भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मलक्षणविचारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् १०३
र्थविचारणाध्यवसाननिर्वृत्ता हि ब्रह्मावगतिः, नानुमानादिप्रमाणान्तरनिर्वृत्ता । सत्सु तु वेदान्तवाक्येषु जगतो जन्मादिकारणवादिषु तदर्थग्रहणदार्ढ्यायोनुमानमपि वेदान्तवाक्याविरोधि प्रमाणं भवन्न निवार्यते, श्रुत्यैव च सहायत्वेन तर्कस्याभ्युपेतत्वात् । तथा हि—'श्रोतव्यो मन्तव्यः' (बृह० २।४।५) इति श्रुतिः 'पण्डितो मेधावी गन्धारानैवोपसंपद्येतैवमेवेहाचार्यवान् पुरुषो वेद' (छान्दो० ६।१४।२) इति च पुरुषबुद्धिसाहाय्यमात्मनो दर्शयति । न धर्मजिज्ञासायामिव श्रुत्यादय एव प्रमाणं
भामती सनावियाद्वयोच्छेदः । ततो हि ब्रह्मावगतेर्निर्वृत्तिराविर्भावः । तत्किं ब्रह्मण शब्दादृते न मानान्तरमनुसरणीयम् । तथा च कुतो मननं, कुतश्च तदनुभवः साक्षात्कार इत्यत आह ॐ सत्सु तु वेदान्तवाक्येषु इति ॐ । अनुमानं वेदान्ताविरोधि तदुपजीवि चेत्यपि द्रष्टव्यम् । शब्दाविरोधिन्या तदुपजीविन्या च युक्त्या विवेचनं मननम् । युक्तिश्चार्थापत्तिरनुमानं वा । स्यादेतद्—यथा धर्मे न पुरुषबुद्धिसाहाय्यम् , एवं ब्रह्मण्यपि कस्मान्न भवतीत्यत आह ॐ न धर्मजिज्ञासायामिव इति ॐ । ॐ श्रुत्यादयः इति ॐ ।
भामती-व्याख्या प्रमाणों के द्वारा वह अवगति सम्भव नहीं, जैसा कि श्रुति कहती है—"नैषा तर्केण मतिरापनेया" (कठो० १।२।९)। वेदान्त-वाक्य-प्रसूत ब्रह्मावगति से ही कथित द्विविध अविद्या का उच्छेद एवं जीव में ब्रह्मारूपता का आविर्भाव होता है। 'तब क्या ब्रह्म के बोधन में प्रवृत्त अनुमानादि (वेदान्त-भिन्न) प्रमाणों का आदर नहीं करना चाहिए ? उनकी उपेक्षा कर देने से मनन (अनुमानादिपूर्वक अनुचिन्तन ) और साक्षात्कार क्योंकर होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है—"सत्सु वेदान्तवाक्येषु" । अर्थात् जगज्जन्मादि-कारण-वेदी वेदान्त वाक्यों के द्वारा ही प्रथमतः ब्रह्म का बोध उत्पन्न होता है, उसको दृढ़ता प्रदान करने के लिए यदि अनुमानादि प्रवृत्त होते हैं, तब उनको उचित समादर ही दिया जायगा, उनकी उपेक्षा नहीं की जायगी, क्योंकि श्रुति ही अपने सहायक के रूप में तर्कादि को मान्यता प्रदान करती है—"श्रोतव्यो मन्तव्यः" (बृह० उ० २।४।५) ! "पण्डितो मेधावी गन्धारानैवोपसम्पद्येतैवमेवेहाचार्यवान् पुरुषो वेद" (छां० ६।१४।२) यह श्रुति स्पष्टरूप से पुरुष-बुद्धि की सहायता को स्वीकार करती हुई कहती है कि जैसे कोई मेधावी पण्डित पुरुष अन्य व्यक्तियों से मार्ग-दर्शन लेकर सुदूर गन्धार देश तक पहुँच जाता है, वैसे ही अधिकारी पुरुष आचार्य के निर्देशन में वेदान्त वाक्यों के द्वारा ब्रह्म का वेदन (अवगम) कर लेता है।
शङ्का—जैसे धर्म के बोधन में वेद पुरुष बुद्धि की सहायता को स्वीकार नहीं करता [ कुमारिल भट्ट ने कहा है—
"द्रव्यक्रियागुणादीनां धर्मत्वं स्थापयिष्यति।
तेषामैन्द्रियकत्वेऽपि न ताद्रूप्येण धर्मता ॥
श्रेयःसाधनता ह्येषां नित्यं वेदात् प्रतीयते।
ताद्रूप्येण च धर्मत्वं तस्मान्नेन्द्रियगोचरः ॥" (श्लो. वा. पृ. ४९)
व्रीहि आदि द्रव्य, यागादि क्रिया, आरुण्यादि गुण ही धर्मरूप माने गए हैं। यद्यपि वे ऐन्द्रियक हैं, तथापि उनमें धर्मता ऐन्द्रियक नहीं मानी जाती, क्योंकि उनमें श्रेयःसाधनत्वेन रूपेण धर्मता मानी जाती है, श्रेयःसाधनता का ज्ञान नियमतः "व्रीहिभिर्यजेत" इत्यादि वैदिक वाक्यों से ही होती है, अतः धर्म वैदिकसमधिगम्य है, धर्म के बोधन में अन्य किसी प्रमाण की सहायता अपेक्षित नहीं] । वैसे ही औपनिषद पुरुष (ब्रह्म) के बोधन में भी वेदान्त-वाक्य अन्य किसी भी प्रमाण या युक्ति की अपेक्षा क्यों करेंगे ?
समाधान—उक्त शङ्का का निराकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं—'न धर्मजिज्ञा-