो निमित्तकारण में भी रह जाती है, अतः सूत्र में आदि पद रखना एवं भाष्यकार का जन्म, स्थिति और