भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १०४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ १ पा. १ सू. २ |
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ब्रह्मजिज्ञासायाम्, किंतु श्रुत्यादयोऽनुभावादयश्च यथासंभवमिह प्रमाणम्, अनुभवावसानत्वाद् भूतवस्तुविषयत्वाच्च ब्रह्मज्ञानस्य । कर्तव्ये हि विषये नानुभवापेक्षास्तीति श्रुत्यादीनामेव प्रामाण्यं स्यात् , पुरुषाधीनात्मलाभत्वाच्च कर्तव्यस्य । कर्तुमकर्तुम-
भामती
श्रुतीतिहासपुराणस्मृतयः, प्रमाणम्। अनुभवोऽन्तःकरणवृत्तिभेदो ब्रह्मसाक्षात्कारस्तस्याविद्यानिवृत्तिद्वारेण ब्रह्मस्वरूपाविर्भावः प्रमाणफलम्। तच्च फलमिव फलमिति गमयितव्यम्। यद्यपि धर्मजिज्ञासायामपि सामग्र्यां प्रत्यक्षादीनां व्यापारस्तथापि साक्षान्नास्ति। ब्रह्मजिज्ञासायां तु साक्षादनुभवादीनां सम्भवोऽनुभवार्था च ब्रह्मजिज्ञासेत्याह ॐ अनुभवावसानत्वात् ॐ। ब्रह्मानुभवो ब्रह्मसाक्षात्कारः परमपुरुषार्थः निर्मृष्टनिखिलदुःखपरमानन्दरूपत्वादिति। ननु भवतु ब्रह्मानुभवार्था जिज्ञासा, तदनुभव एव त्वशक्यः, ब्रह्मणस्तद्विषयतायोग्यत्वादित्यत आह ॐ भूतवस्तुविषयत्वाच्च ब्रह्मविज्ञानस्य ॐ। व्यतिरेकसाक्षात्कारस्य विकल्परूपो विषयविषयिभावः।
नत्वेवं धर्मज्ञानमनुभवावसानं, तदनुभवस्य स्वयमपुरुषार्थत्वात् , तदनुष्ठानसाध्यत्वात् पुरुषार्थस्य, अनुष्ठानस्य च विनाप्यनुभवं शाब्दज्ञानमात्रादेव सिद्धेरित्याह ॐ कर्तव्ये हीत्यादिना ॐ। न चायं साक्षात्कारविषयतायोग्योऽप्यवर्त्तमानत्वाद् , अवर्त्तमानश्चानवस्थितत्वादित्याह ॐ पुरुषाधीन इति ॐ। पुरुषाधीनत्वमेव लौकिकवैदिककार्याणामाह ॐ कर्तुमकर्तुम् इति ॐ। लौकिकं कार्यमनवस्थितमुदा-
भामती-व्याख्या
सायामिव श्रुत्यादय एव प्रमाणं ब्रह्मजिज्ञासायाम्' । केवल श्रुति, स्मृति, इतिहास, पुराण और सूत्र ग्रन्थ ही ब्रह्म में प्रमाण नहीं, अपितु अन्तःकरण की वृत्ति विशेषरूप अनुभव ( ब्रह्मसाक्षात्कार ) भी प्रमाण है और अविद्या-निवृत्ति के द्वारा ब्रह्मस्वरूप का आविर्भाव उस प्रमाण का फल माना जाता है। वह वस्तुतः फल ( प्रमाण-जन्य ) नहीं, अपितु फल के समान होता है। यद्यपि धर्म-जिज्ञासा में भी वैदिक शब्दों की ग्रहणादि सामग्री श्रावण प्रत्यक्षादि की अपेक्षा करती है, तथापि धर्म में प्रत्यक्षादि का साक्षात् उपयोग नहीं, किन्तु ब्रह्म-जिज्ञासा में अनुभव का साक्षात् उपयोग है, क्योंकि ब्रह्म-जिज्ञासा का ब्रह्म-साक्षात्कार ही प्रयोजन माना जाता है—अनुभवावसानत्वाद् ब्रह्मज्ञानस्य'। ब्रह्म का अनुभव या साक्षात्कार ही परम पुरुषार्थ है, क्योंकि वह निखिल दुःख-रहित परमानन्द-स्वरूप होता है। 'यह जो कहा जाता है कि अनुभवार्था जिज्ञासा, वह उचित नहीं, क्योंकि ब्रह्म में प्रत्यक्ष की योग्यता ही नहीं मानी जाती'—इस आक्षेप का निराकरण किया जाता है—"भूतवस्तुविषयत्वाच्च ब्रह्मविज्ञानस्य"। यद्यपि ब्रह्मरूप साक्षात्कार का ब्रह्म के साथ विषय-विषयीभाव नहीं, तथापि ब्रह्म से व्यतिरिक्त वृत्तिरूप साक्षात्कार की विषयता ब्रह्म में बन जाती है, वृत्ति अनिर्वचनीय और काल्पनिक है, अतः उसकी विषयता भी विकल्पात्मक ( काल्पनिक ) ही होती है। अथवा अविद्या का व्यतिरेक ( अभाव ) जब ब्रह्मरूप और ब्रह्मरूप साक्षात्कार ही अविद्या के व्यतिरेक का साक्षात्कार होता है, तब एक ही ब्रह्म में ब्रह्मत्वेन विषयिता और अविद्याव्यतिरेकत्वेन विषयता—इस प्रकार काल्पनिक विषय-विषयीभाव माना जा सकता है। जैसे ब्रह्म का अनुभव परम पुरुषार्थ है, वैसे धर्म का अनुभव परम पुरुषार्थ नहीं, अपितु धर्म के अनुष्ठान से स्वर्गादिरूप पुरुषार्थ की सिद्धि होती है, धर्म का अनुष्ठान धर्म के शब्द-ज्ञानरूप परोक्ष ज्ञान से भी सम्पन्न हो जाता है, भाष्यकार कहते हैं—"कर्त्तव्ये हि विषये नानुभवापेक्षाऽस्ति"। धर्म साक्षात्कार की विषयता के योग्य भी नहीं होता, क्योंकि ज्ञान-काल में धर्म वर्तमान नहीं होता, अपितु "पुरुषाधीनात्मलाभत्वाच्च कर्तव्यस्य"। केवल जायमान अननुष्ठित यागादि को धर्म नहीं, सम्पादित यागादि को धर्म कहा जाता है, वह पहले सम्भव नहीं। सभी लौकिक