भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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१०२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. १ सू. २

जगतो यथोक्तविशेषणमीश्वरं मुक्त्वाऽन्यतः प्रधानादचेतनाद्, अणुभ्योऽभावात्, संसारिणो वा उत्पत्त्यादि संभावयितुं शक्यम् । न च स्वभावतः, विशिष्टदेशकालनिमित्तानामिहोपादानात् । एतदेवानुमानं संसारिव्यतिरिक्तेश्वरास्तित्वादिसाधनं मन्यन्त ईश्वरकारणिनः । नन्विहापि तदेवोपन्यस्तं जन्मादिसूत्रे । न, वेदान्तवाक्यकुसुमग्रथनार्थत्वात्सूत्राणाम् - वेदान्तवाक्यानि हि सूत्रैरुदाहृत्य विचार्यन्ते । वाक्या-


भामती

प्रबन्धेन प्रतिज्ञाविषयस्य ब्रह्मस्वरूपस्य लक्षणद्वारेण सम्भावनोक्ता । तत्र प्रमाणं वक्तव्यम् । यथाह्युर्नैयायिकाः—

"सम्भावितः प्रतिज्ञायां पक्षः साध्येत हेतुना ।
न तस्य हेतुभिस्त्राणमुत्पतन्नेव यो हतः ॥"

यथा च बन्ध्या जननीत्यादिः' इति । इत्थं नाम जन्मादिसम्भावनावहेतुः, यदन्ये वैशेषिकादय इत एवानुमानादीश्वरविनिश्चयमिच्छन्तीति, सम्भावनाहेतुतां द्रढयितुमाह ॐ एतदेव इति ॐ । चोदयति ॐ नन्विहापि इति ॐ । एतावत्तैवाधिकरणार्थं समाप्ते वक्ष्यमाणाधिकरणार्थं वदन् सुहृद्भावेन परिहरति ॐ न इति ॐ । वेदान्तवाक्यकुसुमप्रथनार्थतामेव दर्शयति ॐ वेदान्तेति ॐ । विचारस्याध्यवसानं सवा-


भामती-व्याख्या

भङ्ग—तीनों का निर्देश करना सार्थक है । जगद्रूप कार्य के जो विशेषण दिए गए हैं—अनेककर्तृभोक्तृसंयुक्तत्त्वादि और कारणभूत ब्रह्म के जो सर्वज्ञत्वादि विशेषण दिए गए हैं, उनका प्रयोजन स्पष्ट किया जाता है—"न यथोक्तविशेषणस्य जगतो यथोक्तविशेषणमीश्वरं मुक्त्वा अन्यतः उत्पत्त्यादि सम्भावयितुं शक्यम्" । सांख्य-सम्मत प्रधान (प्रकृति), वैशेषिक-कल्पित परमाणु जड और माध्यमिक-सिद्धान्त-सिद्ध शून्य (अभाव) तत्त्व निरुपाख्य (अलीक) है एवं संसारी जीव अल्पज्ञ हैं, अतः वे जगत् की रचना नहीं कर सकते ।

शङ्का—यहाँ तक की चर्चा का निष्कर्ष यह है कि प्रथम सूत्र में प्रतिज्ञात ब्रह्म का द्वितीय सूत्र में जो लक्षण (जगज्जन्मादिकर्तृत्व) प्रस्तुत किया गया, उसके द्वारा ब्रह्मस्वरूप की सम्भावना प्रकट की गई, अब ब्रह्म में प्रमाण प्रदर्शित करना चाहिए, जैसा कि नैयायिकगण मानते हैं -

"सम्भावितः प्रतिज्ञायां पक्षः साध्येत हेतुना ।
न तस्य हेतुभिस्त्राणमुत्पतन्नेव यो हतः ॥"

अर्थात् पर्वतरूप पक्ष पर्वतत्वेन सिद्ध और वह्निमत्त्वेन साध्य माना जाता है, लक्षण के द्वारा सम्भावित वह्निमत्त्वेन पर्वत रूप पक्ष ही धूमादि हेतु के द्वारा सिद्ध किया जाता है, लक्षणरहित अत एव असम्भावित उस पक्षकी हेतुओं के द्वारा सिद्धि नहीं की जा सकती, जो कि प्रतीति में आते ही व्याहत हो जाता है, जैसे 'वन्ध्या में माता' । फलतः जन्मादिकर्तृत्वरूप लक्षण के द्वारा सम्भावित ब्रह्म में प्रमाण-प्रदर्शन की अपेक्षा से वैशेषिकादि "जन्माद्यस्य यतः"—इस सूत्र को लक्षण के साथ-साथ अनुमान प्रमाण का भी सूचक मानते हैं—'क्षित्यादिकं जगत्, सकर्तृकम्, जन्मादियुक्तत्वाद्, घटादिवत्' ।

समाधान—यह विचार-शास्त्र है, प्रमाण-शास्त्र नहीं कि प्रमाण-प्रदर्शन मात्र से अधिकरण का उद्देश्य पूरा हो जाय । यहाँ सभी वक्ष्यमाण अधिकरणों में विवादास्पद वेदान्त वाक्यों पर संशयादि-प्रदर्शन पूर्वक यह विचार किया जाता है कि इन वाक्यों का ब्रह्म में समन्वय किस प्रकार है ? वेदान्त-वाक्यरूपी पुष्पों को पिरोने के लिए यह सूत्र-ग्रन्थ रचा गया है । इस विचार-माला का पर्यवसान ब्रह्मावगतिरूप सुमेरु में ही होता है, अनुमानादि